“मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग : जहां शिव और पार्वती ने खोजा था अपना खोया बचपन” (Part 2)

Hello Friends, बारह ज्योतिर्लिंगों की सीरीज में हमनें पहले पार्ट में “सोमनाथ ज्योतिर्लिंग” का उल्लेख किया था जिसका रिव्यु बहुत अच्छा देखने को मिल रहा है | अब मैं और आप इस सीरीज को आगे बढ़ाते हुए अगले पार्ट में ले जा रहे हैं | इस पार्ट में हम “मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग” का वर्णन करेंगे | इस आर्टिकल में मैं और आप जानेंगे कि क्योँ ये ज्योतिर्लिंग इतना प्रसिद्ध हुआ | ये श्रीशैलम से किस प्रकार जुड़ा हुआ है | साथ ही ये भी जानेंगे कि इसकी यात्रा कैसे करनी है ?, कब दर्शन करना है ?. चलिए फिर इस यात्रा के दुसरे चरण की शुरुआत करते हैं – 

1. मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग (Mallikarjuna Jyotirlinga) : दक्षिण की कैलाश यात्रा

malllikarjuna jyotirlinga

नल्लामाला की इन गुमनाम पहाड़ियों पर चढ़ते हुए मुझे लगा मानो समय अपनी चाल धीमी कर रहा है। यहाँ हैदराबाद की उस भागमभाग वाली ज़िंदगी बिल्कुल नहीं है, न ही विजयवाड़ा का वो शोर है। यहाँ तो सिर्फ़ हवा में “जय मल्लिकार्जुन” के जयकारे गूंजते हैं, और पत्तियाँ खुद-ब-खुद “ॐ नमः शिवाय” का जाप करती लगती हैं। श्रीशैलम… बस इतना सुनते ही मेरी रूह में एक सिहरन सी दौड़ गई। 

यह कोई साधारण मंदिर नहीं है, यह वो जगह है जहाँ खुद भगवान शिव ने ‘मल्लिकार्जुन’ (Mallikarjuna Jyotirlinga) के नाम से एक ज्योति के रूप में अपना वास बनाया । काशी जहां विद्या और मोक्ष की नगरी है, तो श्रीशैलम दक्षिण भारत की वो कैलाश है, जहां भगवान ने माता पार्वती के साथ मिलकर हर उस माता-पिता का दर्द समझा होगा, जिसका बच्चा घर छोड़कर चला गया हो।

मैंने बारह ज्योतिर्लिंगों की सूची में दूसरे नंबर (Mallikarjuna Jyotirlinga) पर आने वाले इस धाम के बारे में बहुत कुछ पढ़ा था। लेकिन जब आप पाताल गंगा के ठंडे पानी में डुबकी लगाते हैं, और फिर उन सीढ़ियों पर चढ़ते हैं, जिन्हें होल्कर रानी अहिल्याबाई ने बनवाया था, तो अहसास बिल्कुल अलग होता है । यह लेख सिर्फ एक ट्रैवलॉग नहीं है, बल्कि श्रीशैलम की उस यात्रा का वर्णन है जहाँ मैंने पत्थरों में भगवान को, किंवदंतियों में सच्चाई को, और अपने अंदर शांति को खोजा।

2. श्रीशैलम : इतिहास की चट्टानों पर उकेरा गया अध्याय

आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले में स्थित यह पर्वत श्रीशैलम, नल्लामाला की पहाड़ियों की गोद में बसा है। श्रीशैलम का इतिहास आज से लगभग दो हजार साल पहले शुरू होता है, जब सातवाहन वंश का शासन था। पहली सदी के एक शिलालेख में इस पर्वत का जिक्र मिलता है, जहाँ इसे तीर्थ के रूप में वर्णित किया गया है । यानी, यहाँ ईसा मसीह के जन्म से पहले भी लोग पूजा-अर्चना के लिए आते थे।

जब मैं मंदिर के प्रांगण में प्रवेश करता हूँ, तो दीवारों पर बनी संगमरमर की नक्काशी मुझे विजयनगर साम्राज्य के उस वैभव की याद दिलाती है, जिसने इस मंदिर को अपना स्वर्णिम युग दिया। राजा हरिहर राय और बाद में रेड्डी राजाओं ने इस मंदिर को वो शक्ल दी जो आज हम देखते हैं । आपको जानकर हैरानी होगी कि मराठा वीर छत्रपति शिवाजी ने भी यहाँ आकर मंदिर के उत्तरी गोपुरम (प्रवेश द्वार) का निर्माण कराया था । जी हाँ, वीर शिवाजी जी की भी इस मंदिर के प्रति गहरी आस्था थी। वे महाशिवरात्रि के मौके पर यहाँ आते थे और उन्होंने यहाँ एक भंडारा (भोजन व्यवस्था) भी शुरू करवाया था।

यह मंदिर सिर्फ शैव मत का ही केंद्र नहीं है, बल्कि यह भारत का एकमात्र ऐसा मंदिर है जो दोनों प्रमुख संप्रदायों – शैव और शाक्त (माँ भ्रामरंबा के कारण) – के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है । ऐसा कहा जाता है कि यहाँ स्थित शिवलिंग ‘स्वयंभू’ है, यानी प्रकृति ने खुद ही इसे बनाया है । यह कोई संयोग नहीं है कि सदियों से यह जगह संतों, कवियों और आम आदमी को अपनी ओर खींचती आ रही |

3. कथा: जब एक पिता ने अपने बेटे को ढूंढने के लिए ली ज्योति का रूप

मल्लिकार्जुन (Mallikarjuna Jyotirlinga) की कहानी उतनी ही मार्मिक है जितनी कि दिव्य। जब आप मंदिर के गर्भगृह में खड़े होकर उस ज्योतिर्लिंग को देखते हैं, तो सिर्फ पत्थर नहीं दिखता, बल्कि एक पिता का दिल दिखता है।

शिवपुराण के अनुसार, एक बार भगवान गणेश और कार्तिकेय में यह विवाद हो गया कि कौन पहले विवाह करने योग्य है। मामला सुलझाने के लिए भगवान शिव ने एक प्रतियोगिता रखी: “जो भी पृथ्वी का चक्कर लगाकर पहले वापस आएगा, उसका विवाह पहले होगा।” |

बात सुनते ही कार्तिकेय (मुरुगन) अपने वाहन मोर पर सवार होकर पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा पर निकल पड़े। परन्तु गणेशजी, जिनका वाहन चूहा था, समझ गए कि दौड़ना असंभव है। तब उन्होंने अपनी बुद्धि का प्रयोग किया। उन्होंने माता-पिता (शिव और पार्वती) की सात बार परिक्रमा की और कहा, “आप ही मेरे संपूर्ण ब्रह्मांड हो, आपकी परिक्रमा कर लेना ही पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करने के बराबर है।”

जब कार्तिकेय थके-हारे वापस आए, तो गणेशजी का विवाह पहले ही हो चुका था। अपमानित और क्रोधित होकर कार्तिकेय कैलाश छोड़कर क्रौंच पर्वत (जिसे अब श्रीशैलम कहते हैं) की ओर चले गए । पुत्र के वियोग में माता पार्वती व्याकुल थीं। वे और भगवान शिव कार्तिकेय को मनाने पहुंचे, लेकिन क्रोधित पुत्र हर बार वहाँ से और दूर चला जाता था। 

अंत में, माता पार्वती को पुत्र की व्यथा दूर करने और कार्तिकेय को यह एहसास दिलाने के लिए कि वह कितना प्यार करते हैं, भगवान शिव ने वहीं श्रीशैलम पर्वत पर एक ‘ज्योति’ (प्रकाश स्तंभ) के रूप में प्रकट होना शुरू किया। माता पार्वती भी वहीं प्रकट हुईं और तब से वह स्थान ‘मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग (Mallikarjuna Jyotirlinga)’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया ।

‘मल्लिकार्जुन’ (Mallikarjuna Jyotirlinga) नाम ही माता-पिता के मिलन का प्रतीक है: ‘मल्लिका’ (पार्वती) + ‘अर्जुन’ (शिव) । यह कहानी भले ही पौराणिक हो, लेकिन इसका संदेश बहुत गहरा है – “जब अपना बच्चा रूठ जाए, तो माँ-बाप को अपनी शान छोड़कर, कभी ज्योति बनकर, कभी पत्थर बनकर, बस उनके पास ही डेरा डाल लेना चाहिए।” यह ज्योतिर्लिंग (Mallikarjuna Jyotirlinga) उसी अटूट प्रेम का प्रतीक है।

4. भ्रामरंबा देवी : यहाँ तो ‘माँ’ भी रहती हैं |

मल्लिकार्जुन (Malikarjuna Jyotirlinga) की महिमा अधूरी है अगर बात माँ भ्रामरंबा की न हो। यह अनूठा मंदिर परिसर एक ही छत के नीचे ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ दोनों को समेटे हुए है । ऐसा पूरे भारत में और कहीं नहीं देखने को मिलता। कहते हैं कि देवी सती के शरीर के कुछ हिस्से जहाँ-जहाँ गिरे थे, वे शक्तिपीठ कहलाए। मान्यता है कि यहाँ पर देवी सती का ‘नेकला’ (गला या आभूषण) गिरा था, जिससे यह शक्तिपीठ बना ।

‘भ्रामरंबा’ नाम का अर्थ है ‘भौंरों की माता’ या ‘भौंरे के रूप में रहने वाली देवी’। एक कथा के अनुसार, यहाँ देवी ने तपस्या की थी और वे भौंरे का रूप धारण करके शिवलिंग पर चढ़ने वाले फूलों के रस का पान करती थीं। मैंने स्थानीय पुजारी से यह भी सुना कि आज भी रात के समय मंदिर के गर्भगृह में भौंरों की गूंज सुनाई देती है, जो माँ की उपस्थिति का संकेत मानी जाती है।

इस मंदिर में एक और अनूठी परंपरा है, जो मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित करती है। यहाँ के दर्शन की एक खासियत यह है कि भक्त शिवलिंग को स्पर्श कर सकते हैं। हाँ, बिल्कुल सही पढ़ा आपने। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से केवल श्रीशैलम (Mallikarjuna Jyotirlinga) में ही भक्तों को ‘स्पर्श दर्शन’ का सौभाग्य प्राप्त होता है । 

यह नियम उसी तरह से चला आ रहा है जैसे कि माँ बच्चे को गोद में उठा लेती है। यहाँ की दीवारों पर बनी नक्काशी में भृंगी ऋषि की कहानी भी अंकित है, जिन्हें शुरुआत में माँ पार्वती ने श्राप दिया था, लेकिन बाद में मल्लिकार्जुन ने ही उन्हें पुन: जीवनदान दिया। यह दृश्य भी माँ-बाप (शिव-पार्वती) के बीच प्रेम और क्रोध के झूले को दर्शाता है।

5. स्थापत्य : द्रविड़ कला का वह शिखर जो आसमान छूता है |

mallikarjuna jyotirlinga

श्रीशैलम (Mallikarjuna Jyotirlinga) के मंदिर का स्थापत्य (आर्किटेक्चर) देखते ही बनता है। यह विजयनगर साम्राज्य की स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना है, जिसमें द्रविड़ शैली की झलक साफ दिखती है । मंदिर के चारों ओर विशाल दीवारें हैं, जो किसी किले से कम नहीं लगतीं। यह मंदिर करीब 6 मीटर ऊंची दीवार से घिरा हुआ है, जो इसे सुरक्षा और गरिमा का आभास देता है ।

जब आप मुख्य गोपुरम के नीचे से गुजरते हैं, तो ऊपर देखते ही आपका सिर पीछे चला जाता है। वह ऊंचाई… मानो वह गोपुरम आपको यह बताना चाह रहा हो कि ईश्वर कितना विशाल है। मंदिर के अंदर के खंभे अद्भुत नक्काशी से सजे हैं। यहाँ के मंडपम में 100 से अधिक खंभे हैं, जिन पर रामायण और महाभारत के दृश्य उकेरे गए हैं ।

एक बहुत ही रोचक मूर्ति यहाँ मिलती है – ऋषि भृंगी की तीन पैरों वाली मूर्ति। कथा है कि ऋषि भृंगी केवल शिव की पूजा करते थे, पार्वती की नहीं। इससे नाराज होकर पार्वती ने उनसे उनकी सारी शक्ति छीन ली। तब शिव ने उन्हें तीसरा पैर दे दिया ताकि वे टिक सकें। यह मूर्ति यहाँ के कलाकारों की कारीगरी का जीता-जागता उदाहरण है |

6. पाताल गंगा और वो पवित्र डुबकी

मंदिर जाने से पहले एक रस्म है जिसे हर भक्त निभाता है : पाताल गंगा में स्नान। यह कोई अलग नदी नहीं है, बल्कि कृष्णा नदी का वह हिस्सा है जो पहाड़ी के नीचे से बहता है और यहाँ एक गहरे कुंड के रूप में प्रकट होता है। मान्यता है कि यह नदी यहाँ पाताल लोक से आती है, इसलिए इसका नाम पाताल गंगा पड़ा ।

पाताल गंगा के घाट तक पहुंचने के लिए आपको करीब 850 सीढ़ियां उतरनी पड़ती हैं (हालाँकि अब रोपवे भी है, लेकिन सीढ़ियां उतरने का अपना ही मजा है) । यह घाट अहिल्याबाई होल्कर ने बनवाया था। जब मैंने उन ठंडे पानी में डुबकी लगाई, तो शरीर की सारी थकान मानो गायब हो गई। ऐसा कहा जाता है कि यहाँ स्नान करने से सभी पाप धुल जाते हैं। चाहे यह विश्वास हो या न हो, लेकिन उस पानी में डूबकर बाहर निकलने पर जो हल्कापन महसूस होता है, वह शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता।

7. श्रीशैलम (Mallikarjuna Jyotirlinga) के रहस्य और चमत्कार

श्रीशैलम (Mallikarjuna Jyotirlinga) सिर्फ मंदिर नहीं है, बल्कि छोटी-छोटी चमत्कारी मान्यताओं का संगम है। मंदिर परिसर में घूमते हुए मैंने कुछ ऐसे स्थान देखे, जिन्हें सुनना और देखना दोनों ही अद्भुत है :

  • त्रिफला वृक्ष (Triphala Vruksham) : यह एक विशेष पेड़ है। मान्यता है कि यदि कोई संतान सुख से वंचित दंपत्ति इस पेड़ के नीचे सच्चे मन से प्रार्थना करता है, तो उन्हें संतान की प्राप्ति होती है। मैंने वहाँ कई जोड़ों को आंखें बंद करके, अश्रुपूरित नेत्रों से प्रार्थना करते देखा ।

  • सहस्र लिंगेश्वर : मंदिर में एक जगह है जहाँ भगवान राम और सीता ने माना जाता है कि एक हजार छोटे शिवलिंग स्थापित किए थे। यह दृश्य अपने आप में अद्भुत है ।

  • पंच मठ : श्रीशैलम पर्वत की चोटी पर पांच प्राचीन मठ हैं, जो अलग-अलग संप्रदायों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यहाँ रहने वाले साधुओं का जीवन देखना, जो पूरी तरह से भौतिक सुखों का त्याग कर चुके हैं, हमें हमारी ज़िंदगी की दौड़ पर रोक लगाने को मजबूर कर देता है |

8. उत्सव : जब सारा श्रीशैलम (Mallikarjuna Jyotirlinga) जगमगा उठता है |

यदि आप श्रीशैलम (Mallikarjuna Jyotirlinga) की यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो महाशिवरात्रि के समय यहाँ आना बहुत अच्छा रहेगा। यह सिर्फ एक रात नहीं होती, बल्कि ग्यारह दिनों का ब्रह्मोत्सव होता है ।

इन दिनों यहाँ जो नजारा होता है, वह अलौकिक होता है। हर तरफ “ॐ नमः शिवाय” के नारे गूंजते हैं। मैं आपको एक अनोखी रस्म के बारे में बताना चाहूंगा जो सिर्फ यहाँ होती है – ‘पगलंकरण’ (Pagalankarana)। यह एक प्राचीन परंपरा है जिसमें जुलाहा समुदाय (देवांग) का एक व्यक्ति बिना कपड़ों के, पूरे अंधेरे में मंदिर के सबसे ऊंचे शिखर पर चढ़कर एक लंबा सफेद कपड़ा (पगा) बांधता है। पूरे मंदिर की बत्तियां बुझा दी जाती हैं। ऐसा माना जाता है कि उस समय भगवान स्वयं उस व्यक्ति का हाथ पकड़ते हैं ।

महाशिवरात्रि के ठीक मध्यरात्रि को ‘लिंगोद्भव’ का समय होता है, जब भगवान शिव ज्योति के रूप में प्रकट हुए थे। उस समय रुद्राभिषेक किया जाता है, और फिर ठीक रात 12 बजे भगवान मल्लिकार्जुन (Mallikarjuna Jyotirlinga) का माता भ्रामरंबा के साथ कल्याणोत्सव (विवाह) मनाया जाता है । इस दृश्य को देखकर ऐसा लगता है जैसे पूरा ब्रह्मांड किसी शादी के मंडप में तब्दील हो गया हो।

9. आस्था का केंद्र : जहां महान संत भी आए

श्रीशैलम (Mallikarjuna Jyotirlinga) ने हमेशा संतों और विद्वानों को आकर्षित किया है। मंदिर के इतिहास में आदि शंकराचार्य का नाम भी स्वर्ण अक्षरों में लिखा है। उन्होंने यहाँ आकर अपना प्रसिद्ध ‘शिवानंद लहरी’ (Shivananda Lahari) की रचना की थी, जो भगवान शिव की स्तुति में एक अद्वितीय स्तोत्र है ।

कर्नाटक संगीत के महान गायक और संत पुरंदरदास भी यहाँ आए थे। संत अक्का महादेवी (Akka Mahadevi) ने, जो लिंगायत संप्रदाय की प्रमुख संत थीं, अपना पूरा जीवन श्रीशैलम (Mallikarjuna Jyotirlinga) में ही बिताया। उनकी वचन (वचना साहित्य) आज भी कन्नड़ साहित्य का अनमोल हिस्सा हैं । यहाँ आकर यह समझना मुश्किल नहीं है कि क्यों इतने सारे संतों ने इस जगह को अपना घर बनाया। यहाँ की वातावरण में एक अलग ही शांति है, जो आपको सोचने पर मजबूर कर देती है।

10. यात्रा की तैयारी : कैसे पहुंचें और क्या करें ?

mallikarjuna jyotirlinga

यदि आप इस लेख को पढ़ रहे हैं और आपके मन में भी यहाँ आने का ख्याल आया है, तो यहाँ कुछ व्यावहारिक सुझाव हैं जो आपके काम आ सकते हैं।

कैसे पहुंचें ?

  • हवाई मार्ग : सबसे नजदीक हवाई अड्डा हैदराबाद है (लगभग 212 किमी) । यहाँ से टैक्सी या बस आसानी से मिल जाती है। हाल ही में कुरनूल हवाई अड्डा भी बना है, जो थोड़ा नजदीक है, लेकिन हैदराबाद से कनेक्टिविटी बेहतर है ।

  • रेल मार्ग : सबसे नजदीक रेलवे स्टेशन मार्कापुर रोड (Markapur Road) है । यहाँ से श्रीशैलम के लिए टैक्सी और बसें चलती हैं। दूसरा विकल्प कुरनूल सिटी है।

  • सड़क मार्ग : आंध्र प्रदेश और तेलंगाना राज्य सड़क परिवहन निगम (APSRTC और TGSRTC) की हजारों बसें हर रोज़ हैदराबाद, विजयवाड़ा और कुरनूल से श्रीशैलम के लिए चलती हैं। यह रास्ता नल्लामाला जंगलों से होकर गुजरता है, जो अपने आप में एक साहसिक अनुभव है ।

दर्शन के नियम :

  • ड्रेस कोड : यहाँ सख्ती है। पारंपरिक भारतीय पोशाक पहनना अनिवार्य है। पुरुषों को धोती, पायजामा या पैंट के साथ कुर्ता पहनना चाहिए। महिलाओं को साड़ी, लहंगा या सलवार सूट पहनना चाहिए। पैंट-टी-शर्ट या वेस्टर्न कपड़ों की इजाजत नहीं है ।

  • नियम : मोबाइल फोन और कैमरे अंदर ले जाना प्रतिबंधित है। लॉकर की सुविधा बाहर उपलब्ध है। मंदिर में शांति बनाए रखें, यह कोई पर्यटन स्थल नहीं, एक जीवंत पूजा स्थल है 

11. जरूर देखने योग्य स्थान (Nearby Attractions)

मल्लिकार्जुन (MAllikarjuna Jyotirlinga) के दर्शन करने के बाद, श्रीशैलम में और भी बहुत कुछ है जिसे आप मिस नहीं कर सकते :

  • पाताल गंगा : हम पहले ही इसका जिक्र कर चुके हैं। यहाँ स्नान जरूर करें।

  • साक्षी गणपति मंदिर : मान्यता है कि भगवान गणेश ने यहाँ रहकर कार्तिकेय और शिव-पार्वती के मिलन का गवाह बनकर ‘साक्षी’ (गवाह) नाम अर्जित किया ।

  • फालधारा और पंचधारा : ये वे स्थान हैं जहाँ पहाड़ों से पानी की धाराएँ गिरती हैं। ऐसा कहा जाता है कि पांडवों ने यहाँ तपस्या की थी। यह जगह बेहद शांत और प्राकृतिक रूप से सुंदर है ।

  • श्रीशैलम बांध : यह कृष्णा नदी पर बना एक विशाल बांध है। यहाँ से सूर्यास्त का दृश्य बेहद खूबसूरत होता है।

12. निष्कर्ष : एक अलौकिक अनुभव

श्रीशैलम मल्लिकार्जुन मंदिर (Mallikarjuna Jyotirlinga) की यह यात्रा मेरे लिए सिर्फ एक धार्मिक यात्रा से कहीं अधिक थी। यह एक भावनात्मक यात्रा थी। जब मैं गर्भगृह में अकेले उस स्वयंभू लिंग के सामने खड़ा था, तो मुझे ऐसा लगा जैसे मैं सिर्फ पत्थर की पूजा नहीं कर रहा, बल्कि एक पिता के अटूट प्रेम, एक माँ की व्यथा और एक रूठे बेटे के अहंकार की गाथा सुन रहा हूँ।

यहाँ की पहाड़ियाँ, यहाँ की पाताल गंगा, यहाँ का वातावरण — सब कुछ इतना जीवंत है कि आप खुद को उसी कालखंड में पाते हैं जब भगवान शिव ने अपने पुत्र को खोजने के लिए यहाँ ज्योति बनकर प्रकट हुए थे। मुझे लगता है कि हर व्यक्ति को, चाहे वह किसी भी धर्म का हो, अपने जीवन में कम से कम एक बार यहाँ आकर इन पहाड़ियों की सन्नाटे में बैठकर अपने आप से मिलना चाहिए।

हो सकता है आपको भगवान न मिलें, लेकिन आपको अपने अंदर की वह शक्ति जरूर मिलेगी जिसका नाम है – धैर्य, प्रेम और क्षमा। और शायद, मल्लिकार्जुन का असली अर्थ भी यही है — अपने भीतर के शिव (अर्जुन) और पार्वती (मल्लिका) को जगाना।

जय मल्लिकार्जुन! जय भ्रामरंबा!

Frequently Asked Questions (FAQ)

प्रश्न 1: मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग (Mallikarjuna Jyotirlinga) कहाँ स्थित है ?
Ans) यह आंध्र प्रदेश के नंदयाल (पूर्व में कुरनूल) जिले में, नल्लामाला पहाड़ियों पर स्थित श्रीशैलम नामक पवित्र नगर में है।

प्रश्न 2: क्या मल्लिकार्जुन मंदिर (Mallikarjuna Jyotirlinga) में स्पर्श दर्शन की अनुमति है ?
Ans) हाँ, यह द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एकमात्र ऐसा मंदिर है जहाँ भक्त शिवलिंग को स्पर्श कर सकते हैं। यह एक बहुत ही विशेष सौभाग्य माना जाता है ।

प्रश्न 3: मल्लिकार्जुन मंदिर (Mallikarjuna Jyotirlinga) के दर्शन का समय क्या है ?
Ans) मंदिर सुबह 4:30 बजे से दोपहर 3:30 बजे तक और शाम 6:00 बजे से रात 9:00 बजे तक खुलता है। मंगला आरती सुबह 4:30 बजे होती है ।

प्रश्न 4: श्रीशैलम (Mallikarjuna Jyotirlinga) जाने का सबसे अच्छा समय क्या है ?
Ans) अक्टूबर से फरवरी का महीना सबसे अच्छा रहता है क्योंकि तब मौसम सुहावना होता है। महाशिवरात्रि के समय यहाँ बहुत भीड़ होती है, लेकिन उत्सव का अनुभव अद्वितीय होता है।

प्रश्न 5: क्या यह मंदिर शैव और शाक्त दोनों के लिए महत्वपूर्ण है ?
Ans) बिल्कुल। यह इकलौता मंदिर है जो एक साथ 12 ज्योतिर्लिंग (शिव) और 18 महाशक्तिपीठों (देवी भ्रामरंबा) में शुमार है |

प्रश्न 6: श्रीशैलम (Mallikarjuna Jyotirlinga) में ठहरने की क्या व्यवस्था है? क्या वहाँ अच्छे होटल मिल जाते हैं ?
Ans) बिल्कुल मिल जाते हैं। श्रीशैलम सिर्फ एक तीर्थ स्थल नहीं, बल्कि एक विकसित पर्यटन नगरी है। यहाँ आपको हर बजट के लिए ठहरने की जगह मिल जाएगी।

  • श्रीशैलम देवस्थानम ट्रस्ट (Srisailam Devasthanam) के आश्रम और धर्मशालाएँ : ये सबसे सस्ती और साफ-सुथरी व्यवस्थाएँ हैं। आपको यहाँ 100 रुपये से लेकर 1000 रुपये प्रति रात तक के कमरे मिल जाएंगे। बुकिंग ऑनलाइन या वहाँ पहुँचकर की जा सकती है।

  • निजी होटल और रिसॉर्ट : मुख्य मार्ग पर और बस स्टैंड के आसपास कई अच्छे प्राइवेट होटल हैं। इनमें हरिहर रेजीडेंसीमल्लिकार्जुन ग्रैंड और पाताल गंगा रिसॉर्ट के नाम लिए जा सकते हैं। यहाँ का कमरा 1500 से 4000 रुपये तक में मिल जाता है।

  • सरकारी गेस्ट हाउस : APTDC (आंध्र प्रदेश टूरिज्म) का एक अच्छा गेस्ट हाउस भी है, जो पाताल गंगा के पास ही है। यहाँ से दृश्य बहुत शानदार दिखता है।

मेरी सलाह : यदि आप महाशिवरात्रि या किसी त्योहार के समय जा रहे हैं, तो कम से कम तीन महीने पहले बुकिंग करा लें। वरना आपको वहाँ रात 2 बजे तक कमरे की तलाश में भटकना पड़ सकता है। मैंने यह दृश्य अपनी आँखों से देखा है।

प्रश्न 7: क्या श्रीशैलम (Mallikarjuna Jyotirlinga) में नॉन-वेज और शराब की अनुमति है ?
Ans) सीधा और साफ जवाब – नहीं।

श्रीशैलम (Mallikarjuna Jyotirlinga) एक पवित्र तीर्थस्थल है, इसे ‘क्षेत्र’ (Holy Land) माना जाता है। यहाँ के पूरे शहर में नॉन-वेज भोजन बनाना, बेचना या खाना पूरी तरह से प्रतिबंधित है। यहाँ तक कि अंडे तक नहीं मिलते। यहाँ के होटलों और घरों में सिर्फ शुद्ध शाकाहारी भोजन ही बनता है।

शराब की तो बात ही मत कीजिए। यहाँ न सिर्फ बिक्री बल्कि शराब पीना भी कानूनी अपराध है। पुलिस सख्ती से निगरानी रखती है। अगर आपको शराब पीने की आदत है, तो श्रीशैलम की सीमा में प्रवेश करने से पहले ही अपनी बोतल खत्म कर दें या फिर बाहर छोड़ दें। यहाँ का माहौल इतना सात्विक है कि आप खुद ही इस चीज को अवॉइड करना चाहोगे।

प्रश्न 8: श्रीशैलम (Mallikarjuna Jyotirlinga) घूमने में कितना समय लगता है? 1 दिन काफी है या 2 ?
Ans) यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि आप क्या देखना चाहते हैं।

  • यदि सिर्फ मंदिर दर्शन (भागकर) : यदि आप सुबह जल्दी आते हैं और लाइन छोटी है (जो कि गैर-त्योहारी दिनों में होती है), तो 3-4 घंटे में दर्शन हो जाते हैं। ऐसे में आप 1 दिन में दर्शन करके वापस लौट सकते हैं। लेकिन यह ‘देखना’ हुआ, ‘अनुभव’ नहीं।

  • यदि पूरा आनंद लेना है (सुझाव) : मैं आपको 2 दिन और 1 रात जरूर रुकने की सलाह दूंगा।

    • पहला दिन : सुबह पाताल गंगा में स्नान, फिर मंदिर के बाहर के मंडपम और साक्षी गणपति देखना। शाम को मंदिर में आरती (दीपोत्सव) जरूर देखें।

    • दूसरा दिन : सुबह जल्दी उठकर मल्लिकार्जुन के दर्शन (स्पर्श दर्शन का प्रयास करें), फिर पंचधारा, फालधारा और श्रीशैलम बांध घूमें।

    • दो दिन में आप जल्दबाजी में नहीं रहेंगे और आपको वह शांति मिलेगी जिसके लिए आप आए हैं।

प्रश्न 9: क्या श्रीशैलम (Mallikarjuna Jyotirlinga) में एटीएम और अस्पताल की सुविधा है ?
Ans) हाँ, लेकिन कुछ सावधानियाँ बरतनी चाहिए।

  • एटीएम : मुख्य बस स्टैंड और मंदिर के मुख्य द्वार के पास SBI, HDFC और Andhra Bank के एटीएम हैं। लेकिन ध्यान रखें, त्योहारों के समय ये एटीएम अक्सर खाली हो जाते हैं। मेरा सुझाव है कि हैदराबाद या कुरनूल से ही पर्याप्त नकदी (कम से कम 3000-4000 रुपये) निकालकर ले जाएँ। डिजिटल पेमेंट (PhonePe, Google Pay) चलता है, लेकिन नेटवर्क कभी-कभी कमजोर पड़ जाता है।

  • अस्पताल : यहाँ एक सरकारी अस्पताल (Area Hospital) और कई प्राइवेट क्लीनिक हैं। साथ ही मंदिर ट्रस्ट अपनी ओर से एक निशुल्क आयुर्वेदिक औषधालय चलाता है। हालाँकि बड़ी बीमारी के लिए नजदीकी बड़ा शहर कुरनूल है (लगभग 180 किमी)। थोड़ी सी दवाइयाँ (पेट दर्द, चक्कर, बीपी की) अपने साथ जरूर रखें, क्योंकि पहाड़ी इलाका है और रात में कुछ भी हो सकता है।

प्रश्न 10: क्या श्रीशैलम (Mallikarjuna Jyotirlinga) में ‘स्पर्श दर्शन’ करने के लिए कोई अलग टिकट है? कितने का है ?
Ans) हाँ, ‘स्पर्श दर्शन’ के लिए अलग से टिकट लेना पड़ता है। इसे आम भाषा में ‘स्पर्श दर्शन टिकट’ या ‘प्रवेश टिकट’ कहते हैं।

  • कीमत : आमतौर पर यह टिकट 200 रुपये से 300 रुपये के बीच होता है (त्योहारों पर कीमतें बदल सकती हैं)।

  • यह कैसे मिलेगा? यह टिकट आप मंदिर के मुख्य द्वार के बाहर बनी काउंटर से ले सकते हैं। यहाँ दो लाइनें होती हैं: एक फ्री दर्शन (जिसमें 2-4 घंटे लगते हैं) और एक स्पर्श दर्शन (जिसमें 30 मिनट से 1 घंटा लगता है)।

  • कब नहीं मिलता ? महाशिवरात्रि के दिन अत्यधिक भीड़ के कारण स्पर्श दर्शन बंद कर दिया जाता है, क्योंकि तब पूजा का मान रखना और भीड़ को नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है।

एक सुझाव : टिकट खरीदते समय पूछ लें कि क्या उसमें ‘प्रसाद’ (लड्डू, बेलपत्र आदि) भी शामिल है या अलग से लेना है। और जब आप लिंग को स्पर्श करें, तो वहाँ पुजारी आपके हाथ में जल चढ़ाएगा और मंत्र पढ़ेगा — उस वक्त अपनी कोई मुराद पूछने में संकोच न करें, कहते हैं उस वक्त बोली गई बातें जरूर पूरी होती हैं।

प्रश्न 11: क्या श्रीशैलम (Mallikarjuna Jyotirlinga) में बारिश के दिनों में जाना सही रहता है ?
Ans) थोड़ा मुश्किल, लेकर साहसिक (Adventurous) हो सकता है।

  • समस्या : श्रीशैलम (Mallikarjuna Jyotirlinga) का रास्ता नल्लामाला के घने जंगलों से होकर गुजरता है। बारिश (जुलाई-सितंबर) में यहाँ लैंडस्लाइड (भूस्खलन) होने का डर रहता है। सड़कें फिसलन भरी हो जाती हैं, और कई बार सड़कें बंद भी हो जाती हैं। पाताल गंगा का पानी भी बहुत बढ़ जाता है, जिससे स्नान करना खतरनाक हो सकता है।

  • फायदा : अगर बारिश नहीं हुई और आप पहुँच गए, तो श्रीशैलम हरे-भरे जंगलों से ढका हुआ बहुत सुंदर दिखता है। झरने झर रहे होते हैं, ठंडक बहुत अच्छी होती है, और भीड़ बहुत कम होती है।

  • मेरी राय : बारिश के मौसम में जाने से बचें। सितंबर के अंत से अक्टूबर शुरू होने का इंतजार करें। सेफ्टी पहले, सुकून बाद में।

प्रश्न 12: क्या महिलाएं स्पर्श दर्शन कर सकती हैं? क्या कोई विशेष नियम है ?
Ans) बिल्कुल, महिलाएं भी पूरी श्रद्धा से स्पर्श दर्शन कर सकती हैं। लेकिन दो बातों का विशेष ध्यान रखें :

  1. कपड़े : महिलाओं के लिए ड्रेस कोड काफी सख्त है। साड़ी, लहंगा या सलवार-कमीज (दुपट्टा अनिवार्य) पहनना होगा। जींस, लेगिंग्स (बिना कुर्ते के) या टाइट टॉप पहनकर प्रवेश नहीं मिलेगा। यदि आपने लेगिंग्स पहन रखी है, तो ऊपर से कोई लंबा कुर्ता या दुपट्टा लपेटना होगा।

  2. माहवारी (Periods) : परंपरागत रूप से, मंदिरों में माहवारी के दौरान प्रवेश की अनुमति नहीं होती। श्रीशैलम में भी यही नियम है। यह अपमान नहीं, बल्कि एक प्राचीन आस्था है। यदि आप इस दौरान हैं, तो स्पर्श दर्शन से बचें, लेकिन आप दूर से दर्शन कर सकती हैं या माँ भ्रामरंबा के दर्शन कर सकती हैं (वहाँ के नियम अलग हो सकते हैं)।

प्रश्न 13: क्या श्रीशैलम (Mallikarjuna Jyotirlinga) में ‘रुद्राभिषेक’ करवा सकते हैं ? कैसे ?
Ans) हाँ, यहाँ रुद्राभिषेक (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल से अभिषेक) करवाने की बहुत पुरानी परंपरा है।

  • कैसे कराएँ ? मंदिर परिसर में ‘प्रशासनिक कार्यालय’ या ‘स्पेशल दर्शन काउंटर’ पर जाकर आप पूछ सकते हैं। वहाँ अलग-अलग रेट्स (500 रुपये से लेकर 5000 रुपये तक) के पैकेज होते हैं। महंगे पैकेज में बेलपत्र, भांग, धतूरा, और ढेर सारा प्रसाद शामिल होता है।

  • समय : रुद्राभिषेक आमतौर पर सुबह के समय (5:30 AM से 10:00 AM के बीच) होता है।

  • खास बात : यहाँ खास बात यह है कि आप पुजारी के साथ बैठकर खुद चढ़ावा चढ़ा सकते हैं। आप खुद ही लिंग पर दूध या जल चढ़ाएंगे। यह अनुभव बहुत आत्मिक होता है।

एक चेतावनी : ऑनलाइन कई स्कैमर्स हैं जो बिना लाइसेंस के रुद्राभिषेक बुक करवाते हैं। सीधे श्रीशैलम देवस्थानम की ऑफिशियल वेबसाइट पर जाएँ या मंदिर पहुँचकर काउंटर पर बुक करें।

प्रश्न 14: क्या श्रीशैलम (Mallikarjuna Jyotirlinga) शिशुओं और बुजुर्गों के लिए सुविधाजनक है ?
Ans) यह सबसे जरूरी सवाल है।

  • शिशु (Infants) : छोटे बच्चों (5-6 साल से कम) के लिए थोड़ी दिक्कत हो सकती है क्योंकि मंदिर के अंदर प्रवेश करने के लिए काफी देर तक लाइन में खड़ा रहना पड़ता है (भीड़भाड़ वाले दिनों में)। हाँ, स्पर्श दर्शन की टिकट ले लें तो लाइन कम हो जाती है। मंदिर परिसर में दूध और पानी की सुविधा है। रात में ठंड बहुत होती है, इसलिए बच्चों को गर्म कपड़े जरूर पहनाएँ।

  • बुजुर्ग (Elderly) : पाताल गंगा जाने के लिए 850 सीढ़ियाँ हैं। अब यहाँ रोपवे की सुविधा शुरू हो गई है (बोट या केबल कार), जो बुजुर्गों के लिए बहुत मददगार है। मंदिर के अंदर भी व्हीलचेयर की सुविधा मिल जाती है। बस रेलिंग पकड़कर सीढ़ियाँ चढ़ने में थकान हो सकती है, इसलिए धीरे-धीरे चलें।

  • विशेष सलाह : यदि आपके साथ कोई बुजुर्ग है जिसे चलने में तकलीफ है, तो वहाँ के ‘सेवादारों’ (Volunteers) से मदद मांगें। वे बिना किसी शुल्क के स्ट्रेचर या व्हीलचेयर की व्यवस्था कर देते हैं।

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