“रावण: जिसे राम ने भी माफ कर दिया, लेकिन उसका अहंकार नहीं”
1. ये आर्टिकल (रावण का अहंकार) क्योँ पढ़े?
“रामायण” यह कोई नया नाम नहीं है। यह नाम भारत के हर व्यक्ति के दिलों में वास करता है। साथ ही साथ विदेशों में रहने लोग भी इस नाम से अनजान नहीं हैं। मुझे लगता है कि रामायण का सबसे महत्वपूर्ण किरदार अगर पूछा जाए तो सभी के होंठों पर “प्रभु श्रीराम” का नाम आएगा और ह्रदय गद्गद् हो जाता है। अगर उसी रामायण में श्रीराम के बाद दूसरा सबसे बड़ा किरदार पूछा जाए तो “रावण” का नाम आता है।
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Toggle“रावण” का नाम सुनते ही सबके मन में नफ़रत की भावना आ जाती है, लेकिन रावण एक बहुत बड़ा विद्वान, योद्धा और तपस्वी था उसकी सिर्फ अहंकार की भावना ने उसे मृत्यु तक पहुँचाया। असली सवाल तो यह है कि “श्री राम ने आखिर मारा किसे?” रावण के शरीर को या उसके अंदर बैठे विषैले अहंकार को?. “रावण का अहंकार” उससे यह स्वीकार नहीं करवा पा रहा था कि वह गलत हो सकता है। यही वह बिंदु है जहाँ से रावण का अहंकार उसके पतन की कहानी शुरू होती है।
मेरा मानना है कि राम ने तो केवल रावण के शरीर को मारा लेकिन उनका असली निशाना उसकी (रावण का अहंकार) विचारधारा थी। आईये, इस आर्टिकल के माध्यम से हम यह जानने का प्रयास करेंगे कि रावण कौन था?; कहाँ से आया?; कैसे इतना बड़ा बना?; और आखिर में किस गलती से अपना सब कुछ खो बैठा? चलिए, बिना किसी देरी के अपनी चर्चा को शुरू करते हैं-
2. रावण कौन था? (पूरा परिचय)
(A)रावण का वंश
रावण के बारे में जानने के पहले मुझे और आपको उसके पूरे परिवार के बारे में जानना होगा क्योंकि रावण एक ब्राह्मण ऋषि का वंशज होते हुए भी एक राक्षस कैसे बना?. रावण के परदादा ब्रम्हा के दस मानस-पुत्रों में से एक थे और दादा सप्तऋषियों में से एक थे। पिता एक महान ब्राह्मण ऋषि जो शिव भगवान की कठोर तपस्या के लिए जाने जाते थे वो “महर्षि विश्रवा” थे।
ये तो सभी उनके पिता की ओर से थे अब माता की ओर से वंशावली देखी जाये तो उनके नाना राक्षस राजा “सुमाली” थे जिन्होंने ब्रम्हा जी से वरदान पाकर लंका पर राज किया था। उनकी नानी का नाम “केतुमती” था। रावण की माता राक्षस राजा सुमाली की चार पुत्रियों में से एक थी जिनका नाम “कैकसी” था।
(B) रावण का जन्म
राक्षस राजा सुमाली चाहता था कि उसकी पुत्री कैकसी का विवाह संसार के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति से हो क्योंकि उनसे होने वाला संतान बहुत शक्तिशाली होगा, जो राक्षसों का खोया हुआ सम्मान वापस लायेगा। राजा सुमाली यह देख चुका था कि संसार में कोई भी राजा उससे ज्यादा शक्तिशाली नहीं है। तब उन्होंने अपनी पुत्री के विवाह के लिए ऋषियों में से किसी एक को चुनना चाहा और उनकी यह खोज ऋषि विश्रवा पर आकर समाप्त हो गई।
राक्षस राजा सुमाली ने ऋषि विश्रवा के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा लेकिन ऋषि विश्रवा ने इसे स्वीकार नहीं किया। सुमाली के द्वारा विवश करने पर वे मान गए किन्तु एक चेतावनी दी और कहा कि यह विवाह अनुपयुक्त समय और शास्त्र अनुकूल नहीं है अत: इससे होने वाली संतान राक्षसी प्रवृत्ति की होगी। जब रावण का जन्म हुआ तो उसे “दसग्रिव” नाम दिया गया।
(B) रावण के संस्कार
इस आर्टिकल को लिखते समय मुझे अपने दादा जी की कही हुई एक बात याद आ रही है। वे कहते थे कि “बेटा , बच्चों में संस्कार उनके माता-पिता के द्वारा दिया जाता है। छोटे बच्चे बिलकुल उस मिट्टी की तरह होते हैं जैसा कुम्हार के चाक पर होता है और कुम्हार उसे धीरे-धीरे एक बहुत सुंदर रूप प्रदान करता है। ठीक उसी तरह यदि माता-पिता बच्चे में अच्छे संस्कार देते हैं तो उसका प्रभाव सदैव अच्छा होता है और यदि गलत संस्कार दिए तो उसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है।”
रावण का अहंकार उसके जन्म से ही शुरू नहीं हुआ था। रावण ने शिक्षा-दीक्षा तो अपने पिता से ली लेकिन अहंकार के संस्कार राक्षस राजा सुमाली से लिये। जब सुमाली ने ब्रम्हा जी से वरदान पाकर लंका पर विजय प्राप्त किया तब भगवान विष्णु ने सुमाली को हराया और फिर सुमाली को रसातल में जाकर छिपना पड़ा। सुमाली चाहता था कि उसका कोई वंशज़ फिर से लंका को जीते; इसलिए अपनी पुत्री कैकसी का विवाह ऋषि विश्रवा से करवाया अर्थात सुमाली ही था जिसने रावण को “राक्षस नीति” सिखाई और उसके अहंकार को हवा दी।
इस आर्टिकल के माध्यम से मैं एक और बात पर गौर करवाना चाहता हूँ कि राक्षसी कैकसी ने ऋषि विश्रवा से 4 संतानों को जन्म दिया-
- रावण
- कुम्भकर्ण
- विभीषण
- शूर्पणखा
3. रावण की प्रारंभिक सफलताएँ और तपस्या
(A) शिव भगवान की कठोर तपस्या
रावण का अहंकार उसकी सफलताओं के साथ-साथ बढ़ता गया। जब रावण ने अपने पिता से शिक्षा ग्रहण कर ली तब उसे लगा कि और शक्तिशाली बनाना चाहिए। रावण ने निश्चय किया कि वह कैलाश पर्वत पर जायेगा और भगवान शिव की तपस्या की तपस्या करेगा। यकीन मानिये ये तपस्या इतनी कठोर थी कि रावण हजारों सालों तक भूखा-प्यासा, एक पैर पर खड़ा होकर, आग और बारिश के बीच में तपस्या करते रहे। अंत में भगवान शिव ने खुद आकर उन्हें वरदान दिया, यहाँ रावण का अहंकार जन्म लेता है, उसे लगा “मैंने शिव को भी झुका दिया”; लेकिन यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि रावण ने भगवान शिव से असीम शक्ति का वरदान माँगा, न की अमरता का।
भगवान शिव ने रावण को अपने “अर्ध चन्द्र (आधा चाँद)” की शक्ति दे दी और यह भी वरदान दिया कि अब तू “दसानन (दस सिरों वाला)” कहलायेगा। दस सिरों वाला अर्थात रावण पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, उर्ध्व, अधो, अग्नि, वायु, आकाश, और पृथ्वी मतलब वह ब्रह्मांड की हर दिशा और तत्व पर नियंत्रण पाने वाला बन गया था।
भगवान शिव ने रावण को वरदान देकर शक्तिशाली बना दिया किन्तु अमर नहीं किया क्योंकि अमरता उसके अहंकार का सबसे बड़ा हथियार बन जाता। इस घटना के बाद रावण ने इसे अपनी जीत मान ली और सोंचा कि अब वह संसार में किसी को भी झुका सकता है, भगवान शिव को भी। यहीं से उसके अहंकार की शुरुआत हुई।
(B) ब्रह्मा जी से वरदान
भगवान शिव से वरदान पाने के बाद रावण को सिर्फ ऊपरी लोकों के प्राणियों से डर था तब उसने सोंचा कि क्यों न ब्रम्हा जी की तपस्या करके वरदान प्राप्त किया जाये और फिर रावण ने ब्रम्हा जी की तपस्या शुरू कर दी। यह तपस्या भी अत्यंत भीषण थी जिसमे रावण ने अपना पूरा शरीर लगभग नष्ट कर दिया। तब ब्रम्हा जी ने स्वयं प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। रावण ने माँगा “मुझें देवता, दानव, यक्ष, गंधर्व और नाग, इनमें से कोई भी मुझे मार न सके।” ब्रम्हा जी ने वरदान दे दिया।
ब्रम्हा जी से प्राप्त वरदान में रावण ने मानव (मनुष्य) को शामिल नहीं किया। रावण का अहंकार इतना बढ़ गया कि उसे मनुष्यों से खतरा महसूस ही नहीं हुआ और मेरा मानना है कि यही उसकी सबसे बड़ी भूल साबित हुई क्योंकि रावण मनुष्य को बहुत ही तुच्छ समझता था और अंत में रावण को एक मनुष्य के हाथों मृत्यु की प्राप्ति हुई।
(C) लंका पर विजय
भगवान शिव और ब्रम्हा जी वरदान प्राप्त करने के बाद रावण बहुत शक्तिशाली हो चुका था और उसकी नज़र बहुत समय से सोने की लंका पर थी जो उसके सौतेले भाई और धन के देवता कुबेर के पास था। कुबेर, ऋषि विश्रवा और उनकी पहली पत्नी का पुत्र था जो रावण से बहुत पवित्र, बड़ा और योग्य था किन्तु वह रावण से हार गया क्योंकि वरदान पाने के बाद उससे जितना संभव नहीं था।
रावण सोने की लंका जीत ली और कुबेर का पुष्पक विमान भी छिन लिया। यदि रावण चाहता तो उसे लंका बड़ी आसानी से मिल सकता था क्योंकि कुबेर उसका भाई था लेकिन रावण का अहंकार चरम पर था उसने कुबेर को हराया और अपमानित किया ताकि वह अपनी विजय का मज़ा ले पाये।
मैं तो यही कहूँगा कि रावण ने कठोर मेहनत की और उसे वह सब प्राप्त हुआ जिसका वह हक़दार था। यदि अपनी शक्ति का प्रयोग अपने भाई को अपमानित करने और लोगों को कष्ट पहुँचाने में न करता तो पूरे विश्व में कोई भी उसकी बराबरी नहीं कर पाता। धीरे-धीरे यही शक्ति अहंकार का रूप लेने लगी।
4. रावण की उपलब्धियाँ (ज्ञान और शक्ति का चरम)
(A) चारों वेदों का ज्ञाता (सिर्फ पढ़ा नहीं समझा भी)
जैसा कि मैंने आर्टिकल की शुरुआत में बताया था रावण की शिक्षा-दीक्षा की पूरी जिम्मेदारी महर्षि विश्रवा ने ली थी। इसलिए रावण को न सिर्फ ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद ज्ञान था बल्कि वह ब्रह्मांड के गणित, भौतिकी, जीव विज्ञान और नीति शास्त्र को भी अच्छे से समझता था। वह चाहता तो वेदों पर व्याख्या भी लिख सकता था।
ब्रिटैनिका (Encyclopaedia Britannica) के अनुसार, अगर रावण की तुलना आज के आधुनिक युग में की जाये तो वह एक प्रोफेसर, एक वैज्ञानिक और एक दार्शनिक आसानी से बन सकता है क्योंकि उसे हर तत्व का गहन ज्ञान था।
(B) संगीतज्ञ (रूद्र वीणा के जन्मदाता)
रावण भगवान शिव को अपना गुरु मानता था और उन्हें खुश करने के लिए उसने “रूद्र वीणा” नामक एक वाद्य यंत्र की रचना भी की जो आज भी शास्त्रीय संगीत का सबसे प्राचीन और जटिल वाद्य यंत्र माना जाता है। विश्व कठपुतली कला विश्वकोश (World Encyclopedia Of Puppetry Arts) में भी इसका वर्णन मिलता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, रावण ने अपनी ही नसों को तार के रूप में इस्तेमाल किया और रक्त से सींचकर वीणा बनाई अर्थात उसने अपना शरीर और रक्त, संगीत को समर्पित कर दिया था।
आज हम जो “शिव तांडव स्त्रोत” का पाठ करते हैं उसकी रचना भी रावण ने ही की थी जो आज भी शिव भक्ति का सबसे शक्तिशाली स्त्रोत माना जाता है। इसका उल्लेख गूगल आर्ट्स एंड कल्चर (Google Arts & Culture) में भी किया गया है। अत: मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ कि रावण सिर्फ एक योद्धा ही नहीं था बल्कि एक बहुत अच्छा कलाकार भी था।
(C) ज्योतिष, राजनीति और नीति का महान विद्वान
अगर ज्योतिष की बात की जाए तो रावण को ग्रह-नक्षत्रों की गति, शुभ-अशुभ का योग और मुहूर्त निकलना बहुत अच्छे से आता था। आप लोगों को ये बात जानकर बहुत हैरानी होगी की, रावण ने “सीता का हरण कब करना है?” इसका भी शुभ मुहूर्त निकला था।
राजनीति और नीति विज्ञान में रावण की कोई भी बराबरी नहीं कर सकता। रावण, चाणक्य से भी पहले का नीतिशास्त्र जानता था कि “एक राजा को कब बोलना है”; “कब चुप रहना है”; “कब युद्ध करना है”; और “कब संधि करना है”। यह सब उसकी उंगुलियों पर था।
रावण ने “रावण नीति” नामक एक ग्रंथ भी लिखा था जो आज भी लुप्त है, जिसमें “एक राजा को कैसे अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए”; इसका पूरा वर्णन था।
(D) विरोधाभास: इतना ज्ञानी होकर "सीता हरण" जैसी गलती क्यों?
मैं यह मानता हूँ कि ज्ञान और कर्म में बहुत फर्क होता है। आईये, इसे कुछ बिन्दुओं के मध्यम से समझते हैं-
- रावण का ज्ञान सैधांतिक था, व्याहारिक नहीं। वह जानता था कि सीता जैसी विवाहित नारी का अपहरण करना अधर्म है, लेकिन फिर भी उसने यह कार्य किया क्योंकि उसका मानना था कि “मैं जो करूँ, वही दह्र्म है”।
- उसकी बहन शूर्पणखा की नाक लक्ष्मण ने काट दी थी जिसके कारण रावण ने प्रतिशोध लेने की ठानी। उसने अपनी बुद्धि का प्रयोग न करके अपनी भावनाओं को अपने ऊपर हावी होने दिया।
- रावण मनुष्यों को तुच्छ समझता था यह उसकी सबसे बड़ी गलती साबित हुई और अंत में एक मनुष्य (राम) के हाथों मृत्यु को प्राप्त हुआ।
- ज्ञान और विवेक दो अलग-अलग शब्द हैं। ज्ञान का अर्थ है “सीखी हुई बातें” और विवेक का अर्थ है “सही-गलत का उचित समय पर निर्णय करना”। अत: यह कहा जा सकता है कि रावण के पास ज्ञान था, विवेक नहीं।
5. राम ने रावण को 'माफ़' कब और क्यों किया?
(A) राम का सन्देश - "सीता को लौटा दें, माफ़ का दूंगा"
हनुमान जब लंका से सीता जी से मिलकर वापस लौटकर आये और पूरा यात्रा वृतांत राम जी को सुनाया तो राम जी ने अंगद को अपना संदेश लेकर रावण के दरबार में जाने को कहा। अंगद ने रावण के दरबार में जाकर कहा “हे लंकेश्वर! प्रभु राम का संदेश है- सीता माता को ससम्मान लौटा दो। उन्होंने तुम्हें क्षमा करने का फैसला किया है। कोई युद्ध नहीं होगा; कोई बदला नहीं लिया जायेगा। तुम्हारा राज्य, तुम्हारा जीवन और तुम्हारी प्रतिष्ठा सब सुरक्षित रहेगा। मैं तुम्हें प्रणाम करके वापस अयोध्या लौट जाऊंगा।” लेकिन रावण का अहंकार ने उसे ऐसा नहीं करने दिया।
(B) राम ने रावण के ज्ञान, तप और भक्ति का सम्मान क्यों किया?
राम ने युद्ध टालने का हर संभव प्रयास किया क्योंकि वे जानते थे की रावण ने सीता हरण अहंकार वश किया है न की जानबूझकर। राम के उदारवादी दृष्टिकोण से देखें तो रावण में जहाँ बुराई दिखती तो कुछ अच्छाई भी है। आईए, इसे मैं कुछ बिन्दुओं में स्पष्ट करता हूँ-
- भगवान राम खुद एक विद्वान थे। वे जानते थे कि चारों वेदों को कंठस्थ करना; उसका अर्थ निकलना और उस पर व्याख्या देना बहुत कठिन कार्य है। यह किसी साधारण व्यक्ति के द्वारा नहीं हो सकता अर्थात रावण ने ये सब बहुत कठिन तप से हांसिल किया होगा।
- राम स्वयं रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना करने वाले थे। वे जानते थे कि “शिव तांडव स्त्रोत” रावण ने लिखा है और “रूद्र वीणा” भी बनाई है। रावण, राम के इष्टदेव शिव के परमभक्त थे। राम एक भक्त की भक्ति का सम्मान करते थे, भले ही वो उनका दुश्मन क्यों न हो।
- राम जानते थे कि रावण हजारों सालों तक भूख-प्यासा, धुप-बारिश और एक पैर पर खड़ा होकर तपस्या की है। यह एक “आत्म-अनुशासन” का प्रतिक है। राम ने सोंचा कि “इतनी कठोर तपस्या करने वाला व्यक्ति बुरा नहीं हो सकता, वह जरुर भटका हुआ है।”
- रावण लंका का राजा था और उसका राज्य सोने की नगरी थी जो उसकी राजनीतिक सूझबूझ को दर्शाता है। राम ने एक राजा को राजा की तरह सम्मान दिया।
- राम जानते थे कि “धर्म रक्षा में है, बदला में नहीं।” अगर दुश्मन भी सुधर जाए, तो उसे माफ़ करना एक राजा का धर्म है। राम ने रावण को “महान विद्वान” कहकर संबोधित किया; भले ही उसने सीता का अपहरण किया था, लेकिन राम ने इसे इसे सिर्फ एक गलती माना।
6. रावण ने माफ़ी क्यों स्वीकार नहीं की? (अहंकार का प्रवेश)
(A) पिछली जीत का नशा ("मैं सबसे बड़ा हूँ")
रावण ने अब तक जो भी किया था उसमें उसे जीत ही मिली थी, तो उसे ऐसा लगने लगा था कि “मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ”; उसकी जितनी भी उपलब्धियाँ रही जैसे- शिव भगवान की कठोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया; ब्रह्मा जी कठोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया; कुबेर को हराकर लंका को जीता; पुष्पक विमान पर कब्ज़ा कर लिया और त्रिलोक विजेता बना। मुझे लगता है कि इन सब उपलब्धियों ने रावण को एक गहरा भ्रम दिया कि “मैं अजेय हूँ, मेरा कोई मुकाबला नहीं कर सकता”।
(B) रावण का भ्रम (माफ़ी को कमज़ोरी समझा)
रावण के अंदर दो वंशों का खून था। ब्राह्मण और राक्षस खून। ब्राह्मण खून ज्ञान, त्याग, तप और क्षमा सिखाता है तो राक्षस खून शक्ति, प्रतिशोध, अहंकार और दबदबा सिखाता है। रावण ने राक्षस खून को चुना। रावण ने राजा होने का गलत अर्थ समझा, उसे लगा कि राजा वह होता है जो किसी के आगे न झुके, बल्कि सच्चा राजा तो वह होता है जो गलती होने पे झुकना भी जानता हो।
शायद रावण ये भूल गया था कि उसके पिता महर्षि विश्रवा ने उसे एक और बात सिखाई थी, “ज्ञान की सबसे बड़ी शिक्षा है कि मैं कुछ नहीं जानता”। लेकिन रावण ने ज्ञान को विनम्रता के लिए नहीं, अहंकार के लिए इस्तेमाल किया। इसलिए रावण ने माफ़ी को एक कमज़ोरी समझा न की शांति प्रस्ताव।
7. 'रावण का अहंकार' के तीन रूप
(A) ज्ञान का अहंकार ("मुझसे बड़ा कोई नहीं")
मैं ऐसा मानता हूँ कि ज्ञान का अहंकार सबसे खतरनाक होता है क्योंकि जो व्यक्ति खुद को सबसे बड़ा ज्ञानी मानता है, वह कभी भी दूसरों से कुछ नहीं सीखता और जो नहीं सीखता वह बार-बार गलतियाँ करता रहता है। रावण को जन्म से ही ब्राह्मण वंश विरासत में मिला था। उसके पिता विश्रवा, महर्षि थे, उसके दादा पुलस्त्य सप्तऋषिओं में से एक थे और परदादा स्वयं ब्रम्हा जी थे।
रावण को लगता था कि मैंने तो सारे वेद कंठस्थ कर लिए; मुझसे बड़ा विद्वान कौन होगा?; राम तो एक वनवासी है, उसे क्या पता होगा?; विभीषण मुझसे कम जनता है मैं उसकी बात क्यूँ मानू? रावण भूल गया था कि विद्या का सबसे बड़ा फल “विनम्रता” है, लेकिन उसने विद्या को शक्ति बना लिया, सेवा नहीं।
(B) शक्ति का अहंकार ("मुझे कोई नहीं हरा सकता")
शक्ति का अहंकार किसी के लिए भी बहुत घातक होता है क्योंकि यह व्यक्ति को “अजेय” का भ्रम देता है, जबकि हर शक्ति का कोई न कोई अंत जरुर होता है।
रावण ने युद्ध में इंद्र को हराया था तो उसे लगा कि राम तो एक इंसान है, उसे भी हरा दूँगा। मेरे पास चंद्रहास (शिव का आशीर्वाद) है और मैंने तीनों लोक जीत लिए हैं तो अब मुझे कोई नहीं हरा सकता। रावण ने वरदान मंगाते समय मनुष्य को बाहर रखा था और राम इंसान के रूप में थे (भगवान विष्णु के अवतार); जो उसे परास्त करने की पूरी शक्ति रखते थे। रावण का ध्यान एक छोटी से घटना पर भी नहीं गया, कि किस तरह एक वानर (हनुमान) ने पूरी लंका में आग लगा दी और उसकी राक्षस सेना कुछ न भी न कर सकी। अगर श्री राम पूरी सेना के साथ आ गए तो हार निश्चित है।
(C) राजा का अहंकार ("मै किसी के आगे नहीं झुकूँगा")
इतिहास गवाह है कि राजा का अहंकार सबसे खतरनाक होता है, क्योंकि इसमें सिर्फ एक राजा ही नहीं बल्कि पूरी प्रज़ा भी डूबती है। रावण को लगा की, यदि मैंने सीता को लौटा दिया, तो मैं राजा नहीं रहूँगा; मैं कमज़ोर लगूंगा। यह उसकी भूल थी क्योंकि सच्चा राजा तो वही होता है जो अपनी गलती मानकर भी राजा बना रहता है, क्योंकि उसकी प्रजा उसकी विनम्रता को याद रखती है, उसके अहंकार को नहीं।
रावण ने “राजा” शब्द का अर्थ “तानाशाह” समझ लिया था लेकिन इसका असली अर्थ है “जनसेवक”।
8. राम ने अहंकार को माफ़ क्यों नहीं किया ?
(A) अहंकार कोई व्यक्ति नहीं, बीमारी है। (बीमारी को माफ़ नहीं, नष्ट किया जाता है।)
मैं अगर अहंकार की बात करूं तो अहंकार की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है। अहंकार कोई व्यक्ति नहीं, कोई नाम नहीं ओए कोई शरीर नहीं। अहंकार एक मानसिक संक्रमण है। जैसे- कैंसर और कोरोना वायरस।
रावण में अहंकार के जो लक्षण थे वो हैं- “मैं सबसे बड़ा हूँ”; मुझसे गलती नहीं हो सकती”; “मेरे सामने सब झुके” और “जो मैं करूं वही सही है”। राम, रावण से नफरत नहीं करते थे लेकिन उसके अहंकार को दूर करना चाहते थे। इसलिए राम ने युद्ध किया “अहंकार” बीमारी को बाहर निकालने लिए।
(B) रावण को माफ़ कर दिया (आत्मा), 'रावण का अहंकार' को नहीं
यहाँ मैं आत्मा और अहंकार की बात कर रहा हूँ। “आत्मा”, जैसा कि हम जानते हैं कि यह अज़र-अमर, निर्मल और ईश्वर का अंश है और “अहंकार” एक विकृति है, जो आत्मा को ढँक लेती है। विकृति को माफ़ नहीं नष्ट किया जाता है। जब रावण मरा तो उसके शरीर से दिव्य ज्योति (प्रकाश) निकली और ब्रह्मलोक को चली गई अर्थात उसकी आत्मा को मोक्ष मिल गया। राम ने रावण का अंतिम संस्कार विधिपूर्वक करवाया जो किसी दुश्मन के लिए नहीं किया जाता है। ये कार्य किसी सम्मानित व्यक्ति के लिए किया जाता है।
राम ने रावण के परिवार को पूरा सम्मान दिया तथा उसके छोटे भाई विभीषण को लंका का राजा बना दिया। “राम ने रावण को नहीं मारा, उन्होंने ‘रावण का अहंकार’ को मारा। रावण तो बच गया, लेकिन आत्मा के रूप में”।
(C) अगर 'रावण का अहंकार' को माफ़ कर देते, तो गलत संदेश जाता- क्यों?
यहाँ पर राम, रावण के लिए नहीं बल्कि पुरे समाज के सोंच रहे थे। अगर राम, ‘रावण का अहंकार’ को माफ़ कर देते तो लोग समझते अहंकार से कोई नुकसान नहीं होता है और फिर हर कोई अहंकारी बन जाता। इससे धर्म की मृत्यु होती। राम ने सोंचा कि क्षमा तो मैं करूँगा लेकिन न्याय भी मुझे ही करना है और न्याय में अहंकार को नष्ट करना सही है।
अगर हम एक कदम आगे बढ़कर सोंचे तो , यदि रावण को माफ़ कर दिया जाता तो विभीषण भी अहंकारी बन जाता; लंका की प्रजा सोचने लगती कि हमारा राजा अहंकारी होते हुए भी बच गया तो अहंकारी होना कोई बुरी बात नहीं है। अयोध्या में भी यही संदेश जाता कि राम ने अहंकार को माफ़ कर दिया, तो हम भी अपनी गलतियों पर अहंकार कर सकते हैं।
अंत में सारे समाज की भलाई को देखते हुए राम ने रावण का वध किया और पूरे समाज को एक साफ़ संदेश दिया कि हर अहंकारी का आखिरी उपचार मृत्यु ही है।
9. आज के युग में इस कहानी (रावण का अहंकार) की प्रासंगिकता
रावण का अहंकार आज भी जीवित है। रावण सिर्फ त्रेता युग में ही नहीं थे वो आज भी हम सब में किसी न किसी रूप में मौजूद हैं। आईए, इसे हम कुछ बिन्दुओं के माध्यम से समझते हैं-
- आज का मानव जन्म से ही टैलेंटेड है और वह कुछ न कुछ करके अपना जीवयापन करता है। एक समय पश्चात वह किसी अच्छे मुकाम पर पहुँच जाता है और फिर उसमे धीरे-धीरे अहंकार की भावना बढ़ने लगती है। एक समय बाद ऐसा समय आता है कि वह वहीं पहुँच जाता है जहाँ से शुरू किया था।
- आजकल कॉर्पोरेट कल्चर का ज़माना है। जहाँ हर ऑफिस में एक ऐसा बॉस जरुर होता है जिसे लगता है कि पूरे कंपनी में उसके आलावा कोई भी काम नहीं करता।
उदाहरण के लिए, वह हमेशा अपने जूनियर को डिमोटिवेट करता है, लेकिन एक दिन वही जूनियर किसी दूसरी कंपनी का डायरेक्टर बन जाता है और उसका बॉस उसी सोंच के साथ वहीं फंसा रहता है। - आज के ज़माने में तो सबसे ज्यादा अहंकार परिवार में देखने को मिलता है। माता-पिता, पति-पत्नी और भाई-बहन में जरुर कुछ न कुछ अनबन रहता है। तभी तो आज इतने वृद्धा आश्रम खुल गये, तलाक के मामले दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं और बच्चे गलत आदतों में फंस रहे हैं।
- रिश्तों और दोस्ती में तो अहंकार ने अपना घर बना लिया है। बात छोटी सी बहस से शुरू होकर बढ़े अंजाम तक पहुँच जाती है। “मैं नहीं मानूंगा, चाहे कुछ भी हो”; “पहले वो माने, फिर मैं”; “मुझसे गलती नहीं होती, अगर हुई है तो तुम्हारी वजह से”। ये सब कहे जाने वाले कथन बहुत कडवाहट मन में भरते हैं और नतीजा यह होता है कि रिश्ता/दोस्ती टूट जाता है।
मेरा मानना है कि यदि बॉस ये कहे कि “यह आईडिया मेरा नहीं, टीम का है तो पूरी टीम उसके साथ जान लगाकर काम करने के लिए तैयार हो जाएगी”।
परिवार में कोई भी व्यक्ति ये मान ले कि “मुझसे गलती हुई”, तो परिवार टूटने से बच जायेगा।
और दोस्ती में यदि दोस्त यह कह दे कि “मैंने गलत कहा, मुझे माफ़ कर दे”, तो सालों की दोस्ती टूटने से बच जाएगी।
10. निष्कर्ष
अब मैं निष्कर्ष पर पहुँच गया हूँ और अपने आर्टिकल (रावण का अहंकार) को समेटते हुए एक ही बात कहना चाहूँगा कि शक्ति, ज्ञान और सफलता खतरनाक नहीं है, खतरनाक है उसके साथ आने वाला अहंकार। जब तक हम अपनी उपलब्धियों में से “मैं” शब्द को खत्म नहीं करेंगे तब तक अहंकार के चक्र में फंसे रहेंगे।
अगर इंसान अहंकार में जीता है तो वह रावण (रावण का अहंकार) को पुनर्जीवित कर रहा है। हम सभी को राम के मार्गों का अनुसरण करना चाहिए। राम इसलिए भगवान बने क्योंकि उन्होंने अपना “मैं” त्याग दिया था और फिर उन्होंने हर रिश्ते को दिल से निभाया चाहे वह पुत्र का रिश्ता हो; पति का रिश्ता हो; पिता का रिश्ता हो या एक राजा का रिश्ता। आज भी हम उनके द्वारा निभाए गए हर किरदार को देखकर प्रफुल्लित हो उठते हैं। हमें भी अपने जीवन में इसी तरह से हर रिश्ते को निभाना है फिर चाहे वो परिवार का रिश्ता हो या ऑफिस का रिश्ता।
Frequently Asked Questions
1. क्या रावण को ‘विलेन’ कहना उसके साथ अन्याय नहीं है?
Ans) रावण न तो पूरी तरह से विलेन था और न ही हीरो। उसने कुछ काम विलेन वाले किये हैं और कुछ काम हीरो वाले। जैसे- वह चार वेदों का ज्ञाता था लेकिन माता सीता का अपहरण भी किया; शिव का परमभक्त था लेकिन दुसरे की पत्नी पर नज़र भी डाला; महान संगीतज्ञ था लेकिन अपने भाई कुबेर से लंका को छिना; कठोर तपस्वी था लेकिन अहंकार भी बहुत था। मेरे अनुसार, रावण द्वारा किया गया केवल एक कार्य (रावण का अहंकार) ने उसकी छवि को बहुत नुकसान पहुँचाया।
2.अगर रावण इतना ज्ञानी था, तो उसने ‘नीति’ के विरुद्ध जाकर सीता हरण क्यों किया?
Ans) इस प्रश्न के उत्तर के लिए हमें ज्ञान और अहंकार के बीच के फर्क को समझना होगा। रावण को पता था कि पराई स्त्री का अपहरण करना अधर्म है, लेकिन उसने फिर भी किया; रावण को पता था कि राम, भगवान विष्णु के अवतार हैं, फिर भी रावण का अहंकार उनके सामने नहीं झुकने नहीं दिया; और उसे पता था की यदि वह राम से युद्ध करेगा तो मारा जायेगा, लेकिन इसके बाद भी उसने युद्ध किया अर्थात रावण के पास ज्ञान तो था लेकिन विवेक नहीं।
3. क्या रावण आज के ‘सफल परंतु अकेले’ इंसान का प्रतीक है?
Ans) हाँ, ये बात 100% सच है। आज का इंसान सफल तो है लेकिन उसकी स्थिति रावण (रावण का अहंकार) जैसी ही है। उदाहरण के लिए- रावण लंका का राजा था और आज का इंसान किसी बड़ी कंपनी में CEO/बिजनेसमैन है; रावण के पास अनगिनत राक्षस सेना थी और आज के इंसान के पास हजारों कर्मचारी/follower हैं; रावण शिव का भक्त व वेदों का ज्ञाता था और आज के इंसान के पास डिग्रियाँ, स्किल्स व अनुभव है; रावण अपने भाई से दूर था और आज का इंसान अपने परिवार से दूर है।
4. अगर रावण को पछतावा हुआ, तो क्या उसे मोक्ष मिला?
Ans) हाँ। जब राम का ब्रह्मास्त्र उसकी ओर आया, तो उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने राम की स्तुति की और कहा “हे राम! आपने मुझे अहंकार से मुक्त किया और मुझे मोक्ष दिया”।