रथ यात्रा : “जब भगवान मंदिर से बाहर आते हैं – पुरी से दुनिया तक, आस्था का महासागर”

Hello Friends, इस बार रथ यात्रा 16 जुलाई से शुरू होकर 24 जुलाई तक मनाया जायेगा | यह एक अदभुत त्यौहार है जिसमें भगवान खुद अपने भक्तों से मिलने आते हैं | तो आइए, इस लेख में मैं और आप रथ यात्रा के हर रंग को – इतिहास, विज्ञान, भक्ति, समाज, और व्यक्ति के दिल पर पड़ने वाले असर को – बहुत करीब से समझेंगे। यह सिर्फ एक यात्रा नहीं है। यह हजारों सालों से चल रही भारत की सांस्कृतिक चेतना का जुलूस है। चलिये फिर यात्रा की शुरुआत करते हैं –

Table of Contents

1. रथ यात्रा (Rath Yatra) : जब ठहर जाती है दुनिया, और चल पड़ते हैं देवता |

Rath Yatra

बचपन में मैंने रथ यात्रा को कभी समझा नहीं था। मुझे लगता था कि भगवान मंदिर में रहते हैं, सिंहासन पर बैठते हैं, हम उनके सामने सिर झुकाते हैं और फिर लौट आते हैं। लेकिन जब मैं पहली बार पुरी गया – उस समय शायद नौ या दस साल का रहा होऊंगा – तो मैं चौंक गया। मैंने देखा कि तीन विशालकाय रथ सड़क पर खड़े हैं। लोग रस्सियाँ पकड़े हुए हैं और भगवान को घसीट रहे हैं ? यह मेरे मन में बैठी ईश्वर की छवि से बिल्कुल अलग था।

मैंने अपने नाना से पूछा – “ये भगवान को क्यों खींच रहे हैं ?” नाना हँसे और बोले – “बेटा, ये खींच नहीं रहे, ये चल रहे हैं अपने भक्तों के बीच। रथ तो बहाना है। असली बात है – भगवान ने अपना सिंहासन छोड़ दिया है, और अब वे गली-गली घूम रहे हैं, सबको दर्शन दे रहे हैं। जो उनसे मिलने नहीं आ सकता, उनके पास भगवान खुद चले जाते हैं।”

उस दिन मैं समझा कि रथ यात्रा सिर्फ एक परंपरा नहीं है। यह एक संदेश है। यह विनम्रता का उत्सव है। यह अहंकार त्यागने का पर्व है। यह सड़क पर उतरा हुआ आध्यात्म है।

तो आइए, इस लेख में हम रथ यात्रा के हर रंग को – इतिहास, विज्ञान, भक्ति, समाज, और व्यक्ति के दिल पर पड़ने वाले असर को – बहुत करीब से समझें। यह सिर्फ एक यात्रा नहीं है। यह हजारों सालों से चल रही भारत की सांस्कृतिक चेतना का जुलूस है।

2. क्यों रथ ? क्यों यात्रा ? पौराणिक मूल की खोज |

रथ यात्रा की कहानी हमें सीधे ले जाती है श्रीकृष्ण के द्वारिका काल में। कहते हैं कि एक बार देवर्षि नारद ने जगन्नाथ जी (जो कृष्ण के ही एक रूप हैं) से कहा कि हे प्रभु, आपने कितने ही दर्शन दिए, लेकिन आपने अपने बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा को कभी अपने साथ कहीं बाहर नहीं ले गए। कृष्ण मुस्कुराए और बोले – “यह बात सही कही। मैंने मथुरा, द्वारिका, वृंदावन तो सब देख लिया, लेकिन मेरे भाई-बहन भी दर्शन चाहते हैं।”

तब कहें कि रथ बनाओ। और ऐसी यात्रा निकालो, जहाँ मैं, मेरा भाई और बहन – तीनों साथ चलें। लेकिन क्यों गुंडिचा मंदिर ? एक अन्य कथा है – गुंडिचा रानी (जगन्नाथ की भक्त) ने प्रार्थना की थी कि हे प्रभु, आप सिर्फ मंदिर में ही क्यों ? आप मेरे घर भी आइए। तब भगवान ने कहा कि ठीक है, हर साल मैं आपके मंदिर (जो अब गुंडिचा मंदिर कहलाता है) नौ दिन के लिए आऊंगा।

एक और बहुत गहरी व्याख्या मिलती है। कहा जाता है कि यह यात्रा उस यात्रा का प्रतीक है, जब माँ यशोदा ने कृष्ण-बलराम को रथ पर बिठाकर नंदगाँव से मथुरा भेजा था। लेकिन वे रथ पर कैदी नहीं थे – वे मुस्कुरा रहे थे, हाथ हिला रहे थे। यही है रथ यात्रा – एक स्वतंत्रता जहाँ ईश्वर स्वयं भक्तों के बीच खुली सड़क पर आता है।

मैं अक्सर सोचता हूँ – क्या यह सब सिर्फ कथा है ? या इसमें कोई और सच्चाई छिपी है ? शायद हमारे पूर्वज समझते थे कि ईश्वर को चार दीवारी के भीतर कैद नहीं किया जा सकता। वह तो हर गली, हर चौराहे, हर उस चौके पर है, जहाँ एक माँ अपने बच्चे को रोटी खिला रही है।

3. पुरी का मंदिर और दारु ब्रह्म का रहस्य

रथ यात्रा समझने से पहले हमें पुरी के जगन्नाथ मंदिर को समझना होगा। यह कोई साधारण मंदिर नहीं है। यह उन चार धामों में से एक है – बद्रीनाथ, द्वारिका, रामेश्वरम, और पुरी। लेकिन पुरी अलग है। यहाँ के विग्रह लकड़ी के बने हैं – जिन्हें दारु ब्रह्म कहा जाता है। और इनकी परंपरा अनोखी है।

कहते हैं कि एक बार भगवान कृष्ण ने राजा इंद्रद्युम्न को सपने में कहा कि समुद्र के किनारे एक अति विशाल वृक्ष है। उसकी लकड़ी से मूर्तियाँ बनाओ। राजा ने खोजा। मिला। लेकिन कोई बनाने वाला नहीं था। तब एक वृद्ध बढ़ई आया – और वह कोई और नहीं, बल्कि स्वयं विश्वकर्मा थे। उन्होंने शर्त रखी – “जब तक मैं बनाऊँ, तब तक दरवाज़ा बंद रखो। कोई अंदर न आए।”

दिन बीतते गए। राजा को धैर्य न रहा। उसने दरवाज़ा खोल दिया। बढ़ई गायब हो गया। और मूर्तियाँ अधूरी रह गईं – बिना हाथ और पैर के। लेकिन राजा को आशीर्वाद मिला कि इन्हीं अधूरी मूर्तियों की पूजा होगी। और वे रहस्यमयी शक्ति – दारु ब्रह्म – उनमें निवास करेगी।

यह कथा सच है या कल्पना – यह विवादास्पद है। लेकिन यह सच है कि पुरी के जगन्नाथ, सुभद्रा और बलराम की मूर्तियाँ हर 12 या 19 साल में बदली जाती हैं। और अद्भुत बात यह है कि पुरानी मूर्तियाँ गुप्त रूप से एक गहरे गड्ढे में दफन कर दी जाती हैं। किसी को पता नहीं कि वे कहाँ हैं। वह स्थान ‘कोईली वैकुंठ’ कहलाता है।

जब मैं पहली बार यह जानकर हैरान हुआ था कि भगवान लकड़ी के हैं, तो मुझे लगा – क्या यह अंधविश्वास है ? लेकिन फिर मैंने सोचा – ईश्वर को रूप देने की हर परंपरा में एक स्थानीयता, एक भौतिकता, एक मानवीयता होती है। लकड़ी का भगवान ही तो सबसे नज़दीक होता है – वह जलता भी है, घुलता भी नहीं, लेकिन रथ पर बैठता है।

4. तीन रथ, तीन देवता, तीन दर्शन

रथ यात्रा की शुरुआत में तीन रथ होते हैं। बड़े से बड़े, रंग-बिरंगे, कपड़ों, पत्थरों, घंटियों और फूलों से लदे। यह कोई रथ नहीं है – यह एक चलता-फिरता मंदिर है। 

(A) पहला रथ – नंदीघोष (जगन्नाथ जी का रथ)

यह सबसे बड़ा और सबसे ऊँचा रथ है। इसके 16 पहिए होते हैं। रंग – पीला और लाल। पीला ज्ञान का रंग है, लाल ऊर्जा का। इस रथ का नाम है ‘नंदीघोष’ – नंदी यानी आनंद, घोष यानी ध्वनि। यानी आनंद की ध्वनि जो पूरे ब्रह्मांड में गूंजती है। इस रथ की ऊँचाई लगभग 45 फुट होती है। उस पर चढ़ने वाली सीढ़ियाँ हैं। और ऊपर जगन्नाथ जी विराजमान होते हैं – बड़ी-बड़ी आँखें, हाथ नहीं, लेकिन मुस्कान हटी नहीं।

(B) दूसरा रथ – तालध्वज (बलराम जी का रथ)

यह थोड़ा छोटा है, 14 पहियों वाला। रंग – हरा और लाल। हरा प्रकृति का प्रतीक है, कृषि का। बलराम को हलधारी कहा जाता है। उनके रथ पर हल और मूसल का चिह्न बना होता है। अगर जगन्नाथ ज्ञान के देवता हैं, तो बलराम शक्ति और कृषि आधारित समाज के नायक हैं। इस रथ का नाम ‘तालध्वज’ है – ताल यानी ताड़ के वृक्ष का प्रतीक, जो शक्ति देता है।

(C) तीसरा रथ – दर्पदलन (सुभद्रा जी का रथ)

सबसे छोटा, 12 पहियों वाला। रंग – काला और लाल। काला – रहस्य का, अज्ञात का। यह रथ बहन सुभद्रा का है। दर्पदलन का अर्थ है – अहंकार का नाश करने वाला। यह रथ हमें सिखाता है कि बहन का स्थान कितना महत्वपूर्ण है। भारतीय परंपरा में रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के प्रेम का है, लेकिन रथयात्रा में सुभद्रा अपने दोनों भाइयों के बीच चलती हैं – यह संतुलन है।

मैंने एक बार किसी वृद्ध पुरोहित से पूछा – “इन रंगों का क्या महत्व है ?” उन्होंने कहा – “बेटा, देखो – जगन्नाथ पीले हैं तो सूर्य की तरह। बलराम हरे हैं तो पृथ्वी की तरह। सुभद्रा काली हैं तो आकाश की तरह। तीनों मिलकर ही सृष्टि चलती है।”

5. रथ बनाने की कला – जहाँ लकड़ी जीवित हो जाती है |

रथ कोई कारखाना नहीं बनाता। रथ बनाते हैं महाराणा परिवार के लोग। यह परंपरा सैकड़ों पीढ़ियों से चली आ रही है। ये लोग पुरी के पास एक छोटे से गाँव में रहते हैं। उन्हें किसी IIT ने नहीं सिखाया है। उन्हें न तो CAD डिज़ाइन आता है, न इंजीनियरिंग मैकेनिक्स। लेकिन वे जो रथ बनाते हैं, उसकी मजबूती और डिज़ाइन देखकर इंजीनियर भी हैरान रह जाते हैं।

रथ बनाने के लिए लकड़ी चुनने की एक प्राचीन विधि है। वे विशेष पेड़ों की लकड़ी लेते हैं – जैसे फांसी, धौरा, असन। लकड़ियाँ सुखाई जाती हैं, कीलों का उपयोग नहीं होता, सब कुछ खूँटियों और जोड़ों से बनाया जाता है। अक्षय तृतीया के दिन रथ निर्माण का संकल्प होता है और फिर लगातार काम चलता है।

मैंने सुना है कि रथों के पहियों में कोई नट-बोल्ट नहीं होता। लकड़ी के बने होते हैं। और वे रथ इतने भारी होते हैं कि उन्हें खींचने के लिए हजारों लोग लगते हैं। फिर भी, वे रथ तब तक टूटते नहीं, जब तक कि यात्रा पूरी न हो जाए। एक साल ऐसा भी आया था जब बारिश से लकड़ी गीली हो गई और रथ हिल नहीं पाया। लेकिन अगले ही दिन धूप आ गई और रथ चल पड़ा।

मेरे एक मित्र ने जो पुरी के पास रहता है, बताया कि महाराणा परिवार के लोग रथ बनाते वक्त किसी से बात नहीं करते। वे मौन व्रत रखते हैं। क्योंकि वे समझते हैं कि यह सिर्फ एक वाहन नहीं है – यह स्वयं एक देवता है।

6. स्नान यात्रा से रथ यात्रा (Rath Yatra) तक – वे दिन जब देवता बीमार पड़ जाते हैं |

यह बात बड़ी अजीब लगती है – ईश्वर बीमार होता है ? हाँ, पुरी की परंपरा में ऐसा माना जाता है। ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन ‘स्नान यात्रा’ होती है। तीनों देवताओं को 108 घड़ों जल से स्नान कराया जाता है। यह स्नान इतना भव्य होता है कि लोग दूर-दूर से देखने आते हैं।

लेकिन अगले ही दिन से देवता ‘अनसर’ में चले जाते हैं। यानी बीमार। माना जाता है कि इतने ठंडे जल से स्नान करने के बाद उन्हें जुकाम, बुखार हो जाता है। अब अगले 15 दिनों तक कोई उनके दर्शन नहीं कर सकता। मंदिर के पट बंद रहते हैं। केवल राजवैद्य उनकी सेवा करते हैं। उन्हें विशेष औषधियाँ, दूध, फल चढ़ाए जाते हैं।

15 दिन बाद ‘नवयौवन’ का दिन आता है। तब देवताओं को नए रूप में सजाया जाता है। मानो वे ठीक हो गए हों, तरोताजा हो गए हों। फिर अगले दिन ही रथयात्रा निकलती है।

इस परंपरा को देखकर मुझे लगता है कि हमारे पूर्वजों ने ईश्वर को एक कठोर, दंड देने वाले शासक के रूप में नहीं सोचा था। उन्होंने ईश्वर को परिवार का एक सदस्य माना था – जो बीमार पड़ता है, जिसकी सेवा होती है, जो छुट्टी मनाता है, और जो घूमने जाता है। यह नाता डर का नहीं, लगाव का है।

7. छेरा पहंरा – जब राजा झाड़ू लगाता है |

रथ यात्रा (Rath Yatra) से एक दिन पहले ‘छेरा पहंरा’ होता है। यह शब्द सुनते ही पुरी में हलचल मच जाती है। ‘छेरा’ का अर्थ है छूना या स्पर्श करना, और ‘पहंरा’ यानी पहरा देना। लेकिन असल में यह एक ऐसी रस्म है जिसमें गजपति राजा (उड़ीसा के पारंपरिक राजा) भगवान जगन्नाथ के रथ को झाड़ू लगाते हैं।

एक सोने की झाड़ू लेकर राजा खुद रथ के चारों ओर घूमता है और पानी डालते हुए रास्ता साफ करता है। यह रस्म कहती है कि सबसे बड़ा शासक भी जब भगवान के सामने आता है, तो उसे झुकना पड़ता है। यह कोई राजनीतिक प्रदर्शन नहीं है – यह विनम्रता का सार है।

मैं जब पहली बार यह जानकर स्तब्ध रह गया था कि एक राजा सड़क पर झाड़ू लगा रहा है, तो मेरे पिता ने कहा – “यही तो भारत है। यहाँ राजा भी दास है, और दास भी राजा है।”

आज के दौर में जब नेता अपनी तस्वीरें सड़कों पर लगवाते हैं, अपनी मूर्तियाँ खड़ी करवाते हैं, तब यह रस्म हमें सिखाती है कि सत्ता अस्थायी है, और सेवा शाश्वत है।

8. वह दिन – जब रथ खिंचता है और आँखें नम हो जाती हैं |

rath yatra

रथ यात्रा (Rath Yatra) का मुख्य दिन – आषाढ़ शुक्ल द्वितीया। पुरी शहर रातों-रात बदल जाता है। हर गली में चलने की जगह नहीं होती। हर तरफ पीताम्बर पहने भक्त, माथे पर चंदन, हाथों में रस्सी। कोई बूढ़ा है, कोई जवान है, कोई बच्चा कंधे पर बैठा है। हर किसी के चेहरे पर एक ही भाव – एक अनोखा उत्साह, जो पागलपन के कगार पर है, लेकिन पूरी तरह पवित्र है।

सुबह ‘पहंडी’ निकलती है – यानी देवता मंदिर से बाहर निकलते हैं, रथ पर चढ़ते हैं। यह दृश्य अविश्वसनीय होता है। ढोल, नगाड़े, शंख, घंटियाँ। भक्त ‘जय जगन्नाथ’ के नारे लगाते हैं। और फिर…

और फिर राजा आता है। छेरा पहंरा करता है। फिर रस्सी खिंचती है।

अब यह रस्सी कोई आम रस्सी नहीं है – यह मोटी, बलवान, रेशमी डोर होती है, जिसे हाथों-हाथ लाखों हाथ छूते हैं। मैंने अपनी आँखों से देखा है कि जब रथ पहली बार हिलता है, तो लोग रोने लगते हैं। वे रोते नहीं हैं – वे फूट-फूट कर रोते हैं। क्योंकि उन्हें लगता है कि भगवान ने उनकी पुकार सुन ली। भगवान उन्हीं की तरह सड़क पर उतर आए हैं।

मुझे याद है, 2014 की रथयात्रा में एक बुजुर्ग महिला मेरे बगल में खड़ी थी। उसके हाथ काँप रहे थे। रस्सी उसकी पहुँच से थोड़ी दूर थी। मैंने उसे रस्सी थमा दी। उसने रस्सी छुआ और आँखें बंद कर लीं। एक मिनट बाद जब उसने आँखें खोलीं, तो बोली – “बेटा, अब मर सकती हूँ। जगन्नाथ ने मुझे दर्शन दे दिए।”

उस दिन मैं समझा कि रथ यात्रा केवल एक त्योहार नहीं है – यह लाखों लोगों के जीवन की सबसे बड़ी तारीख है।

9. गुंडिचा घर – जब भगवान अपनी मौसी के घर जाते हैं |

रथ जब गुंडिचा मंदिर पहुँचता है, तो उसे ‘गुंडिचा घर’ कहा जाता है। मान्यता है कि गुंडिचा रानी जगन्नाथ की मौसी थीं। तो यह यात्रा मौसी के घर जाने के समान है। यहाँ नौ दिन देवता विश्राम करते हैं। यह नौ दिन पुरी में एक अलग ही उल्लास होता है। हर दिन कोई न कोई विशेष रस्म होती है – सुनावेशा (सोने-चाँदी के आभूषणों से सज्जा), अधर पणा (दूध-मलाई का भोग), रथ बंकन (रथ को थोड़ा झुकाना)।

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण दिन है बहुड़ा यात्रा का – वापसी की यात्रा। नौवें दिन फिर से रथ खिंचते हैं, लेकिन इस बार थोड़ी जल्दी में, क्योंकि देवता अपने मुख्य मंदिर लौटना चाहते हैं। वापसी पर ‘रास लीला’ की झाँकी निकलती है। ऐसा माना जाता है कि बहुड़ा यात्रा के दिन वर्षा होना बहुत शुभ होता है। कई बार देखा गया है कि जब रथ लौटते हैं, तो अचानक बादल छा जाते हैं और हल्की बूंदाबादी होने लगती है। भक्त कहते हैं – “देखो, देवता रो रहे हैं अपने मंदिर की याद में।”

10. वैज्ञानिक दृष्टि – क्या है इस यात्रा का छिपा अर्थ ?

जब हम रथ यात्रा को केवल धर्म से देखते हैं, तो कुछ लोग इसे अंधविश्वास कहकर खारिज कर देते हैं। लेकिन अगर हम इसे सामाजिक विज्ञान, मनोविज्ञान और पारिस्थितिकी की दृष्टि से देखें, तो यह एक अद्भुत व्यवस्था है।

पहला – सामूहिक चेतना का निर्माण

हज़ारों वर्षों से यह एक ही दिन, एक ही तरीके से हो रहा है। यह एक अनोखा सामाजिक बंधन बनाता है। एक ओडिया व्यक्ति चाहे अमेरिका में हो, उस दिन वह मानसिक रूप से पुरी में होता है। यह समुदाय को एक सूत्र में पिरोता है।

दूसरा – वर्गभेद का विघटन 

रथ यात्रा के दिन कोई जाति नहीं पूछता, कोई ऊँच-नीच नहीं देखता। रस्सी पर सभी के हाथ एक जैसे होते हैं – गीले पसीने से तर, कभी-कभी खून से भीगे (जब रस्सी घिस जाए)। एक ब्राह्मण और एक हरिजन साथ-साथ खिंचते हैं। यह संविधान से पहले की सबसे बड़ी समानता है।

तीसरा – कृषि से जुड़ा आर्थिक आयाम 

रथ यात्रा आषाढ़ मास में होती है। यह वह समय है जब खेतों में बुआई हो चुकी होती है और फसल के आने में अभी समय है। यानी किसानों के पास थोड़ा खाली समय होता है। उस खालीपन को उत्सव से भरा जाता है ताकि मानसिक तनाव न हो। साथ ही, व्यापार, दान, भोजन का वितरण – यह अर्थव्यवस्था का एक चक्र है।

चौथा – पर्यावरणीय संतुलन

 रथ पूरी तरह लकड़ी के बनते हैं, जो विशेष पेड़ों से आती हैं। हर साल नए रथ बनते हैं और पुराने रथों की लकड़ी का उपयोग मंदिर के अन्य कामों में या ईंधन के रूप में किया जाता है। यह एक टिकाऊ परंपरा है।

 

11. महाप्रसाद – जहाँ भगवान खुद पकाते हैं, और हम खाते हैं |

रथ यात्रा की एक और अद्भुत परंपरा है ‘महाप्रसाद’। पुरी के जगन्नाथ मंदिर की रसोई दुनिया की सबसे बड़ी रसोई में से एक है। कहा जाता है कि यहाँ सात बड़ी हाँडियों में अन्न पकता है, और वह एक साथ पकता है – पहले ऊपर की हाँडी पकती है, फिर नीचे की। यह वैज्ञानिक आश्चर्य है कि सातों हाँडियों में अन्न एक साथ कैसे पक जाता है? रसोइये कहते हैं – “यह भगवान की इच्छा है।”

रथ यात्रा के दिन यह महाप्रसाद बाँटा जाता है। सूखा अन्न, छना, खीर, दालमा, बड़ा, पिठा – असंख्य व्यंजन। कोई भी भूखा नहीं रहता। मैंने देखा है कि परदेसी, विदेशी, लावारिस लोग, भिखारी – सभी एक ही पंक्ति में बैठते हैं और एक ही थाली में खाते हैं। यह सिखाता है कि भोजन केवल पेट भरने के लिए नहीं है – यह आत्मा को जोड़ने के लिए है।

12. रथ यात्रा की त्रासदियाँ – जब भीड़ माँ बनती है और डाकू भी

हर साल रथ यात्रा में लाखों लोग आते हैं। कभी-कभी यह आतंक में बदल जाता है। 1885 में भगदड़ मची थी, 1969 में कई लोग कुचल गए थे, 1990 में भी एक बड़ी दुर्घटना हुई थी। लेकिन हैरानी की बात यह है कि रथ यात्रा कभी रुकी नहीं। हर बार व्यवस्था बेहतर हुई। अब पुलिस, एनडीआरएफ, मेडिकल टीमें, सीसीटीवी कैमरे – सब कुछ होता है।

लेकिन एक दिलचस्प बात – रथ यात्रा के दिन चोरी, लूटपाट के मामले लगभग शून्य हो जाते हैं। मैंने एक पुलिस अफसर से पूछा – “यह कैसे संभव है ?” उसने कहा – “साहब, जो चोर है, वो भी इस दिन चोरी नहीं करता। क्योंकि उसे लगता है कि अगर आज जगन्नाथ को रोका, तो मेरा भला नहीं होगा।”

यानी डर नहीं, श्रद्धा – वह भी एक व्यवस्था है।

13. रथ यात्रा गाँव-गाँव – स्थानीय परंपराओं की बहार

हालाँकि पुरी की रथ यात्रा (Rath Yatra) सबसे प्रसिद्ध है, लेकिन भारत के कोने-कोने में रथयात्रा निकलती है। पश्चिम बंगाल में (महेश की रथ यात्रा, इस्कॉन कोलकाता की रथ यात्रा), गुजरात में (जगन्नाथ मंदिर, अहमदाबाद), राजस्थान में (नाथद्वारा में श्रीनाथजी की रथ यात्रा), दिल्ली में (इस्कॉन), मध्य प्रदेश में (मैहर, उज्जैन)।

लेकिन मैं आपको सबसे अनोखी रथ यात्रा के बारे में बताता हूँ – जो होती है शेरपुर, पश्चिम बंगाल में। यहाँ रथ यात्रा में किसी रस्सी को नहीं खिंचता। लोग हाथ जोड़कर खड़े रहते हैं, और रथ अपने आप चलता है (एक झुकी हुई सड़क के कारण)। लेकिन भक्त मानते हैं कि रथ बिना किसी यांत्रिक सहायता के चलता है। मैंने वहाँ जाकर देखा – तर्क और श्रद्धा के बीच की रेखा बहुत पतली है।

14. रथ यात्रा वैश्विक – जब विदेशों में भी बहती है गंगा

जब स्वामी प्रभुपाद (इस्कॉन के संस्थापक) 1960 के दशक में अमेरिका गए, तो उन्होंने देखा कि पश्चिमी युवा आध्यात्मिकता की तलाश में हैं। उन्होंने पहली बार 1967 में सैन फ्रांसिस्को में रथ यात्रा निकाली। लोग हँसे – “तुम यहाँ रथ कैसे खींचोगे ?” लेकिन जब रथ चला, तो अमेरिकी युवा भी ‘हरे कृष्ण’ मंत्र गाने लगे।

आज लंदन, न्यूयॉर्क, पेरिस, बर्लिन, सिडनी, मॉरीशस, दुबई, सिंगापुर – हर जगह रथ यात्रा निकलती है। इसे ‘फेस्टिवल ऑफ इंडिया’ भी कहा जाता है। मैंने एक वृत्तचित्र देखा था, जिसमें एक अफ्रीकी-अमेरिकी महिला रथ खिंच रही थी और कह रही थी – “मुझे नहीं पता यह भगवान कौन है, लेकिन जब मैं रस्सी खींचती हूँ, तो मेरे दिल में जो शांति आती है, वह मैंने कभी चर्च में नहीं पाई।”

यह है रथ यात्रा (Rath Yatra) का वैश्विक चमत्कार – यह किसी को धर्म परिवर्तन नहीं कराती, लेकिन यह किसी को अंदर से बदल देती है।

15. आलोचना – क्या रथ यात्रा बहुत व्यावसायिक हो गई है ?

हर पहलू की तरह, रथयात्रा की भी कमियाँ हैं। आज पुरी में रथ यात्रा के दिन होटल के दाम आसमान छूते हैं। छोटी-सी दुकान भी 10 गुने दाम पर सामान बेचती है। दर्शन के नाम पर ‘प्रायोजन’ और ‘वीआईपी दर्शन’ की व्यवस्था ने आम आदमी को किनारे कर दिया है। कई बार रथों पर चढ़ने के लिए पैसे माँगे जाते हैं।

एक बुजुर्ग ने मुझसे कहा – “पहले लोग रथ खिंचते थे मन्नत पूरी होने पर। अब लोग रथ खिंचते हैं सेल्फी लेने के लिए।”

यह कड़वा सच है। लेकिन इसके बावजूद, जब सुबह-सुबह शंख बजता है और रथ हिलता है – उस समय वहाँ कोई VIP नहीं होता, कोई प्रायोजक नहीं होता। वहाँ सिर्फ एक श्रद्धा होती है – नंगी, निर्वस्त्र, असली।

16. निजी संस्मरण – जब मैं खो गया और पा लिया

मैं आपको अपनी एक कहानी सुनाता हूँ। साल 2018 की बात है। मैं रथ यात्रा देखने गया था। भीड़ इतनी थी कि दो कदम चलना भी मुश्किल था। अचानक मेरा फोन चोरी हो गया। मेरे पास न पैसे थे, न कोई नंबर याद था। मैं घबरा गया।

तभी एक स्थानीय दुकानदार ने मुझे देखा – “क्या हुआ ?” मैंने बताया। उसने बिना कुछ सोचे मुझे 500 रुपये दिए – “जा, घर पहुँच जा।” मैंने नाम पूछा तो बोला – “जगन्नाथ दास।”

मैं रथ के पास गया। रस्सी खींची। आँखें बंद करके कहा – “हे जगन्नाथ, अगर तू सच में है, तो मेरा फोन वापस ला दे।”

दो घंटे बाद मुझे एक अनजान नंबर से कॉल आया – “साहब, आपका फोन मिल गया है। सामने चौराहे पर मिलिए।” गया तो देखा – एक चोर नहीं, एक आम आदमी खड़ा था। बोला – “बस में पड़ा मिला।”

अब आप इसे संयोग कहें या चमत्कार – लेकिन उस दिन मैं भी उन लाखों की तरह हो गया, जो कहते हैं – “जगन्नाथ सच में हैं।” 

17. दर्शन का मूल मंत्र – हम क्यों खिंचते हैं रथ ?

दार्शनिक दृष्टि से देखें तो रथ यात्रा का अर्थ बहुत गहरा है। हम अपने अहंकार के रथ पर बैठे होते हैं। हमें लगता है कि हम सब कुछ हैं। लेकिन रथयात्रा में आप देखेंगे – भगवान रथ पर हैं, लेकिन वह खुद नहीं खींच रहे। उन्हें खींचने वाले भक्त हैं। यानी ईश्वर चाहता है कि हम उसके वाहन बनें, न कि वह हमारा।

एक बार मैंने किसी संत से पूछा – “भगवान को खींचना पाप नहीं है?” उन्होंने कहा – “बेटा, भगवान खिंचता नहीं, वह चलता है। हम सिर्फ रास्ता दिखाते हैं। रस्सी तो बस प्रतीक है – प्रतीक इस बात का कि हम भी चाहते हैं कि हमारे जीवन में ईश्वर चले।”

18. रथयात्रा और सिनेमा – फिल्मों में अमर यह पर्व

रथयात्रा पर कई फिल्में और गीत बने हैं। ओडिया सिनेमा की शुरुआत हुई थी ‘सीता बिबाह’ से, लेकिन रथ यात्रा पर ‘जगन्नाथ’ नाम की कई फिल्में आईं। हिंदी सिनेमा में ‘जगन्नाथ रथ’ पर कोई बड़ी फिल्म नहीं बनी, लेकिन ‘श्री 420’, ‘मदर इंडिया’ जैसी फिल्मों में रथयात्रा के दृश्य मिल जाते हैं। एक बहुत प्रसिद्ध गीत है – “रथ के पहिए बजे घुँघरू” – यह गीत सुनते ही मन में रथयात्रा की छवि बन जाती है।

सौभाग्य से, आज सोशल मीडिया ने रथयात्रा को और अधिक सुलभ बना दिया है। लाइव स्ट्रीमिंग, 4K वीडियो, ड्रोन शॉट्स – सब कुछ। लेकिन असली अनुभव तो वहाँ खड़े होने का है – जहाँ शोर इतना होता है कि अपनी आवाज़ सुनाई नहीं देती, और फिर भी अंदर एक गहरी शांति होती है।

19. रथ यात्रा के अनदेखे चेहरे – मेला, खिलौने, और बच्चों की मुस्कान

रथ यात्रा (Rath Yatra) सिर्फ देवताओं का त्योहार नहीं है – यह बच्चों का स्वर्ग है। मेले लगते हैं। खिलौनों की दुकानें – लकड़ी के छोटे रथ, मिट्टी के जगन्नाथ, गुब्बारे, चूड़ियाँ, चरखी, खोमचे वालों की मीठी बोली – “ले लो बाबू, जगन्नाथ जी का प्रसाद।”

मुझे याद है, एक बार एक छोटे बच्चे ने अपने पिता से कहा – “पापा, ये रथ इतना बड़ा क्यों है ?” पिता ने कहा – “बेटा, क्योंकि इसमें बहुत सारे लोगों की खुशियाँ सवार होती हैं।” 

20. निष्कर्ष – रथ थम जाता है, लेकिन यात्रा चलती रहती है

रथ यात्रा (Rath Yatra) समाप्त होती है बहुड़ा यात्रा के साथ। देवता वापस अपने मंदिर लौटते हैं। रथों को अलग किया जाता है। लकड़ियाँ संग्रहित कर ली जाती हैं। सड़कें खाली हो जाती हैं। पुरी फिर से साधारण शहर बन जाता है।

लेकिन जो बचता है – वह है लाखों चेहरों पर एक हल्की सी मुस्कान, उन आँखों में एक नमी, और मन में एक विश्वास कि हाँ, हमने उस दिन कुछ तो अलग किया था। हमने भीड़ में खुद को ढूंढा। हमने अराजकता में व्यवस्था देखी। हमने धक्कों में प्रेम पाया।

रथ यात्रा (Rath Yatra) सिखाती है कि जीवन एक यात्रा है। कभी हम रथ पर होते हैं, कभी हम रस्सी खींचते हैं। लेकिन असली धर्म है चलते रहना – एक-दूसरे के साथ, एक-दूसरे के लिए।

और हर साल, आषाढ़ में, वही रथ फिर से बनता है। वही रस्सी खिंचती है। वही नारा गूंजता है – “जय जगन्नाथ।”

Frequently Asked Questions (FAQ)

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प्रश्न 1: रथ यात्रा (Rath Yatra) क्या है ?
उत्तर : रथ यात्रा एक हिंदू त्योहार है, जिसमें भगवान जगन्नाथ (श्रीकृष्ण का एक रूप), उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा को विशाल रथों पर बिठाकर सड़कों पर यात्रा कराई जाती है। यह पुरी (ओडिशा) की सबसे प्रसिद्ध यात्रा है, लेकिन अब पूरे भारत और विदेशों में भी यह आयोजित होती है।

प्रश्न 2: रथ यात्रा (Rath Yatra) कब होती है ?
उत्तर : यह आषाढ़ मास (हिंदू कैलेंडर का तीसरा महीना) के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को होती है। ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार, यह आमतौर पर जून या जुलाई के महीने में आती है।

प्रश्न 3: रथ यात्रा (Rath Yatra) कितने दिन चलती है ?
उत्तर : कुल 9 दिन। पहले दिन रथ गुंडिचा मंदिर (जिसे ‘मौसी के घर’ के नाम से भी जाना जाता है) के लिए निकलते हैं। वहाँ 9 दिन रुकने के बाद, 10वें दिन ‘बहुड़ा यात्रा’ या वापसी यात्रा होती है। 12वें दिन ‘सुनावेशा’ के बाद देवता मुख्य मंदिर लौटते हैं।

प्रश्न 4: रथ यात्रा (Rath Yatra) का मुख्य केंद्र कहाँ है ?
उत्तर : ओडिशा का पुरी शहर, जहाँ विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर स्थित है। यह चार धामों में से एक है।

प्रश्न 5: भगवान जगन्नाथ के हाथ-पैर क्यों नहीं हैं ?
उत्तर : पौराणिक कथा के अनुसार, राजा इंद्रद्युम्न ने विश्वकर्मा (देवताओं के बढ़ई) से मूर्तियाँ बनाने का आग्रह किया। विश्वकर्मा ने शर्त रखी कि मूर्तियाँ बनते समय कोई दरवाजा न खोले। राजा अधीर हो गया और उसने दरवाजा खोल दिया। विश्वकर्मा गायब हो गए, और मूर्तियाँ अधूरी रह गईं – हाथ, पैर अधूरे। लेकिन एक आकाशवाणी हुई कि इन्हीं मूर्तियों की पूजा अधूरे रूप में होगी, और वे ‘दारु ब्रह्म’ (लकड़ी में परम ब्रह्म) कहलाएँगी।

प्रश्न 6: रथ यात्रा (Rath Yatra) क्यों निकाली जाती है ?
उत्तर : तीन प्रमुख कारण हैं :

  1. मौसी के घर : कहते हैं कि गुंडिचा रानी (जगन्नाथ की मौसी) ने भगवान को अपने घर बुलाया था। तब भगवान हर साल मौसी के घर जाते हैं।

  2. भाई-बहन का प्रेम : सुभद्रा भी दर्शन चाहती थीं, इसलिए कृष्ण-बलराम उन्हें साथ लेकर चलते हैं।

  3. भक्तों से मिलन : भगवान मंदिर की चारदीवारी से बाहर आकर सड़क पर आते हैं, ताकि हर व्यक्ति – चाहे वह मंदिर में प्रवेश न कर सके – उनके दर्शन कर सके।

प्रश्न 7: क्या रथ यात्रा (Rath Yatra) केवल जगन्नाथ से संबंधित है ?
उत्तर : मूल रूप से हाँ, लेकिन इस्कॉन (ISKCON) ने इसे कृष्ण चेतना के प्रसार के लिए दुनिया भर में फैलाया। आज नाथद्वारा, द्वारिका, उज्जैन और कई मंदिरों में भी रथयात्रा निकलती है।

प्रश्न 8: गुंडिचा मंदिर क्या है ?
उत्तर : पुरी के जगन्नाथ मंदिर से लगभग 2-3 किलोमीटर दूर स्थित एक मंदिर। मान्यता है कि यह गुंडिचा रानी (जगन्नाथ की मौसी) का घर है। देवता यहाँ 9 दिन रुकते हैं।

प्रश्न 9: तीनों रथों के नाम क्या हैं ?
उत्तर :

  • जगन्नाथ जी का रथ : नंदीघोष (16 पहिए, पीला-लाल रंग)

  • बलराम जी का रथ : तालध्वज (14 पहिए, हरा-लाल रंग)

  • सुभद्रा जी का रथ : दर्पदलन (12 पहिए, काला-लाल रंग)

प्रश्न 10: रथ कौन बनाता है ?
उत्तर : पुरी के ‘महाराणा’ परिवार। यह परंपरा सैकड़ों पीढ़ियों से चली आ रही है। वे किसी भी आधुनिक उपकरण या कील का उपयोग किए बिना, पूरी तरह लकड़ी के जोड़ों से रथ बनाते हैं।

प्रश्न 11: क्या हर साल नए रथ बनते हैं ?
उत्तर : हाँ। हर साल अक्षय तृतीया के दिन नए रथों का निर्माण शुरू होता है। पुराने रथों की लकड़ी का उपयोग मंदिर के ईंधन या अन्य निर्माणों में किया जाता है।

प्रश्न 12: रथों की लकड़ी कहाँ से आती है ?
उत्तर : ओडिशा के जंगलों से – विशेष रूप से ‘फांसी’, ‘धौरा’, और ‘असन’ जैसी लकड़ियाँ। इन्हें चुनने की एक प्राचीन विधि है, जिसमें केवल वृद्ध और स्वस्थ पेड़ों का चयन होता है।

प्रश्न 13: ‘छेरा पहंरा’ क्या है ?
उत्तर
: यह एक अद्भुत रस्म है, जिसमें उड़ीसा के गजपति राजा (पारंपरिक शासक) सोने की झाड़ू से रथों के आसपास सफाई करते हैं और पानी छिड़कते हैं। यह दर्शाता है कि सबसे बड़ा राजा भी भगवान का सेवक है।

प्रश्न 14: रथ कैसे खिंचते हैं ?
उत्तर : हजारों-लाखों भक्त मिलकर मोटी रस्सियाँ पकड़ते हैं। ‘जय जगन्नाथ’ के नारे के साथ रस्सी खिंचती है। ऐसी मान्यता है कि रथ खिंचवाने से सारे पाप धुल जाते हैं और मनोकामनाएँ पूरी होती हैं।

प्रश्न 15: ‘पहंडी’ क्या है ?
उत्तर : वह दृश्य जब देवताओं को मंदिर के गर्भगृह से बाहर निकालकर रथों तक लाया जाता है। ढोल, नगाड़े, शंख और घंटियों के साथ यह अत्यंत भव्य होता है।

प्रश्न 16: ‘अनसर’ क्या होता है ?
उत्तर : स्नान यात्रा (ज्येष्ठ पूर्णिमा) के बाद देवता 15 दिनों तक ‘बीमार’ माने जाते हैं। इस दौरान मंदिर के पट बंद रहते हैं, और कोई दर्शन नहीं कर सकता। इसे ‘अनसर’ कहते हैं। 15 दिन बाद ‘नवयौवन’ के दिन देवता नए रूप में तैयार होते हैं।

प्रश्न 17: ‘बहुड़ा यात्रा’ क्या है ?
उत्तर : वापसी यात्रा। 9 दिन गुंडिचा मंदिर में रहने के बाद, देवता फिर से अपने मूल मंदिर लौटते हैं। यह यात्रा थोड़ी जल्दी में मानी जाती है, क्योंकि भगवान अपने घर लौटना चाहते हैं।

प्रश्न 18: पुरी रथयात्रा देखने कब जाना चाहिए ?
उत्तर : रथयात्रा वाले दिन से कम से कम 2-3 दिन पहले पहुँचना उचित रहता है। रथयात्रा के दिन पुरी शहर पूरी तरह पैदल यात्रियों के लिए बंद हो जाता है। ‘बहुड़ा यात्रा’ भी देखने लायक होती है।

प्रश्न 19: क्या महिलाएँ रथ खिंच सकती हैं ?
उत्तर : बिल्कुल। रथयात्रा में कोई लिंग भेद नहीं है। महिलाएँ, बच्चे, बुजुर्ग – सभी रथ खिंच सकते हैं। हाल के वर्षों में महिलाओं की भागीदारी काफी बढ़ी है।

प्रश्न 20: क्या विदेशी लोग भी रथ खिंच सकते हैं ?
उत्तर : हाँ। रथयात्रा सबके लिए खुली है। इस्कॉन द्वारा आयोजित वैश्विक रथयात्राओं में तो विदेशी ही मुख्य भागीदार होते हैं। पुरी में भी विदेशी पर्यटक बिना किसी भेदभाव के रस्सी पकड़ते हैं।

प्रश्न 21: क्या रथ खिंचवाने के लिए कोई शुल्क है ?
उत्तर : नहीं, रथ खिंचवाना पूरी तरह निःशुल्क और स्वैच्छिक है। हालाँकि, कुछ स्थानों पर VIP दर्शन या विशेष रस्सी का विकल्प दिया जाता है (जिसके लिए दान लिया जाता है), लेकिन आम भक्त कभी पैसे नहीं देता।

प्रश्न 22: रथ यात्रा (Rath Yatra) में रहने और खाने की क्या व्यवस्था है ?
उत्तर : पुरी में सरकारी और निजी गेस्ट हाउस, धर्मशालाएँ और होटल हैं। रथयात्रा के दिन सरकार विशेष शिविर लगाती है। महाप्रसाद (मंदिर का भोजन) सभी के लिए खुला होता है। बाहरी खाने की स्टॉलें भी लगती हैं।

प्रश्न 23: क्या रथयात्रा के दिन पुरी में नहाने या शौचालय की समस्या होती है ?
उत्तर : यह एक गंभीर मुद्दा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में प्रशासन ने हजारों पोर्टेबल शौचालय और स्नान की अस्थायी व्यवस्था की है। फिर भी, महिलाओं और बुजुर्गों को कठिनाई हो सकती है – इसलिए तैयार होकर जाएँ।

प्रश्न 24: क्या रथ यात्रा (Rath Yatra) सुरक्षित है ?
उत्तर : पहले भगदड़ और कुचले जाने की घटनाएँ हुई हैं (जैसे 1885, 1969, 1990)। लेकिन अब प्रशासन बहुत सतर्क है – CCTV कैमरे, मेडिकल टीमें, NDRI, पुलिस बल, रस्सियों के बीच बैरियर लगाए जाते हैं। यदि आप नियमों का पालन करें और भीड़ में धक्का-मुक्की से बचें, तो यह अपेक्षाकृत सुरक्षित है।

प्रश्न 25: चोरी-जेबतराशी का डर है ?
उत्तर : रथ यात्रा (Rath Yatra) के दिन आश्चर्यजनक रूप से चोरी के मामले बहुत कम हो जाते हैं – क्योंकि चोर भी मानते हैं कि यह दिन उनके लिए भी पवित्र है। फिर भी, सतर्कता आवश्यक है। कीमती सामान, जेवर घर पर छोड़ें।

प्रश्न 26: बच्चों के साथ जाना उचित है ?
उत्तर : हाँ, लेकिन बहुत सावधानी के साथ। बच्चों को हाथ से न छोड़ें। उनके गले में नाम और फोन नंबर वाला पर्चा लटकाएँ। कंधे पर बैठाने से भीड़ में देखने में मदद मिलती है।

प्रश्न 27: महाप्रसाद क्या है ?
उत्तर : जगन्नाथ मंदिर में भगवान को चढ़ाया गया भोजन, जिसे बाद में भक्तों में बाँटा जाता है। यह सात हाँडियों में पकता है और इसमें दालमा, खीर, छना, बड़ा, सूखी सब्जी, पिठा आदि शामिल होते हैं। यह अविश्वसनीय रूप से स्वादिष्ट और पवित्र माना जाता है।

प्रश्न 28: क्या रथ यात्रा (Rath Yatra) के दिन मांस-मदिरा वर्जित है ?
उत्तर : पुरी रथ यात्रा (Rath Yatra) के दौरान पूरा शहर शाकाहारी हो जाता है। अधिकांश दुकानें मांस-मदिरा नहीं बेचतीं। भक्त स्वयं भी ब्रह्मचर्य और सात्विक भोजन का पालन करते हैं।

प्रश्न 29: क्या भारत के बाहर भी रथयात्रा होती है ?
उत्तर : हाँ। इस्कॉन (ISKCON) ने दुनिया भर में इसे लोकप्रिय बनाया। लंदन, न्यूयॉर्क, सैन फ्रांसिस्को, सिडनी, मॉरीशस, दुबई, बैंकॉक, बर्लिन – हर साल भव्य रथ यात्रा (Rath Yatra) निकलती है। अमेरिका और यूरोप में इसे ‘फेस्टिवल ऑफ इंडिया’ या ‘फेस्टिवल ऑफ चैरियट्स’ के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 30: विदेशों में रथ यात्रा (Rath Yatra) कब होती है ?
उत्तर : आमतौर पर पुरी की तिथि के आसपास ही, लेकिन स्थानीय सुविधा और मौसम के अनुसार थोड़ा आगे-पीछे भी हो सकती है। इस्कॉन के मंदिर अपनी वेबसाइट पर तारीख घोषित करते हैं।

प्रश्न 31: विदेशी लोग रथ यात्रा (Rath Yatra) को कैसे देखते हैं ?
उत्तर : अधिकतर विदेशी इसे एक सांस्कृतिक, रंगीन और आध्यात्मिक अनुभव मानते हैं। कई लोग बिना किसी धार्मिक बंधन के रथ खींचते हैं और इसे ‘सामूहिक आनंद’ की अभिव्यक्ति मानते हैं।

प्रश्न 32: क्या रथ यात्रा (Rath Yatra) बहुत व्यावसायिक हो गई है ?
उत्तर : कुछ हद तक हाँ। पुरी में होटल, दुकानें, वीआईपी दर्शन – सब महँगे हो जाते हैं। लेकिन यह भी सच है कि मूल भक्ति अभी भी जीवित है। सड़क पर रस्सी खींचता गरीब आदमी किसी व्यावसायिकता की परवाह नहीं करता।

प्रश्न 33: क्या रथ यात्रा (Rath Yatra) में अंधविश्वास है ?
उत्तर : यह दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। यदि आप इसे समाजशास्त्र से देखें, तो यह सामूहिकता, समानता और आनंद का उत्सव है। यदि आप केवल ‘लकड़ी के रथ पर बैठे भगवान’ की कल्पना करें, तो यह विश्वास है। रथयात्रा आस्था का मामला है, वैज्ञानिक प्रमाण का नहीं।

प्रश्न 34: क्या रथ यात्रा (Rath Yatra) केवल हिंदुओं के लिए है ?
उत्तर : नहीं। जगन्नाथ मंदिर पुरी में गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है (परंपरागत रूप से), लेकिन रथ यात्रा (Rath Yatra) के दिन सड़क पर हर कोई देख सकता है, छू सकता है और रस्सी खींच सकता है – चाहे वह किसी भी धर्म का हो। विदेशों में तो यह पूर्णतः खुला है।

प्रश्न 35: रथ यात्रा (Rath Yatra) से जुड़ा ‘रोप-वे’ या ‘स्टील का रास्ता’ क्या है ?
उत्तर : यह एक आधुनिक व्यवस्था है। पुरी में कभी-कभी रथ के पहिए सड़क में धँस जाते थे। अब सरकार रथ के मार्ग में स्टील की परत चढ़ा देती है, ताकि रथ आसानी से चले। लेकिन पुरातनपंथी इसका विरोध करते हैं, क्योंकि परंपरा में तो मिट्टी की सड़क ही मान्य है।

प्रश्न 36: क्या रथ यात्रा (Rath Yatra) पर सूर्यग्रहण या चंद्रग्रहण पड़ता है, तो क्या होता है ?
उत्तर : यदि रथ यात्रा (Rath Yatra) के दिन ग्रहण पड़ता है, तो रथ यात्रा टल जाती है। ग्रहण के बाद स्नान और पवित्रीकरण करके अगले दिन यात्रा निकाली जाती है।

प्रश्न 37: ‘अधर पणा’ क्या है ?
उत्तर : गुंडिचा मंदिर में 9 दिनों के दौरान आने वाली एक रस्म, जिसमें देवताओं को दूध, मलाई, शहद और मसालों से बना एक विशेष पेय (पणा) चढ़ाया जाता है। इसे भक्त प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।

प्रश्न 38: क्या रथ यात्रा (Rath Yatra) का रास्ता हर साल बदलता है ?
उत्तर : नहीं। पुरी का रास्ता सदियों से तय है – जगन्नाथ मंदिर से गुंडिचा मंदिर तक, लगभग 2.5 से 3 किलोमीटर। हर साल वही रास्ता, वही उत्साह।

प्रश्न 39: क्या रथ यात्रा (Rath Yatra) में पशु बलि दी जाती है ?
उत्तर : बिल्कुल नहीं। जगन्नाथ मंदिर में कभी भी किसी पशु की बलि नहीं दी जाती। यह पूर्णतः शाकाहारी और अहिंसक परंपरा है। रथ यात्रा में तो और भी अधिक सात्विकता होती है।

प्रश्न 40: मैं रथ यात्रा (Rath Yatra) से जुड़ी ऑनलाइन जानकारी कहाँ से प्राप्त कर सकता हूँ ? 
उत्तर : पुरी जगन्नाथ मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट (shreejagannatha.in), ओडिशा पर्यटन विभाग, इस्कॉन की स्थानीय वेबसाइट, और YouTube पर लाइव स्ट्रीम देख सकते हैं। तिथियों के लिए हिंदू पंचांग या स्थानीय समाचार देखें।

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