काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग : भस्म, भक्ति और बाबा का वो सच जो मंदिरों में नहीं लिखा (Part 7)

Hello Friends, पिछले पार्ट 6 में मैंने “भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग” का उल्लेख किया था जिसने इस 12 ज्योतिर्लिंग की यात्रा को आनंद से भर दिया | अब पार्ट 7 की शुरुआत करने जा रहे हैं इसमें “काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग” की चर्चा करेंगे | जब मैं ये यात्रा कर रहा था तो एक अलग ही उत्साह में अंदर था जो मैं शब्दों में बयाँ नही कर सकता | चलिये फिर बिना किसी देरी के सातवें चरण के यात्रा की शुरुआत करते हैं –

Table of Contents

1. काशी विश्वनाथ (Kashi Vishwanath) : गंगा की सीढ़ी पर बैठे-बैठे

kashi vishwanath

मैं बता नहीं सकता कि काशी (Kashi Vishwanath) बुलाती कैसे है। कोई फ़ोन नहीं करती, कोई पत्र नहीं लिखती। बस एक दिन अचानक लगता है — जाना है। और जब जाना होता है, तो रुकना मुश्किल हो जाता है। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। मैं दिल्ली में अपने काम में उलझा था, एक साधारण-सा आदमी, न बहुत धार्मिक, न बहुत नास्तिक। 

बीच-बीच में मंदिर चला जाता हूँ, कभी शिवरात्रि पर जाग लेता हूँ, कभी सावन में जल चढ़ा आता हूँ। लेकिन काशी? काशी मेरे लिए बस एक नाम था, जो दूरदर्शन पर आने वाले धार्मिक कार्यक्रमों में सुनने को मिलता था। “काशी विश्वनाथ”, “ज्योतिर्लिंग”, “मोक्ष की नगरी” — ये सब शब्द कानों में पड़ते थे, पर दिल तक नहीं उतरते थे।

फिर एक रात मैं बिना किसी योजना के निकल पड़ा। ट्रेन पकड़ी, स्लीपर क्लास, बिना रिजर्वेशन के। टिकट तो चार्ट नहीं हुआ था, पर टीटी साहब ने रहम खाकर बैठने को जगह दे दी। पूरी रात चलती ट्रेन में मैं खिड़की से बाहर देखता रहा — अंधेरे में कभी एक पेड़ दिखता, कभी किसी स्टेशन की पीली रोशनी। 

सुबह जब मैं उठा, तो बाहर हरियाली थी, और कहीं दूर कोई मस्जिद या मंदिर सा दिखा। मैंने सोचा — काशी आने वाला हूँ, पर अंदर कुछ खलबला नहीं रहा था। बस थकान थी, सुबह की ठंडी हवा, और चाय का ख्याल।

जब मैं काशी (Kashi Vishwanath) (वाराणसी जंक्शन) उतरा, तो सबसे पहले गंध ने थपथपाया। क्या गंध थी वह ? सड़ा-पचा, और फिर भी कुछ मीठा-सा। धूप की, गोबर की, गंगा की और हज़ारों लोगों के पसीने की मिली-जुली गंध। मैं थोड़ा हिचकिचाया, क्योंकि दिल्ली के एसी कमरे से निकला शरीर अभी भी इस असली दुनिया से तालमेल नहीं बैठा पाया था। एक ऑटो वाले ने झपट लिया — “कहाँ जाना है बाबू, काशी विश्वनाथ ? चलो घाट, पचास रुपया।”

मैंने कहा — “मंदिर, सीधा मंदिर।”

ऑटो चलने लगा। रास्ते में सब कुछ इतना गन्दा, फिर भी इतना जीवंत था कि मैं कुछ सोच नहीं पा रहा था। गाय बीच सड़क पर लेटी थी, कोई उसे टटोल रहा था। बच्चे पन्नी के खिलौने से खेल रहे थे। एक चाय की दुकान पर तीन आदमी बैठे थे और एक बुजुर्ग कुछ सुना रहा था — “…तभी बाबा ने कहा, बेटा, तू क्यों परेशान है ?” मैं ऑटो से झाँकता रहा। फिर अचानक सड़कें संकरी हो गईं, बाज़ार शुरू हो गए। और फिर — एक कोने के पार — मैंने देखा वह शिखर। सुनहरा। चमकता हुआ। बोलता हुआ सा।

मैं पहुँच गया था। काशी विश्वनाथ (Kashi Vishwanath) के द्वार पर।

उस द्वार पर पहुँचते ही सबसे पहली चीज़ जो टकराई, वो थी — भीड़। लेकिन यह वैसी भीड़ नहीं थी जैसी मैंने कभी देखी थी। किसी स्टेशन पर, किसी मेले में, या किसी राजनीतिक रैली में जैसी भीड़ होती है — वहाँ एक अजीब सी लड़ाई होती है, हर कोई अपनी जगह बनाने को बेचैन होता है। यहाँ ऐसा नहीं था। यहाँ लोग धक्का तो दे रहे थे, पर साथ ही मुस्कुरा भी रहे थे। 

एक औरत ने मुझसे बिना जान-पहचान के अपना पर्स पकड़ा दिया, “जरा मेरा बच्चा संभाल लो भईया, मैं जूते निकालती हूँ।” मैंने बच्चे को उठा लिया, वह हँसा। पुलिस वाले सीटी बजा रहे थे, किसी बाबा ने जोर से घंटी बजा दी। मैंने महसूस किया — यहाँ सब कुछ अराजक है, फिर भी सब ठीक है।

2. ज्योतिर्लिंग क्या है ? — वो पहली बार जब शिव बन गए प्रकाश

अक्सर लोग कहते हैं, “बारह ज्योतिर्लिंग” हैं। नाम गिनाते हैं — सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकाल, ओंकारेश्वर, केदारनाथ, भीमाशंकर, विश्वनाथ, त्र्यंबकेश्वर, वैद्यनाथ, नागेश्वर, रामेश्वरम, घृष्णेश्वर। लेकिन यह “ज्योतिर्लिंग” है क्या, यह समझने के लिए मुझे एक पुराने पंडित जी से मिलना पड़ा। वह बैठे थे मणिकर्णिका घाट की सीढ़ी पर, एक पुरानी गीता पढ़ रहे थे। मैंने उनसे पूछा — “ज्योतिर्लिंग ?”

उन्होंने मुँह उठाया, मेरी तरफ देखा, फिर कहा — “बेटा, लिंग का मतलब चिह्न होता है, निशानी। और ज्योति का मतलब प्रकाश। तो ज्योतिर्लिंग मतलब — वह निशानी जहाँ शिव खुद प्रकाश बनकर प्रकट हुए। बिना आकार का, बिना सीमा का। उस दिन शिव ने ब्रह्मा और विष्णु को बताया कि मैं वह हूँ जिसका कोई अंत नहीं।”

पंडित जी ने कहानी सुनाई। पुराने समय की बात है, ब्रह्मा और विष्णु में यह विवाद हो गया कि कौन बड़ा है। तभी बीच में एक अग्नि स्तंभ प्रकट हुआ, जिसका न आदि दिखता था, न अंत। ब्रह्मा हंस बनकर ऊपर गए, विष्णु वराह बनकर नीचे। ब्रह्मा ने झूठ बोला कि मैं शीर्ष पर पहुँच गया, तब शिव ने उन्हें श्राप दिया कि तुम्हारी पूजा नहीं होगी। और उस अग्नि स्तंभ के बारह हिस्से हुए — बारह ज्योतिर्लिंग।

मैंने पूछा — “तो काशी (Kashi Vishwanath) वाला अलग क्यों है?”

पंडित जी हँसे — “अलग इसलिए कि यहाँ शिव ने खुद कहा — जो इस नगरी में मरेगा, उसे मैं मुक्ति दूंगा। कहीं और नहीं। बस यहाँ।”

मैंने सोचा — बारह में से एक होते हुए भी यह अनोखा है। दूसरे ज्योतिर्लिंगों की तरह यह पहाड़ों में नहीं, रेगिस्तान में नहीं, समुद्र के किनारे नहीं। बल्कि सबसे पुराने शहर के बीच, एक गली के अंत में, जहाँ हर दीवार पर गोबर के थप्पे हैं, और हर कोने पर एक बाबा बैठा है जो कुछ भी कह सकता है।

मैं अब यहाँ यह भी समझ गया कि “ज्योतिर्लिंग” कोई पत्थर नहीं है। वह एक स्थान की ऊर्जा है, जहाँ सदियों से करोड़ों लोगों ने अपनी आस्था टपकाई है। मैं पंडित जी को प्रणाम करके चला गया, पर उनकी बात मेरे दिमाग में चिपक गई — “बिना आकार का, बिना सीमा का।” कितना सुंदर उपहास है यह कि हम लोग किसी मूर्ति के सामने हाथ जोड़ते हैं, जबकि बाबा कहते हैं, मैं तो बिना आकार का हूँ। शायद यही परम तमाशा है। और यही परम रहस्य भी।

3. काशी जलती रही, पर बुझी नहीं — इतिहास के थपेड़ों में खड़ा विश्वनाथ

इतिहास मैंने हमेशा किताबों में पढ़ा था — तारीखें, राजा, लड़ाइयाँ। लेकिन काशी के गलियारों में चलते हुए इतिहास रगों में उतर जाता है। यहाँ का हर पत्थर किसी न किसी कहानी को बयाँ कर रहा है। मैं एक दिन विश्वनाथ के पिछले हिस्से में खड़ा था, जहाँ से ज्ञानवापी मस्जिद दिखती है। वहाँ एक बुजुर्ग खड़े थे, उन्होंने मुझे पुकारा — “बेटा, जानता है यह क्या है?”

मैंने कहा — “ज्ञानवापी मस्जिद।”

वह बोले — “हाँ, लेकिन इसके नीचे जो है, वह असली ज्ञानवापी कुंआ है। जब औरंगजेब ने 1669 में मंदिर तोड़ा, तो पुजारियों ने शिवलिंग को इस कुएँ में छुपा दिया था। आज भी मस्जिद की दीवार में हिंदू देवियों की मूर्तियाँ हैं।”

मैं चुप हो गया। मैं पहले से यह सब पढ़ चुका था, लेकिन यहाँ खड़े होकर देखना अलग बात थी। काशी का इतिहास सिर्फ आस्था का नहीं, बल्कि प्रतिरोध का भी रहा है। पहले मुस्लिम आक्रमण — 1194 में कुतुबुद्दीन ऐबक ने मंदिर को नुकसान पहुँचाया। फिर 1351 में फिरोजशाह तुगलक ने। लेकिन हर बार मंदिर बन गया। फिर 1669 में औरंगजेब ने जमीनी स्तर तक तुड़वा दिया, और मस्जिद बनवा दी। कहते हैं उसने इतनी जल्दी मस्जिद बनवा दी कि मंदिर के पत्थरों का ही इस्तेमाल किया। आज भी वे पत्थर मस्जिद की दीवारों में नजर आते हैं, जिन पर हिंदू देवी-देवताओं की नक्काशी है। कैसा विचित्र है यह सब ?

यहाँ बैठकर मैं सोचने लगा — क्या धर्म के नाम पर लड़ाई कभी खत्म होगी ? और तभी वह बुजुर्ग फिर बोले — “बेटा, यहाँ शिव कभी नहीं गए। मस्जिद बनी, पर शिव यहाँ रहे। क्योंकि वह कोई पत्थर नहीं।”

यह सच है। 1780 में महारानी अहिल्याबाई होलकर ने वर्तमान मंदिर का निर्माण करवाया। मैंने पढ़ा था कि वह कितनी महान शासक थीं, पर यहाँ आकर लगा — उसने सिर्फ एक इमारत नहीं बनवाई, उसने एक विश्वास को फिर से खड़ा किया। फिर 1835 में पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने स्वर्ण शिखर बनवाया। उस सोने की परत चढ़ी शिखर पर मैंने घंटों देखा। एक गरीब पंजाबी सिक्ख राजा, एक हिंदू मंदिर पर सोना चढ़ाता है — क्या यह नहीं कहता कि धर्म की दीवारें इंसान बनाते हैं, परमात्मा इनसे ऊपर है?

आज वहाँ कॉरिडोर बन चुका है। 2021 में प्रधानमंत्री मोदी ने उद्घाटन किया। कुछ लोग कहते हैं कि पुरानी काशी खत्म हो गई। कुछ कहते हैं कि अब सुंदर हो गई है। मैं दोनों के बीच अटका हूँ। हाँ, पहले वहाँ बहुत अफरा-तफरी थी, ठेले थे, कूड़ा था, गंदगी थी। लेकिन वह गंदगी भी काशी की अपनी थी। अब सब साफ़ है, सब चमक रहा है, लेकिन कहीं न कहीं वह पुराना जादू थोड़ा फीका लगता है। लेकिन कौन हूँ मैं इसका फैसला करने वाला ? काशी जीती रहे। बाबा जीते रहें। बस इतना काफी है।

4. जब मैं गर्भगृह में खड़ा था — भूला हुआ दिल और घंटियों का गणित

तीसरे दिन सुबह तीन बजे मेरी नींद खुल गई। मैं होटल वाले के बोलने से नहीं, बल्कि किसी भीतरी अलार्म से जागा। बाहर अंधेरा था, चाँद नहीं था, पर गंगा से ठंडी हवा आ रही थी। मैंने सोचा — चलते हैं। भस्मारती देखने का मन था। यह एक ऐसी आरती है जो सुबह तीन-साढ़े तीन बजे होती है, मंदिर खुलता है तो सबसे पहले यही आरती। नाम ही भस्म आरती है — भस्म यानी राख। मान्यता है कि शिव राख में निवास करते हैं।

मैं पहुँचा तो मंदिर परिसर में पहले से सैंकड़ों लोग थे। कैसे ? तीन बजे ? फिर पता चला कि कई लोग रात भर यहीं सोते हैं। सर्दी थी, सब कम्बल ओढ़े बैठे थे। चुपचाप। कोई जयकारा नहीं था। बस सन्नाटा और भीतर से घंटियों की हल्की सी आवाज़।

लाइन लगी। लगभग दो घंटे लगे। मैंने जूते बाहर ही छोड़ दिए थे, पैर बर्फ की तरह ठंडे हो चुके थे। पर फिर अचानक — गर्भगृह का दरवाजा खुला। एक पुजारी ने जोर से घंटी बजाई। मैंने किसी को चिल्लाते सुना — “बम भोले!” और मैं भी चिल्ला उठा — “हर-हर महादेव!”

फिर वह पल आया जब मैं गर्भगृह के अंदर खड़ा था। शिवलिंग छोटा था, लगभग साढ़े तीन फुट का, बलुआ पत्थर का। उस पर चाँदी का मुकुट था और फूलों की माला। रोशनी मंद थी, पर ऐसा लग रहा था मानो वह पत्थर अपने आप चमक रहा हो। मैंने सोचा — यही वह लिंग है जिसने तीनों लोक देखे। यही वह स्थान है जहाँ सैकड़ों राजाओं ने सिर झुकाया। और यही वह शिव हैं जिन्होंने कहा — मैं प्रकाश हूँ।

मैं बस खड़ा रहा। प्रणाम किया। कुछ माँगने का मन नहीं हुआ। कभी-कभी मैं सोचता हूँ — हम लोग बाबा के पास बैंक बैलेंस ठीक करने, नौकरी लगाने, शादी कराने जाते हैं। पर वहाँ खड़े होकर मैंने महसूस किया कि यह सब तो नगण्य है। बाबा तो सिर्फ यह कह रहे थे — रुक। साँस ले। देख। मैं यहाँ हूँ।

वहाँ से बाहर आया तो आँखें नम थीं। पता नहीं क्यों। मेरे साथ खड़े एक साधु ने कहा — “रोना अच्छा है, बेटा। यहाँ हर कोई रोता है। पर कोई रोता किसके लिए है, यह नहीं जानता।”

मैं बाहर निकलकर लस्सी पीने चला गया। लस्सी वाले ने पूछा — “दर्शन हो गए बाबा के ?” मैंने हाँ कहा। उसने कहा — “जाओ फिर, अब जीवन सार्थक हो गया।” मैं हँस पड़ा। सार्थक ? शायद। या शायद अब शुरुआत हुई है। कौन जानता है ?

5. सुबह तीन बजे की भस्मारती — जब मैंने शिव को राख में देखा

आपको सच बताऊँ ? मैं रात को सो नहीं पाया था। किसी ने कहा था कि भस्मारती के लिए मंदिर रात दो बजे ही खुलने लगता है, लेकिन असली आरती साढ़े तीन बजे। मैंने अलार्म लगाया — ढाई बजे। पर आँखें खुल गईं दो बजे ही। ऐसा लग रहा था जैसे कोई मुझे झकझोर रहा हो। “उठ, चल। देर हो जाएगी।”

मैं होटल से निकला। सर्दी थी, दिसंबर का महीना। काशी (Kashi Vishwanath) में उस वक्त तापमान पाँच-छह डिग्री से नीचे चला जाता है। मैंने गर्म जैकेट पहनी, एक ऊनी टोपी, और सबसे ऊपर स्टोल लपेट लिया। फिर भी ठंड हड्डियों में घुस रही थी। रास्ते में कोई नहीं था। सड़कें खाली थीं, सिर्फ आवारा कुत्ते सो रहे थे, और कहीं किसी दुकान की हरी-पीली लाइटें झपक रही थीं।

मैं मंदिर के मुख्य द्वार पर पहुँचा तो दंग रह गया। रात के ढाई बजे भी वहाँ कम से कम पाँच सौ लोग खड़े थे। कुछ कंबल ओढ़े बैठे थे, कुछ चारपाई पर लेटे थे, कुछ बस खड़े-खड़े ठिठुर रहे थे। एक बुजुर्ग महिला मेरे बगल में आई, उसके हाथ में एक टोकरी थी — फूल, प्रसाद, दीपक। उसने कहा, “बेटा, पहली बार आए हो ?” मैंने कहाँ हाँ। बोली, “आँखें खुली रखना। भस्म वाला दृश्य कभी नहीं भूलोगे।”

हम दो घंटे लाइन में खड़े रहे। सन्नाटा था, लेकिन सन्नाटे में भी कुछ गूँज थी — कहीं कोई जप कर रहा था ‘ॐ नमः शिवाय’, कहीं किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आ रही थी। एक संन्यासी ने अपनी जटाएँ हिलाईं, उनमें से राख उड़ी। मैंने पूछा — “भस्म कहाँ से लाते हो ?” उसने बिना कुछ कहे अपना हाथ बढ़ाया, उसकी हथेली पर राख थी। मैंने सूँघा। श्मशान की गंध, गाय के गोबर की गंध, और कुछ मीठा सा — शायद चंदन। उसने कहा, “यह काशी (Kashi Vishwanath) है। यहाँ जीवन और मृत्यु साथ खेलते हैं।”

सवा तीन बजे मंदिर (Kashi Vishwanath) के दरवाजे खुले। पुजारी बाहर आए, सब सफेद वस्त्र पहने थे। उनके माथे पर भस्म की तीन लकीरें थीं। भीड़ में हलचल मच गई। हर तरफ से ‘हर-हर महादेव’ के नारे लगने लगे। मैं भी चिल्लाया — ‘बम भोले!’ और फिर हम भीतर घुसे।

गर्भगृह छोटा है, इतना छोटा कि दस-पंद्रह लोग मुश्किल से खड़े हो सकते हैं। पर उस सुबह हम कम से कम तीस लोग थे, एक दूसरे से चिपके हुए। पुजारी ने एक बड़ी थाली में भस्म रखी, उस पर घी डाला, फिर अगरबत्तियाँ जलाईं। फिर उसने मंत्र पढ़ना शुरू किया — संस्कृत के वे मंत्र जो मैं नहीं समझता था, पर हर शब्द मेरी छाती पर ठोकर की तरह लग रहा था।

फिर — उसने भस्म ली और उसे शिवलिंग पर चढ़ा दिया। सफेद भस्म, साँवले पत्थर पर। अंदर की रोशनी मंद थी, पर वह भस्म जगमगा उठी जैसे बिजली हो। मुझे लगा, यही तो शिव है — राख, विभूति, विनाश का प्रतीक। क्योंकि वह हमें बताते हैं कि शरीर को एक दिन राख होना है, तो इतने अहंकार में क्यों हो ?

उस पल मैं भूल गया कि मैं कौन हूँ, कहाँ का रहने वाला हूँ, कितना पैसा है बैंक में, क्या नौकरी है। सब धूल। सब भस्म। बस एक चीज़ बची — वह प्रकाश जो उस शिवलिंग से निकल रहा था। मुझे याद है, मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं। कुछ देर बाद खोली तो पुजारी ने मेरे माथे पर भस्म लगा दी थी। उसने कहा — “अब बाबा ने बुला लिया।”

जब मैं बाहर आया, सुबह के चार बज रहे थे। आकाश में तारे अभी भी थे, लेकिन पूरब में हल्की सफेदी आ गई थी। गंगा से कोहरा उठ रहा था, और कहीं दूर एक मंदिर में शंख बज रहा था। मैंने अपने माथे पर लगी भस्म को नहीं धोया। पूरे दिन रखा। होटल लौटा तो दर्पण में देखा — माथे पर भस्म, आँखों में अब भी वही प्रकाश। मैंने सोचा, मरने के बाद शरीर तो जल ही जाता है, पर काशी में मिली यह राख कभी नहीं जलेगी। 

6. काशी (Kashi Vishwanath) के साधु — पागल, परमहंस, या मैं हूँ पागल ?

एक बात जो काशी (Kashi Vishwanath) को दुनिया के किसी भी तीर्थ से अलग बनाती है, वह हैं यहाँ के साधु। नागा, अघोरी, उर्ध्वबाहु, मौनी, बावले — हर किस्म के साधु यहाँ मिल जाते हैं। कोई गंगा किनारे खड़ा सूरज की तरफ देख रहा होता है, कोई किसी गली में नाच रहा होता है, कोई चुपचाप भिक्षा माँग रहा होता है। मैंने कई दिन सिर्फ उन्हें देखने में बिताए। क्योंकि लगता था कि साधुओं के पास कोई राज है, जो हम गृहस्थों को नहीं पता।

पहला साधु — भोलानाथ (नाम बदला है, पर कहानी सच है)

वह मिला मुझे विश्वनाथ (Kashi Vishwanath) गली के कोने पर। उम्र लगभग सत्तर साल, दाढ़ी सफेद, बाल बिखरे, शरीर पर केवल एक लंगोटी। रात के दस बजे थे, सर्दी में वह अकेला बैठा था, उसके पास एक पुराना कंबल था और एक ताँबे का लोटा। मैं रुका। उसने पूछा — “खाना है?” मैं चौंका, क्योंकि मुझसे किसी ने ऐसा नहीं पूछा था। मैंने कहा — “नहीं बाबा, मैंने खा लिया।” उसने कहा — “मैंने नहीं पूछा तुझे भूख है या नहीं। मैंने पूछा — खाना है ? मेरे पास खाना है, तू ले ले।”

मैंने देखा, उसके लोटे में एक रोटी थी और थोड़ी सी सब्जी। मैंने मना कर दिया। उसने हँसकर कहा — “देख, तू मुझे बाबा कहता है, पर मैं तुझसे ज्यादा भूखा नहीं हूँ। तू क्यों नहीं लेता ?” मैं चुप रहा। फिर उसने खुद ही वह रोटी खा ली, बिना किसी जल्दी के। खाते-खाते बोला — “बेटा, काशी में सब भूखे हैं। पर कोई भूखा नहीं है। समझा ?”

मैंने नहीं समझा। पर उसकी बात आज भी मेरे दिमाग में है। शायद वह कह रहा था कि शरीर की भूख बुझ जाती है, पर आत्मा की भूख कभी नहीं बुझती। उसी को पूजता है शिव।

दूसरा साधु — नागा

मैं एक दिन मणिकर्णिका घाट पर बैठा था। वहाँ श्मशान है। लाशें जलती हैं। हड्डियाँ नदी में बहती हैं। मैं डर रहा था, पर कौतूहल भी था। वहाँ एक नागा साधु आया — पूरा शरीर भस्म से ढका, लंबी जटाएँ, गले में रुद्राक्ष, हाथ में त्रिशूल। वह सीधा मेरे पास आया और बोला — “तू यहाँ क्या देख रहा है?”

मैं डर गया, पर बोला — “बस… जीवन और मृत्यु।” उसने जोर से हँसकर कहा — “बेवकूफ, यहाँ जीवन और मृत्यु एक ही है। वह देख, जो शरीर जल रहा है, वही कल किसी के घर पालने में था। और जो पालने में है, वही कल इस चिता पर होगा। तो तू किसको देख रहा है?”

मैं सन्न रह गया। उसने फिर कहा — “डरता क्यों है? भस्म को देख। वही तेरा अंत है, वही तेरा आरंभ।”

वह चला गया। मैं घंटों वहीं बैठा रहा। उस दिन मैंने देखा — चार लाशें जलीं। पर कोई रोया नहीं। क्योंकि काशी में रोने का रिवाज नहीं है। यहाँ मरना उत्सव है। सच में।

तीसरा साधु — वो जिसने मुझे पैसे दिए

हाँ, यह भी सच है। मैं एक दिन एक गली से गुजर रहा था, तो एक साधु ने मुझे रोका। उम्र पचास के आसपास, साफ-सुथरा, सफेद कुर्ता पहने। उसने कहा — “बेटा, मुझे दस रुपये दे दो, चाय पीनी है।” मैंने उसे बीस रुपये दे दिए। उसने दस रुपये अपने पास रखे, दस रुपये वापस मेरी तरफ बढ़ा दिए। कहा — “ले, यह तेरे लिए। अब बता, तुझे क्या चाहिए ?”

मैं हैरान था। “बाबा, आपने मुझसे माँगे, अब दे रहे हो ?”

वह बोला — “बेटा, मैं साधु हूँ, पर माँगना और देना एक ही है। तूने मुझे दिए, मैंने तुझे दिए। बस फर्क इतना है कि तूने सोचा तू महान है, और मैंने सोचा मैं महान हूँ। दोनों बेवकूफ हैं। बाबा एक है।”

मैं उस दिन रात तक सोचता रहा — काशी के ये साधु पागल हैं या मैं ?

7. मान्यताएँ — यहाँ मरने का सच

हर हिंदू जानता है — काशी (Kashi Vishwanath) में मरने से मोक्ष मिलता है। पर इसके पीछे का सच क्या है ? मैंने यहाँ बहुत पूछा, बहुत सुना, बहुत पढ़ा।

काशीवासी — वो जो यहाँ मरने आते हैं |

आप देखेंगे कि काशी की गलियों में सैकड़ों बुजुर्ग लोग घूम रहे हैं, जो दूसरे राज्यों से आए हैं। यूपी से, बिहार से, राजस्थान से, बंगाल से, यहाँ तक कि केरल और असम से भी। वह कोई सैलानी नहीं हैं। वह यहाँ मरने आए हैं। वह काशीवासी हैं।

एक बूढ़े जी से मेरी बात हुई। नाम थे — रामलाल जी, उम्र 84 साल, राजस्थान के रहने वाले। तीन साल पहले आए थे। अब यहीं रहते हैं, एक छोटे से कमरे में, पाँच सौ रुपये किराए पर। उनका बेटा हर महीने दो-चार हजार भेज देता है। बाकी का गुजारा भीख या दान से। मैंने पूछा — “इतनी मुश्किल में क्यों ?”

रामलाल जी हँसे — “बेटा, मैं 84 का हूँ। अब और क्या चाहिए? एक दिन शरीर छूटना ही है। क्यों न काशी में छूटे ? यहाँ मरूँगा तो सीधे शिव के पास। घर में मरूँगा तो फिर से जनम लेना पड़ेगा। अब बहुत हो गए जनम।”

मैंने पूछा — “डर नहीं लगता?” वह बोले — “डर किस बात का ? जब शिव खुद कहते हैं — जो मेरी नगरी में मरेगा, उसे मैं उद्धार दूंगा। तो फिर डर कैसा ?”

मैं सोचता हूँ — कितनी साहस की बात है कि एक इंसान अपना सब कुछ छोड़कर किसी दूसरे शहर में अकेला मरने आ जाए। यह विश्वास है या पागलपन ? मुझे लगता है, यह वह विश्वास है जो पागलपन से भी ऊपर है।

पिंडदान — मैंने अपने पूर्वजों को याद किया

मैंने सोचा, चूँकि आया हूँ तो पिंडदान भी कर लूँ। यह एक ऐसी रस्म है जहाँ मृत पूर्वजों के नाम पर चावल के पिंड बनाकर गंगा में बहाए जाते हैं। मैं दशाश्वमेध घाट पर गया, एक पंडित मिला। नाम था बृजेश तिवारी। उम्र पैंतालीस, पेट निकला हुआ, गले में जनेऊ, हाथ में रुद्राक्ष की माला। उसने पूछा — “किसके लिए करना है ?”

मैंने अपने दादा-परदादा के नाम बताए। उसने एक ताँबे के पात्र में चावल, दूध, दही, और तिल मिलाए, फिर उसके गोले बनाए। मुझे बोला — “यह पिंड हैं। अब नाम लो और उन्हें पानी में बहा दो।”

जैसे-जैसे मैं पिंड बहा रहा था, मेरी आँखें भर आईं। क्यों ? पता नहीं। शायद इसलिए कि मैंने कभी उन लोगों को नहीं देखा, पर आज मैं उनका नाम ले रहा था। गंगा का पानी ठंडा था, और हवा में किसी मंदिर की घंटी बज रही थी। मैंने सोचा — हो सकता है यह सब निरर्थक हो, एक रस्म हो, पर इस रस्म ने मुझे अपने पूर्वजों से जोड़ दिया। और शायद यही धर्म का सच है — तुम्हें उनसे जोड़ना जो अब नहीं हैं।

बृजेश पंडित ने मुझसे दो हजार रुपये दक्षिणा में लिए। कुछ लोग कहेंगे बहुत है, कुछ कहेंगे कम है। मैंने दिए। क्योंकि उसने एक काम किया — मुझे वह एहसास दिलाया जो पैसे से नहीं खरीदा जाता।

8. गंगा आरती — शाम का वह जादू जो शब्दों से परे है |

काशी (Kashi Vishwanath) में शाम का एक खास वक्त होता है — शाम ढलते ही पूरा शहर मानो किसी दूसरी दुनिया में चला जाता है। और उस दुनिया का राजा है — दशाश्वमेध घाट पर होने वाली गंगा आरती।

मैं सुनता आया था, वीडियो देखे थे, पर यहाँ खड़ा होना बिल्कुल अलग था। पहले से ही भीड़ थी। शाम छह बजते-बजते घाट की हर सीढ़ी पर लोग बैठ चुके थे। मैंने भी जगह ली, दूसरी सीढ़ी पर। मेरे दाएँ एक फ्रेंच दंपति बैठा था, बाएँ एक बिहारी परिवार। सामने गंगा थी, काली-नीली, जैसे कोई अनंत समुद्र हो।

साढ़े छह बजे सात युवा पुजारी आए, सब सफेद धोती-कुर्ता में। बाल्कनियों पर लोगों ने दीपक जलाए। तब एक सन्नाटा छा गया। फिर घंटी बजी — बड़ी घंटी, ऐसी कि सीना गूँज उठा। फिर मंत्र शुरू हुए। मुझे याद है — ‘ॐ जय गंगे मैया’। सब लोग गा रहे थे। मैं भी गुनगुना रहा था, शब्द नहीं आ रहे थे, पर सुर आ रहे थे।

फिर सबसे बड़ा दृश्य — सातों पुजारियों ने एक साथ विशाल दीप थाली उठाई। अगरबत्तियों का धुआँ, धूप की सुगंध, घंटियों की आवाज़, और बार-बार ‘हर-हर गंगे’ के नारे। मेरी आँखें नम थीं। मेरे बाएँ बैठी एक बूढ़ी माँ रो रही थी। उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और कहा — “बेटा, गंगा देख रही है, हमें देख रही है।”

मैंने अपना हाथ नहीं हटाया। गंगा में लालटेनें तैर रही थीं, सैकड़ों छोटे दीपक, जैसे आकाश के तारे नीचे आ गए हों। आरती खत्म हुई, तो पुजारियों ने प्रसाद बाँटा। मुझे एक लड्डू मिला और थोड़ा सा चंदन। मैंने चंदन माथे पर लगाया और लड्डू खाया। उस लड्डू का स्वाद मुझे आज भी याद है — दूध और घी की तरह, मीठा, पर ज़्यादा नहीं।

शाम ढल चुकी थी, घाट की बत्तियाँ जल गई थीं, और गंगा पर पूरा चाँद खिल रहा था। मैं वहाँ घंटों बैठा रहा। कुछ लोग सो गए थे, कुछ प्रेमी जोड़े बातें कर रहे थे, कुछ बच्चे दीए तैरा रहे थे। मैंने सोचा — यही तो काशी है। वह शहर जो तुम्हें रोने का हक देता है, चुप रहने का हक देता है, और यह भी कि अगर चाहो तो चिल्ला दो — ‘हर-हर महादेव’।

9. काशी (Kashi Vishwanath) की गलियाँ — खो जाने का सुख

एक दिन मैंने तय किया — कोई गूगल मैप नहीं, कोई पूछताछ नहीं, बस चलता हूँ जिधर पैर ले जाएँ। और मैं चल पड़ा। सुबह के नौ बजे थे, धूप तेज़ नहीं थी, गलियाँ संकरी थीं, इतनी संकरी कि दो लोग मुश्किल से गुजरें। दीवारों पर गाय के गोबर के थप्पे सूख रहे थे, कहीं बालकनी पर चाय की चुस्की लेता एक आदमी, कहीं एक बूढ़ी औरत अपने दरवाजे पर रंगोली बना रही थी।

मैं एक जगह रुका जहाँ चाट वाला था। उसके पास सात-आठ लोग खड़े थे। मैंने भी खड़े होकर टमाटर चाट खाई। पानीपुरी खाई। बिना हाथ धोए। पता नहीं क्यों, लेकिन उस गंदगी में स्वाद कुछ और ही था। चाट वाले ने पूछा — “बाबा के दर्शन कर लिए?” मैंने हाँ कहा। बोला — “तो अब शहर देखो। यहाँ बाबा हर गली में रहते हैं।”

मैं आगे बढ़ा। एक मोड़ पर एक अघोरी बैठा था — असली अघोरी, माथे पर खोपड़ी की माला, हाथ में डमरू। मैं रुक गया। उसने मेरी तरफ देखा और हँसा। मैं वहाँ से निकल गया, पर उसकी हँसी अभी तक मेरे कानों में है — जैसे वह कह रहा हो — “तू कितना डरपोक है, पर आया है बाबा के दरबार में।”

फिर मैं पहुँचा विश्वनाथ (Kashi Vishwanath) मंदिर के पीछे उस गली में जहाँ श्रृंगार गौरी मंदिर है। एक छोटा सा मंदिर, बिल्कुल साधारण, पर वहाँ स्त्रियाँ अखंड दीप जलाती हैं। मैं दरवाजे पर खड़ा रहा। एक महिला ने मुझे देखा और कहा — “बेटा, बाहर क्यों खड़ा है? भीतर आ जा, शक्ति तुझे भी दर्शन देगी।” मैं अंदर गया, प्रणाम किया। उस महिला ने मेरे हाथ में एक लौंग रख दी — “बोल, हर-हर महादेव।”

मैंने बोला, तो वह मुस्कुराई — “अब जा, बेटा। तेरा कल्याण हो।”

बाहर निकला तो चार घंटे बीत चुके थे। पैर दुख रहे थे, प्यास लगी थी, पर मन अजीब तरह से शांत था। जैसे मैंने ये चार घंटे किसी और लोक में बिताए हों। गूगल मैप कभी खोलकर नहीं देखा। और जब होटल पहुँचा, तो रास्ता अपने आप मिल गया। शायद बाबा ने दिखा दिया।

10. ज्ञानवापी विवाद — ज़मीन पर खड़े होकर देखा सच

यह विषय थोड़ा उलझा हुआ है, पर मैं नहीं छोड़ सकता। क्योंकि मैंने ज्ञानवापी परिसर में जाकर सब कुछ देखा। हाँ, परिसर का एक हिस्सा मुसलमानों के लिए है, एक हिस्सा हिंदुओं के लिए। मस्जिद की दीवार में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ हैं — यह कोई नया राज नहीं है। और विवाद यह है कि नीचे पुराना मंदिर था या नहीं।

मैं वहाँ खड़ा था, उस दीवार को छू रहा था। पत्थर ठंडा था, मुलायम, जैसे वह अब भी कुछ कहना चाहता हो। एक बुजुर्ग हिंदू आदमी वहाँ आया, उसने कहा — “यह हमारी संस्कृति का अपमान है, मस्जिद के नीचे हमारे देवता कैद हैं।” उसके ठीक दो मिनट बाद एक युवा मुसलमान आया, उसने कहा — “भाई, मैं भी यहाँ नमाज पढ़ता हूँ, यह भी मेरी पवित्र जगह है।”

मैं दोनों को सुनता रहा। और सोचता रहा — क्या इतिहास को बदला जा सकता है ? हो सकता है 1669 में औरंगजेब ने मंदिर तोड़ा हो। हो सकता है उससे पहले भी किसी ने कुछ तोड़ा हो। और हो सकता है 200, 500, 1000 साल पहले किसी और का मंदिर रहा हो। तो अब क्या करें ? लड़ें ? एक दूसरे को मारें ? हम हजारों सालों से लड़ रहे हैं, और अभी तक हमें यह नहीं पता कि परमात्मा एक ही है, रास्ते अलग-अलग हैं।

मैं वहाँ से उठा, दोनों हाथ जोड़े — मस्जिद की तरफ और मंदिर की तरफ। बाबा विश्वनाथ (Kashi Vishwanath)  दोनों के बीच में बैठे हैं। शायद वही सच्चा ज्योतिर्लिंग है।

11. खाना — चाट, बाटी, भांग और भक्ति का स्वाद

काशी (Kashi Vishwanath) में खाना भी एक तपस्या है। मैं एक दिन बिल्कुल भूखा रहा, सिर्फ इसलिए कि देखूँ — क्या मिलता है। सुबह उठा तो गंगा घाट पर चाय पी। वह चाय इतनी गरम और मीठी थी, मानो गंगा के पानी में ही गुड़ घुल गया हो। फिर दोपहर को खिचड़ी खाई — किसी छोटी सी दुकान पर, मिट्टी के बर्तन में। सादी खिचड़ी, लौकी की सब्जी, और अचार। उस खिचड़ी का स्वाद अब तक भूला नहीं है। क्यों? शायद इसलिए कि मैंने उसे भक्ति के साथ खाया।

शाम को मैंने काशी की प्रसिद्ध चाट खाई — टमाटर चाट, पानी पूरी, और दही बड़ा। पेट खराब हो गया, पर मैं खुश था। क्योंकि काशी में पेट खराब होना भी एक अनुभव है।

और हाँ — भांग। मैंने सिर्फ एक गोली खाई, आधी। पता है क्या हुआ ? दुनिया धीमी हो गई। गंगा का पानी ज़्यादा चमकने लगा। लोग ज़्यादा सुंदर लगने लगे। मैं मणिकर्णिका घाट पर बैठा रहा, बिना किसी सोच के। कुछ साधु मेरे पास बैठ आए, उनमें से एक ने कहा — “भांग तो बस चढ़ती है, बेटा। असली नशा बाबा का है। वह चढ़े तो कभी उतरे नहीं।”

मैं हँसा। फिर घाट पर सो गया। जब आँख खुली तो सुबह के चार बजे थे। चिल्ल पड़ा — “हर-हर महादेव।” मेरे जैसे पागल और भी थे वहाँ।

12. वैज्ञानिक नज़र — क्यों काशी कभी मरी नहीं ?

मैं एक वैज्ञानिक नहीं हूँ, पर यहाँ आकर मैंने पढ़ा और सुना कि गंगा के पानी में बैक्टीरियोफेज होते हैं — यानी वे वायरस जो बैक्टीरिया को खा जाते हैं। यही वजह है कि गंगा का पानी सड़ता नहीं। यही वजह है कि लाखों लोग स्नान करते हैं, शव जलाते हैं, फिर भी पानी खराब नहीं होता।

और काशी में मौजूद ऊर्जा ? वैज्ञानिक कहते हैं कि यह शहर पृथ्वी की चुंबकीय रेखाओं पर बसा है। यहाँ के साधु-संन्यासी हज़ारों सालों से जो मंत्र पढ़ते आ रहे हैं, उनकी कंपन आज भी हवा में है।

मैं नहीं जानता यह कितना सच है। पर इतना जानता हूँ — मैंने जब उस शिवलिंग के सामने नेत्र बंद किए, तो मेरे भीतर एक कंपन हुई। वह विज्ञान था या आस्था ? क्या फर्क पड़ता है ?

13. बाबा ने मुझसे क्या कहा ? — अंतिम अध्याय

मेरी अंतिम रात थी काशी (Kashi Vishwanath) में। मैं दशाश्वमेध घाट पर बैठा था। चाँद पूरा था, गंगा की लहरों पर चाँदनी बिखरी थी। सब लोग जा रहे थे, घाट खाली हो रहा था। मैं अकेला रह गया। पैर ठंडे हो चुके थे, पर मैं हिलना नहीं चाहता था।

तभी एक साधु आया — बूढ़ा, दुबला-पतला, कंबल ओढ़े। वह मेरे पास आया और बिना पूछे मेरे बगल में बैठ गया। कुछ देर तक चुप रहा। फिर बोला — “कल जा रहा है न ?”

मैंने कहा — “हाँ बाबा।”

बोला — “बाबा मत बुला। बाप हूँ मैं तेरा। सुन, बेटा। काशी में जो देखा, वह ले जा। पर काशी को मत ले जा। क्योंकि काशी यहाँ है, अपनी जगह। तू वहीं जाकर अपने को याद रख — तू भी एक मंदिर है। और तेरे भीतर भी एक शिवलिंग है। उसकी पूजा कर। बस।”

मैं चुप था। उसने मुझे गले लगा लिया। उसके शरीर से राख की गंध आ रही थी और कुछ मीठा। फिर वह उठ गया और चला गया। उसका नाम नहीं पूछा। शायद उसका कोई नाम नहीं था। शायद वह विश्वनाथ (Kashi Vishwanath) था। शायद नहीं भी था। पर उसने जो कहा, वह मैं कभी नहीं भूलूंगा।

मैं सुबह की ट्रेन में बैठा, काशी छोड़ी। पीछे गंगा थी, मंदिर थे, घाट थे, और विश्वनाथ था। मेरी आँखों में आँसू थे। पर यह दुख के नहीं थे। यह कृतज्ञता के थे।

हो सकता है कुछ लोग कहें कि यह बहुत लंबा है, बहुत रोमांटिक है, या बहुत व्यक्तिगत है। पर मैंने तो बस वही लिखा जो मेरे साथ हुआ।

जय विश्वनाथ।
जय गंगा।
और सबको प्रणाम।

Frequently Asked Questions (FAQ)

1. काशी विश्वनाथ (Kashi Vishwanath) मंदिर कहाँ स्थित है ?
Ans) 
यह मंदिर (Kashi Vishwanath) वाराणसी (बनारस), उत्तर प्रदेश में है, जो गंगा नदी के पश्चिमी तट पर बसा है। मंदिर लहुराबीर इलाके में है, जो शहर के बीचों-बीच। अगर आप वाराणसी जंक्शन से आएँ तो ऑटो या ई-रिक्शा से 15-20 मिनट में पहुँच जाएँगे। बस याद रखें — गलियाँ बहुत संकरी हैं, बड़ी गाड़ी अंदर नहीं जाती।

2. काशी विश्वनाथ (Kashi Vishwanath) को ज्योतिर्लिंग क्यों कहा जाता है ?
Ans) 
पौराणिक कथा के अनुसार, जब शिव ने ब्रह्मा और विष्णु के बीच विवाद सुलझाने के लिए अग्नि स्तंभ का रूप धारण किया, तो वह अग्नि स्तंभ बारह भागों में टूटा। ये बारह स्थान ज्योतिर्लिंग कहलाए। काशी में स्थित विश्वनाथ (Kashi Vishwanath) उनमें से एक है। इसे मुक्तिदायक ज्योतिर्लिंग भी कहते हैं, क्योंकि मान्यता है — यहाँ मरने पर शिव सीधे मोक्ष देते हैं।

3. मंदिर (Kashi Vishwanath) का इतिहास क्या है ? क्या यह सच में तोड़ा गया था ?
Ans) 
हाँ, यह सच है। मंदिर (Kashi Vishwanath) को कई बार नष्ट किया गया। सबसे बड़ा विनाश 1669 में औरंगजेब के आदेश पर हुआ। उसने मंदिर तुड़वाकर उसी स्थान पर ज्ञानवापी मस्जिद बनवा दी। वर्तमान मंदिर का निर्माण 1780 में महारानी अहिल्याबाई होलकर ने करवाया। बाद में 1835 में महाराजा रणजीत सिंह ने स्वर्ण शिखर बनवाया।

4. मंदिर (Kashi Vishwanath) के दर्शन का समय क्या है ?
Ans) 
मंदिर (Kashi Vishwanath) सुबह 2:30 बजे से रात 11:00 बजे तक खुला रहता है, लेकिन अलग-अलग समय पर अलग-अलग आरतियाँ होती हैं :

समयघटना
सुबह 2:30मंगला आरती (ग्रीष्म में 3:00)
सुबह 3:00-4:00भस्म आरती (बहुत खास)
सुबह 4:00-11:00आम दर्शन
दोपहर 11:30-12:00भोग आरती
शाम 7:00-8:30सप्तऋषि आरती (बड़ी आरती)
रात 9:00-11:00शयन आरती

5. क्या मंदिर (Kashi Vishwanath) में मोबाइल फोन, कैमरा ले जा सकते हैं ?
Ans) 
नहीं। मोबाइल फोन, कैमरा, और कोई भी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस अंदर ले जाना मना है। बाहर लॉकर की सुविधा है, या आप अपने होटल में छोड़ सकते हैं। पहले कुछ सालों में फोटोग्राफी की इजाजत थी, अब बिल्कुल नहीं। सुरक्षा के कड़े इंतजाम हैं — सीआईएसएफ तैनात है।

6. मंदिर (Kashi Vishwanath) कैसे पहुँचें ? पासिंग या टिकट की क्या व्यवस्था है ?
Ans) 
मंदिर (Kashi Vishwanath) में प्रवेश निःशुल्क है। कोई टिकट नहीं। पर भीड़ इतनी होती है कि आप 2-3 घंटे लाइन में खड़े रह सकते हैं। यदि आप जल्दी दर्शन करना चाहते हैं, तो एक शुल्कीय यात्रा (paid darshan) की सुविधा है — ₹200-300 में आप तेज लाइन से अंदर जा सकते हैं। यह पूरी तरह वैकल्पिक है।

7. विशेष आरती — भस्म आरती क्या है ? और कैसे ज्वाइन करें ?
Ans) 
भस्म आरती मंदिर (Kashi Vishwanath) की सबसे पुरानी और अनोखी आरती है। यह सुबह 3:00-4:00 बजे के बीच होती है। भस्म का मतलब है राख (श्मशान की राख या विभूति)। पुजारी राख शिवलिंग पर चढ़ाते हैं — जो यह संदेश देता है कि शरीर को एक दिन राख होना है।

कैसे ज्वाइन करें :

  • मंदिर सुबह 2:30 बजे खुलता है, इससे पहले पहुँच जाएँ।

  • भीड़ कम होती है, पर आरती का समय निकट आते-आते भीड़ बढ़ जाती है।

  • आप किसी पुजारी से संपर्क कर सकते हैं, या बस लाइन में लग जाएँ।

  • महिलाएँ और पुरुष अलग-अलग लाइनों में खड़े होते हैं।

8. क्या मंदिर (Kashi Vishwanath) में महिलाओं के लिए कोई विशेष नियम है ?
Ans) 
सामान्य तौर पर नहीं। महिलाएँ भी पुरुषों की तरह ही दर्शन कर सकती हैं। केवल एक बात — कुछ विशेष अनुष्ठान (जैसे पिंडदान के कुछ हिस्से) केवल पुरुषों के लिए होते हैं, यदि महिला अकेली हो। लेकिन सामान्य दर्शन में कोई भेद नहीं है। सुरक्षा के लिए महिला पुलिसकर्मी तैनात हैं।

9. क्या मंदिर (Kashi Vishwanath) में नॉन-हिंदुओं के प्रवेश की अनुमति है ?
Ans) 
हाँ, बिल्कुल। काशी विश्वनाथ (Kashi Vishwanath) मंदिर में सभी धर्मों के लोग आ सकते हैं। कोई भेदभाव नहीं है। बस यह ध्यान रखें — मर्यादा बनाए रखें, मंदिर के नियमों का पालन करें, और अपना सिर ढककर न रखें (टोपी, पगड़ी उतारनी होगी)। विदेशी पर्यटक भी आते हैं।

10. काशी विश्वनाथ (Kashi Vishwanath) और ज्ञानवापी मस्जिद का क्या संबंध है ?
Ans) 
यह लंबे समय से विवादित मुद्दा है। पुराना मंदिर जहाँ था, वहीं औरंगजेब ने मस्जिद बनवा दी। आज दोनों सटे हुए हैं — एक तरफ विश्वनाथ मंदिर (Kashi Vishwanath), दूसरी तरफ ज्ञानवापी मस्जिद। मस्जिद की दीवार में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ आज भी देखी जा सकती हैं।

11. मंदिर (Kashi Vishwanath) के पास रहने के लिए अच्छे होटल कौन से हैं ?
Ans) 
हर बजट में ऑप्शन हैं :

बजटहोटल के नाम
सस्ता (₹500-1000)होटल गंगा, होटल शिवा, गेस्ट हाउस विश्वनाथ लेन
मिड रेंज (₹1500-3000)होटल पलासी, होटल मेरिडियन, होटल अलका
महँगा (₹5000+)होटल भारत महल, ताज गंगा (लगभग ₹10,000/रात)

12. मंदिर (Kashi Vishwanath) के आसपास क्या खाएँ ?
Ans) 
आप पूछिए मत। काशी की चाट तो मशहूर है, पर यहाँ और भी बहुत कुछ है :

  • टमाटर चाट — बनारसी स्पेशल (गली नंबर 1, विश्वनाथ लेन) |

  • पानी पूरी — हर गली में मिलेगी, पर असली वाली गोदौलिया चौराहे पर |

  • बनारसी तहरी (मसालेदार चावल) — बड़ा मालखाना क्षेत्र |

  • लस्सी — ब्लू लस्सी (दशाश्वमेध घाट के पास, हाँ वह नीली) |

  • मलाईयो — सर्दियों में, सिर्फ बनारस में मिलती है |

13. काशी (Kashi Vishwanath) में एक दिन में कितने मंदिर देख सकते हैं ?
Ans) 
यदि आप सुबह 4 बजे निकलें, तो एक दिन में यह सब देख सकते हैं :

  1. काशी विश्वनाथ (भस्म आरती के बाद) |

  2. अन्नपूर्णा मंदिर (पास ही) |

  3. कालभैरव मंदिर (जरा दूर, लेकिन जाना चाहिए) |

  4. संकट मोचन हनुमान मंदिर |

  5. दुर्गा कुंड |

  6. तुलसी मानस मंदिर |

  7. गंगा आरती (शाम को) |

14. क्या काशी (Kashi Vishwanath) में भांग पीना/खाना कानूनी है ?
Ans) 
काशी (Kashi Vishwanath) में भांग (cannabis की एक कानूनी शैली) सरकारी ठेकों पर बिकती है। इसे पकौड़े, गोली, या पेय के रूप में खाया-पीया जा सकता है। लेकिन ध्यान रखें — यह नशीला है। इसका अधिक सेवन बुरी तरह से प्रभावित कर सकता है। पर्यटक अक्सर इसके चक्कर में परेशान हो जाते हैं।

15. काशी (Kashi Vishwanath) क्यों कहलाती है “मोक्ष की नगरी” ?
Ans) 
पौराणिक मान्यता है कि यहाँ विश्वनाथ (शिव) ने वचन दिया — जो कोई इस नगरी में मरेगा, उसकी आत्मा को सीधे मोक्ष मिलेगा, उसे फिर जन्म नहीं लेना पड़ेगा। यही कारण है कि बूढ़े-बुजुर्ग अपने अंतिम दिनों में काशी (Kashi Vishwanath) आकर रहते हैं — उन्हें “काशीवासी” कहते हैं।

16. क्या काशी (Kashi Vishwanath) में मोबाइल/नेटवर्क चलता है ?
Ans) 
हाँ। सभी प्रमुख नेटवर्क — Jio, Airtel, Vi — अच्छा काम करते हैं। यहाँ तक कि मंदिर (Kashi Vishwanath) के अंदर भी नेटवर्क मिल जाता है (लेकिन मोबाइल अंदर ले जाना मना है)। गलियों में कभी-कभी सिग्नल कमजोर हो जाता है, पर बाहर चलता है।

17. क्या मंदिर (Kashi Vishwanath) व्हीलचेयर (wheelchair) या विकलांगों के लिए सुलभ है ?
Ans) 
अब हाँ, काफी हद तक। नए कॉरिडोर में रैंप बनाए गए हैं। बुजुर्गों और विकलांगों के लिए अलग प्रवेश द्वार है। आप पहले से इंतजाम कर सकते हैं — मंदिर (Kashi Vishwanath) के बाहर वालंटियर मिल जाएँगे।

18. काशी (Kashi Vishwanath) यात्रा के लिए सबसे अच्छा समय क्या है ?
Ans) 
अक्टूबर से मार्च — यह सबसे अच्छा समय है। गर्मी (अप्रैल-जून) में यहाँ 45 डिग्री तक पहुँच जाता है, तब तपती धूप में घूमना मुश्किल है। जुलाई-सितंबर में बारिश होती है, गलियाँ कीचड़ भरी होती हैं, पर कम भीड़ होती है।

19. पिंडदान क्या होता है? क्या हर किसी को करना चाहिए ?
Ans) 
पिंडदान एक हिंदू अनुष्ठान है, जहाँ मृत पूर्वजों के नाम पर चावल, जौ, दूध, दही के गोले (पिंड) बनाकर गंगा में बहाए जाते हैं। मान्यता है कि इससे पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है।

कोई बाध्यता नहीं है। यदि आप करना चाहते हैं, तो किसी भी घाट पर पंडित मिल जाएँगे। यह अधिकतर पुत्र या बड़े बेटे द्वारा किया जाता है। महिलाएँ भी कर सकती हैं, पर कुछ परंपराओं में केवल पुरुष ही करते हैं।

20. काशी (Kashi Vishwanath) में कितने दिन रुकना चाहिए ?
Ans)
न्यूनतम: 2 दिन (एक दिन मंदिर और घाट, दूसरा दिन आसपास का इलाका)

  • आराम से: 3-4 दिन
    (पास के सारनाथ जाने के लिए अलग दिन)

  • अगर सब कुछ देखना है: 5-6 दिन

21. काशी विश्वनाथ (Kashi Vishwanath) मंदिर के आसपास घूमने के लिए और क्या है ?
Ans) 
बहुत कुछ। बस यहाँ बैठकर सूची देख लें : 

स्थानदूरी (लगभग)क्यों जाएँ?
दशाश्वमेध घाट500 मीटरगंगा आरती, शाम का जादू
मणिकर्णिका घाट1 किमीमुख्य श्मशान — जीवन-मरण का साक्षात
संकट मोचन मंदिर3 किमीहनुमान जी का प्रसिद्ध मंदिर
सारनाथ10 किमीबुद्ध का पहला उपदेश स्थल
रामनगर किला14 किमीपुराना किला और संग्रहालय
तुलसी मानस मंदिर2 किमीरामचरितमानस संगमरमर पर उत्कीर्ण

22. क्या काशी (Kashi Vishwanath) में पिकपॉकेटिंग या ठगी होती है ?
Ans) 
हाँ, थोड़ा-बहुत होता है। काशी (Kashi Vishwanath) अब भी एक पर्यटक स्थल है, और जहाँ भीड़ होती है, वहाँ चोरी की आशंका रहती है। इसलिए :

  • पर्स और फोन जेब में बहुत गहरे रखें |

  • बैकपैक हमेशा आगे की तरफ रखें |

  • किसी भी ‘बाबा’ पर बिना सोचे पैसे न उड़ेलें |

  • पंडित से पूछकर ही कोई रस्म कराएँ |

23. क्या काशी (Kashi Vishwanath) में अकेली महिला यात्रा सुरक्षित है ?
Ans) 
हाँ, अपेक्षाकृत सुरक्षित है। काशी (Kashi Vishwanath) में हर साल हज़ारों अकेली महिलाएँ यात्रा करती हैं। पर कुछ सावधानियाँ ज़रूरी हैं :

  • रात 9 बजे के बाद अकेली न घूमें |

  • किसी अनजान से अंधेरी गली में न जाएँ |

  • सार्वजनिक स्थलों पर शालीन वस्त्र पहनें |

  • पुलिस और महिला हेल्पलाइन नंबर संभालकर रखें |

24. क्या सावन के महीने में काशी (Kashi Vishwanath) जाना चाहिए ?
Ans) 
सावन (जुलाई-अगस्त) में काशी बिल्कुल बदल जाती है। मंदिरों (Kashi Vishwanath) में बिजली की रोशनी, गलियों में भक्तों की भीड़, हर तरफ कावड़ी, हर तरफ जलाभिषेक। लेकिन यह भी सच है — यह सबसे अधिक भीड़ का समय होता है। लाइनें 4-5 घंटे लंबी हो जाती हैं। गलियाँ ठेलों से अवरुद्ध हो जाती हैं।

25. काशी (Kashi Vishwanath) यात्रा के बाद मैं क्या करूँ ? कोई नियम तो नहीं ?
Ans) 
कोई कठोर नियम नहीं, पर एक परंपरा यह है — काशी (Kashi Vishwanath) दर्शन के बाद गंगा जल अपने साथ घर ले जाएँ, और घर में उससे प्रतिदिन तिलक करें या शिवलिंग पर चढ़ाएँ। आप चाहें तो एक रुद्राक्ष, एक छोटी मूर्ति, या बस एक स्मृति ले जा सकते हैं।

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *