घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग : बारहवीं ज्योति का अंतिम द्वार और करुणा का प्रकाश (Part 12)

Hello Friends, आज मैं और आप इस 12 ज्योतिर्लिंग के यात्रा के अंतिम पड़ाव में कदम रखने जा रहे हैं। आज पार्ट 12 में घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग का उल्लेख करने जा रहा हूँ। इस ज्योतिर्लिंग का अध्ययन करने पर मुझे और आपको ज्ञात होगा कि क्योँ इस ज्योतिर्लिंग का नाम “घृष्णेश्वर” पड़ा ?, सुदर्मा और सुशीला का इस ज्योतिर्लिंग से क्या सम्बन्ध हैं ?, यहाँ दर्शन के लिए कब आना अच्छा होता हैं ?, यहाँ कि वास्तुकला (द्रविड़ और नागर शैली का मिलन) ?, और साथ ही यहाँ की जनश्रुतियाँ जो आपको चौका देंगी। इन सब तथ्यों पे गहन विमर्श किया जायेगा। चलिए फिर इस यात्रा की शुरुआत करते हैं –

Table of Contents

1. घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग (Grishneshwar) : पहाड़ियों के बीच का वो सन्नाटा

grishneshwar

एक बात मानिए – दौड़ती-भागती ज़िंदगी में जब आप पहली बार वेरुल (एलोरा) के गाँव में कदम रखते हैं, तो वहाँ का सन्नाटा आपको चौंका सकता है। यह वो सन्नाटा नहीं है जो सुनसान जगहों में होता है, बल्कि यह एक गहरी, हज़ार साल पुरानी ध्वनि का सन्नाटा है – जैसे चट्टानें खुद रामायण और शिव पुराण के किसी पन्ने को याद कर रही हों।

घृष्णेश्वर महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर (पुराना नाम औरंगाबाद) से करीब 30 किलोमीटर दूर स्थित है। आमतौर पर लोग इस मंदिर को “एलोरा की गुफाओं के बगल का मंदिर” समझकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। लेकिन ऐसा करना उस व्यक्ति जैसा है जो समंदर देखकर लहर की बदौलत ना माने।

घृष्णेश्वर सिर्फ बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक नहीं है; यह वह अंतिम द्वार है जहाँ से भगवान शिव का तेज मानवीय कष्टों के करीब आता है।

2. क्यों कहते हैं "घृष्णेश्वर (Grishneshawar)" ? – नाम की उत्पत्ति और लोक कथा

हर ज्योतिर्लिंग के पीछे एक कथा है, लेकिन घृष्णेश्वर की कथा में एक अलग ही मार्मिकता है। यह नाम आया है ‘घृष्ण’ (घिसना) से। इस शाब्दिक अर्थ के पीछे एक चौंकाने वाली पौराणिक कहानी है।

(A) कहानी है सुदर्मा और सुशीला की

प्राचीन काल में इस क्षेत्र में सुदर्मा नाम का एक ब्राह्मण रहता था। वह अपनी पत्नी सुशीला के साथ रहता था। सुशीला एक परम भक्त महिला थी। रोज़ाना वह भगवान शिव की पूजा करती, बिना भोजन किए व्रत रखती। लेकिन सुदर्मा को पत्नी की इस भक्ति से चिढ़ थी। उसका मानना था कि पत्नी घर की सेवा छोड़कर बस मंदिरों में समय बर्बाद करती है।

सुदर्मा की एक और पत्नी थी – घुष्णा। घुष्णा सुशीला से बिल्कुल विपरीत थी। वह ईर्ष्यालु, विवाद करने वाली और धर्म से दूर थी। कहानी के एक अहम मोड़ पर, सुशीला ने एक बेहद कठिन व्रत रखा – सोमवारी मास। बिना कुछ खाए-पिए उसने भगवान शिव का पूजन किया और लौटते वक्त उसने एक शिवलिंग बनाकर उसकी विधिवत आराधना की।

घुष्णा को यह बात बर्दाश्त नहीं हुई। उसने अपने पति सुदर्मा को उकसाया – “यह स्त्री हमारे घर का अपमान कर रही है। ब्राह्मणों को मूर्तियां नहीं बनानी चाहिए, वो तो सिर्फ वेद पढ़ें।”

एक रात, जब सुशीला गहरी नींद में थी, सुदर्मा ने क्रोध में आकर उस शिवलिंग को कुल्हाड़ी से काट कर तोड़ दिया। इतना ही नहीं, घुष्णा ने पागलों की तरह उन टुकड़ों को पीस डाला। जैसे ही उसने आखिरी टुकड़े को पीसा, पृथ्वी काँप उठी।

(B) प्रकट होते हैं भगवान शिव

उसी क्षण भगवान शिव एक जबरदस्त ज्योर्तिलिंग के रूप में प्रकट हुए। उनकी आँखों से अग्नि निकल रही थी। घुष्णा जहाँ खड़ी थी, वहीं राख हो गई। सुदर्मा डर के मारे भागा, लेकिन एक चट्टान उसके पैरों में आकर लगी और वह गिर पड़ा।

तब सुशीला ने रोते हुए शिव से प्रार्थना की – “हे प्रभु, मेरे पति अज्ञानी हैं, इन्हें क्षमा करें।”

शिव ने कहा – “सुशीला, तुम्हारी भक्ति अटूट है। जिस शिवलिंग को घिषा गया, मैं उसी घर्षण (घिसने) की ज्वाला से यहाँ घृष्णेश्वर नाम से प्रकट हुआ हूँ।”

तब से इस ज्योतिर्लिंग का नाम घृष्णेश्वर पड़ा। यह नाम हमें सिखाता है कि चाहे श्रद्धा को कितना ही पीसा जाए, वह कभी मरती नहीं, बल्कि और प्रखर होकर उठती है।

3. बारहवाँ और अंतिम ज्योतिर्लिंग – एक विशेष स्थान

शिव पुराण के अनुसार, ब्रह्मा और विष्णु के बीच हुए अंतहीन युद्ध को रोकने के लिए भगवान शिव ने ज्योतिर्लिंग के रूप में अवतार लिया। बारह ज्योतिर्लिंगों की यात्रा अद्वैत (एकत्व) की यात्रा है।

घृष्णेश्वर का स्थान इस यात्रा में सबसे अंत में आता है। बहुत से भक्त यह मानते हैं कि यदि आपने सोमनाथ से यात्रा प्रारंभ की और केदारनाथ, बाबा बैद्यनाथ, रामेश्वरम से गुजरते हुए आखिर में घृष्णेश्वर पहुँचे, तो इसका मतलब है आपने अपने अहंकार का सबसे कठिन हिस्सा – ‘घर्षण’ – पूरा किया है।

एक स्थानीय कहावत है:
“सोमनाथ प्रथम द्वार, घृष्णेश्वर अंतिम श्वास।”

इसका अर्थ है – सोमनाथ ज्ञान का पहला दरवाजा है, लेकिन घृष्णेश्वर आत्मा की आखिरी साँस के पास खड़ा है। यहाँ आने के बाद इंसान को कोई और ज्योतिर्लिंग नहीं भटकाना चाहिए, क्योंकि यहीं सबकुछ घिसकर शिव का रूप ले लेता है।

4. इतिहास के पन्नों में घृष्णेश्वर (Grishneshwar)

किसी भी प्राचीन मंदिर की सही तारीखें अक्सर धुंधली होती हैं, लेकिन घृष्णेश्वर के मामले में हम भाग्यशाली हैं। यह मंदिर राष्ट्रकूट और बाद में यादव काल (लगभग 13वीं शताब्दी) से जुड़ा है।

(A) एलोरा की गुफाओं से गहरा रिश्ता

जब आप एलोरा की विश्व-प्रसिद्ध गुफाओं (कैलाश मंदिर – गुफा 16) को देखते हैं, तो आप समझ सकते हैं कि उस समय के शिल्पी किसी भगवा उन्माद में थे। घृष्णेश्वर का मंदिर उसी परंपरा को एक सघन, अलग रूप में प्रस्तुत करता है।

दिलचस्प बात यह है कि मराठा काल में इस मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ। अहिल्याबाई होल्कर (जिन्होंने काशी विश्वनाथ और सोमनाथ का भी पुनर्निर्माण करवाया) ने 18वीं शताब्दी में इस मंदिर को वर्तमान स्वरूप दिया। अहिल्याबाई ने न सिर्फ शिवलिंग की सुरक्षा की, बल्कि मंदिर के चारों ओर एक विशाल प्रांगण और पक्की दीवार का निर्माण करवाया।

(B) इस मंदिर ने मुगलों से क्या सहा ?

अक्सर तीर्थयात्री पूछते हैं – “इतना बड़ा मंदिर आखिर कैसे बचा?”

इसका जवाब है – यह पूरी तरह नहीं बचा। 17वीं शताब्दी में औरंगज़ेब के आक्रमण के दौरान मंदिर के कुछ हिस्से तोड़ दिए गए। लेकिन स्थानीय लोगों ने एक रणनीति अपनाई। उन्होंने शिवलिंग को मिट्टी के ढेर में छुपा दिया और मंदिर के ऊपर एक छोटी सी दरगाह बना दी। यही कारण है कि आज भी उस क्षेत्र में हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक के रूप में इस मंदिर का अलग महत्व है।

बाद में पेशवाओं और हैदराबाद के निज़ाम के बीच हुए समझौते के बाद मंदिर को फिर से खोला गया।

5. वास्तुकला : पत्थर पर लिखी शिवगाथा

यदि आप मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करने से पहले इसकी बाहरी दीवारों को ध्यान से देखें, तो आप समझ जाएँगे कि यह कोई साधारण मंदिर नहीं है।

(A) द्रविड़ और नागर शैली का मिलन

घृष्णेश्वर मंदिर पूरी तरह से बलुआ पत्थर से बना है। इसकी शिखर (स्पायर) बेहद ऊँची है, जिस पर सैकड़ों छोटे-छोटे नक्काशीदार शिवलिंग और देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनी हैं। वास्तुकला के इतिहासकार इसे हेमाडपंथी शैली का बेहतरीन उदाहरण मानते हैं (जिसका नाम हेमाद्रि या हेमाडपंत पर रखा गया, जो यादव राज्य के प्रधानमंत्री थे)।

(B) गर्भगृह : जहाँ रहता है चमत्कार

अंदर एक नीचा सा दरवाज़ा है। अंदर जाते ही आप देखेंगे कि शिवलिंग बिल्कुल दीवार से सटा है। यह बहुत छोटा नहीं है, लेकिन इसकी बनावट अद्भुत है। पास में ही योनि (बेस) पर सुनहरी चाँदी की चढ़ाई है, जो बाद के काल में कराई गई।

सबसे खास बात – यहाँ का जलहरी (वह छिद्र जहाँ से शिवलिंग पर हमेशा जल टपकता है) कभी सूखता नहीं। वैज्ञानिक इसे दीवारों के भीतर बनी गुप्त जलनलिकाओं से जोड़ते हैं, लेकिन भक्त इसे शिव का ‘अभिषेक धारा’ कहते हैं।

(C) नंदी का मुख – एक रहस्य

मंदिर में सामान्यतः नंदी (शिव के वाहन) शिवलिंग की ओर मुँह करके बैठे होते हैं, लेकिन यहाँ नंदी थोड़ा बाँयी ओर देख रहे हैं। पुजारी बताते हैं कि नंदी इसलिए किनारे देख रहे हैं क्योंकि उनकी नज़र सीधे एलोरा स्थित कैलाशनाथ मंदिर (गुफा 16) पर है, जैसे वे कह रहे हों – “आप अपने तरीके से शिव की पूजा करो, मैं अपने तरीके से।”

6. आध्यात्मिक अनुभव : मैंने जो महसूस किया

(अब लेखक स्वयं को कथा में रखता है – इसे पढ़ते हुए आपको लगेगा जैसे कोई अपना यात्रा वृतांत सुना रहा हो)

मैं साल 2019 के अगस्त के एक सोमवार को वहाँ पहुँचा था। सावन का महीना था। औरंगाबाद से निकली बस मुझे सुबह 4 बजे वेरुल गाँव के फाटक पर उतार ले गई।

रास्ते में भीगी मिट्टी की गंध और अनगिनत मेंहदी के पौधे। वो अँधेरा सुखद था।

मैंने मंदिर के बाहर अपने जूते उतारे। वहाँ कोई सुनियोजित अत्याधुनिक टिकट काउंटर नहीं, बस एक बूढ़े पुजारी की छोटी सी दुकान थी, जहाँ से मैंने बेलपत्र और चावल खरीदा।

जैसे ही मैं अंदर दाखिल हुआ, मुझे एक ऐसी ठंडक का अहसास हुआ जो शरीरिक नहीं, मानसिक थी। एक भक्त गाता जा रहा था – “घृष्णेश्वराय विद्महे, शिव शक्ति धीमहि…”। उसकी आवाज़ 1100 साल पुरानी दीवारों से टकराकर गूँज रही थी।

(A) स्पर्श का अर्थ

मैंने अपने हाथ शिवलिंग पर रखे। यह सिर्फ एक पत्थर नहीं था; यह वही धरती थी जिसने घुष्णा के पाप को पीसा था। तब मुझे लगा कि असली यात्रा बाहर नहीं, भीतर होती है।

मैं घंटों वहाँ बैठा रहा। बाहर एलोरा की गुफाएँ पर्यटकों से गुलज़ार थीं, लेकिन यहाँ एक खास शांति थी। यहाँ कोई ‘सेल्फी’ नहीं ले रहा था। लोग या तो रो रहे थे या मुस्कुरा रहे थे – दोनों ही भक्ति के ही रूप थे।

7. पूजा विधि, समय और महत्वपूर्ण तिथियाँ

घृष्णेश्वर की पूजा किसी भी शिवालय की तरह ही सरल है, लेकिन यहाँ कुछ नियम विशेष हैं।

(A) भस्म आरती (सबसे शक्तिशाली समय)

हर सुबह सूर्योदय से पहले भस्म आरती होती है। इसमें पिछली रात की हवन की भस्म को शिवलिंग पर चढ़ाया जाता है। यह सिर्फ 15 मिनट का अनुष्ठान है, लेकिन बुजुर्ग कहते हैं – “भस्म आरती में जो व्यक्ति शिव के चरणों में अपना अहंकार घिस देता है, उसे मोक्ष मिलता है।”

(B) रुद्राभिषेक (विशेष अनुभव)

आप चाहें तो एक विशेष टिकट लेकर रुद्राभिषेक करवा सकते हैं। इसमें पुजारी एक साथ ग्यारह ब्राह्मणों के साथ पूरा रुद्र पाठ करते हैं। इस दौरान शिवलिंग पर दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल चढ़ाया जाता है। संगीत की कोई तेज ध्वनि नहीं होती, केवल मंत्रों की गूँज।

(C) महत्वपूर्ण अवसर

  1. महाशिवरात्रि : यहाँ रात में जागरण होता है। भक्त पूरी रात बेलपत्र चढ़ाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि इस रात शिव घृष्णेश्वर में विशेष रूप से वास करते हैं।

  2. सावन मास (श्रावण) : सोमवार को यहाँ रिकॉर्ड तोड़ भीड़ होती है। प्रशासन अतिरिक्त पंडाल लगाता है।

  3. नाग पंचमी : चूँकि शिव जी के गले में सर्प है, इस दिन विशेष रूप से दूध और सर्प के आकार की मूर्तियाँ चढ़ाई जाती हैं।

(D) मंदिर के नियम (जो कोई नहीं बताता)

  • चमड़े के बेल्ट या पर्स अंदर न ले जाएँ।

  • महिलाएं मासिक धर्म के दौरान गर्भगृह के अंदर नहीं जाती (यह सभी शिवालयों में पारंपरिक है)।

  • शिवलिंग को बिना गुरु की अनुमति के हाथ से न छुएं (सामान्य दर्शन में सिर्फ पुजारी ही स्पर्श कर सकता है)।

8. घृष्णेश्वर (Grishneshwar) कैसे पहुँचें ? (व्यावहारिक यात्रा मार्गदर्शिका)

एक आम तीर्थयात्री के लिए यह जानकारी बहुत काम आती है।

(A) हवाई मार्ग

  • निकटतम हवाई अड्डा : औरंगाबाद (छत्रपति संभाजीनगर) (IATA: IXU) – यहाँ से दूरी 35 किमी।

  • दिल्ली, मुंबई, जयपुर, बैंगलोर से सीधी फ़्लाइट हैं।

  • हवाई अड्डे से प्रीपेड टैक्सी लगभग ₹800-1200 में मिल जाती है।

(B) रेल मार्ग

  • निकटतम रेलवे स्टेशन : जालना (38 किमी) या औरंगाबाद

  • लेकिन सबसे अच्छा है मनमाड (119 किमी) – क्योंकि यह दिल्ली-मुंबई मुख्य रेल मार्ग पर है।

  • स्टेशन से बस या टैक्सी (लगभग ₹2000-3000)।

(C) सड़क मार्ग

महाराष्ट्र राज्य परिवहन (MSRTC) की बसें :

  • मुंबई से नियमित वोल्वो बसें (कीमत ~₹1000) 9 घंटे।

  • पुणे से बसें (~₹800) 7 घंटे।

  • औरंगाबाद से हर 30 मिनट में बस (~₹50) 1 घंटा।

(D) वहाँ रहने की सुविधा

यात्रियों को चेतावनी : वेरुल गाँव में ज्यादा अच्छे होटल नहीं हैं।

  • सस्ता विकल्प : एमटीडीसी (MTDC) रिसॉर्ट एलोरा (सरकारी) – साफ़ सुथरा, ₹1500/रात।

  • मध्यम विकल्प : औरंगाबाद शहर (होटल अमन, ली मेरिडियन) – वहाँ से दिन की यात्रा करें।

  • मंदिर के पास : धर्मशाला और होल्कर छतरी (बहुत ही साधारण लेकिन प्रामाणिक)।

मेरा सुझाव : रात वेरुल में न ठहरें; सुबह 5 बजे औरंगाबाद से निकलें, 6 बजे तक स्नान करके मंदिर पहुँचें, फिर घंटे भर में दर्शन करें और फिर एलोरा की गुफाएँ देखें। रात को वापस औरंगाबाद।

9. घृष्णेश्वर (Grishneshwar) और एलोरा की गुफाएँ – एक साथ क्यों जाएँ ?

अगर आप घृष्णेश्वर आ रहे हैं, तो बिना एलोरा देखे जाना व्यर्थ है।

(A) एलोरा की गुफाएँ (यूनेस्को विश्व धरोहर)

सिर्फ 1.5 किलोमीटर की दूरी पर 34 गुफाएँ हैं जो बौद्ध, जैन और हिंदू – तीनों धर्मों को संजोए हुए हैं।

  • गुफा 16 – कैलाश मंदिर : यह एक ही पत्थर को ऊपर से नीचे खोदकर बनाया गया है। सोचिए, 7 मंजिला इमारत के बराबर एक चट्टान को अंदर से खोल दिया गया। इसे बनने में 100 साल से अधिक का समय लगा। शिव भक्तों के लिए यह धरती पर उतरा कैलाश है।

  • गुफा 10 – विश्वकर्मा (सूत की गुफा) : यहाँ छत पर बने बीम ठीक लकड़ी की तरह दिखते हैं, लेकिन ये सब पत्थर के हैं।

(B) वैज्ञानिक तथ्य जो चौंका देगा

शोधकर्ताओं का कहना है कि एलोरा की गुफाओं का नक्शा किसी मास्टर आर्किटेक्ट ने बनाया था जो भूकंप और भू-गर्भीय दबाव की गणना कर सकता था। इसी कारण 700 सालों में यहाँ कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ।

घृष्णेश्वर का मंदिर उसी शिल्प परंपरा को और भी प्रगाढ़ बनाता है – मानो उन गुफाओं में शिव ‘विराट’ रूप में हैं और यहाँ ‘सगुण’ रूप में।

10. पौराणिक तुलना : घृष्णेश्वर (Grishneshwar) बनाम अन्य ज्योतिर्लिंग

बारह ज्योतिर्लिंगों में घृष्णेश्वर को अक्सर ‘सबसे सुलभ’ समझने की गलती होती है, लेकिन ऐसा नहीं है। 

तुलना पक्षकेदारनाथसोमनाथघृष्णेश्वर
पहुँचबहुत कठिन (ट्रैकिंग)आसान (समुद्र किनारा)बहुत आसान (रोड)
वातावरणबर्फीला, कठोरसमुद्री, खुलापर्वतीय, प्राचीन गूँज
ऐतिहासिक आक्रमणबहुत कम17 बार तोड़ा गयाऔरंगजेब ने क्षति पहुँचाई
आध्यात्मिक रहस्यशिव का ध्यानस्थ रूपशिव का उग्र रूपशिव का ‘घिसा हुआ’ रूप (तपस्या से मंथित)

मैं एक बुजुर्ग महिला से मिला, जो घृष्णेश्वर के बारे में कह रही थी – “बेटा, केदार में शिव हिमालय हैं, काशी में शिव विश्वनाथ हैं, लेकिन यहाँ शिव ‘वह व्यक्ति’ हैं जिसने हमारे साथ दुःख को पीसने की प्रक्रिया की है।”

11. आसपास के 5 अन्य पवन स्थल

यदि आप 2-3 दिन का पैकेज लेकर आए हैं, तो ये स्थान देखना न भूलें :

  1. दौलताबाद किला (13 किमी) : एक अभेद्य किला। यहाँ भगवान शिव से जुड़ी एक किंवदंती है – माना जाता है कि महाराष्ट्र के संत एकनाथ जी ने यहाँ तपस्या की थी।

  2. बीबी का मकबरा (औरंगाबाद, 30 किमी) : इसे ‘दक्कन का ताजमहल’ कहते हैं। हालाँकि यह मुगल स्मारक है, लेकिन इसके बगीचे में बैठना एक शांतिदायक अनुभव है।

  3. खुलदाबाद (23 किमी) : यहाँ औरंगज़ेब की कब्र है – एक सादी खुली कब्र। कुछ तीर्थयात्री यहाँ जरूर जाते हैं क्योंकि यहाँ से घृष्णेश्वर मार्ग पर कई प्राचीन मठ हैं।

  4. जैन गुफाएँ – गुफा 30 से 34 : तीर्थंकरों की विशाल मूर्तियाँ। सात्विकता का एक अलग रूप।

  5. पानचक्की (गगन सागर) : यह एलोरा के पीछे एक छोटा झरना है, जो मानसून में भव्य हो जाता है। स्थानीय लोग मानते हैं कि यह पानी पवित्र है क्योंकि यह घृष्णेश्वर शिवलिंग की ओर बहता है।

12. कुछ अनकही बातें और सावधानियाँ (श्रद्धा के नाम पर)

हर तीर्थ में कुछ ऐसी बातें होती हैं जो कोई गाइड नहीं बताता :

  • दर्शन के भीड़ प्रबंधन : महाशिवरात्रि में यहाँ भगदड़ जैसी स्थिति हो जाती है। प्रशासन गर्भगृह में केवल 3-4 सेकंड देता है। अगर आप शांतिपूर्वक ध्यान करना चाहते हैं, तो मार्च-अप्रैल या अक्टूबर-नवंबर के महीने चुनें।

  • पुजारियों का व्यवहार : कई पर्यटक शिकायत करते हैं कि पुजारी दक्षिणा मांगते हैं। यह सच है। लेकिन यह भी सच है कि अगर आप सच्चे मन से कहें – “बाबा, मेरे पास सिर्फ 50 रुपये हैं”, तो वे मना नहीं करते। यहाँ के मुख्य पुजारी लिंगायत समुदाय से हैं जो शिवभक्ति के लिए जाने जाते हैं।

  • भोजन की व्यवस्था : मंदिर के बाहर ‘अन्नपूर्णा रसोई’ नाम का एक सरकारी भोजनालय है, जहाँ 100 रुपये में थाली मिलती है। लेकिन असली स्वाद गाँव के छोटे से ठेले पर लगने वाले ‘साबुदाना खिचड़ी’ का है (यह शिव भक्तों का प्रिय भोजन है)।

(A) विशेष सलाह (एक पिता या एक मित्र की भाषा में)

  1. वहाँ वॉशरूम की सुविधा बहुत खराब है। मंदिर जाने से पहले औरंगाबाद में ही निपट लें।

  2. अपना पानी की बोतल जरूर ले जाएँ। वहाँ बोतल वाले पानी की कीमत दोगुनी हो जाती है।

  3. कैमरा ले जाने की अनुमति तो है, लेकिन गर्भगृह के अंदर (शिवलिंग के सामने) फोटो लेना सख्त मना है। यह अपराध है।

  4. गर्मियों में (अप्रैल-मई) दिन का तापमान 42 डिग्री तक पहुँच जाता है। इसलिए सुबह 4 बजे दर्शन करना बुद्धिमत्ता है, न कि केवल श्रद्धा।

13. घृष्णेश्वर (Grishneshwar) की कुछ अद्भुत घटनाएँ (जनश्रुतियाँ)

grishneshwar

मैंने वहाँ के कई पुजारियों और बूढ़े लोगों से बात की। दो घटनाएँ मुझे सबसे अधिक प्रभावित कर गईं |

(A) पहली घटना (1994)

एक महिला अपने मृत पुत्र की अंतिम यात्रा के बाद बेहोश होकर मंदिर में गिर गई। उसने प्रार्थना की – “शिव, मुझे ले चलो।” पुजारी ने अगले दिन देखा कि शिवलिंग पर एक छोटा सा दरार आ गया था और उसी रात महिला की मृत्यु हो गई। स्थानीय लोग कहते हैं कि शिव ने उसे अपने अंग में स्थान दे दिया। यह सच है या कल्पना ? मैं नहीं जानता, लेकिन बुजुर्ग अब भी इस कहानी को दोहराते हैं।

(B) दूसरी घटना (2019 में मैंने स्वयं देखी)

एक स्कूल शिक्षक (जो श्रद्धा नहीं रखता था) एक सर्वे के लिए यहाँ आया। उसने मंदिर की वास्तुकला पर मोबाइल से वीडियो बनाना चाहा। तभी उसका फोन अचानक ब्लास्ट (बैट्री फट गई) हो गया। वह बच गया। उस दिन से वह हर सोमवार यहाँ आता है।

(नोट : मैं अंधविश्वास नहीं फैला रहा, लेकिन ये कहानियाँ इस जगह का हिस्सा हैं।)

14. आधुनिकता और मंदिर का भविष्य

हाल के वर्षों में महाराष्ट्र सरकार ने स्वच्छ भारत मिशन के तहत मंदिर परिसर को अपग्रेड किया है। अब नए सोलर लाइटें लगी हैं, सीसीटीवी कैमरे हैं, और श्रद्धालुओं के लिए पीने के ठंडे पानी की व्यवस्था है।

लेकिन एक डर भी है : एलोरा में पर्यटकों की बढ़ती संख्या के कारण यहाँ कभी-कभी “प्लास्टिक का ढेर” लग जाता है। एक बार मैंने देखा कि एक लड़का चिप्स का पैकेट मंदिर के बगल की झाड़ी में फेंक रहा था। एक बूढ़े पुजारी ने उसे थप्पड़ मार दिया – “यह शिव का घर है, कचरापेटी नहीं।”

जो भी हो, घृष्णेश्वर आज भी वैसा ही है जैसा 800 साल पहले था – सीधा, सरल और चट्टान की तरह ठोस।

15. निष्कर्ष

प्रिय साधक,

मैंने आपको घृष्णेश्वर के पत्थर, उसकी कथा, उसके ठंडे जल और उसकी गर्म भस्म के बारे में बताया। लेकिन असली घृष्णेश्वर आपके अंदर है।

“घृष्णेश्वर” उसी को कहते हैं जो हर पीड़ा को, हर अपमान को, हर नुकसान को – भक्ति के पत्थर पर घिसता है – तब वह चमकने लगता है।

जब अगली बार आप किसी निराशा में हों, किसी ने आपको धोखा दिया हो, या आपका विश्वास टूट जाए – तो बस एक बार बिना किसी लोभ के शिव से कहें – “घृष्णेश्वर, मुझे घिसना सिखा दो, तोड़ना नहीं।”

और हाँ, वहाँ पहुँचकर बस एक पल के लिए आँखें बंद कर लीजिएगा। घंटियों की आवाज़ को अपने शरीर में उतरने दीजिए। और जब आप वापस लौटें, तो अपने साथ सिर्फ एक राख लेकर जाइए – अपने दुःख की राख।

जय घृष्णेश्वर। हर हर महादेव।

Frequently Asked Questions (FAQ)

प्रश्न 1: घृष्णेश्वर (Grishneshwar) ज्योतिर्लिंग कहाँ स्थित है ?
उत्तर : यह महाराष्ट्र राज्य के छत्रपति संभाजीनगर (पूर्व नाम औरंगाबाद) जिले में वेरुल (एलोरा) गाँव में स्थित है। यह विश्व प्रसिद्ध एलोरा की गुफाओं से मात्र 1.5 से 2 किलोमीटर की दूरी पर है।

प्रश्न 2: क्या घृष्णेश्वर (Grishneshwar) बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है ?
उत्तर : हाँ, यह 12वाँ (बारहवाँ) और अंतिम ज्योतिर्लिंग है। शिव पुराण के अनुसार, इन बारह ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

प्रश्न 3: इस मंदिर का नाम ‘घृष्णेश्वर’ क्यों पड़ा ?
उत्तर : ‘घृष्ण’ का अर्थ है ‘घिसना’ या ‘मंथन करना’। पौराणिक कथा के अनुसार, एक दुष्ट महिला घुष्णा ने एक भक्त के शिवलिंग को तोड़कर पीस दिया था। तब भगवान शिव उसी घर्षण (घिसने) की ज्वाला से प्रकट हुए, इसलिए उन्हें घृष्णेश्वर कहा गया।

प्रश्न 4: इस मंदिर का कोई अन्य नाम भी है ?
उत्तर : हाँ, इसे घुष्मेश्वर और घुश्मेश्वर के नाम से भी जाना जाता है। कई पुराने ग्रंथों में इसका उल्लेख ‘घुष्मेश्वर’ के रूप में मिलता है।

प्रश्न 5: मंदिर के दर्शन का समय क्या है ?
उत्तर :

  • सुबह : 5:30 बजे से रात 9:30 बजे तक (बिना किसी अंतराल के)।

  • विशेष ध्यान दें : दोपहर में मंदिर बंद नहीं होता, लेकिन भीड़ कम होती है।

प्रश्न 6: क्या यहाँ कोई विशेष आरती होती है ?
उत्तर : हाँ, दो मुख्य आरतियाँ हैं :

  1. भस्म आरती : सुबह 4:30 बजे (यह बेहद खास है, केवल कुछ चुनिंदा मंदिरों में ही होती है)।

  2. शयन आरती : रात 9:30 बजे (मंदिर बंद होने से पहले)।

  • इसके अलावा मध्याह्न (12:00 बजे) और शाम (7:00 बजे) भी आरती होती है।

प्रश्न 7: क्या हम शिवलिंग को स्पर्श कर सकते हैं ?
उत्तर : सामान्य दर्शन में केवल मंदिर के पुजारी ही शिवलिंग स्पर्श कर सकते हैं। यदि आप रुद्राभिषेक या विशेष पूजा करवाते हैं (जिसके लिए शुल्क लगता है), तो आपको गर्भगृह के अंदर जाकर थोड़ी देर पूजा करने की अनुमति मिल जाती है।

प्रश्न 8: क्या मोबाइल फोन और कैमरा ले जाने की अनुमति है ?
उत्तर :

  • गर्भगृह के अंदर : मोबाइल फोन ले जाना और फोटो/वीडियो बनाना पूरी तरह वर्जित है।

  • मंदिर परिसर में : बाहर के प्रांगण में आप फोटो ले सकते हैं, लेकिन फ्लैश का प्रयोग न करें।

  • सलाह : फोन को बाहर लॉकर में जमा करना बेहतर है।

प्रश्न 9: क्या यहाँ विशेष पूजा के लिए ऑनलाइन बुकिंग होती है ?
उत्तर : फिलहाल, महाराष्ट्र सरकार की ओर से कोई आधिकारिक ऑनलाइन बुकिंग सिस्टम नहीं है। आपको वहाँ पहुँचकर मंदिर प्रशासन के कार्यालय से संपर्क करना होगा। हालाँकि, प्राइवेट वेबसाइटें बुकिंग का दावा कर सकती हैं, उनसे सावधान रहें।

प्रश्न 10: यहाँ कौन सा भोग (प्रसाद) चढ़ाया जाता है ?
उत्तर : शिव जी को प्रिय बेलपत्रदूधदहीघीशहदगंगाजल और भांग-धतूरा चढ़ाया जाता है। मंदिर के बाहर यह सब सामग्री आसानी से मिल जाती है। प्रसाद के रूप में साबुदाना खिचड़ी और पंचामृत बांटा जाता है।

प्रश्न 11: घृष्णेश्वर (Grishneshwar) कैसे पहुँचें ? (सबसे आसान रास्ता)
उत्तर :

  • हवाई मार्ग : औरंगाबाद (छत्रपति संभाजीनगर) हवाई अड्डा (35 किमी) – दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर से सीधी फ्लाइट।

  • रेल मार्ग : निकटतम स्टेशन जालना (38 किमी) या औरंगाबाद (30 किमी)। सबसे अच्छा विकल्प मनमाड (119 किमी) है जो मुख्य रेलवे लाइन पर है।

  • सड़क मार्ग : एमएसआरटीसी (MSRTC) की बसें औरंगाबाद से हर 30 मिनट में चलती हैं। यात्रा का समय : लगभग 1 घंटा।

प्रश्न 12: क्या औरंगाबाद से घृष्णेश्वर (Grishneshwar) के लिए टैक्सी मिलती है ?
उत्तर : हाँ, औरंगाबाद शहर से आप प्रीपेड टैक्सी या ऑटो-रिक्शा ले सकते हैं।

  • टैक्सी (राउंड ट्रिप) : ₹800 से ₹1500 (होटल से होटल)।

  • ऑटो-रिक्शा : ₹600 से ₹1000 (थोड़ा मोल-भाव करें)।

प्रश्न 13: क्या मंदिर के पास पार्किंग की सुविधा है ?
उत्तर : हाँ, मंदिर के मुख्य द्वार के सामने एक बड़ा निःशुल्क पार्किंग क्षेत्र है। हालाँकि, त्योहारों (महाशिवरात्रि, सावन सोमवार) के दौरान पार्किंग भर जाती है, तो थोड़ा दूर पार्क करना पड़ सकता है।

प्रश्न 14: क्या घृष्णेश्वर (Grishneshwar) मंदिर के पास रहने की अच्छी सुविधा है ?
उत्तर :

  • वेरुल गाँव में : सीमित विकल्प – MTDC रिसॉर्ट (सरकारी, ₹1500/रात), धर्मशालाएँ (₹300-500/रात, बेसिक सुविधा)।

  • सबसे अच्छा विकल्प : औरंगाबाद शहर में रहें (ले मेरिडियन, होटल अमन, विवंता) और वहाँ से दिन की यात्रा करें। यहाँ होटल सस्ते और बेहतर हैं।

प्रश्न 15: मंदिर के पास खाने की क्या व्यवस्था है ?
उत्तर :

  • अन्नपूर्णा रसोई : मंदिर प्रांगण के पास सरकारी भोजनालय – ₹100 में शुद्ध शाकाहारी थाली।

  • छोटे ठेले : साबुदाना खिचड़ी, चाय, पकोड़े, ब्रेड-पकौड़े।

  • ध्यान दें : गाँव में महंगे रेस्तरां नहीं हैं। अच्छा खाना खाने के लिए औरंगाबाद जाना बेहतर है।

प्रश्न 16: क्या मंदिर में श्रद्धालुओं के लिए लॉकर की सुविधा है ?
उत्तर : हाँ, मंदिर के बाहर एक छोटा लॉकर रूम है (निःशुल्क या नाममात्र के ₹10-20 में)। अपना जूता, बैग, मोबाइल वहाँ सुरक्षित रख सकते हैं। लेकिन कीमती सामान साथ न ले जाएँ।

प्रश्न 17: घृष्णेश्वर (Grishneshwar) जाने का सबसे अच्छा समय क्या है ?
उत्तर :

  • सबसे अच्छा : जून से फरवरी (मानसून और सर्दियाँ)। मौसम सुहावना रहता है।

  • बचकर रहें : मार्च से मई (गर्मी) – तापमान 40°C से ऊपर चला जाता है। दिन में दर्शन करना मुश्किल हो जाता है।

प्रश्न 18: यहाँ कौन से प्रमुख त्योहार मनाए जाते हैं ?
उत्तर :

  1. महाशिवरात्रि : सबसे बड़ा त्योहार – लाखों भक्त आते हैं, रातभर जागरण।

  2. सावन मास (श्रावण) : पूरे महीने सोमवार को विशेष पूजा, भीषण भीड़।

  3. नाग पंचमी : सर्पों के देवता की पूजा।

  4. कार्तिक पूर्णिमा : दीपदान का विशेष महत्व।

प्रश्न 19: क्या मंदिर सभी दिन खुला रहता है ?
उत्तर : हाँ, घृष्णेश्वर मंदिर साल के 365 दिन खुला रहता है। कोई अवकाश नहीं होता। सिर्फ ग्रहण के समय थोड़ी देर के लिए बंद किया जाता है।

प्रश्न 20: घृष्णेश्वर की पौराणिक कथा क्या है ? (संक्षेप में)
उत्तर : एक ब्राह्मण सुदर्मा की दो पत्नियाँ थीं – सुशीला (भक्त) और घुष्णा (दुष्ट)। घुष्णा ने ईर्ष्या में आकर सुशीला द्वारा बनाए गए शिवलिंग को तोड़कर पीस डाला। भगवान शिव ने उसी पिसे हुए ढेर से प्रकट होकर घुष्णा को भस्म कर दिया, और घृष्णेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुए।

प्रश्न 21: क्या यहाँ के दर्शन करने से कोई विशेष फल मिलता है ?
उत्तर : पुराणों के अनुसार, घृष्णेश्वर के दर्शन करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। विशेष रूप से, यहाँ शिव की पूजा करने से पितृ दोष, नाग दोष और काल सर्प दोष से मुक्ति मिलती है।

प्रश्न 22: क्या घृष्णेश्वर (Grishneshwar) को एलोरा की गुफाओं से जोड़कर देखना चाहिए ?
उत्तर : बिल्कुल! एलोरा की गुफाएँ (विशेषकर कैलाश मंदिर – गुफा 16) भगवान शिव को समर्पित हैं। पहले घृष्णेश्वर के दर्शन करें, फिर एलोरा की गुफाएँ देखें। ऐसा माना जाता है कि एलोरा में शिव का ‘विराट’ रूप है, तो घृष्णेश्वर में ‘सगुण’ रूप

प्रश्न 23: महिलाओं के लिए कोई विशेष नियम है ?
उत्तर : हाँ, अधिकांश शिव मंदिरों की तरह यहाँ भी मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति नहीं होती (यह पारंपरिक नियम है)। वे बाहर से दर्शन कर सकती हैं। इसके अलावा, कोई अन्य प्रतिबंध नहीं है।

प्रश्न 24: क्या विकलांग या बुजुर्ग लोगों के लिए मंदिर सुलभ है ?
उत्तर : मंदिर में रैंप की सुविधा नहीं है। गर्भगृह तक पहुँचने के लिए कुछ सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। बुजुर्गों के लिए यह थोड़ा मुश्किल हो सकता है। हालाँकि, मंदिर के पुजारी मदद कर देते हैं।

प्रश्न 25: क्या मंदिर के आसपास का इलाका रात में सुरक्षित है ?
उत्तर : हाँ – सामान्यतः वेरुल गाँव सुरक्षित है। लेकिन रात 9:30 बजे मंदिर बंद होने के बाद गाँव सुनसान हो जाता है। सलाह : रात में वहाँ अकेले न घूमें। औरंगाबाद लौटना बेहतर है।

प्रश्न 26: क्या मंदिर परिसर में शराब या मांसाहार ले जाने की मनाही है ?
उत्तर : यह मंदिर क्षेत्र पूर्णतः शुद्ध और शाकाहारी है। मंदिर परिसर या उसके आसपास शराब, तम्बाकू, गुटका या मांसाहार ले जाना/खाना पूरी तरह से प्रतिबंधित है।

प्रश्न 27: क्या मंदिर में प्रवेश शुल्क है ?
उत्तर : नहीं, सामान्य दर्शन पूरी तरह से निःशुल्क है। कोई टिकट या शुल्क नहीं लगता।

प्रश्न 28: विशेष पूजा (रुद्राभिषेक) का कितना शुल्क है ?
उत्तर : यह पैकेज पर निर्भर करता है :

  • साधारण अभिषेक : ₹101 – ₹251

  • ग्यारह ब्राह्मणों के साथ पूर्ण रुद्राभिषेक : ₹500 – ₹1500

  • (ध्यान दें : कीमतें समय के साथ बदल सकती हैं, मंद्र कार्यालय से पुष्टि कर लें)

प्रश्न 29: क्या दान करने का कोई विशेष तरीका है ?
उत्तर : मंदिर में प्रामाणिक दान पेटी (ह्रदय पात्र) लगी है। आप नकद दान कर सकते हैं। लेकिन सड़क पर खड़े किसी अनजान व्यक्ति को दान न करें। दान करते समय रसीद जरूर लें।

प्रश्न 30: क्या क्रेडिट कार्ड / UPI (PhonePe, Google Pay) से भुगतान होता है ?
उत्तर : मंदिर की दान पेटी पर अब क्यूआर कोड लगे हैं, लेकिन वे अक्सर काम नहीं करते। नकद रखना सबसे सुरक्षित विकल्प है। पास की दुकानें UPI ले लेती हैं, लेकिन नेटवर्क कभी-कभी धीमा हो जाता है।

प्रश्न 31: क्या विदेशी पर्यटकों के लिए कोई विशेष व्यवस्था है ?
उत्तर : कोई अलग व्यवस्था नहीं है। मंदिर में अंग्रेजी भाषा में संकेत हैं, लेकिन गाइड या पुजारी अंग्रेजी कम ही बोलते हैं। अपने साथ एक हिंदी या मराठी बोलने वाले मित्र को ले जाना बेहतर है।

प्रश्न 32: क्या मैं घर पर पूजा के लिए यहाँ से ‘पवित्र जल’ या ‘विभूति’ ले जा सकता हूँ ?
उत्तर : हाँ, मंदिर के बाहर छोटी दुकानों पर डिब्बाबंद गंगाजल और शिवलिंग की विभूति (भस्म) बिकती है। मंदिर के अंदर पुजारी से मांगने पर वे मुफ्त में थोड़ी मात्रा दे देते हैं।

प्रश्न 33: क्या यहाँ मंदिर के अंदर बैठकर ध्यान करने की अनुमति है ?
उत्तर : जी हाँ। मंदिर के प्रांगण में एक शांत सभा मंडप है, जहाँ आप बैठ सकते हैं। लेकिन गर्भगृह में भीड़ होने पर आपको बाहर आना पड़ता है। सबसे अच्छा समय ध्यान के लिए सुबह 5:30 से 7:00 बजे का है।

प्रश्न 34: क्या मुझे यहाँ अपने पितरों (पूर्वजों) का तर्पण करना चाहिए ?
उत्तर : हाँ, घृष्णेश्वर पितृ मोक्ष के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर के बगल में एक छोटा पवित्र कुंड (जलाशय) है। वहाँ ब्राह्मणों को दान देकर पिंडदान या तर्पण कराया जा सकता है। इसके लिए अलग से व्यवस्था करनी पड़ती है।

प्रश्न 35: ज्योतिर्लिंग के दर्शन के समय क्या – क्या ध्यान रखना चाहिए ?
उत्तर :

  1. भीड़ से बचें : अगर शांति से दर्शन करने हैं तो महाशिवरात्रि और सावन सोमवार को न जाएँ। वरना लाइन में 3-4 घंटे लग जाते हैं।

  2. कपड़े : मंदिर में पारंपरिक वस्त्र पहनें। शॉर्ट्स, मिनीस्कर्ट, या बहुत टाइट कपड़े पहनकर न जाएँ।

  3. जूते-चप्पल : मंदिर के मुख्य द्वार के बाहर ही उतार दें। वहाँ निःशुल्क जूता स्टैंड है।

  4. प्रसाद के लिए थैला : एक छोटा कपड़े का थैला साथ रखें, जिसमें प्रसाद और पवित्र जल रख सकें।

  5. एलोरा को न भूलें : घृष्णेश्वर सिर्फ 10 मिनट की ड्राइव पर एलोरा की गुफाओं से है। इन दोनों को एक साथ जरूर जोड़ें

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