“गौतम बुद्ध : मौन का महाकाव्य” (Part 9)

Hello Friends, मैं और आप इस सीरीज के नौवें चरण में प्रवेश करने जा रहे हैं | ये पार्ट अपने आप में बेहद खास है क्योँकि ये एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जो एक राजा होते हुए भी एक भिछुक बना जिसे सभी सुख सुविधायें प्राप्त थी | सिद्धार्थ से गौतम बुद्ध की इस यात्रा में हम जानेंगे कि किस तरह इनके पिता ने इन्हें समाज से दूर रखा और हर संभव प्रयास किया की कि गौतम बुद्ध एक महान राजा बने | लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था, गौतम बुद्ध ने रातों रात अपना राजपाठ त्याग कर ज्ञान प्राप्ति की खोज में निकल गए और मानव समाज की कई विसंगितियों को दूर किया | चलिये इस महान यात्रा की शुरुआत करते हैं –

Table of Contents

1. गौतम बुद्ध (Mahatma Budh) : जो हार कर भी जीत गया |

mahatma budh

बहुत से महापुरुष ऐसे हुए जिन्होंने दुनिया को बदला, पर गौतम बुद्ध (Mahatma Budh) शायद इकलौते ऐसे शख्स हैं जिन्होंने दुनिया को बदलने की कोशिश ही नहीं की। उन्होंने बस अपने आप को बदला। और उस आत्म-परिवर्तन की छाप इतनी गहरी पड़ी कि आज 2500 साल बाद भी लोग उनके पेड़ के नीचे बैठना चाहते हैं। यह लेख उसी इंसान की कहानी है — जो राजकुमार था, फिर भिखारी बना, फिर किसी का भिखारी नहीं रहा।

सिद्धार्थ (Mahatma Budh) का जन्म लुंबिनी के एक बाग में हुआ था, जो आज नेपाल में है। कहते हैं माँ मायादेवी एक पेड़ की डाल पकड़े खड़ी थीं और उनके गर्भ से बच्चा निकला बिना किसी पीड़ा के। बाद में यह बच्चा इतना दुख देखेगा कि दुनिया के सारे दर्द को अपने अंदर समा लेगा। पर तब तो वह बस एक नवजात था, जिसकी ओर आकाश के देवता झाँक रहे थे, या कम से कम कहानियाँ तो यही कहती हैं।

बचपन में एक बार एक ऋषि आए — असित नाम के। उन्होंने बच्चे के शरीर पर लक्षण देखे और रोने लगे। राजा शुद्धोधन घबरा गए। असित ने कहा — यह बच्चा या तो चक्रवर्ती सम्राट बनेगा या संन्यासी। लेकिन मैं रो रहा हूँ क्योंकि मैं बूढ़ा हूँ, इसका धर्म सुनने से पहले ही मर जाऊँगा। बाप ने बेटे को सुनहरे पिंजरे में कैद कर दिया। तीन महल बने — एक गर्मी के लिए, एक बरसात के लिए, एक सर्दी के लिए। नाचने वाली स्त्रियाँ, महकते बाग़, हाथी-घोड़े, सोने के कटोरे। राजा ने फैसला किया — मेरा बेटा घर से बाहर कभी नहीं जाएगा।

पर दुनिया दरारों से घर में घुसती है। एक दिन सिद्धार्थ ने अपने सारथी छन्न से कहा — शहर घुमा चल। रास्ते में एक बूढ़ा दिखा, झुर्रीदार चेहरा, टेढ़ी कमर, लार टपकती। सिद्धार्थ ने पूछा — यह क्या है? छन्न ने कहा — बुढ़ापा, प्रभु। यह हर किसी को आएगा। सिद्धार्थ चुप हो गया।

 दूसरे दिन एक रोगी दिखा — पस से सना, दर्द से कराहता। तीसरे दिन एक शव — उठा हुआ, मुँह पर कपड़ा डाला। सिद्धार्थ की आँखें खुलीं। चौथे दिन एक सन्यासी दिखा — शांत, स्थिर, आँखों में कोई भीख नहीं। सिद्धार्थ ने उस रात अपने पुत्र राहुल को सोते देखा, अपनी पत्नी यशोधरा को सोते देखा, और घोड़े कंथक पर चढ़कर महल छोड़ दिया।

महल छोड़ना कोई साधारण बात नहीं थी। बाप रोया, पत्नी बेहोश हुई, बेटा बेसहारा हुआ। पर सिद्धार्थ ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। बाद में किसी ने पूछा — क्या यह पाप नहीं है? बुद्ध ने कहा — एक गाँव जल रहा था और वहाँ एक आदमी अपने बच्चे को छोड़कर भागा, क्योंकि वह पानी लाने दूसरे गाँव जा रहा था। क्या वह पापी है? मैं पूरी दुनिया के लिए पानी लेने गया था। यह उत्तर सुनकर पूछने वाला चुप हो गया।

अब शुरू हुआ छह साल का तप। उन दिनों यह माना जाता था कि शरीर को कष्ट देने से आत्मा शुद्ध होती है। सिद्धार्थ ने साँस रोकी, खाना छोड़ा, काँटों पर लेटे, आँखों में आग देखी। एक समय ऐसा आया कि उनकी रीढ़ की हड्डी पेट से बाहर झाँकने लगी। वे गिर पड़े। एक ग्वालन सुजाता ने दूध-चावल पिलाया। तब उन्हें समझ में आया — अति का मार्ग मुक्ति नहीं देता। सुख और दुख दोनों चरम से बचना चाहिए। यह था उनका ‘मध्यम मार्ग’।

बोधगया में एक पीपल का पेड़ था। सिद्धार्थ उसके नीचे बैठ गए। उन्होंने कहा — जब तक सत्य नहीं मिलता, यह आसन नहीं छोड़ूँगा। मार नाम का एक यक्ष या प्रलोभन का देवता आया। उसने संदेह बोया — तू क्या पाएगा? लोग तुझे पागल कहेंगे। स्त्रियाँ नाचीं, हथियार दिखे, आँधी आई। सिद्धार्थ ने हाथ बढ़ाकर धरती को छुआ — यह मेरी गवाह है। और उस रात उन्हें बोधि मिली। अब वे बुद्ध (Mahatma Budh) थे — जागा हुआ। कोई चमत्कार नहीं हुआ था। बस एक आदमी ने अपने मन के सारे कोने-चपट साफ कर दिए थे।

वे उठे और सारनाथ की ओर चल दिए। वहाँ उनके वे पाँच साथी रहते थे जिन्होंने उन्हें तपस्या छोड़ने पर छोड़ दिया था। उन्होंने बुद्ध को आते देखा और कहा — यह भोगी आ रहा है, इससे बात मत करना। पर जैसे ही बुद्ध (Mahatma Budh) पास पहुँचे, पाँचों अनजाने में खड़े हो गए। फिर बुद्ध ने पहला प्रवचन दिया — चार आर्य सत्य। दुख है। दुख का कारण है। दुख का निरोध है। निरोध का मार्ग है। बातें सुनने में साधारण लगती हैं, पर जब कोई व्यक्ति स्वयं दुख से मुक्त होकर बोले, तो हर शब्द में रस होता है।

आनंद नाम का एक युवक था। वह बुद्ध (MAhatma Budh) से मिला और बोला — मैं भी चलूँ? बुद्ध ने कहा — आ। आनंद फिर 45 साल तक बुद्ध के साथ रहा। उसने हर बात सुनी, पर उसे बोधि तब मिली जब बुद्ध पहले ही मर चुके थे। यह बात अलग है। बुद्ध के पास कई ऐसे लोग आए — चोर, रानी, गणिका, ब्राह्मण, बच्चे, बूढ़े। एक बार एक माँ अपने मृत बच्चे को लेकर आई — बुद्ध ने कहा — राई के एक दाने ले आ उस घर से जहाँ कभी मृत्यु न हुई हो। वह माँ सब घरों में गई और लौटकर बोली — हर घर में मौत हुई है। बुद्ध ने कहा — तो अब रोना छोड़, दुख का सच समझ।

बुद्ध (Mahatma Budh) ने कभी कोई धर्मग्रंथ नहीं लिखा। उन्होंने कभी किसी पर हाथ नहीं रखा। वे बस बैठे रहे और जो पूछता, उसे जवाब मिल जाता। एक बार एक व्यक्ति ने पूछा — ईश्वर है? बुद्ध चुप रहे। व्यक्ति ने पूछा — नहीं है? फिर चुप। व्यक्ति ने कहा — जवाब दो। बुद्ध ने कहा — यदि तुम पर तीर लगा हो, तो क्या तुम यह पूछोगे कि तीर किसने बनाया? पहले तीर निकालो। यही बुद्ध की शिक्षा का सार है — अनावश्यक प्रश्नों में उलझना नहीं, दुख से मुक्ति का रास्ता देखना।

वे 80 साल तक जीए। एक दिन चुंद नाम के एक लोहार ने उन्हें भोजन कराया। बाद में बुद्ध बीमार पड़ गए। पेट में तेज दर्द, खून के दस्त। आनंद रोने लगा। बुद्ध ने कहा — रोओ मत। संघ टूटने वाला नहीं है। मैंने जो सिखाया, वही तुम्हारा गुरु है। 

फिर वे कुशीनगर के एक साल वन में पहुँचे। दो पेड़ों के बीच उन्होंने आखिरी बार करवट ली। एक भिक्षु ने पूछा — तथागत के बाद हम किसे देखें ? बुद्ध (Mahatma Budh) ने कहा — अपने आप को दीपक बनाओ। अपने आप का सहारा लो। और उनके अंतिम शब्द थे — ‘संखारा वय धम्मा, अप्पमादेन सम्पादेथा।’ अर्थात — सब बनावटी चीजें नाशवान हैं, सावधानी से काम करो।

बुद्ध (Mahatma Budh) के बाद उनकी अस्थियाँ आठ राज्यों में बाँटी गईं। उनके ऊपर स्तूप बनाए गए। पर असली स्तूप तो उनके शब्द थे — जो किसी पत्थर की तरह नहीं, बल्कि पानी की तरह बहते रहे। आज दुनिया के कोने-कोने में लोग ज़ेन करते हैं, विपश्यना करते हैं, माइंडफुलनेस करते हैं। उनमें से बहुतों को यह नहीं पता कि यह सब उसी एक आदमी की देन है जिसने एक पेड़ के नीचे बैठकर कहा था — दुख को देखो, उसे समझो, उससे मुक्त हो जाओ।

बौद्ध धर्म के तीन रत्न हैं — बुद्ध, धम्म, संघ। पर गौतम बुद्ध (Mahatma Budh) ने खुद कहा था — मेरी मूर्ति मत बनाना, मेरी पूजा मत करना। लेकिन लोगों ने मूर्तियाँ बनाईं, पूजा की, मालाएँ चढ़ाईं। शायद यह उनकी सबसे बड़ी विडंबना है। पर शायद यह उनकी सबसे बड़ी सफलता भी — कि एक ऐसा व्यक्ति जो देवता नहीं बनना चाहता था, देवताओं से भी ज़्यादा पूजा गया।

तो आखिर बुद्ध (Mahatma budh) क्या थे? कोई देवता नहीं। कोई अवतार नहीं। कोई जादूगर नहीं। बस एक इंसान जिसने अपने मन के हर अंधेरे कमरे में दीया जलाया। उसने कोई चमत्कार नहीं दिखाया, कोई अभिशाप नहीं दिया, कोई वादा नहीं किया। 

उसने सिर्फ एक रास्ता दिखाया — जो चलना चाहे, चल सकता है। बाकी सब बकवास है। और शायद यही कारण है कि आज, जब हर कोई कोई न कोई गुरू ढूंढ रहा है, कोई शॉर्टकट ढूंढ रहा है, कोई चमत्कार ढूंढ रहा है — बुद्ध (Mahatma budh) अब भी वहाँ बैठे हैं, मुस्कुरा रहे हैं, और चुपचाप कह रहे हैं — तुम स्वयं बुद्ध हो। बस सोए हुए हो। जाग जाओ।

2. वो राजकुमार जिसे दुनिया से बचाकर रखा गया

गौतम बुद्ध (Mahatma Budh) की कहानी शुरू होती है एक ऐसे राजकुमार से जिसके पास सब कुछ था। सोने के महल, रेशमी वस्त्र, सुगंधित तेल, नाचने गाने वाली स्त्रियाँ, हाथी-घोड़े, अनंत धन। उसके पिता शुद्धोधन ने फैसला किया था कि उसका बेटा कभी दुख नहीं देखेगा। यह कोई साधारण सुरक्षा नहीं थी। यह एक तरह की साजिश थी — एक पूरे साम्राज्य की साजिश एक बच्चे को बचपन से ही अंधा रखने की। क्योंकि एक ऋषि ने भविष्यवाणी कर दी थी कि यह बच्चा या तो दुनिया का सबसे बड़ा राजा बनेगा या दुनिया छोड़कर चला जाएगा। राजा को दूसरा विकल्प मंजूर नहीं था। इसलिए उसने अपने बेटे को जेल में डाल दिया — हाँ, सोने की जेल में, पर जेल ही थी।

यह बात आज के समय में भी देखी जा सकती है। कितने माता-पिता अपने बच्चों को दुनिया की कठोरता से बचाने के लिए उन्हें महँगे स्कूलों में भेजते हैं, उन्हें मोबाइल और लैपटॉप दे देते हैं, उनके सामने कभी पैसे की तंगी या बीमारी की बात नहीं करते। पर दुनिया दरारों से अंदर आती ही है।

 सिद्धार्थ (Mahatma Budh) को भी दुनिया ने बाद में पकड़ लिया। पर तब तक वह 29 साल का हो चुका था। 29 साल तक वह एक ही दीवार के अंदर जिया था। उसने कभी बूढ़ा नहीं देखा था, कभी बीमार नहीं देखा था, कभी मरा हुआ नहीं देखा था। यह सोचना भी अजीब है कि एक इंसान 29 साल तक जीए और मौत के बारे में कुछ न जानता हो। पर यही सिद्धार्थ की कहानी की सबसे बड़ी विडंबना है — उसे दुख से बचाने की कोशिश ने ही उसे दुख का सबसे बड़ा साधक बना दिया।

बचपन की एक घटना बहुत मशहूर है। एक बार सिद्धार्थ अपने पिता के साथ खेतों में गए। वहाँ उन्होंने एक हल चलता देखा। हल के पीछे एक किसान था, पसीने से तर, धूप में झुलसता। हल के आगे दो बैल थे, थके हुए, पैरों में कीचड़। और हल के नीचे मिट्टी में से कीड़े निकल रहे थे, और पक्षी उन कीड़ों को खा रहे थे। 

सिद्धार्थ (Mahatma budh) ने यह सब देखा और एक पेड़ के नीचे बैठ गए। वे ध्यान में चले गए। उन्होंने सोचा — यह कैसी दुनिया है जहाँ एक जीव दूसरे जीव को खाकर जीता है? यह उनका पहला ध्यान था। उनके पिता को बहुत गर्व हुआ कि बेटा इतनी गहरी सोच रखता है। पर शुद्धोधन को यह नहीं पता था कि यह गहरी सोच ही एक दिन उनके बेटे को उनसे छीन ले जाएगी।

सिद्धार्थ (Mahatma Budh) की शादी यशोधरा से हुई। यशोधरा भी उतनी ही सुंदर थी जितना सिद्धार्थ सुंदर था। उनका एक बेटा हुआ, राहुल। नाम का मतलब होता है — जंजीर। क्योंकि एक बेटा पिता को बाँधता है। पर सिद्धार्थ की जंजीरें कमज़ोर पड़ रही थीं। उसके मन में प्रश्न थे जिनका जवाब महलों के अंदर कोई नहीं दे सकता था। 

रात में जब सब सोते थे, सिद्धार्थ जागता था। वह अपनी पत्नी के सोते हुए चेहरे को देखता था और सोचता था — एक दिन यह चेहरा झुर्रीदार हो जाएगा। यह शरीर ठंडा पड़ जाएगा। फिर यह प्रेम कहाँ रहेगा? ये प्रश्न किसी दार्शनिक के नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति के थे जो दर्द से बचकर थक गया था।

3. चार दृश्य और एक रात का सन्नाटा

एक दिन सिद्धार्थ (Mahatma Budh) ने अपने सारथी छन्न से कहा — मुझे शहर घुमा चल। राजा ने आदेश दिया था कि जिस रास्ते से राजकुमार जाए, वहाँ से बीमार, बूढ़े और मरे हुए लोगों को हटा दिया जाए। पर देवता चाहते थे कि सिद्धार्थ जागे, इसलिए उन्होंने एक बूढ़े को रास्ते में ला दिया। 

सिद्धार्थ (Mahatma Budh) ने पहली बार बूढ़ा आदमी देखा। उसके दाँत टूटे थे, बाल सफेद थे, शरीर झुका था, हाथ काँप रहे थे। सिद्धार्थ ने छन्न से पूछा — यह क्या है? छन्न ने कहा — बुढ़ापा, प्रभु। सिद्धार्थ ने पूछा — क्या मुझे भी यह होगा? छन्न ने कहा — हाँ प्रभु, हर किसी को। सिद्धार्थ (Mahatma Budh) चुप हो गए। उस दिन वे महल लौटे तो उनके चेहरे पर वही मुस्कान नहीं थी।

दूसरे दिन फिर वे निकले। इस बार रास्ते में एक रोगी मिला। उसका शरीर घावों से भरा था, बदबू आ रही थी, वह दर्द से कराह रहा था। सिद्धार्थ (Mahatma Budh) ने पूछा — यह क्या है? छन्न ने कहा — बीमारी, प्रभु। सिद्धार्थ ने पूछा — क्या मुझे भी यह हो सकता है? छन्न ने कहा — हाँ प्रभु, हर किसी को। सिद्धार्थ का मन और भारी हो गया। 

तीसरे दिन उन्होंने एक शव देखा। चार आदमी उसे ढो रहे थे। शरीर सख्त पड़ चुका था, मुँह पर कपड़ा बाँधा था, लोग रो रहे थे। सिद्धार्थ (Mahatma Budh) ने पूछा — यह क्या है? छन्न ने कहा — मौत, प्रभु। सिद्धार्थ ने पूछा — क्या मुझे भी मरना है? छन्न ने कहा — हाँ प्रभु, हर किसी को। सिद्धार्थ को ऐसा लगा जैसे पूरी दुनिया एक जलता हुआ घर है और सब लोग सो रहे हैं।

चौथे दिन उन्होंने एक सन्यासी देखा। उसके पास कुछ नहीं था — न घर, न कपड़े, न बाल, न कोई रिश्ता। पर उसकी आँखों में वह शांति थी जो सिद्धार्थ ने कभी किसी में नहीं देखी थी। उसने कोई माँग नहीं की, कोई शिकायत नहीं की, वह बस चल रहा था। सिद्धार्थ ने पूछा — यह क्या है? छन्न ने कहा — संन्यासी, प्रभु। वह सब कुछ छोड़कर सत्य की खोज में निकल पड़ा है। 

सिद्धार्थ (Mahatma Budh) के मन में एक बिजली कौंधी। उस रात वह महल लौटा तो उसने फैसला कर लिया था। वह उस सन्यासी की तरह बनेगा। पर पहले उसे अपने बेटे को एक बार आखिरी बार देखना था।

राहुल सो रहा था। यशोधरा उसके बगल में सो रही थी। यशोधरा का हाथ राहुल के सिर पर था। सिद्धार्थ दरवाजे पर खड़ा हो गया। वह अंदर नहीं गया। उसने सोचा — अगर मैं अंदर गया और यशोधरा जाग गई, तो वह रोएगी, राहुल जाग जाएगा, और मैं नहीं जा पाऊँगा। इसलिए वह वहीं खड़ा रहा, देखता रहा, फिर मुड़ा और चला गया। उसने अपने घोड़े कंथक को जगाया। घोड़े ने अपने खुरों के नीचे कपड़े बिछा दिए ताकि आवाज़ न हो। 

सिद्धार्थ (Mahatma Budh) ने रात के अंधेरे में महल छोड़ा। जब वह शहर से बाहर निकला, तो उसने मुड़कर महल की ओर देखा और कहा — जब तक मैं जन्म और मृत्यु का पार नहीं पा लेता, इस शहर में वापस नहीं आऊँगा। फिर उसने अपने शाही वस्त्र उतार दिए, अपने गहने उतार दिए, अपनी तलवार उतार दी, और एक मुर्दे की लाश से चिथड़े लेकर पहन लिए। छन्न और कंथक को वापस भेज दिया। 

घोड़ा कंथक वापस महल पहुँचा तो उसका दिल फट गया और वह मर गया। यह कहानी कितनी सच है, कोई नहीं जानता। पर इतना ज़रूर है — एक आदमी ने सब कुछ छोड़ा। और उसने कुछ पाने के लिए नहीं छोड़ा, बल्कि कुछ समझने के लिए छोड़ा।

4. छह साल की तपस्या और एक कटोरी दूध-चावल

mahatma budh

सिद्धार्थ (Mahatma Budh) अब संन्यासी बन चुके थे। उन दिनों भारत में तपस्या का बहुत बोलबाला था। लोग सोचते थे कि शरीर को जितना अधिक कष्ट दोगे, आत्मा उतनी ही शुद्ध होगी। सिद्धार्थ ने भी यही रास्ता अपनाया। वे गए और दो गुरुओं के पास रहे — आलार कालाम और उद्दक रामपुत्त। इनसे उन्होंने ध्यान के उच्चतम स्तर सीखे। पर उन्हें संतोष नहीं हुआ। क्योंकि ये अवस्थाएँ भी अस्थायी थीं। ध्यान टूटते ही दुख वापस आ जाता था। सिद्धार्थ ने सोचा — इन अवस्थाओं को पाने से क्या होगा? मुझे दुख का स्थायी अंत चाहिए।

फिर वे उरुवेला (आज का बोधगया) आए। वहाँ निरंजना नदी के किनारे उन्होंने कठोर तपस्या शुरू कर दी। दिन में एक दाना। कभी तिल, कभी चावल, कभी सिर्फ पानी। उनका शरीर सूखने लगा। उनकी रीढ़ की हड्डी पेट से बाहर निकल आई। उनकी आँखें धँस गईं। उनका रंग काला पड़ गया। एक बार वे शौच के लिए नदी गए तो गिर पड़े। उनमें इतनी ताकत नहीं थी कि वे उठ सकें। उन्होंने सोचा — शायद मैं मर गया। पर फिर उन्हें होश आया। उन्होंने देखा कि तपस्या से उन्हें कुछ हासिल नहीं हुआ। वे पहले से ज़्यादा कमज़ोर हो गए थे, पर उनके प्रश्न वैसे ही थे।

तभी एक ग्वालन सुजाता वहाँ आई। उसने सोचा कि यह कोई वृक्ष देवता है। उसने दूध-चावल का कटोरा बढ़ाया। सिद्धार्थ (Mahatma Budh) ने कटोरा लिया। उन्होंने खाना खाया। पहली बार छह साल में उन्होंने पेट भर खाया। उनके पाँच साथी जो उनके साथ तपस्या कर रहे थे, उन्होंने यह देखा। उन्हें लगा — सिद्धार्थ संन्यास से गिर गया।

 वे उसे छोड़कर चले गए। सिद्धार्थ अकेले रह गए। पर उन्हें कुछ समझ में आ चुका था — चरम सुख और चरम दुख दोनों ही मूर्खता हैं। बीच का रास्ता ही सही है। यह बुद्ध की शिक्षा का सबसे बुनियादी सिद्धांत था। पर तब तक वे बुद्ध नहीं थे। वे सिर्फ एक ऐसे आदमी थे जिसने बहुत दुख झेला था और अब थोड़ा समझदार हो गया था।

उन्होंने नदी में स्नान किया। फिर वे एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठ गए। उन्होंने अपने मन से कहा — अब मैं यहीं बैठूँगा। मेरा शरीर सूखकर चर्मपत्र बन जाए, मेरी हड्डियाँ चूर हो जाएँ, पर मैं इस आसन से तब तक नहीं उठूँगा जब तक मुझे सत्य नहीं मिल जाता। और वे बैठ गए। 

एक दिन, दो दिन, तीन दिन। एक सप्ताह, दो सप्ताह, तीन सप्ताह। उनकी आँखें बंद थीं। उनका शरीर स्थिर था। पर उनके भीतर एक तूफान था। मार नाम का एक देवता — जो प्रलोभन, भय और मृत्यु का प्रतीक है — उनसे लड़ने आया।

5. बोधि रात — जब एक आदमी मार से लड़ा

मार के पास बड़ी सेना थी। तरह-तरह के राक्षस, तीर-तलवार, आग के गोले। वह सिद्धार्थ के सामने आया और बोला — उठ, यहाँ से चला जा। तू राजा बन सकता है, तुझे क्या मिलेगा यहाँ बैठकर? सिद्धार्थ ने आँखें नहीं खोलीं। मार ने अपनी तीन बेटियों को भेजा — तृष्णा, रति और अरति। वे नाचीं, गाईं, प्रलोभन दिया। सिद्धार्थ ने कुछ नहीं कहा। फिर मार ने अपनी सारी सेना झोंक दी। तूफान आया, बारिश हुई, आग बरसी। पर सिद्धार्थ के आसपास की ज़मीन सूखी रही। मार चिल्लाया — तू कौन है जो मेरा सामना कर रहा है? यहाँ मेरी गवाही कौन देगा?

सिद्धार्थ (Mahatma Budh) ने अपना दाहिना हाथ उठाया और धरती को छुआ। उन्होंने कहा — धरती मेरी गवाह है। इसी धरती पर मैंने जन्म लिया, इसी पर मैंने सुख-दुख सहे, इसी पर मैंने अपना रास्ता खोजा। धरती गवाह है। और तभी धरती काँपी। मार और उसकी सेना गायब हो गए। यह सब प्रतीक है, समझने वालों के लिए। मार कोई देवता नहीं है, वह हमारे अपने मन का वह हिस्सा है जो हमें कमज़ोर करता है, डराता है, ललचाता है। और धरती को छूना कोई जादू नहीं, बल्कि यह कहने का तरीका है — मैं वास्तविकता से जुड़ा हूँ, कल्पनाओं से नहीं।

उस रात सिद्धार्थ (Mahatma Budh) को तीन ज्ञान हुए। पहले ज्ञान में उन्होंने अपने पिछले जन्म देखे। कितनी बार वे पैदा हुए, कितनी बार मरे, कितनी बार राजा बने, कितनी बार कीड़े बने। दूसरे ज्ञान में उन्होंने सब प्राणियों को देखा — कैसे वे अपने कर्मों के अनुसार एक शरीर से दूसरे शरीर में जाते हैं। 

तीसरे ज्ञान में उन्होंने दुख के कारण और उसके निवारण का मार्ग देख लिया। सुबह हुई। सूरज निकला। सिद्धार्थ ने आँखें खोलीं। वह अब सिद्धार्थ नहीं था। वह बुद्ध था। जागा हुआ। कोई चमत्कार नहीं हुआ था। कोई देवता नहीं आया था। बस एक आदमी ने अपने मन के कोने-कोने में झाड़ू लगा दी थी।

बुद्ध (Mahatma Budh) बोधि वृक्ष के नीचे कई दिनों तक बैठे रहे। वे अपने ज्ञान का आनंद ले रहे थे। उनके मन में एक प्रश्न आया — यह सत्य इतना गहरा है, क्या कोई इसे समझ पाएगा? क्या मैं यह सिखाऊँ? तब ब्रह्मा नाम के एक देवता ने उनसे प्रार्थना की — हे बुद्ध, जो थोड़ी धूल वाली आँखें हैं, वे समझ लेंगे। कृपया सिखाओ। 

बुद्ध (Mahatma Budh) ने सोचा — ठीक है, जो सुनना चाहे, सुने। और वे उठे। वे सारनाथ की ओर चल दिए, जहाँ उनके पुराने पाँच साथी रहते थे। जिन्होंने उन्हें तपस्या छोड़ने पर छोड़ दिया था। वे सोच रहे थे कि सिद्धार्थ एक भोगी बन गया है। पर जैसे ही बुद्ध पास पहुँचे, वे अनजाने में खड़े हो गए। कुछ ऐसा था उस चेहरे पर — एक शांति, एक स्थिरता, एक आत्मविश्वास जो किसी राजा का नहीं, किसी देवता का नहीं, बल्कि एक ऐसे इंसान का था जिसने अपना सब कुछ खो दिया और कुछ ऐसा पा लिया जो कभी खोया नहीं जा सकता।

6. पहला प्रवचन — चार सत्य और आठ रास्ते

बुद्ध (Mahatma Budh) ने सारनाथ के मृगदाव में अपना पहला प्रवचन दिया। वहाँ पाँच भिक्षु थे — कोण्डन्न, वप्प, भद्दिय, महानाम और अस्सजि। बुद्ध ने उनसे कहा — भिक्षुओ, दो चरम हैं जिनका सेवन संन्यासी को नहीं करना चाहिए। एक है कामों में आसक्ति, जो नीच, ग्राम्य, अनार्य है। दूसरा है आत्म-क्लेशन, जो दुखद, अनार्य है। इन दोनों से बचकर तथागत ने मध्यम मार्ग निकाला है। 

और फिर उन्होंने चार आर्य सत्य सुनाए। पहला सत्य — दुख है। जन्म दुख है, बुढ़ापा दुख है, मृत्यु दुख है, जिससे प्रेम है उससे बिछड़ना दुख है, जिससे द्वेष है उससे मिलना दुख है, जो चाहते हो वह न मिलना दुख है। दूसरा सत्य — दुख का कारण है। तृष्णा, भव-तृष्णा, विभव-तृष्णा। तीसरा सत्य — दुख का अंत संभव है। तृष्णा के निरोध से दुख निरुद्ध होता है। चौथा सत्य — दुख के अंत का मार्ग है। आठ अंगों वाला आर्य अष्टांगिक मार्ग।

यह सुनकर कोण्डन्न को सबसे पहले समझ में आया। उसकी आँखों से आँसू निकल आए। उसने कहा — जो कुछ भी उत्पन्न होता है, वह निरुद्ध होता है। बुद्ध ने कहा — कोण्डन्न को समझ में आ गया। तब से कोण्डन्न ‘अन्नासि कोण्डन्न’ कहलाया। पाँचों भिक्षु बुद्ध के शिष्य बन गए। इसी दिन बौद्ध संघ की नींव पड़ी। तीन रत्न पूरे हो गए — बुद्ध, धम्म, संघ। बुद्ध ने कोई नया धर्म नहीं बनाया था। उन्होंने बस एक पुरानी बीमारी का इलाज बताया था — दुख नाम की बीमारी का।

अब बुद्ध (MAhatma Budh) 45 साल तक घूमते रहे। वे एक जगह से दूसरी जगह पैदल चलते थे। उनके पास कोई घर नहीं था, कोई गाड़ी नहीं थी, कोई पैसा नहीं था। उनके पास केवल तीन चीज़ें थीं — एक चीवर (कपड़ा), एक पात्र (भिक्षा का कटोरा), और अपनी साँस। और इन तीन चीज़ों के साथ उन्होंने साम्राज्यों को हिला दिया। राजा उनके पास आते थे, अमीर उनके पास आते थे, गरीब उनके पास आते थे, चोर उनके पास आते थे, हत्यारे उनके पास आते थे। 

बुद्ध (Mahatma Budh) ने कभी किसी से कोई शुल्क नहीं लिया, कभी किसी को अपना शिष्य बनने के लिए नहीं कहा, कभी किसी पर हाथ नहीं रखा। वे बस बैठे रहते थे और जो पूछता था, उसे जवाब मिल जाता था। कभी-कभी तो बिना बोले ही जवाब मिल जाता था। बुद्ध की चुप्पी भी एक उपदेश थी।

 

7. जो बुद्ध के पास आए — एक चोर, एक गणिका, एक राजा और एक हत्यारा

एक बार अंगुलिमाल नाम का एक डाकू था। उसने 999 लोगों को मार डाला था। उसने प्रण किया था कि वह एक हजार अँगुलियों की माला बनाएगा। उसकी माँ उसे समझाने गई तो वह माँ को भी मारने लगा। बुद्ध उसी रास्ते से गुजर रहे थे। गाँव वालों ने कहा — मत जाओ, वहाँ एक हत्यारा है। बुद्ध चलते रहे। अंगुलिमाल ने बुद्ध को देखा। वह दौड़ा। पर बुद्ध चल रहे थे और अंगुलिमाल दौड़ रहा था, फिर भी वह बुद्ध तक नहीं पहुँच पा रहा था। 

अंगुलिमाल चिल्लाया — रुको! बुद्ध ने बिना रुके कहा — मैं तो पहले ही रुका हूँ, तुम रुको। अंगुलिमाल को समझ में नहीं आया। बुद्ध ने कहा — मैंने हिंसा रोक दी है, तुमने नहीं रोकी। अंगुलिमाल के हाथ से तलवार गिर गई। वह रोने लगा। वह बुद्ध का शिष्य बन गया। बाद में जब लोग उस पर पत्थर फेंकते थे, वह सह लेता था। उसने कहा — मैंने बहुत पाप किए हैं, यह उनका फल है। बुद्ध ने उसे कभी जज नहीं किया।

एक और कहानी है आम्रपाली की। वह वैशाली की एक गणिका थी, बहुत सुंदर। बुद्ध (Mahatma Budh) वैशाली आए तो सब अमीर लोगों ने बुद्ध (Mahatma Budh) को भोजन का निमंत्रण दिया। आम्रपाली ने भी निमंत्रण दिया। बुद्ध (Mahatma Budh) ने आम्रपाली का निमंत्रण स्वीकार किया। अमीर लोग नाराज हो गए — आप एक वेश्या के घर जा रहे हैं? बुद्ध ने कहा — मैं किसी के घर नहीं, बल्कि निमंत्रण के पास जा रहा हूँ। 

आम्रपाली ने अपने आम के बाग में बुद्ध को भोजन कराया। बाद में उसने अपना सारा धन संघ को दान कर दिया और भिक्षुणी बन गई। बुद्ध ने कभी किसी को उसके जन्म, जाति, व्यवसाय या पापों के कारण नहीं तुला। वे सिर्फ देखते थे — क्या तुम दुख से मुक्त होना चाहते हो? अगर हाँ, तो चलो।

राजाओं की बात करें तो बुद्ध (Mahatma Budh) के सबसे बड़े भक्तों में एक था प्रसेनजित — कोशल के राजा। वह बुद्ध के पास आता, सिर झुकाता, और घंटों बैठा रहता। एक बार उसने बुद्ध से पूछा — भगवन, मैं राजा हूँ, मुझे राज्य संभालना है, युद्ध करने पड़ते हैं, क्या मैं धर्म का पालन कर सकता हूँ?

 बुद्ध (Mahatma Budh) ने कहा — राजा, जो करना पड़ता है करो, पर यह मत सोचो कि हिंसा से हिंसा शांत होती है। जितना कम हिंसा, उतना अच्छा। प्रसेनजित ने बुद्ध से बहुत कुछ सीखा। एक बार वह अपनी रानी मल्लिका के साथ आया। मल्लिका एक माली की बेटी थी, पर उसकी बुद्धि तेज थी। बुद्ध ने उसकी बहुत प्रशंसा की। यह बात उन दिनों बहुत बड़ी थी जब स्त्रियों को कोई अधिकार नहीं था।

 

8. भिक्षुणी संघ — जब बुद्ध ने स्त्रियों को भी रास्ता दिया.

बुद्ध (Mahatma Budh) के सौतेले माँ का नाम था महाप्रजापति गौतमी। उन्होंने सिद्धार्थ को अपना दूध पिलाया था जब मायादेवी की मृत्यु हो गई थी। जब बुद्ध ने संन्यास लिया, तो गौतमी बहुत दुखी हुईं। बाद में जब बुद्ध प्रसिद्ध हो गए, तो गौतमी ने सोचा — मैं भी संन्यास लूँ। वह अपने साथ 500 स्त्रियों को लेकर बुद्ध के पास आईं। बुद्ध ने मना कर दिया। उन्होंने कहा — अब समय नहीं है, स्त्रियों के लिए संघ में रहना कठिन है।

 गौतमी रोने लगीं। वहीं खड़ी रहीं, पैर सूज गए, शरीर पर धूल जम गई। आनंद ने बुद्ध से कहा — भगवन, ये वही महाप्रजापति हैं जिन्होंने आपको पाला है। क्या स्त्रियाँ भी अर्हत नहीं हो सकतीं? बुद्ध चुप रहे। आनंद ने तीन बार पूछा। तब बुद्ध ने कहा — ठीक है, पर आठ गुरु धर्म मानने होंगे। गौतमी ने मान लिया। इस तरह पहली बार किसी धर्म में स्त्रियों को संन्यास का अधिकार मिला।

पर यहाँ एक विवाद है। आठ गुरु धर्म कुछ ऐसे थे — जैसे एक भिक्षुणी को एक भिक्षु के सामने झुकना होगा, चाहे वह भिक्षु कितना ही नया क्यों न हो। कई लोग कहते हैं कि ये नियम बाद में जोड़े गए। कई लोग कहते हैं कि बुद्ध ने ये नियम समाज को ध्यान में रखकर बनाए थे, क्योंकि उस समय स्त्रियों को संरक्षण की ज़रूरत थी। पर इतना तय है कि बुद्ध ने स्त्रियों को मुक्ति का रास्ता दिखाया। 

उनकी शिष्याओं में खेमा, उप्पलवण्णा, पताचारा जैसी कई महान भिक्षुणियाँ हुईं। पताचारा ने अपने पति और बच्चों को एक साथ खो दिया था। वह पागल हो गई थी। बुद्ध (Mahatma Budh) ने उसे शांति दी। वह बाद में बहुत बड़ी धर्माचार्य बनी। उसने सैकड़ों स्त्रियों को संन्यास दिलाया।

यशोधरा की बात करें तो वह भी बाद में भिक्षुणी बनी। जब बुद्ध कपिलवस्तु लौटे, तो यशोधरा ने उनसे कहा — मैंने तुम्हारे बिना 29 साल बिताए। तुमने मुझे एक रात में छोड़ दिया। अब मैं भी संन्यास लेना चाहती हूँ। बुद्ध ने कहा — जैसी इच्छा। यशोधरा ने संन्यास लिया और वह भी अर्हत बनीं। उनके बेटे राहुल ने भी संन्यास लिया। बुद्ध का पूरा परिवार संघ में आ गया।

 केवल शुद्धोधन नहीं आए, क्योंकि वे राजा थे। पर अंत समय में जब शुद्धोधन मरने लगे, तो बुद्ध स्वयं उनके पास आए। उन्होंने अपने पिता का सिर अपनी गोद में रखा और उन्हें धम्म सुनाया। शुद्धोधन ने अंतिम साँस ली। यह दृश्य बहुत मार्मिक है — एक संन्यासी बाप के सिरहाने बैठा है, जिसने उससे कभी राजा बनने की उम्मीद की थी। पर बुद्ध ने वह राज्य दिया जो कोई राजा नहीं दे सकता।

9. बुद्ध की शिक्षा — कोई ईश्वर नहीं, कोई पवित्र पुस्तक नहीं, कोई आज्ञा नहीं |

बुद्ध (Mahatma Budh) की शिक्षा में सबसे अजीब बात यह है कि उन्होंने ईश्वर के बारे में कुछ नहीं कहा। लोग पूछते थे — ईश्वर है? बुद्ध चुप रहते। नहीं है? फिर चुप। एक बार एक ब्राह्मण ने बहुत देर तक प्रश्न पूछे — आत्मा है? शरीर आत्मा है? आत्मा शरीर से अलग है? संसार अनंत है? बुद्ध ने कहा — मैंने तुमसे कहा था कि तीर लगा है तो पहले तीर निकालो। ब्राह्मण ने कहा — पर मैं यह जानना चाहता हूँ। बुद्ध ने कहा — यह जानने से तुम्हारा दुख कम नहीं होगा। ब्राह्मण चुप हो गया। यह बुद्ध की व्यावहारिकता थी। वे उन प्रश्नों में नहीं पड़ते थे जिनका कोई अंत नहीं। उनका पूरा ध्यान एक ही समस्या पर था — दुख कैसे खत्म हो?

बुद्ध (Mahatma Budh) ने कोई पवित्र पुस्तक नहीं लिखी। उन्होंने कहा — अपने आप को दीपक बनाओ। मेरे शब्दों को मत पकड़ो, अनुभव करो। यह बात बहुत क्रांतिकारी थी। उनके समय में लोग वेदों को अंतिम सत्य मानते थे, ब्राह्मणों को ईश्वर का प्रतिनिधि मानते थे, यज्ञों को मोक्ष का रास्ता मानते थे। बुद्ध ने सबको एक तरफ रख दिया। 

उन्होंने कहा — न तो वेद सत्य हैं, न ब्राह्मण बड़े हैं, न यज्ञ से कुछ होता है। तुम्हारा अपना मन ही तुम्हारा मार्ग है। यह सुनकर ब्राह्मणों को बहुत गुस्सा आया। उन्होंने बुद्ध के खिलाफ बातें फैलाईं — कि यह नास्तिक है, यह समाज को बिगाड़ रहा है। पर बुद्ध को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। वे कहते थे — अगर कोई मेरी बात नहीं मानना चाहता, तो वह न माने। मैं जबरदस्ती नहीं करता।

बुद्ध (Mahatma Budh) की सबसे बड़ी देन है विपश्यना — यानी चीजों को जैसा है वैसा देखना। आमतौर पर हम चीजों को वैसा नहीं देखते जैसी वे हैं, बल्कि वैसा देखते हैं जैसा हम चाहते हैं। हम एक सुंदर व्यक्ति को देखते हैं तो सोचते हैं — यह हमेशा सुंदर रहेगा। हम पैसे देखते हैं तो सोचते हैं — यह हमेशा रहेगा। पर सच यह है कि सब कुछ बदलता है। 

यही बुद्ध (Mahatma Budh) का ‘अनित्य’ का सिद्धांत है। और जब हम यह समझ जाते हैं कि सब बदलता है, तो हम चीजों से चिपकना छोड़ देते हैं। और जब चिपकना छोड़ देते हैं, तो दुख अपने आप घट जाता है। यह बहुत सरल गणित है, पर बहुत कठिन अभ्यास। बुद्ध ने 45 साल तक बस यही सिखाया।

10. आखिरी दिन — एक लोहार, एक बीमारी और दो पेड़

बुद्ध (Mahatma Budh) 80 साल के हो गए थे। उनका शरीर बूढ़ा हो गया था। पीठ में दर्द रहता था। वे चलते-चलते रुक जाते थे। आनंद उनका सहारा बनता था। एक दिन बुद्ध ने आनंद से कहा — मैं इसी वर्ष निर्वाण को प्राप्त होऊँगा। आनंद रोने लगा। बुद्ध ने कहा — आनंद, तुम रोते हो क्योंकि तुम अभी भी सोचते हो कि मैं कोई चीज़ हूँ। मैं तो बस एक रास्ता हूँ। जो रास्ता समझ गया, उसके लिए मैं कहीं नहीं जा रहा। आनंद को कुछ समझ में आया या नहीं, पर वह रोता रहा।

बुद्ध (Mahatma Budh) अपनी आखिरी यात्रा पर निकले। वे राजगीर से चले, फिर वैशाली गए, फिर कुशीनगर की ओर बढ़े। रास्ते में उन्होंने एक लोहार चुंद के घर भोजन किया। चुंद ने उन्हें ‘सूकर-मद्दव’ खिलाया। इस शब्द का मतलब बहस का विषय है — कोई कहता है सूअर का माँस, कोई कहता है एक तरह का मशरूम, कोई कहता है सूअर चरने वाली जगह की जड़ी-बूटी।

 पर असर यह हुआ कि बुद्ध को भारी दस्त लग गए। उन्हें खून आने लगा। दर्द असहनीय था। बुद्ध (Mahatma Budh) ने आनंद से कहा — चुंद से कहना कि वह दुखी न हो। मेरे पास दो भोजन सबसे बड़े हैं — एक वह जो मैंने बोधि वृक्ष के नीचे बैठने से पहले खाया (सुजाता का दूध-चावल) और एक यह। दोनों ही महान फल वाले हैं। बुद्ध ने चुंद को दोष नहीं दिया। उन्होंने किसी को कभी दोष नहीं दिया।

कुशीनगर के पास एक साल वन था। दो साल के पेड़ थे, एक-दूसरे से थोड़ी दूरी पर। बुद्ध वहाँ पहुँचे। उन्होंने आनंद से कहा — मेरे लिए दो पेड़ों के बीच एक आसन बिछा दो। आनंद ने बिछाया। बुद्ध (Mahatma Budh) करवट के बल लेट गए। उनका दाहिना हाथ सिर के नीचे था, बायाँ हाथ शरीर के साथ। यह ‘महापरिनिर्वाण मुद्रा’ कहलाती है। तब एक भिक्षु ने पूछा — भगवन, तथागत के बाद हम किसे देखें? बुद्ध ने कहा — अपने आप को दीपक बनाओ। अपने आप का सहारा लो। धम्म को सहारा बनाओ, किसी और को नहीं। फिर उन्होंने भिक्षुओं से पूछा — कोई प्रश्न है? कोई संदेह है? सब चुप थे। आनंद रो रहा था। 

बुद्ध (Mahatma Budh) ने कहा — आनंद, तुमने बहुत सेवा की। तुम अच्छे हो। अब रोओ मत। समय आ गया है। और उनके अंतिम शब्द थे — ‘वयधम्मा संखारा, अप्पमादेन सम्पादेथा।’ सब बनावटी चीजें नाशवान हैं, सावधानी से काम करो। फिर उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं। कोई धूम नहीं हुई, कोई देवता नहीं आया, कोई चमत्कार नहीं हुआ। एक बूढ़ा, बीमार आदमी मर गया। पर उस मौत ने मौत को हरा दिया। क्योंकि वह जो जाग गया था, उसके लिए न तो जन्म था, न मृत्यु।

11. बुद्ध के बाद — राख, स्तूप और एक शाश्वत मौन

बुद्ध (Mahatma Budh) का शरीर जलाया गया। उनकी अस्थियाँ बाँटी गईं। आठ राज्यों ने स्तूप बनाए। तीसरे सम्राट अशोक ने उन स्तूपों को खोला और दुनिया भर में बौद्ध धर्म फैलाया। आज बुद्ध की अस्थियाँ कहाँ-कहाँ हैं, इसकी लंबी सूची है। पर असली अस्थियाँ तो बुद्ध के शब्द थे। और वे शब्द मुँह से मुँह, पीढ़ी से पीढ़ी, देश से देश बहते रहे। चीन गए, जापान गए, तिब्बत गए, थाईलैंड गए, श्रीलंका गए। 

हर जगह बुद्ध (Mahatma Budh) के रूप बदले — पतली आँखों वाले, मोटे पेट वाले, लंबे कान वाले, हाथ में कमल लिए, सिर पर मुकुट रखे। पर बुद्ध ने कहा था — मेरी मूर्ति मत बनाना। लोगों ने बनाई। बुद्ध ने कहा — मेरी पूजा मत करना। लोगों ने की। यह विडंबना है। पर शायद यह मानव स्वभाव है — कि वह उसी की पूजा करता है जिसने पूजा से मुक्ति दिलाई।

बौद्ध धर्म भारत में लगभग समाप्त हो गया। हाँ, समाप्त हो गया। आज भारत में बौद्ध 1% से भी कम हैं। पर बुद्ध कहीं नहीं गए। अम्बेडकर ने 1956 में लाखों दलितों को बौद्ध धर्म दिलाया। बुद्ध फिर से भारत में लौट आए। पर सवाल यह है — क्या हमें बुद्ध की ज़रूरत है? 21वीं सदी में, जब हर आदमी के पास स्मार्टफोन है, फ्रिज है, कार है, पैसा है — तो क्या हमें दुख से मुक्ति चाहिए ? 

आँकड़े बताते हैं — depression सबसे तेज़ी से बढ़ रहा है, suicide युवाओं की सबसे बड़ी मौत का कारण है, loneliness एक महामारी बन चुकी है। हमारे पास सब कुछ है, पर हम खाली हैं। हम भाग रहे हैं, पर कहीं पहुँच नहीं रहे। हम चिल्ला रहे हैं, पर कोई सुन नहीं रहा। ठीक वैसे ही जैसे बुद्ध महलों में थे। शायद हम सब सिद्धार्थ हैं, पर हम महल छोड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे।

बुद्ध (Mahatma Budh) का संदेश आज पहले से कहीं ज़्यादा प्रासंगिक है। वे कहते हैं — अपने मन को देखो। बिना फिल्टर के देखो। तुम जो सोचते हो वह तुम नहीं हो। तुम जो महसूस करते हो वह तुम नहीं हो। तुम वह हो जो देख रहा है। बस इतना समझ लो, और सारी उलझनें खत्म। यह कोई धर्म नहीं है, यह कोई दर्शन नहीं है, यह कोई सिद्धांत नहीं है। यह एक अभ्यास है — साँस लेने का, बैठने का, चुप रहने का, अपने आप को बिना डांटे देखने का।

 बुद्ध (Mahatma Budh) ने कभी किसी से कुछ नहीं माँगा। वे सिर्फ बैठे रहे। और उनकी चुप्पी आज भी उतनी ही ज़ोर से बोल रही है जितनी 2500 साल पहले बोलती थी। बस हमें सुनना आना चाहिए। और सुनने के लिए हमें थोड़ा चुप होना पड़ेगा। थोड़ा अकेला होना पड़ेगा। थोड़ा अपने सामने बैठना पड़ेगा। और तब शायद हमें समझ में आए — बुद्ध कोई और नहीं, हमारा अपना जागा हुआ चेहरा है। अभी हम सो रहे हैं। पर जगे हुए का नाम ही बुद्ध है। और वह बस एक साँस की दूरी पर है।

12. बुद्ध और स्त्रियाँ — वह विवाद जो कभी खत्म नहीं हुआ

जब भी बुद्ध (Mahatma Budh) की बात होती है, एक सवाल ज़रूर उठता है — क्या बुद्ध स्त्रियों के खिलाफ थे? क्योंकि उन्होंने शुरू में महाप्रजापति गौतमी को संन्यास देने से मना कर दिया था। और जब दिया, तो आठ गुरु धर्म लगा दिए — जैसे एक भिक्षुणी को भिक्षु के सामने झुकना होगा, चाहे वह भिक्षु कितना ही नया क्यों न हो। आज के नज़रिए से यह बहुत गलत लगता है। पर हमें वह समय समझना होगा। 2500 साल पहले भारत में स्त्रियों को कोई अधिकार नहीं था। उन्हें शिक्षा नहीं मिलती थी, उन्हें संपत्ति नहीं मिलती थी, उन्हें मंदिरों में जाने की इजाजत नहीं थी, उन्हें वेद पढ़ने की इजाजत नहीं थी। 

एक स्त्री का जन्म ही अभिशाप माना जाता था। ऐसे समाज में बुद्ध ने स्त्रियों को संन्यास दिया — यह एक क्रांति थी। पर यह क्रांति पूरी नहीं थी, क्योंकि बुद्ध समाज से पूरी तरह अलग नहीं रह सकते थे। उन्हें संघ को बचाना था। अगर उन्होंने भिक्षुणियों को बिल्कुल बराबर का दर्जा दे दिया होता, तो समाज उन पर टूट पड़ता। शायद यही कारण था कि उन्होंने आठ गुरु धर्म रखे।

पर बुद्ध (Mahatma Budh) के शब्दों को देखें तो तस्वीर साफ हो जाती है। बुद्ध ने कहा — स्त्री और पुरुष में कोई भेद नहीं है। जैसे गंगा, यमुना, सरयू, सरस्वती — सब अलग-अलग नदियाँ हैं, पर समुद्र में मिलकर सब समुद्र हो जाती हैं, वैसे ही स्त्री और पुरुष — दोनों अर्हत बन सकते हैं। उन्होंने कई स्त्रियों की बहुत प्रशंसा की। खेमा को उन्होंने सबसे बुद्धिमान भिक्षुणी कहा। उप्पलवण्णा को सबसे चमत्कारी। पताचारा को सबसे धर्मकथा में निपुण। 

एक बार एक ब्राह्मण ने बुद्ध से पूछा — क्या स्त्री भी बुद्ध बन सकती है? बुद्ध ने कहा — हाँ, यदि वह प्रयास करे। ब्राह्मण चौंक गया। उसने कहा — पर स्त्री तो कमज़ोर होती है। बुद्ध ने कहा — कमज़ोरी शरीर में नहीं, मन में होती है। जिसका मन दृढ़ है, वह स्त्री हो या पुरुष, बुद्ध बन सकता है।

एक और कहानी है — सुभा नाम की एक भिक्षुणी। वह बहुत सुंदर थी। एक दिन जंगल में एक जवान लड़का उसे देखकर उसके पीछे पड़ गया। उसने कहा — तुम इतनी सुंदर हो, संन्यास क्यों लिया? मेरे साथ चलो, हम सुख से रहेंगे। सुभा ने कहा — यह शरीर तो मांस, हड्डी और मल-मूत्र का ढेर है। सुंदरता तो बीमारी है। उस लड़के ने उसे छेड़ा तो सुभा ने अपनी ही आँख नोच ली और लड़के के सामने रख दी। 

उसने कहा — ले, यह रही तेरी सुंदरता। लड़का भाग गया। यह कहानी बहुत चरम है, पर यह दिखाती है कि बुद्ध (Mahatma Budh) की शिष्याएँ कितनी साहसी थीं। वे शरीर के मोह से पार हो चुकी थीं। ऐसी स्त्रियाँ कमज़ोर नहीं थीं। वे उस समय के किसी भी पुरुष से ज़्यादा मजबूत थीं।

तो क्या बुद्ध (Mahatma Budh) नारीवादी थे? यह सवाल गलत है। ‘नारीवादी’ शब्द 20वीं सदी का है। बुद्ध एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने हर उस प्राणी को मुक्ति का रास्ता दिखाया जो दुखी था — चाहे वह राजा हो या चोर, ब्राह्मण हो या शूद्र, स्त्री हो या पुरुष। उन्होंने जाति तोड़ी, वर्ग तोड़ा, और लिंग की दीवार को भी ढहाया — भले ही पूरी तरह से नहीं, पर काफी हद तक।

 यह उनके समय के हिसाब से बहुत बड़ी बात थी। अगर बुद्ध (Mahatma Budh) आज होते, तो शायद वे कहते — आठ गुरु धर्म को हटाओ, भिक्षुणियों को पूरी बराबरी दो। क्योंकि बुद्ध का मूल संदेश ही है — सब प्राणी समान हैं। सिर्फ दुख में अंतर है, प्राणी में नहीं।

13. बुद्ध और राजनीति — जब राजा भिक्षु बन जाते थे |

बुद्ध (Mahatma Budh) का राजनीति से क्या रिश्ता था? एक तरफ वे राजा थे जिन्होंने राजपाठ छोड़ा था। दूसरी तरफ वे अक्सर राजाओं के साथ बैठते थे। उन्होंने कभी कोई राज्य नहीं चलाया, कभी कोई कानून नहीं बनाया, कभी किसी युद्ध में हिस्सा नहीं लिया। फिर भी उनका राजनीति पर बहुत गहरा असर पड़ा। 

क्योंकि उन्होंने राजाओं को सिखाया — राजा वह नहीं जो दंड दे, राजा वह है जो रक्षा करे। राजा वह नहीं जो धन इकट्ठा करे, राजा वह है जो प्रजा को सुखी रखे। उनके समय में राजा अपनी प्रजा पर कर लगाते थे, युद्ध करते थे, दंड देते थे। बुद्ध ने कहा — जो राजा प्रजा पर अत्याचार करता है, वह राजा नहीं, डाकू है।

एक बार अजातशत्रु नाम का राजा आया। उसने अपने पिता बिम्बिसार को मरवा दिया था। वह सिंहासन पर बैठा था, पर उसके मन में पाप का बोझ था। वह बुद्ध के पास आया और बोला — मैं एक पुत्र हूँ जिसने अपने पिता को मारा। क्या मेरा उद्धार संभव है? बुद्ध ने उसे देर तक देखा। फिर कहा — जो किया, वह बदला नहीं जा सकता। पर आगे से सही रास्ता चुन सकते हो। अजातशत्रु रोया। उसने बुद्ध से धम्म सीखा। बाद में उसने बौद्ध संघ को बहुत दान दिया। पर उसे पूरी शांति कभी नहीं मिली। बुद्ध ने कहा था — हिंसा से हिंसा नहीं शांत होती। अजातशत्रु ने हिंसा की थी, इसलिए वह जीवन भर जलता रहा। यह बुद्ध की राजनीति थी — कोई सजा नहीं, सिर्फ परिणाम समझाना।

सम्राट अशोक बुद्ध (Mahatma Budh) के सबसे बड़े भक्त थे। अशोक ने कलिंग युद्ध में लाखों लोग मारे थे। फिर वह युद्ध का मैदान देखकर घबरा गया — खून की नदियाँ, बिखरे हुए अंग, रोती हुई स्त्रियाँ, अनाथ बच्चे। उसने सोचा — मैंने क्या किया? फिर वह बौद्ध भिक्षुओं के पास गया और बुद्ध का संदेश सुना। उसने फैसला किया — अब से कोई युद्ध नहीं। उसने दंड को कम किया, अस्पताल बनवाए, पशु-हत्या पर रोक लगाई, लोगों के लिए कुएँ और सड़कें बनवाईं।

 उसने अपने साम्राज्य की दीवारों पर बुद्ध के उपदेश लिखवाए — ‘अहिंसा परमो धम्मः’। यह बुद्ध की राजनीति का प्रभाव था — एक सम्राट युद्ध छोड़कर शांति के रास्ते पर आ गया। बुद्ध ने कभी अशोक को नहीं देखा, क्योंकि अशोक बुद्ध के 200 साल बाद हुआ। पर अशोक ने बुद्ध (Mahatma Budh) को देखा — अपने अंदर, अपने मन में, उन शिलालेखों में जो आज भी खड़े हैं।

बुद्ध (Mahatma Budh) की राजनीति का एक और पहलू है — ‘दस राजधम्म’। बुद्ध ने कहा — राजा को दस गुण रखने चाहिए : दान, सील, त्याग, सत्य, मृदुता, तप, अक्रोध, अहिंसा, क्षमा, अनुकंपा। ये गुण किसी राजा के नहीं, बल्कि एक साधु के होते हैं। बुद्ध चाहते थे कि राजा साधु बने। यानी राजा को लोभ, द्वेष, मोह से ऊपर उठना चाहिए। वह प्रजा का सेवक हो, स्वामी नहीं। यह बात आज भी सच है — कोई भी नेता जो लोभी है, क्रोधी है, मोह में अंधा है, वह देश को बर्बाद कर देगा। बुद्ध ने यह 2500 साल पहले कहा था। शायद आज के राजनेताओं को भी यह सुनने की ज़रूरत है।

14. बुद्ध और विज्ञान — जब ध्यान न्यूरोसाइंस से मिलता है |

20वीं सदी के अंत में विज्ञान ने कुछ ऐसा खोजा जिससे बौद्ध भिक्षु मुस्कुरा दिए। वैज्ञानिकों ने देखा कि जो लोग लंबे समय से ध्यान कर रहे हैं, उनके दिमाग में बदलाव आ जाता है। उनके प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स (जो ध्यान और आत्म-नियंत्रण के लिए है) मोटा हो जाता है। उनका एमिग्डाला (जो डर और गुस्से के लिए है) सिकुड़ जाता है। यानी ध्यान दिमाग को शांत और स्थिर बना देता है। वैज्ञानिकों को यह देखकर हैरानी हुई, पर बुद्ध यह 2500 साल पहले जानते थे। उन्होंने कहा था — जैसे एक झील में कीचड़ बैठ जाता है और पानी साफ हो जाता है, वैसे ही मन की अशांति ध्यान से शांत हो जाती है।

एक और खोज — न्यूरोप्लास्टिसिटी। पहले वैज्ञानिक सोचते थे कि बड़े होने के बाद दिमाग बदलता नहीं। पर अब पता चला है कि दिमाग जीवन भर बदलता रहता है। हर अनुभव, हर सोच, हर भावना दिमाग के तारों को बदल देती है। बुद्ध ने कहा था — मन ही सब कुछ है। जैसा तुम सोचते हो, वैसे बन जाते हो। 

यही बात न्यूरोसाइंस आज कह रही है — हम अपने विचारों के आदी हो जाते हैं। अगर हम हर दिन गुस्सा सोचते हैं, तो गुस्सा हमारी आदत बन जाती है। अगर हम हर दिन करुणा सोचते हैं, तो करुणा हमारा स्वभाव बन जाती है। बुद्ध ने यही कहा था — अपने मन पर नियंत्रण रखो। क्योंकि मन ही तुम्हारा मित्र है, मन ही तुम्हारा शत्रु है।

आज माइंडफुलनेस दुनिया भर में फैल गई है। अस्पतालों में, स्कूलों में, जेलों में, कंपनियों में लोग माइंडफुलनेस सीख रहे हैं। उन्हें यह नहीं पता कि यह बुद्ध की देन है। माइंडफुलनेस का मतलब है — बिना जज किए, बिना प्रतिक्रिया दिए, बस वर्तमान में होना। अपनी साँस को देखना। अपने शरीर को देखना। अपने विचारों को देखना। और यही बुद्ध का सबसे बड़ा उपदेश था — स्मृति (mindfulness) से ही सब कुछ संभव है। एक बार बुद्ध ने कहा — स्मृति को मैं सबसे बड़ा धर्म कहता हूँ। क्योंकि स्मृति के बिना कोई साधना नहीं होती, कोई जागरण नहीं होता।

विज्ञान ने यह भी पाया कि करुणा ध्यान (मेटा) करने से दूसरों के प्रति हमारी सहानुभूति बढ़ती है। जो लोग करुणा ध्यान करते हैं, वे दूसरे के दर्द को जल्दी पहचान लेते हैं और उसकी मदद करने को तैयार हो जाते हैं। बुद्ध (Mahatma Budh) ने कहा था — मैत्री (लविंग-काइंडनेस) से सारी शत्रुता समाप्त हो जाती है। जैसे माँ अपने बच्चे से प्रेम करती है, वैसे ही सब प्राणियों से प्रेम करो। 

आज यह साबित हो रहा है कि करुणा हमारे दिमाग को ही नहीं, हमारे समाज को भी बदल देती है। बुद्ध (Mahatma Budh) ने यह सब कहा था जब विज्ञान अभी पैदा भी नहीं हुआ था। यही कारण है कि कई वैज्ञानिक बुद्ध (Mahatma Budh) को एक प्राचीन वैज्ञानिक मानते हैं — जिसने मन के प्रयोगशाला में बिना किसी मशीन के सब कुछ खोज लिया।

15. बुद्ध और प्रकृति — जो पेड़ के नीचे जागा

बुद्ध (Mahatma Budh) का जन्म एक पेड़ के नीचे हुआ (साल वृक्ष)। उन्हें बोधि एक पेड़ के नीचे मिली (पीपल)। उनका महापरिनिर्वाण दो पेड़ों के बीच हुआ (साल वृक्ष)। बुद्ध का पूरा जीवन पेड़ों से जुड़ा है। वे जंगलों में रहते थे, पहाड़ों पर चढ़ते थे, नदियों के किनारे बैठते थे। उन्होंने कभी कहा — जो व्यक्ति पेड़ों के बीच रहता है, उसका मन शांत होता है। आज हम शहरों में रहते हैं, कंक्रीट के जंगल में, ट्रैफिक के शोर में, स्क्रीन की रोशनी में। 

हमारा मन बेचैन है। हम प्रकृति से दूर हो गए हैं। और प्रकृति से दूर होना अपने आप से दूर होना है। बुद्ध ने कहा था — प्रकृति को देखो। पेड़ कैसे बढ़ता है? बिना जल्दबाजी के। नदी कैसे बहती है? बिना रुके, बिना चिपके। सूरज कैसे उगता है? बिना किसी से पूछे। प्रकृति से सीखो। यही धम्म है।

बुद्ध (Mahatma Budh) ने पशुओं के प्रति भी बहुत करुणा रखी। उन्होंने कहा — हिंसा मत करो, चाहे वह छोटा से छोटा कीट ही क्यों न हो। उनके समय में लोग पशु बलि देते थे। बुद्ध (Mahatma Budh) ने कहा — एक पशु को मारकर तुम स्वर्ग नहीं जाओगे। स्वर्ग दया से मिलता है, हिंसा से नहीं। उन्होंने अपने भिक्षुओं को सिखाया — पानी छानकर पियो ताकि उसमें के जीव न मरें। धीरे-धीरे चलो ताकि रास्ते में कोई चींटी न कुचल जाए। यह बात आज बहुत प्रासंगिक है जब हम पृथ्वी को नष्ट कर रहे हैं, जानवरों को विलुप्त कर रहे हैं, जंगलों को काट रहे हैं। बुद्ध (Mahatma Budh) कहते — यह पृथ्वी तुम्हारी माँ है। जो माँ को काटता है, वह अपने पैर काटता है।

एक बार बुद्ध (Mahatma Budh) ने एक भिक्षु से कहा — जाओ, एक पेड़ के नीचे बैठो। उस पेड़ को ऐसे देखो जैसे तुम्हारा अपना शरीर है। पेड़ की जड़ें देखो, तना देखो, पत्तियाँ देखो, फल देखो। फिर सोचो — यह पेड़ कभी बीज था। फिर अंकुर हुआ। फिर छोटा पौधा। फिर बड़ा पेड़। फिर यह बूढ़ा होगा, फिर मरेगा। ठीक वैसे ही जैसे तुम।

 भिक्षु ने यह किया और उसे समझ में आ गया — सब अनित्य है। पेड़ भी, मैं भी। यह बुद्ध (Mahatma Budh) की पारिस्थितिकी थी — मनुष्य और प्रकृति में कोई अंतर नहीं। हम प्रकृति के अंदर हैं, प्रकृति हमारे अंदर है। जो प्रकृति को बचाता है, वह खुद को बचाता है। जो प्रकृति को नष्ट करता है, वह खुद को नष्ट करता है।

16. उपसंहार — बुद्ध अब भी क्यों जीवित हैं ?

आप और मैं अंत में आ गए हैं। पर बुद्ध की कहानी कभी खत्म नहीं होती। क्योंकि बुद्ध कोई कहानी नहीं है। वह एक विधि है। जैसे हम साँस लेते हैं, वैसे ही हम बुद्ध हो सकते हैं — यदि हम जागरूक हों। बुद्ध ने कोई चमत्कार नहीं किया, कोई स्वर्ग नहीं दिखाया, कोई नर्क नहीं दिखाया। उन्होंने बस एक साधारण बात कही — दुख है, उसका कारण है, उसका अंत है, और अंत का रास्ता है। बाकी सब बातें बकवास हैं।

 यह सुनने में सरल है, पर करने में कठिन। क्योंकि हम दुख को पकड़े रहते हैं। हम अपने गुस्से को पकड़े रहते हैं, अपने मोह को पकड़े रहते हैं, अपनी पहचान को पकड़े रहते हैं। बुद्ध कहते — छोड़ो। पर हम नहीं छोड़ते। फिर हम रोते हैं। फिर हम दोष देते हैं — ईश्वर को, किस्मत को, दूसरों को। बुद्ध कहते — तुम्हारे दुख का जिम्मेदार कोई और नहीं, तुम खुद हो। और तुम्हारी मुक्ति का जिम्मेदार भी तुम खुद हो।

मुझे याद है एक बार मैं बोधगया गया था। उस पीपल के पेड़ के नीचे बैठा था जहाँ बुद्ध बैठे थे। वहाँ हजारों लोग थे — तिब्बती, थाई, चीनी, भारतीय, अमेरिकी, यूरोपीय। सब अपनी-अपनी भाषा में कुछ न कुछ बुदबुदा रहे थे, मालाएँ फेर रहे थे, झुक रहे थे, रो रहे थे। मैंने सोचा — यह सब क्या है? बुद्ध ने तो कहा था — मेरी पूजा मत करो। पर यहाँ तो लोग उन्हें भगवान बना चुके हैं। तब मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं। मैंने सिर्फ साँस देखी। एक साँस अंदर, एक साँस बाहर। बस।

 थोड़ी देर बाद मुझे लगा — सारा शोर गायब हो गया। सारे रंग गायब हो गए। सिर्फ एक सन्नाटा था। और उस सन्नाटे में मुझे लगा कि बुद्ध वहाँ बैठे हैं। कोई मूर्ति नहीं, कोई चित्र नहीं, बल्कि वही सन्नाटा जो 2500 साल पहले भी वहाँ था। मैंने समझा — बुद्ध कोई व्यक्ति नहीं है। बुद्ध वह जगह है जहाँ मन शांत हो जाता है। वह जगह हर किसी के अंदर है। बस हमें उसे खोजना है।

तो अब मैं आपसे कहूँगा — बुद्ध के बारे में पढ़ना बंद करो। बुद्ध (Mahatma Budh) बनना शुरू करो। ज़रूरी नहीं कि आप संन्यास लें या जंगल चले जाएँ। बस एक काम करो — दिन में दस मिनट बैठो। अपनी आँखें बंद करो। अपनी साँस देखो। और कुछ मत करो। कोई मंत्र नहीं, कोई भगवान नहीं, कोई प्रार्थना नहीं। बस साँस। 

पहले दिन तुम्हें कुछ नहीं होगा। पहले सप्ताह तुम्हें कुछ नहीं होगा। पहले महीने तुम थोड़ा शांत महसूस करोगे। पहले साल तुम पाओगे कि तुम वही हो, पर अलग हो। तुम कम गुस्सा करोगे, कम ईर्ष्या करोगे, कम डरोगे। और धीरे-धीरे तुम समझ जाओगे — बुद्ध झूठ नहीं बोल रहे थे। दुख का अंत संभव है। बस थोड़ा धैर्य चाहिए, थोड़ा अभ्यास चाहिए, और थोड़ी स्मृति चाहिए। बाकी तो तुम पहले से ही बुद्ध हो। बस सो रहे हो। अब जागो।

17. Frequently Asked Questions (FAQ)

mahatma budh

सवाल 1 : क्या बुद्ध (Mahatma Budh) भगवान थे ?
Ans) नहीं। बुद्ध (Mahatma Budh) ने खुद कहा था — मैं कोई देवता नहीं हूँ, कोई अवतार नहीं हूँ, कोई देवदूत नहीं हूँ। मैं एक इंसान हूँ जो जाग गया। उन्होंने साफ कहा — मेरी पूजा मत करो, मेरी मूर्ति मत बनाओ। लेकिन लोगों ने फिर भी बना दी। 

बुद्ध (Mahatma Budh) के लिए ‘भगवान’ शब्द गलत है। उनके लिए सही शब्द है — ‘तथागत’ (जो वैसा ही आया जैसा है) या ‘बुद्ध’ (जागा हुआ)। वे चाहते थे कि लोग उनके जैसे बनें, उन्हें पूजें नहीं। पर मानव स्वभाव है — वह उसी को पूजने लगता है जो उसे पूजा से मुक्ति दिलाता है। विडंबना देखिए।

सवाल 2 : क्या बुद्ध (Mahatma Budh) ने ईश्वर को नकारा ?
Ans) बुद्ध (Mahatma Budh) ने न तो ईश्वर को माना, न नकारा। उन्होंने कहा — यह सवाल ही गलत है। अगर तुम पर तीर लगा है, तो क्या तुम पूछोगे कि तीर किसने बनाया? पहले तीर निकालो। बुद्ध का पूरा ध्यान एक ही समस्या पर था — दुख से मुक्ति कैसे मिले? ईश्वर है या नहीं, इससे दुख कम नहीं होता। 

इसलिए उन्होंने इस पर चुप्पी साध रखी थी। बाद में बौद्ध धर्म में कई लोगों ने देवी-देवताओं को शामिल कर लिया, पर मूल बुद्ध की शिक्षा में किसी ईश्वर की जगह नहीं है। तुम अपने मालिक हो, अपने उद्धारकर्ता हो। कोई तुम्हें बचाने नहीं आएगा।

सवाल 3 : क्या बुद्ध (Mahatma Budh) ने जाति-पाति खत्म की ?
Ans) हाँ, बहुत हद तक। उनके समय में ब्राह्मण खुद को सबसे ऊपर मानते थे, शूद्रों को छूना भी पाप था। बुद्ध ने कहा — जाति खून से नहीं, कर्म से बनती है। ब्राह्मण वह नहीं जो ब्राह्मण परिवार में पैदा हुआ, बल्कि वह जिसने अपने मन के अहंकार को मार डाला। शूद्र वह नहीं जो शूद्र परिवार में पैदा हुआ, बल्कि वह जो अपने क्रोध और लोभ का गुलाम है। 

उन्होंने संघ में सबको जगह दी — चोर, हत्यारा, वेश्या, राजा, ब्राह्मण, शूद्र। सब एक साथ बैठते थे, साथ खाते थे। यह उस समय की बहुत बड़ी क्रांति थी। पर बुद्ध के बाद भारत में जाति फिर से मजबूत हो गई। बौद्ध धर्म यहाँ से लगभग खत्म हो गया। फिर अम्बेडकर ने 1956 में इसे फिर से जगाया।

सवाल 4 : क्या बुद्ध (Mahatma Budh) स्त्री-विरोधी थे ?
Ans) यह सवाल बहुत बहस का है। एक तरफ उन्होंने स्त्रियों को संन्यास दिया — जो उस समय सोचा भी नहीं जा सकता था। उन्होंने कहा — स्त्री और पुरुष में कोई भेद नहीं। स्त्री भी अर्हत (बुद्धत्व) प्राप्त कर सकती है। उनकी कई शिष्याएँ बहुत प्रसिद्ध हुईं — खेमा, उप्पलवण्णा, पताचारा, धम्मदिन्ना। दूसरी तरफ, उन्होंने भिक्षुणियों के लिए आठ गुरु धर्म बनाए — जैसे भिक्षुणी को भिक्षु के सामने झुकना होगा, भिक्षुणी भिक्षु को उपदेश नहीं दे सकती, वगैरह। 

यह आज के नज़रिए से गलत लगता है। पर उस समय के समाज को देखते हुए, शायद बुद्ध ने ये नियम संघ को बचाने के लिए बनाए थे। अगर वे स्त्रियों को पूरी बराबरी दे देते, तो समाज उन्हें और संघ को बर्दाश्त नहीं करता। यह एक कठिन समझौता था। पर साफ है — बुद्ध स्वयं स्त्री-विरोधी नहीं थे। वे अपने समय के हिसाब से बहुत आगे थे।

सवाल 5 : क्या बुद्ध (Mahatma Budh) ने राहुल और यशोधरा को छोड़कर गलत किया ?
Ans) यह सवाल हर पिता और हर पति के मन में आता है। एक रात में बिना बताए अपनी पत्नी और नवजात बेटे को छोड़ देना — क्या यह पाप नहीं? बुद्ध (Mahatma Budh) से जब यह पूछा गया, तो उन्होंने कहा — एक गाँव जल रहा था। एक आदमी अपने बच्चे को छोड़कर भागा, क्योंकि वह पानी लाने दूसरे गाँव जा रहा था। क्या वह पापी है? मैं पूरी दुनिया के लिए पानी लेने गया था। 

मैंने राहुल को दूध-मक्खन नहीं, बल्कि अमरता का दूध दिया। और सच यह है — बाद में राहुल ने भी संन्यास लिया और वह अर्हत बना। यशोधरा भी भिक्षुणी बनी और अर्हत बनी। बुद्ध ने अपने परिवार को संसार के बंधन से मुक्त किया। क्या यह प्यार नहीं है? पर हाँ, एक आम इंसान के लिए यह समझना मुश्किल है। क्योंकि हमारा प्यार छोटा है, पकड़ने वाला है। बुद्ध का प्यार छोड़ने वाला था। यह अलग है।

सवाल 6 : बुद्ध (Mahatma Budh) ने खुद को क्यों नहीं लिखा ?
Ans) बुद्ध ने कभी कुछ नहीं लिखा। उनके उपदेश मुँह से मुँह चलते रहे। उनकी मृत्यु के 400 साल बाद श्रीलंका में पहली बार तिपिटक लिखी गई। क्यों? बुद्ध चाहते थे कि उनके शब्द जीवित रहें, मरे नहीं। लिखित शब्द मर जाता है, उसकी एक बार तय हो जाती है। मौखिक परंपरा में हर पीढ़ी शब्दों को अपने अनुसार ढालती है, उसे जीवित रखती है। 

बुद्ध ने कहा — मेरे शब्दों को मत पकड़ो, मेरे कहे को मत पूजो। अनुभव करो। अगर वे लिख देते, तो लोग किताब को पकड़ लेते, सत्य को नहीं। यही कारण है। और शायद यही वजह है कि बुद्ध की शिक्षा आज भी इतनी ताज़ा है — क्योंकि वह कभी किताब में कैद नहीं हुई।

सवाल 7 : क्या बुद्ध (Mahatma Budh) भूखे रहते थे ?
Ans) नहीं। बुद्ध (Mahatma Budh) ने तपस्या छोड़ दी थी। उन्होंने कहा — चरम दुख भी मूर्खता है, चरम सुख भी। बीच का रास्ता। भिक्षु भूखे नहीं रहते, वे दिन में एक बार भोजन करते हैं, सुबह से दोपहर तक। उसके बाद केवल पानी। पर वे पेट भर खाते हैं। 

बुद्ध स्वस्थ थे, दुबले-पतले पर मजबूत। वे रोज कई किलोमीटर पैदल चलते थे। 80 साल की उम्र में भी वे चल रहे थे। उनकी मृत्यु भी अधिक खाने से नहीं, बल्कि एक खराब भोजन (या मशरूम) से हुई। तो यह मत सोचिए कि बुद्ध भूखे मरते थे। वे विवेक से खाते थे — पेट भर, पर लोभ से नहीं।

सवाल 8 : क्या बुद्ध (Mahatma Budh) हिंदू थे ?
Ans) बुद्ध (Mahatma Budh) के समय ‘हिंदू’ शब्द नहीं था। ‘सनातन धर्म’ था, जिसे आज हम हिंदू धर्म कहते हैं। बुद्ध उसी संस्कृति में पैदा हुए, उसी में पले-बढ़े। उन्होंने वेद पढ़े, यज्ञ देखे, उपनिषद सुने। पर उन्होंने कई बातों को खारिज किया — यज्ञों की हिंसा, जाति का भेद, ईश्वर की सत्ता, आत्मा का सिद्धांत (हिंदू आत्मा मानते हैं, बुद्ध ने ‘अनात्मा’ कहा — कोई स्थायी आत्मा नहीं)। 

तो बुद्ध हिंदू थे या नहीं? वे हिंदू धर्म से निकले, पर उससे अलग हो गए। जैसे ईसाई यहूदी धर्म से निकले, पर अलग हो गए। आज बौद्ध धर्म एक अलग धर्म है। पर बुद्ध ने खुद कोई नया धर्म नहीं बनाया। उन्होंने बस एक रास्ता दिखाया। धर्म तो बाद में लोगों ने बना लिया।

सवाल 9 : क्या बुद्ध (Mahatma Budh) को देवता ने ज्ञान दिया ?
Ans)
नहीं। बुद्ध (Mahatma Budh) ने खुद कहा — कोई देवता नहीं आया, कोई चमत्कार नहीं हुआ। मैंने अपने प्रयास से, अपनी साधना से, अपनी बुद्धि से ज्ञान पाया। मैं बैठा, मैंने देखा, मैं समझा। बस। बुद्ध (Mahatma Budh) इस मामले में पूरी तरह से ‘सेकुलर’ (धर्मनिरपेक्ष) हैं। उन्होंने किसी चमत्कार को जगह नहीं दी। उनके बाद बौद्ध धर्म में कई चमत्कारी कहानियाँ जुड़ गईं — जैसे वे हवा में उड़े, पानी पर चले, वगैरह। पर मूल बुद्ध इन सबसे दूर थे। वे एक व्यावहारिक इंसान थे, जादूगर नहीं।

सवाल 10 : बुद्ध (Mahatma Budh) की शिक्षा आज क्यों ज़रूरी है ?
Ans) क्योंकि आज हम पहले से कहीं ज़्यादा दुखी हैं। हमारे पास पैसा है, सुख है, मकान है, गाड़ी है, मोबाइल है, इंटरनेट है। फिर भी हम अंदर से खाली हैं। हमें नींद नहीं आती, हमें चैन नहीं मिलता, हम रात-रात भर स्क्रीन देखते हैं, सुबह उठते हैं तो थके होते हैं। हम डिप्रेशन, एंग्जाइटी, लोनलीनेस से घिरे हैं। 

बुद्ध (Mahatma Budh) ने यही समस्या 2500 साल पहले देखी थी — मनुष्य सुख की खोज में दुख पकड़ लेता है। उनका इलाज सरल है — साँस देखो, मन देखो, चिपकना छोड़ो, जागो। कोई दवा नहीं, कोई ऑपरेशन नहीं, कोई पैसा नहीं। बस थोड़ा अभ्यास। यही कारण है कि आज दुनिया भर में माइंडफुलनेस, ज़ेन, विपश्यना इतनी तेजी से फैल रही है। बुद्ध की शिक्षा समय की कसौटी पर खरी उतरी है। और आज भी उतनी ही ताज़ा है जितनी पहले थी।

सवाल 11 : क्या बुद्ध (Mahatma Budh) ने हँसी-मज़ाक किया ?
Ans) बहुत कम। बुद्ध गंभीर थे, पर उदास नहीं। उनके चेहरे पर एक शांत मुस्कान रहती थी। कभी-कभी वे व्यंग्य भी करते थे। एक बार एक ब्राह्मण ने उन्हें गाली दी। बुद्ध (Mahatma Budh) ने कहा — अगर कोई मेहमान आए और उपहार न लिया जाए, तो उपहार किसके पास रहता है? ब्राह्मण ने कहा — मेहमान के पास।

 बुद्ध (Mahatma Budh) ने कहा — तुम्हारी गाली मैंने नहीं ली, वह तुम्हारे पास ही रही। ब्राह्मण चुप हो गया। तो हाँ, बुद्ध में हास्य था, पर वह चुपचाप, बिना ठहाके वाला हास्य था। वे कभी ज़ोर से नहीं हँसे, क्योंकि उनके लिए सब कुछ एक नाटक था — देखने योग्य, पर हँसने या रोने योग्य नहीं।

सवाल 12 : क्या बुद्ध (Mahatma Budh) आज होते तो क्या करते ?
Ans) बुद्ध (Mahatma Budh) आज होते तो शायद महलों में नहीं, पर फिर भी जंगलों में ही होते। वे किसी सोशल मीडिया पर नहीं होते, किसी टीवी शो में नहीं जाते, कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करते। वे बस कहीं एक पेड़ के नीचे बैठे होते। और लोग उनके पास आते। 

वे शायद लैपटॉप नहीं चलाते, पर वे ज़रूर कहते — इस मशीन को बंद करो, अपने मन को देखो। वे शायद कहते — तुम्हारे पास हज़ारों फ्रेंड्स हैं, पर तुम अकेले हो। एक सच्चा फ्रेंड बनो — अपने आप से। बुद्ध आज भी वही कहते जो कल कहते थे। क्योंकि मनुष्य का दुख नहीं बदला। सिर्फ मशीनें बदल गई हैं। बुद्ध मशीनों से नहीं, मन से काम करते हैं।

सवाल 13 : बुद्ध (Mahatma Budh) के बाद उनकी हड्डियों का क्या हुआ ?
Ans) बुद्ध (Mahatma Budh) के शरीर को जलाया गया। अस्थियाँ (हड्डियों के टुकड़े) आठ राज्यों में बाँटी गईं। हर राज्य ने उन पर स्तूप बनाया। सम्राट अशोक ने 200 साल बाद उन स्तूपों को खोला और अस्थियों को दुनिया भर में बाँट दिया — उत्तर से दक्षिण, पूरब से पश्चिम। 

आज उनमें से कुछ अस्थियाँ संग्रहालयों में हैं, कुछ स्तूपों में, कुछ खो गईं। श्रीलंका में एक दाँत रखा है — जिसे ‘दाँत का अवशेष’ कहते हैं। उस पर हर साल बड़ी शोभायात्रा निकलती है। बुद्ध (Mahatma Budh) ने कहा था — मेरी अस्थियों की पूजा मत करना। पर लोगों ने की। और अब तो बुद्ध के दाँत, हड्डियाँ, बाल, सब की पूजा होती है। बुद्ध शायद हँस रहे होंगे — ऊपर से।

सवाल 14 : क्या बुद्ध (Mahatma Budh) का कोई चेला था जो उनके जैसा बना ?
Ans) हाँ, कई। सारिपुत्त और मोग्गल्लान — ये दो मुख्य चेले थे। सारिपुत्त बुद्ध (Mahatma Budh) के बाद सबसे बुद्धिमान था। वह धम्म को बहुत गहरे समझता था। मोग्गल्लान सबसे चमत्कारी था (बाद की कहानियों में)। पर सारिपुत्त और मोग्गल्लान दोनों बुद्ध से पहले मर गए। 

बुद्ध (Budh) ने कहा — मेरे जाने के बाद आनंद बहुत लोगों को सिखाएगा। पर आनंद को बोधि तब मिली जब बुद्ध (Mahatma Budh) पहले ही मर चुके थे। तो हाँ, बुद्ध जैसा कोई नहीं बना। पर बुद्ध ने कभी कहा भी नहीं कि कोई उनके जैसा बने। उन्होंने कहा — तुम अपने जैसे बनो, जागे हुए। बुद्ध बनने की ज़रूरत नहीं, अपना बुद्धत्व पाने की ज़रूरत है।

सवाल 15 : बुद्ध (Mahatma Budh) को पढ़ने का सबसे अच्छा तरीका क्या है ?
Ans) बुद्ध (Mahatma Budh) को पढ़ो मत। बैठो। पुस्तक बंद करो। आँखें बंद करो। साँस देखो। बस। यही बुद्ध (Mahatma Budh) को पढ़ना है। अगर किताब चाहिए, तो ‘धम्मपद’ पढ़ो — यह बुद्ध के सूत्रों का सबसे छोटा और सरल संग्रह है। फिर ‘सुत्तनिपात’ पढ़ो। फिर ‘मज्झिम निकाय’।

 पर असली पढ़ना किताब से नहीं, मन से होता है। बुद्ध ने कहा — जो मुझे देखता है, वह धम्म देखता है। जो धम्म देखता है, वह मुझे देखता है। तो धम्म को देखो — अपने मन में, अपने जीवन में, अपने दुख में। बाकी सब बातें बाद में।

 

 

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