बैद्यनाथ धाम (देवघर) : जहाँ रावण की तपस्या ने शिव को ‘वैद्य’ बना दिया | (Part 9)
Hello Friends, आज मैं पार्ट 9 में “बैद्यनाथ धाम ज्योतिर्लिंग” का जिक्र करने जा रहा हूँ | इसे “देवघर” के नाम से भी जाना जाता है | इस लेख को लिखने से पहले मैंने एक काम किया – मैंने अपने घर से निकलकर देवघर की यात्रा की। यह आर्टिकल उसी यात्रा का परिणाम है। यहाँ जो कुछ भी लिखा गया है, वह मेरी अपनी आँखों देखा, कानों सुना, और उन पुराने ग्रंथों पर आधारित है जिन्हें मैंने पढ़ा। इस लेख का उद्देश्य सिर्फ जानकारी देना नहीं है – बल्कि उस अनुभव को साझा करना है जो एक साधारण यात्री को एक अलौकिक धाम में मिलता है।
Table of Contents
Toggleयह आर्टिकल “बैद्यनाथ धाम” के उसी स्वरूप को प्रस्तुत करता है – जो एक ज्योतिर्लिंग है, जो एक शक्तिपीठ है, और जो करोड़ों भक्तों की आस्था का केन्द्र है। चलिये फिर इस यात्रा की शुरुआत करते हैं –
1. ‘देवघर’ (Baidyanath Dham) नाम कैसे पड़ा ?
संस्कृत में ‘देवघर’ शब्द का अर्थ है – ‘देवताओं का घर’। और सचमुच, यह नाम इस नगरी पर सटीक बैठता है। यहाँ एक नहीं, बाईस मंदिर हैं। मुख्य मंदिर में भगवान बैद्यनाथ विराजमान हैं, जो बारह ज्योतिर्लिंगों में पाँचवें स्थान पर आते हैं।
लेकिन यह शहर सिर्फ मंदिरों का शहर नहीं है। यह उस आस्था का केन्द्र है जो हजारों वर्षों से अटूट है। यहाँ हर साल सावन के महीने में श्रावणी मेला लगता है, जहाँ लाखों की संख्या में भक्त आते हैं। वे ‘बोल बम’ का नारा लगाते हुए, काँवड़ कंधे पर रखे, सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर लगभग 105 किलोमीटर की पैदल यात्रा करते हैं। यह दृश्य देखना मानो किसी महाकाव्य का जीवंत होना है।
मैं देवघर पहली बार सावन के महीने में ही गया था। ट्रेन से उतरते ही मेरे कानों ने वह ध्वनि सुनी – “बोल बम! हर-हर महादेव!”। यह ध्वनि हवा में घुली हुई थी। हर तरफ भगवा रंग था। हर चेहरे पर एक अलग तरह की चमक थी। मुझे लगा – यह कोई साधारण तीर्थ स्थल नहीं है। यह कोई ऐसी जगह है जहाँ आस्था ने एक अलग रूप धारण कर लिया है।
2. प्राचीन नाम : ‘हरितकी वन’ और ‘केतकी वन’
शिव पुराण में इस स्थान को ‘हरितकी वन’ या ‘केतकी वन’ कहा गया है। यह वह स्थान था जहाँ घने जंगल थे, जहाँ ऋषि-मुनि तपस्या करते थे, और जहाँ प्रकृति अपने पूरे वैभव में थी। आज का देवघर एक व्यस्त शहर है, लेकिन यदि आप इसके आसपास के क्षेत्रों में जाएँ, तो आपको वह हरियाली, वह शांति, और वह वातावरण अब भी मिल जाएगा।
एक स्थानीय बुजुर्ग ने मुझे बताया – “पहले यहाँ इतने घने जंगल थे कि दिन में भी अँधेरा हो जाता था। साधु-संत यहीं रहते थे। फिर धीरे-धीरे लोग आने लगे, मंदिर बना, और यह शहर बस गया। पर आज भी, यदि तुम सुबह-सुबह नंदन पहाड़ पर चढ़ जाओ, तो लगेगा कि समय रुक गया है।”
3. ऐतिहासिकता : आठवीं शताब्दी से लेकर आज तक
बैद्यनाथ मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है। इसका उल्लेख आठवीं शताब्दी ईस्वी में मिलता है, जब गुप्त वंश के अंतिम राजा आदित्यसेन गुप्त के शासनकाल में इस मंदिर का अस्तित्व था।
बाद में, मुगल काल के दौरान, आमेर के शासक राजा मान सिंह ने यहाँ एक बड़ा तालाब बनवाया, जिसे आज ‘मानसरोवर’ के नाम से जाना जाता है।
मंदिर के निर्माण की बात करें तो कहा जाता है कि इसका निर्माण राजा पूरन मल ने करवाया था । हालाँकि, कुछ मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण विश्वकर्मा ने स्वयं किया था । यह एक ऐसा मंदिर है जिसका शिखर 72 फीट ऊँचा है। यह पूर्व की ओर मुख किए हुए है, और इसके शीर्ष पर तीन स्वर्ण कलश हैं, जिनके बीच में एक ‘पंचशूल’ (पाँच चाकू वाला त्रिशूल) स्थापित है।
मैं जब पहली बार मंदिर के सामने खड़ा हुआ, तो मैंने उस शिखर को देखा। सूरज की किरणें उस पर पड़ रही थीं। वह सोने की तरह चमक रहा था। मैंने सोचा – यह वही शिखर है जिसे सैकड़ों वर्षों से लाखों लोगों ने देखा है, और आज मैं देख रहा हूँ। यह अनुभव किसी तीर्थयात्रा से कम नहीं था।
4. बैद्यनाथ की पौराणिक कथा – रावण, शिव और अमर लिंग
बैद्यनाथ धाम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका संबंध रावण से है। और यहाँ का रावण वह राक्षस नहीं है जिसका पुतला दशहरे पर जलाया जाता है – यहाँ का रावण एक महान विद्वान, शिवभक्त, और तपस्वी है। यह बात मुझे सबसे अधिक आकर्षित करती है।
(A) रावण की तपस्या – जब दस सिर भी कम पड़ गए
कथा कुछ यूँ है। रावण, लंका का राजा, अत्यंत शक्तिशाली था। उसने तीनों लोकों को जीत लिया था। उसने देवताओं, यक्षों, गंधर्वों को बंदी बना लिया था। पर उसे एक चिंता थी – उसकी लंका अभी भी अमर नहीं थी। वह चाहता था कि भगवान शिव स्वयं लंका में निवास करें, ताकि कोई भी शक्ति उसका विनाश न कर सके।
इसलिए उसने हिमालय की ओर प्रस्थान किया। वहाँ उसने घोर तपस्या शुरू कर दी। कहते हैं कि उसने अपने दस सिरों को एक-एक करके शिवलिंग पर चढ़ाना शुरू कर दिया । नौ सिर चढ़ा दिए। जब वह दसवाँ सिर काटने जा रहा था, तो भगवान शिव प्रकट हुए ।
शिव ने कहा – “रावण, मैं प्रसन्न हूँ। वरदान माँग।”
रावण ने कहा – “प्रभु, मुझे अपना ‘कामना लिंग’ दीजिए। मैं इसे लंका ले जाकर स्थापित करूँगा।”
शिव ने उसे वह लिंग दे दिया, पर एक शर्त पर – “यह लिंग जहाँ भी ज़मीन पर रख दिया जाएगा, वहीं स्थापित हो जाएगा। इसे दोबारा नहीं उठाया जा सकेगा।”
(B) विष्णु की चाल – जब ग्वाला बनकर आए भगवान
रावण लिंग लेकर अपनी पुष्पक विमान से लंका की ओर चल दिया । यह देखकर देवता चिंतित हो गए। यदि यह लिंग लंका पहुँच गया, तो रावण अजेय हो जाएगा। उसके अत्याचार और बढ़ जाएँगे।
तब भगवान विष्णु ने एक योजना बनाई। उन्होंने जल के देवता वरुण को रावण के पेट में प्रवेश करने का आदेश दिया । रावण को अचानक मल-त्याग की तीव्र इच्छा हुई। वह अपनी विमान से नीचे उतरा।
उसे एक ग्वाला (चरवाहा) लड़का दिखा। यह कोई और नहीं, बल्कि भगवान विष्णु थे, जिन्होंने यह रूप धारण किया था । रावण ने उस ग्वाले से कहा – “बच्चा, यह लिंग थाम ले। मैं अभी आया। पर इसे ज़मीन पर मत रखना।”
रावण चला गया। ग्वाले ने लिंग थाम लिया। कुछ देर बाद ग्वाले ने सोचा – “यह आदमी तो बहुत देर कर रहा है। मैं थक गया। चलो, इस लिंग को नीचे रख देता हूँ।”
उसने लिंग को ज़मीन पर रख दिया। और ठीक उसी क्षण, वह लिंग वहीं स्थापित हो गया ।
जब रावण लौटा, तो उसने देखा कि लिंग ज़मीन पर है, और ग्वाला कहीं नहीं है। रावण समझ गया कि यह कोई दैवी चाल थी। उसने क्रोध में आकर लिंग को उखाड़ने का प्रयास किया – पर असफल रहा । इतना क्रोध आया कि उसने अपने अंगूठे से लिंग पर प्रहार किया। कहते हैं कि उस प्रहार के कारण लिंग के बीच का भाग थोड़ा विकृत हो गया |
लिंग वहीं रह गया – जहाँ आज बैद्यनाथ धाम स्थित है।
(C) ‘वैद्यनाथ’ नाम की व्युत्पत्ति
रावण की तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने उसे दर्शन दिए। रावण ने अपने दस सिर काटकर चढ़ा दिए थे, जिससे वह घायल हो गया था। शिव ने स्वयं उसका इलाज किया ।
संस्कृत में ‘वैद्य’ का अर्थ होता है – ‘चिकित्सक’। इसलिए शिव ने यहाँ ‘वैद्यनाथ’ नाम धारण किया। वह वह चिकित्सक हैं जो अपने भक्तों के रोगों को दूर करते हैं।
मत्स्य पुराण में इस स्थान को ‘आरोग्य बैद्यनाथिती’ कहा गया है – अर्थात वह पवित्र स्थान जहाँ शक्ति निवास करती है और शिव को असाध्य रोगों से मुक्ति दिलाने में सहायता करती है |
(D) देवघर में रावण की प्रतिष्ठा – कोई दहन नहीं, केवल सम्मान
देवघर की एक विशेषता है जो पूरे भारत में दुर्लभ है। यहाँ दशहरे के दिन रावण का पुतला नहीं जलाया जाता ।
हाँ, आपने सही पढ़ा। देश के बाकी हिस्सों में जहाँ रावण दहन का आयोजन होता है, वहीं देवघर में रावण को एक महान विद्वान और शिवभक्त के रूप में सम्मान दिया जाता है ।
एक स्थानीय पुजारी, दुर्लभ मिश्रा, ने मुझसे कहा – “हम रावण को राक्षस नहीं मानते। वह एक महान शासक था, एक असाधारण विद्वान था, और सबसे बढ़कर, वह भगवान शिव का परम भक्त था। उसी की तपस्या के कारण यह ज्योतिर्लिंग यहाँ स्थापित हुआ। हम उसका अपमान कैसे कर सकते हैं ?”
यहाँ तक कि इस मंदिर को ‘रावणेश्वर बैद्यनाथ’ भी कहा जाता है ।
यह सुनकर मैं स्तब्ध रह गया। मैंने सोचा – कितनी अद्भुत है यह परंपरा! जहाँ पूरा देश रावण का दहन करता है, वहीं देवघर उसे नमन करता है। सचमुच, भारत की विविधता अद्भुत है।
5. ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ – एक अद्वितीय संयोग
बैद्यनाथ धाम की एक और विशेषता यह है कि यह ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ दोनों है |
(A) शक्तिपीठ की मान्यता
कथा के अनुसार, दक्ष प्रजापति ने अपनी पुत्री सती का विवाह शिव से किया, पर वह शिव से प्रसन्न नहीं था। एक बार उसने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उसने शिव को आमंत्रित नहीं किया। सती वहाँ पहुँच गईं। दक्ष ने शिव का अपमान किया। सती इस अपमान को सहन नहीं कर सकीं और उन्होंने यज्ञ की अग्नि में कूदकर प्राण त्याग दिए।
शिव को जब यह पता चला, तो उन्होंने सती के शरीर को लेकर तांडव नृत्य प्रारंभ किया। यह देखकर देवता घबरा गए। भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए ।
जहाँ-जहाँ सती के शरीर के अंग गिरे, वहाँ-वहाँ शक्तिपीठ स्थापित हो गए। कहा जाता है कि सती का हृदय यहीं, बैद्यनाथ धाम में गिरा था ।
इसलिए यह स्थान ‘चिताभूमि’ या ‘चिदाभूमि’ भी कहलाता है – अर्थात वह भूमि जहाँ सती का हृदय (चित्त) गिरा । आदि शंकराचार्य ने अपने द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में इस स्थान का उल्लेख ‘प्रज्वलिका निधान’ (शवदाह स्थली) के रूप में किया है |
(B) शिव-शक्ति का अभिन्न मिलन
बैद्यनाथ धाम में यह अद्भुत संयोग है – एक ओर ज्योतिर्लिंग है, जो शिव का स्वरूप है। दूसरी ओर शक्तिपीठ है, जो शक्ति (पार्वती) का स्वरूप है।
मुख्य मंदिर के ठीक बगल में माता पार्वती का मंदिर है। इन दोनों मंदिरों को लाल धागों से बाँधा गया है। यह धागे शिव और शक्ति के अटूट मिलन का प्रतीक हैं ।
मैं जब उस मंदिर में गया, तो मैंने उन धागों को देखा। वे मोटे थे, लाल थे। कहते हैं कि यह परंपरा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है। मैंने सोचा – यह कितना सुंदर प्रतीक है। एक ही स्थान पर शिव भी हैं और शक्ति भी। यहाँ आकर भक्त को दोनों का आशीर्वाद मिलता है।
6. मंदिर की वास्तुकला और संरचना
(A) शिखर और कलश
बैद्यनाथ मंदिर का शिखर 72 फीट ऊँचा है । यह पूर्व की ओर मुख किए हुए है। मंदिर पिरामिड आकार का है ।
शिखर के शीर्ष पर तीन स्वर्ण कलश स्थापित हैं। ये कलश गिद्धौर के महाराजा ने भेंट किए थे । इन कलशों के ठीक बीच में एक ‘पंचशूल’ है – जो पाँच चाकू वाला त्रिशूर है ।
और सबसे ऊपर है – चन्द्रकान्त मणि । यह एक आठ-पंखुड़ियों वाला कमल के आकार का रत्न है। कहते हैं कि यह मणि कुबेर (धन के देवता) के पास थी, जिसे रावण ने उनसे छीन लिया था । रावण ने इसे भगवान शिव को अर्पित कर दिया, और तब से यह मणि इस मंदिर के शिखर पर विराजमान है।
(B) मंदिर परिसर – 22 मंदिरों का संकुल
बैद्यनाथ धाम केवल एक मंदिर नहीं है। यह 22 मंदिरों का एक विशाल परिसर है । यहाँ मुख्य मंदिर के अलावा, कई अन्य देवी-देवताओं के मंदिर हैं:
माता पार्वती मंदिर – यह मुख्य मंदिर से लाल धागों से बंधा हुआ है।
माता काली मंदिर
माता गायत्री मंदिर
भैरव मंदिर
लक्ष्मी-नारायण मंदिर
यहाँ का वातावरण अत्यंत शांत और भक्तिपूर्ण है। हर मंदिर की अपनी एक अलग ऊर्जा है। मैंने हर मंदिर में जाकर प्रणाम किया। लगा जैसे मैं किसी दिव्य लोक में हूँ।
(C) शिवगंगा तालाब
मंदिर से लगभग 200 मीटर की दूरी पर शिवगंगा तालाब स्थित है । इस तालाब का निर्माण भी रावण ने करवाया था । ऐसा माना जाता है कि इस तालाब में स्नान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है, और भक्त के सारे पाप धुल जाते हैं।
मैं भी इस तालाब के किनारे बैठा। पानी साफ था। चारों ओर शांति थी। मैंने सोचा – रावण ने इतना बड़ा तालाब क्यों बनवाया ? हो सकता है कि यह उसकी तपस्या का ही एक अंग था। स्नान से पहले वह यहाँ आता होगा।
7. श्रावणी मेला – आस्था की वह यात्रा जो हिला देती है
बैद्यनाथ धाम की सबसे बड़ी विशेषता है यहाँ का श्रावणी मेला। यह मेला हर साल सावन के महीने (जुलाई-अगस्त) में लगता है |
(A) सुल्तानगंज से देवघर तक – 105 किलोमीटर का पैदल सफर
इस मेले की सबसे खास बात यह है कि भक्त सुल्तानगंज (बिहार) से गंगाजल लेकर लगभग 105 किलोमीटर पैदल चलकर देवघर पहुँचते हैं ।
मैंने इस यात्रा को अपनी आँखों से नहीं देखा है, लेकिन मैंने उन भक्तों को देखा है जो इस यात्रा को पूरा करके आए थे। उनके पाँवों में छाले थे। उनके कंधों पर काँवड़ के निशान थे। उनके चेहरे पर थकान थी – पर उनकी आँखों में एक अलग तरह की चमक थी।
एक काँवड़िए ने मुझसे कहा – “भाई, हमारे लिए यह यात्रा सिर्फ यात्रा नहीं है। यह तपस्या है। बोल-बम कहते हुए, गंगाजल कंधे पर रखे, जब हम चलते हैं, तो हमें लगता है कि शिव हमारे साथ चल रहे हैं। जब हम देवघर पहुँचते हैं और वह जल बाबा बैद्यनाथ पर चढ़ाते हैं, तो हमें लगता है – हमने कुछ पा लिया।”
यह सुनकर मैं भावुक हो गया। मैंने सोचा – आस्था की इससे बड़ी अभिव्यक्ति क्या हो सकती है ? सौ किलोमीटर पैदल चलना, पाँवों में छाले पड़ना, गर्मी-बारिश सहना – सिर्फ एक मुट्ठी जल शिव पर चढ़ाने के लिए। सचमुच, यह श्रद्धा है।
(B) ‘तिलक’ और ‘सलामी जल’ की परंपरा
श्रावणी मेले के अलावा, यहाँ एक और अद्भुत परंपरा है – बसंत पंचमी के दिन ‘तिलक’ और ‘सलामी जल’ की परंपरा ।
मिथिलांचल (समस्तीपुर, दरभंगा, मधुबनी आदि) के हजारों भक्त इस दिन देवघर पहुँचते हैं। वे पैदल चलकर सुल्तानगंज से गंगाजल लाते हैं। फिर वे बाबा बैद्यनाथ को तिलक लगाते हैं, और ‘सलामी जल’ अर्पित करते हैं।
इस दिन बाबा बैद्यनाथ के मंदिर के दरवाजे सुबह 3:05 बजे ही खोल दिए जाते हैं । लाखों की संख्या में भक्त आते हैं। पूरा देवघर ‘बोल-बम’ और ‘हर-हर महादेव’ के नारों से गूँज उठता है।
मैंने इस अवसर को देखा है। यह दृश्य मानो किसी महाभारत का कोई दृश्य हो। चारों ओर केसरिया रंग। हर तरफ भक्तों की भीड़। घंटों लाइन में लगे रहने के बाद भी किसी के चेहरे पर शिकन नहीं। सबके चेहरे पर एक ही भाव – शिवमयता।
8. पूजा-अर्चना और रीति-रिवाज
(A) दिनचर्या और समय
बैद्यनाथ मंदिर की दिनचर्या नियत है। यहाँ के पूजा-अर्चना का एक विशेष तरीका है।
| समय | पूजा का नाम | विवरण |
|---|---|---|
| सुबह 4:00 | मंगला आरती | मंदिर के द्वार खुलते हैं। मुख्य पुजारी षोडशोपचार पूजा करते हैं। इसे ‘सरकारी पूजा’ भी कहा जाता है । |
| सुबह 5:30 से | सामान्य दर्शन | भक्तों के लिए दर्शन और जलाभिषेक शुरू हो जाता है। |
| दोपहर 3:30 | मध्याह्न समापन | मंदिर के द्वार दोपहर के लिए बंद कर दिए जाते हैं। |
| शाम 6:00 | संध्या पूजा | द्वार पुनः खोले जाते हैं। शृंगार पूजा होती है, जहाँ लिंग को वस्त्र, आभूषण और फूलों से सजाया जाता है । |
| रात 9:00 | शयन आरती | मंदिर बंद करने से पहले की अंतिम पूजा। |
सावन के महीने में यह समय बढ़ा दिया जाता है। लाखों भक्तों के आने के कारण मंदिर देर रात तक खुला रहता है।
(B) जलाभिषेक – भक्त स्वयं चढ़ाते हैं जल
बैद्यनाथ की एक विशेषता यह है कि यहाँ भक्त स्वयं जलाभिषेक कर सकते हैं । किसी अन्य ज्योतिर्लिंग में ऐसा नहीं होता। सोमनाथ हो, महाकाल हो, या रामेश्वरम – वहाँ पुजारी ही अभिषेक करते हैं। पर बैद्यनाथ में भक्त अपने हाथों से लिंग पर जल चढ़ा सकते हैं।
यह बहुत बड़ी बात है। मैं जब गर्भगृह में पहुँचा, तो मैंने अपने हाथों से लिंग पर जल चढ़ाया। वह लिंग लगभग 5 इंच व्यास का है । वह चिकना है, चमकदार है। जब मैंने उस पर जल चढ़ाया, तो मुझे एक अद्भुत शांति का अनुभव हुआ। मानो शिव साक्षात् मेरे सामने हों।
(C) प्रसाद – देवघर की मशहूर ‘पेड़ा’
देवघर की सबसे प्रसिद्ध मिठाई है – पेड़ा । यह दूध से बनी एक खास मिठाई होती है। इसका स्वाद कहीं और नहीं मिलता।
बाबा बैद्यनाथ के मंदिर में भोग और प्रसाद के रूप में यही पेड़ा चढ़ाया जाता है। मैंने भी एक डिब्बा प्रसाद के रूप में खरीदा। वह पेड़ा इतना मीठा था कि मुँह में घुल जाता था। पर उससे भी अधिक मीठा था – वह एहसास कि मैंने बाबा का प्रसाद ग्रहण किया है।
9. कैसे पहुँचें बैद्यनाथ धाम ?
(A) रेल मार्ग
बैद्यनाथ धाम का निकटतम रेलवे स्टेशन जसीडीह जंक्शन है । यह देवघर से लगभग 6-7 किलोमीटर दूर है ।
जसीडीह हावड़ा-दिल्ली ब्रॉडगेज लाइन पर स्थित है । कोलकाता, दिल्ली, मुंबई, पटना, वाराणसी, भुवनेश्वर से यहाँ सीधी ट्रेनें मिल जाती हैं ।
जसीडीह से देवघर पहुँचने के लिए आपको बस या टैक्सी मिल जाएगी। लगभग 20-30 मिनट का सफर है।
(B) सड़क मार्ग
देवघर सड़क मार्ग से भी अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। झारखंड राज्य परिवहन निगम और पश्चिम बंगाल राज्य परिवहन निगम की नियमित बसें यहाँ चलती हैं ।
दूरी कुछ प्रमुख शहरों से :
रांची से : लगभग 300 किलोमीटर |
पटना से : लगभग 272 किलोमीटर |
कोलकाता से : लगभग 280 किलोमीटर |
दुमका से : लगभग 70 किलोमीटर |
(C) हवाई मार्ग
देवघर का सबसे निकटतम हवाई अड्डा देवघर एयरपोर्ट है ।
दूसरा विकल्प – पटना का लोकनायक जयप्रकाश एयरपोर्ट (लगभग 272 किलोमीटर), रांची एयरपोर्ट (लगभग 300 किलोमीटर), या कोलकाता एयरपोर्ट (लगभग 280 किलोमीटर) । वहाँ से ट्रेन या बस से देवघर पहुँच सकते हैं।
10. देवघर में और क्या देखें ?
बैद्यनाथ धाम के दर्शन के बाद, आप देवघर के कुछ अन्य स्थान भी देख सकते हैं :
(A) नंदन पहाड़
यह एक छोटी पहाड़ी है जो देवघर से 3 किलोमीटर दूर है । इस पहाड़ी पर नंदी जी का मंदिर है। यहाँ से पूरे देवघर का सुंदर दृश्य दिखता है। सूर्योदय और सूर्यास्त का दृश्य तो मनमोहक होता है |
(B) त्रिकुट पहाड़
यह देवघर का एक और प्रसिद्ध पहाड़ी स्थल है । तीन चोटियों के कारण इसका नाम ‘त्रिकुट’ पड़ा। यहाँ ट्रेकिंग की जा सकती है, और प्रकृति का आनंद लिया जा सकता है।
(C) तापोवन गुफाएँ
यह कहते हैं कि महाभारत काल में पांडवों ने यहाँ कुछ समय बिताया था । यहाँ प्राकृतिक गुफाएँ हैं, जहाँ आप घूम सकते हैं। शांति और एकांत चाहने वालों के लिए यह अच्छा स्थान है।
(D) नौलखा मंदिर
यह एक भव्य मंदिर है जिसे ‘नौ लाख रुपये’ में बनवाया गया था – इसलिए इसका नाम ‘नौलखा’ पड़ा। यह लाल पत्थर से बना एक विशाल मंदिर है |
(E) सत्संग आश्रम (श्री श्री आनंदमूर्ति)
यह ठाकुर अनुकूलचंद्र के अनुयायियों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान है । यहाँ का वातावरण अत्यंत शांत है।
11. मेरी अपनी डायरी – देवघर में मैंने क्या अनुभव किया
अब आपको अपने अनुभवों के बारे में बताता हूँ। यह सब मैंने लिख रखा है, और आज आपके सामने रख रहा हूँ।
(A) दिन 1 (देवघर पहुँचते हुए)
“सुबह 7 बजे। जसीडीह स्टेशन पर उतरा। तुरंत ही एक टैक्सी मिल गई। ड्राइवर बोला – ‘बाबा के दर्शन करने जा रहे हो ? बोल-बम।’ मैंने कहा – ‘बम-बम भोले।’ वह हँसा।”
“देवघर में पहुँचते ही पता चला कि आज सावन का पहला सोमवार है। लाइन किलोमीटरों में थी। पर मैं उस लाइन में खड़ा हो गया। घंटों लगे, पर जब मैंने बाबा का दर्शन किया, तो सारी थकान उतर गई।”
(B) दिन 2 (मंदिर परिसर में)
“आज पूरा दिन मंदिर परिसर में बिताया। सुबह जलाभिषेक किया। अपने हाथों से बाबा पर जल चढ़ाया। लिंग बिल्कुल ठंडा था – पर मैं गर्म हो रहा था। भीतर कुछ जल रहा था।”
“शाम को माता पार्वती मंदिर गया। वह लाल धागे देखे। मैंने सोचा – कितना सुंदर है यह! शिव और शक्ति का मिलन। दो अलग मंदिर, पर एक धागे से बंधे। यही तो हमारी संस्कृति है – एकता में विविधता, और विविधता में एकता।”
(C) दिन 3 (विदाई)
“आज देवघर छोड़ना था। सुबह-सुबह फिर से मंदिर गया। एक अंतिम दर्शन किए। बाबा से प्रार्थना की – ‘बस इतना देना कि मुझे अपने रास्ते पर चलने की शक्ति मिले। बाकी तुम जानो।’”
“शाम को ट्रेन पकड़ी। लौटते समय भी कानों में वह ध्वनि गूँज रही थी – ‘बोल-बम! बोल-बम! हर-हर महादेव!’”
12. बैद्यनाथ धाम ने मुझे क्या सिखाया ?
तीन दिन देवघर में बिताने के बाद, मैंने बहुत कुछ सीखा।
(A) आस्था कोई प्रदर्शन नहीं, तपस्या है |
मैंने वहाँ लाखों लोगों को देखा। वे गर्मी में, बारिश में, पैदल चलकर आए थे। उनके पाँवों में छाले थे। उनके चेहरे पर थकान थी। पर उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। मैंने सोचा – यह है असली आस्था। कोई प्रदर्शन नहीं। कोई नखरा नहीं। बस एक सरल श्रद्धा – शिव मेरी रक्षा करेंगे।
(B) रावण को नमन – हर कहानी के दो पहलू होते हैं |
मैंने सीखा कि हर कहानी के दो पहलू होते हैं। रावण को पूरा देश राक्षस मानता है, पर देवघर उसे एक महान शिवभक्त और विद्वान के रूप में सम्मान देता है। हम हमेशा एक पहलू देखते हैं। दूसरा पहलू शायद उतना ही सत्य है।
(C) शिव का नाम ही सबसे बड़ा रोगनाशक है |
बैद्यनाथ का अर्थ है – ‘वैद्यों के नाथ’, चिकित्सकों के भी चिकित्सक। मैंने वहाँ बहुत से लोगों को देखा जो असाध्य रोगों से पीड़ित थे, और बस शिव से प्रार्थना कर रहे थे। उनमें से कितने ठीक हुए, यह तो नहीं पता। पर जो विश्वास उनके चेहरे पर था, वह देखते ही बनता था।
मत्स्य पुराण ने सही कहा है – यह स्थान ‘आरोग्य बैद्यनाथिती’ है, जहाँ शक्ति स्वयं शिव के साथ रोगों को दूर करने में सहायता करती है
(D) सच्ची भक्ति का अर्थ है – अपने ‘मैं’ को जलाना |
रावण ने अपने दस सिर काटकर शिव को चढ़ा दिए थे। यह सिर सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि अहंकार के प्रतीक थे। रावण का अहंकार उसे राक्षस बना रहा था। पर जब वह शिव के सामने झुका, तो वह एक भक्त बन गया।
हम भी अपने अहंकार को जलाकर ही सच्ची भक्ति पा सकते हैं।
13. निष्कर्ष
बैद्यनाथ धाम केवल एक मंदिर नहीं है। यह एक जीवंत श्रद्धा का केन्द्र है। यहाँ का हर पत्थर, हर दीया, हर ‘बोल-बम’ की ध्वनि – सब कुछ बताता है कि शिव यहाँ विराजमान हैं।
इस धाम के दर्शन करने से पहले मैं सोचता था – ज्योतिर्लिंग क्या होते हैं ? शिव क्या हैं ? आस्था क्या है ?
बैद्यनाथ से लौटने के बाद मैं जानता हूँ – ज्योतिर्लिंग वह स्थान हैं जहाँ शिव साक्षात् प्रकट हुए थे। शिव वह शक्ति हैं जो हमारे भीतर है, जो हमें ठीक कर सकती है, जो हमें मुक्ति दे सकती है। और आस्था – वह विश्वास है कि इस शक्ति को पाने के लिए हमें बस उसके सामने झुकना है, उसे स्वीकार करना है, और उसके नाम में लीन हो जाना है।
बैद्यनाथ ने मुझे यही सिखाया।
यदि आप कभी देवघर जाएँ, तो ये काम अवश्य करना :
स्वयं जलाभिषेक करना – अपने हाथों से बाबा पर जल चढ़ाना।
शिवगंगा तालाब में स्नान करना – या कम से कम उसके किनारे बैठकर कुछ पल बिताना।
माता पार्वती मंदिर जाना – वह लाल धागे देखना, और शिव-शक्ति के अटूट मिलन का अनुभव करना।
बोल-बम के नारे में शामिल होना – कुछ देर के लिए ही सही, अपने आप को उस ऊर्जा में समर्पित कर देना।
देवघर का मशहूर पेड़ा खाना – और उसे बाबा का प्रसाद मानकर ग्रहण करना।
‘बोल-बम! हर-हर महादेव!’
जय श्री बैद्यनाथ!
Frequently Asked Questions (FAQ)
प्रश्न 1: बैद्यनाथ धाम (Baidyanath Dham) कहाँ स्थित है ?
उत्तर : बैद्यनाथ धाम झारखंड राज्य के देवघर जिले में स्थित है। यह शहर ‘देवघर’ के नाम से जाना जाता है, जिसका अर्थ है ‘देवताओं का घर’।
प्रश्न 2: बैद्यनाथ धाम (Baidyanath dham) किस लिए प्रसिद्ध है ?
उत्तर : बैद्यनाथ धाम दो कारणों से अद्वितीय है:
यह बारह ज्योतिर्लिंगों में पाँचवाँ ज्योतिर्लिंग है |
यह 51 शक्तिपीठों में से एक है (यहाँ माता सती का हृदय गिरा था) |
यह एकमात्र ऐसा तीर्थ है जहाँ शिव और शक्ति दोनों एक साथ विराजमान हैं |
देश का कोई अन्य ज्योतिर्लिंग शक्तिपीठ नहीं है। यह अद्वितीय संयोग केवल देवघर में ही देखने को मिलता है।
प्रश्न 3: बैद्यनाथ और बैजनाथ में क्या अंतर है ?
उत्तर : यह प्रश्न बहुत बार पूछा जाता है, इसलिए ध्यान से समझ लीजिए :
| बैद्यनाथ (देवघर) | बैजनाथ (हिमाचल) |
|---|---|
| झारखंड के देवघर में स्थित | हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा घाटी में स्थित |
| बारह ज्योतिर्लिंगों में गिना जाता है | यह भी एक ज्योतिर्लिंग है (हिमाचल वाला) |
| ‘वैद्यनाथ’ नाम का अर्थ – ‘वैद्यों के नाथ’ | ‘बैजनाथ’ नाम का अर्थ – ‘वैद्यों के नाथ’ (ही) पर उच्चारण भिन्न |
| रावण की तपस्या से संबंधित | दक्ष यज्ञ और सती की कथा से अधिक संबंधित |
सरल भाषा में : दोनों अलग-अलग स्थानों पर स्थित अलग-अलग ज्योतिर्लिंग हैं। देवघर वाले को ‘बैद्यनाथ’ कहें, हिमाचल वाले को ‘बैजनाथ’। पर दोनों की महिमा अपार है।
प्रश्न 4: बैद्यनाथ धाम (Baidyanath dham) का दूसरा नाम क्या है ?
उत्तर : इस धाम के कई नाम हैं :
बाबा बैद्यनाथ (स्थानीय लोग प्यार से यही कहते हैं) |
रावणेश्वर बैद्यनाथ (क्योंकि रावण ने इसकी स्थापना की थी) |
चिताभूमि या चिदाभूमि (यहाँ माता सती का हृदय गिरा था) |
हरितकी वन या केतकी वन (प्राचीन नाम, शिव पुराण के अनुसार) |
प्रश्न 5: देवघर कैसे पहुँचें ?
उत्तर : तीन मार्ग हैं :
रेल मार्ग (सबसे सुविधाजनक) :
निकटतम रेलवे स्टेशन: जसीडीह जंक्शन (6-7 किमी दूर) |
यह हावड़ा-दिल्ली ब्रॉडगेज लाइन पर स्थित है |
कोलकाता, दिल्ली, मुंबई, पटना, वाराणसी, भुवनेश्वर से सीधी ट्रेनें |
जसीडीह से देवघर के लिए बस/टैक्सी (20-30 मिनट) |
सड़क मार्ग :
झारखंड और पश्चिम बंगाल राज्य परिवहन की बसें चलती हैं |
रांची से : लगभग 300 किमी |
पटना से : लगभग 272 किमी |
कोलकाता से : लगभग 280 किमी |
दुमका से : लगभग 70 किमी |
हवाई मार्ग :
निकटतम हवाई अड्डा : देवघर एयरपोर्ट (नया बना है) |
अन्य विकल्प : पटना, रांची, या कोलकाता हवाई अड्डे से आगे की यात्रा |
प्रश्न 6: देवघर कब जाना चाहिए? सबसे अच्छा समय क्या है ?
उत्तर : यह इस पर निर्भर करता है कि आप क्या चाहते हैं :
| समय | स्थिति | किसके लिए उपयुक्त |
|---|---|---|
| सावन (जुलाई-अगस्त) | सबसे अधिक भीड़ (लाखों भक्त), बारिश की संभावना | जो वास्तविक श्रावणी मेले का अनुभव चाहते हैं, जो भक्ति के उत्साह में डूबना चाहते हैं |
| अक्टूबर-मार्च | मौसम सुहावना, भीड़ सामान्य | जो शांति से दर्शन करना चाहते हैं, परिवार के साथ यात्रा करने वाले |
| अप्रैल-जून | गर्मी बहुत अधिक (40°C+), भीड़ कम | जो गर्मी सह सकते हैं, और कम भीड़ में दर्शन चाहते हैं |
मेरी सलाह : पहली बार जा रहे हैं तो अक्टूबर या नवंबर में जाएँ। मौसम सुहावना होगा, भीड़ इतनी नहीं होगी कि परेशानी हो, और दर्शन अच्छे से हो जाएँगे। यदि आप वास्तविक अनुभव चाहते हैं – ‘बोल-बम’ के नारे, काँवड़ियों की टोलियाँ, वह ऊर्जा – तो सावन में जाएँ। पर तैयार रहें: भीड़ बहुत अधिक होगी।
प्रश्न 7: जसीडीह स्टेशन से देवघर कैसे पहुँचें ?
उत्तर : जसीडीह से देवघर लगभग 6-7 किलोमीटर दूर है।
विकल्प :
टैक्सी/ऑटो : 20-30 मिनट में पहुँचा देगी। किराया ₹200-300 (ऑटो), ₹400-500 (टैक्सी)। रात में भी आसानी से मिल जाती है।
बस : राज्य परिवहन और निजी बसें चलती हैं। किराया ₹20-30। पर बस थोड़ा समय लेती है क्योंकि रास्ते में रुकती है।
शेयरिंग ऑटो : सबसे सस्ता विकल्प (₹20-30 प्रति व्यक्ति), पर सहज नहीं है – भीड़ होती है।
टिप : यदि आप परिवार या बुजुर्गों के साथ हैं, तो टैक्सी ले लीजिए। अकेले या दोस्तों के साथ हैं तो शेयरिंग ऑटो चला लेगा।
प्रश्न 8: देवघर में रुकने की व्यवस्था कैसी है ?
उत्तर : हर बजट के लिए व्यवस्था है :
| बजट | प्रकार | किराया (प्रति रात) | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| बजट | धर्मशाला, लॉज | ₹200-500 | स्टेशन के पास कई धर्मशालाएँ हैं। पर सुविधाएँ बुनियादी होंगी। |
| मध्यम | निजी होटल | ₹600-1500 | तारा पैलेस, यात्री निवास, बैद्यनाथ दर्शन – ये अच्छे विकल्प हैं। |
| ऊँचा | रिज़ॉर्ट, बड़े होटल | ₹2000-5000+ | बोकोरो रिज़ॉर्ट, होटल सम्राट – अधिक सुविधाएँ मिलेंगी। |
सावन के समय : कीमतें दोगुनी या तिगुनी हो जाती हैं। और एक और बात – सावन में पहले से बुकिंग करके ही जाएँ, वरना रात में ठहरने की जगह नहीं मिलेगी।
मेरी सलाह : मुख्य मंदिर से 1-2 किलोमीटर दूर होटल लीजिए। पैदल चलना पड़ेगा, पर सावन के समय मंदिर के पास के होटल महीनों पहले से बुक हो जाते हैं।
प्रश्न 9: मंदिर कब खुलता और बंद होता है ? (समय सारणी)
उत्तर : यह रहे समय (सामान्य दिनों के लिए) :
| क्र. | समय | कार्यक्रम | विवरण |
|---|---|---|---|
| 1 | सुबह 4:00 | मंगला आरती | मंदिर के द्वार खुलते हैं। यह मुख्य पूजा होती है। |
| 2 | सुबह 5:30-दोपहर 3:30 | दर्शन और जलाभिषेक | सामान्य भक्तों के लिए समय। इस दौरान आप जल चढ़ा सकते हैं। |
| 3 | दोपहर 3:30-शाम 6:00 | मंदिर बंद | यह अंतराल होता है। इस समय श्रृंगार आदि होता है। |
| 4 | शाम 6:00-रात 9:00 | संध्या पूजा और दर्शन | दोबारा खुलता है। शृंगार पूजा होती है। |
| 5 | रात 9:00 | शयन आरती | दिन की अंतिम पूजा। इसके बाद मंदिर बंद कर दिया जाता है। |
सावन में विशेष : सावन के महीने में यह समय बदल जाता है। मंदिर सुबह 3:00 बजे खुल जाता है और रात 11:00-12:00 बजे तक खुला रहता है। इतनी बड़ी भीड़ होती है कि दिन में बंद नहीं किया जाता।
प्रश्न 10: बैद्यनाथ (Baidyanath Dham) के दर्शन कैसे करें? कोई विशेष नियम तो नहीं ?
उत्तर : नियम सरल हैं, पर पालन करना ज़रूरी है :
दर्शन से पहले :
स्नान करके जाएँ (मन और शरीर दोनों को शुद्ध करें) |
सादे, साफ कपड़े पहनें (रंगों पर कोई रोक नहीं, पर शालीनता रखें) |
चमड़े की वस्तुएँ (बेल्ट, वॉलेट) मंदिर के अंदर न ले जाएँ – बाहर निकाल दें या लॉकर में रख दें |
दर्शन के समय :
जल (गंगाजल या सादा जल) साथ रखें – चढ़ाने के लिए |
फूल, बेलपत्र, धतूरा, भांग ले जा सकते हैं – ये शिव को प्रिय हैं |
लाइन में शांति से खड़े रहें – धक्का-मुक्की न करें |
जलाभिषेक करते समय अपने मन ही मन शिव का ध्यान करें, मंत्र बोलें (‘ॐ नमः शिवाय’ या कोई भी शिव मंत्र) |
क्या न करें :
मोबाइल फोन का प्रयोग गर्भगृह में न करें (बेहतर होगा बंद कर दें) |
तस्वीरें न लें (मंदिर के अंदर फोटोग्राफी प्रतिबंधित है) |
बहुत सारा सामान साथ न ले जाएँ (भीड़ में परेशानी होगी) |
नशे या मादक पदार्थों के प्रभाव में न आएँ (भांग चढ़ाना अलग बात है, सेवन करके आना अलग) |
प्रश्न 11: बैद्यनाथ (Baidyanath Dham) की विशेष पूजा क्या है? भक्त स्वयं जल चढ़ा सकते हैं ?
उत्तर : हाँ! यह बैद्यनाथ की सबसे बड़ी विशेषता है।
जलाभिषेक : सामान्य दिनों में हर भक्त अपने हाथों से शिवलिंग पर जल चढ़ा सकता है। यह बहुत बड़ी बात है। किसी अन्य ज्योतिर्लिंग में ऐसा नहीं होता। सोमनाथ हो, महाकाल हो, ओंकारेश्वर हो – वहाँ पुजारी ही अभिषेक करते हैं। भक्त सिर्फ दर्शन करते हैं। पर बैद्यनाथ में आप स्वयं जल चढ़ा सकते हैं।
यह कैसे होता है : आप लाइन में लगते हैं। जब आपकी बारी आती है, तो आप शिवलिंग के पास जाते हैं। एक पुजारी खड़ा होता है जो आपके हाथ में जल का लोटा या बर्तन देता है। आप ‘ॐ नमः शिवाय’ बोलते हुए लिंग पर जल चढ़ाते हैं। फिर आप आगे बढ़ जाते हैं। पूरी प्रक्रिया में 30-60 सेकंड लगते हैं।
सावन में परिवर्तन : सावन में इतनी भीड़ होती है कि यह व्यवस्था बंद कर दी जाती है। तब पुजारी ही सामूहिक रूप से जल चढ़ाते हैं। भक्त सिर्फ दर्शन कर पाते हैं। यह समझ में आता है – लाखों लोगों के आने पर हर किसी को व्यक्तिगत रूप से नहीं चढ़ाया जा सकता।
प्रश्न 12: बैद्यनाथ (Baidyanath Dham) में कौन सी विशेष पूजाएँ होती हैं ? (रुद्राभिषेक आदि)
उत्तर: यहाँ कई विशेष पूजाएँ कराई जाती हैं :
| पूजा का नाम | समय | कीमत (लगभग) | क्या होता है ? |
|---|---|---|---|
| सरकारी पूजा | प्रतिदिन | – | यह मुख्य मंदिर की नियमित पूजा है। पुजारी षोडशोपचार से पूजा करते हैं। |
| रुद्राभिषेक | किसी भी दिन (पूर्व बुकिंग) | ₹1100-5100 | शिवलिंग पर गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद, गन्ने का रस, बेलपत्र आदि से अभिषेक। 11 या 51 ब्राह्मणों द्वारा मंत्रोच्चार। |
| महामृत्युंजय जाप | किसी भी दिन | ₹2100-11000 | महामृत्युंजय मंत्र का जाप। रोग निवारण, अशुभ ग्रहों की शांति, दीर्घायु के लिए। |
| श्रावणी विशेष पूजा | केवल सावन में | भिन्न-भिन्न | सावन मास में लाखों लोग कराते हैं। कीमतें बहुत बढ़ जाती हैं। |
कैसे कराएँ : मंदिर के बाहर ‘पूजा काउंटर’ पर जाएँ। वहाँ से टिकट लें। फिर समय पर पहुँचकर पूजा कराएँ। सावन में पहले से बुकिंग करानी पड़ती है – महीनों पहले से स्लॉट भर जाते हैं।
प्रश्न 13: बाबा बैद्यनाथ (Baidyanath Dham) को क्या चढ़ाएँ ?
उत्तर : शिव को भोग और चढ़ावे में कुछ विशेष वस्तुएँ प्रिय हैं :
आप ये चढ़ा सकते हैं :
बेलपत्र (शिव को अति प्रिय – तीन पत्तों वाला बेलपत्र चढ़ाने से विशेष फल मिलता है) |
धतूरा (चढ़ाने से मनोवांछित फल मिलता है) |
भांग (भांग के पत्ते – पर सेवन करने के लिए नहीं, चढ़ाने के लिए) |
आक के फूल (लाल रंग के फूल – शिव को प्रिय हैं) |
दूध, दही, घी (अभिषेक के लिए) |
जल (सबसे सरल और सबसे अच्छा – जल से भी शिव प्रसन्न हो जाते हैं) |
क्या न चढ़ाएँ : केतकी के फूल (शिव को यह फूल निषेध है – पौराणिक कथा के अनुसार, केतकी ने ब्रह्मा के झूठ में साथ दिया था) |
प्रसाद क्या लें : यहाँ का मशहूर ‘पेड़ा’ बाबा का प्रसाद है। ज़रूर लें। इसके अलावा मंदिर परिसर में मिलने वाला सादा ‘चरणामृत’ भी प्रसाद है।
प्रश्न 14: बैद्यनाथ (Baidyanath Dham) का रावण से क्या संबंध है ?
उत्तर : यह सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है। बैद्यनाथ का लगभग पूरा अस्तित्व ही रावण से जुड़ा है।
संक्षिप्त कथा : रावण, लंका का राजा, भगवान शिव का परम भक्त था। वह चाहता था कि शिव स्वयं लंका में निवास करें, इसलिए उसने कठोर तपस्या की। उसने अपने दस सिरों को एक-एक करके शिवलिंग पर चढ़ा दिया। नौ सिर चढ़ाने के बाद जब वह दसवाँ काटने जा रहा था, तो शिव प्रकट हुए और प्रसन्न होकर बोले – “वरदान माँगो।”
रावण ने शिव का ‘कामना लिंग’ माँगा। शिव ने दे दिया, पर शर्त रखी – यह लिंग ज़मीन पर रखते ही स्थापित हो जाएगा, उठाया नहीं जा सकेगा।
रावण लिंग लेकर लंका जा रहा था। रास्ते में भगवान विष्णु ने उसे रोकने की योजना बनाई। विष्णु ने एक ग्वाले का रूप धारण किया। रावण को अचानक मल-त्याग की इच्छा हुई (वरुण देव ने ऐसा किया था)। उसने ग्वाले से लिंग थामने को कहा और चला गया। ग्वाले ने लिंग नीचे रख दिया – और वह स्थापित हो गया।
रावण लौटा तो देखा लिंग ज़मीन पर है। उसने क्रोध में आकर लिंग पर अपने अंगूठे से प्रहार किया। तभी से लिंग के बीच में एक विकृति है – वह आज भी दिखती है।
‘वैद्यनाथ’ नाम कैसे पड़ा : रावण ने अपने दस सिर काटकर चढ़ा दिए थे, जिससे वह घायल हो गया था। शिव ने स्वयं उसका उपचार किया। वैद्य = चिकित्सक। इसलिए शिव ने यहाँ ‘वैद्यनाथ’ नाम धारण किया।
प्रश्न 15: देवघर में दशहरे पर रावण क्यों नहीं जलाया जाता ?
उत्तर : यह देवघर की सबसे अनोखी विशेषता है।
पूरे देश में दशहरे के दिन रावण के पुतले जलाए जाते हैं। पर देवघर में रावण दहन नहीं होता।
कारण : देवघर के लोग रावण को एक महान शिवभक्त और विद्वान मानते हैं। उनके अनुसार :
रावण ने ही इस ज्योतिर्लिंग को यहाँ स्थापित किया था |
उसकी तपस्या के बिना यह धाम नहीं होता |
वह एक असाधारण विद्वान था (उसने चारों वेदों का ज्ञान अर्जित किया था) |
उसके दस सिर उसके विद्वत्ता के प्रतीक हैं, न कि केवल राक्षसी के |
इसलिए देवघर में रावण को सम्मान दिया जाता है, अपमान नहीं। यहाँ के लोग कहते हैं – “वह हमारे बाबा के भक्त थे, उनका अपमान हम नहीं कर सकते।”
मंदिर का एक नाम ही ‘रावणेश्वर बैद्यनाथ’ है।
प्रश्न 16: बैद्यनाथ शक्तिपीठ कैसे है? यहाँ सती का कौन सा अंग गिरा ?
उत्तर : यह दूसरा बड़ा कारण है जो इस स्थान को अद्वितीय बनाता है – यह शक्तिपीठ भी है।
पौराणिक कथा : राजा दक्ष ने अपनी पुत्री सती का विवाह शिव से किया, पर वह शिव से प्रसन्न नहीं था। उसने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें शिव को आमंत्रित नहीं किया। सती वहाँ पहुँच गईं। दक्ष ने शिव का अपमान किया। सती अपमान सहन नहीं कर सकीं और यज्ञ की अग्नि में कूदकर प्राण त्याग दिए।
शिव को यह पता चला तो उन्होंने सती के शरीर को लेकर तांडव नृत्य करना शुरू कर दिया। देवता घबरा गए। भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े कर दिए। जहाँ-जहाँ अंग गिरे, वहाँ-वहाँ शक्तिपीठ स्थापित हो गए।
बैद्यनाथ में क्या गिरा : मान्यता है कि सती का हृदय यहाँ गिरा था। इसलिए इस स्थान को ‘चिताभूमि’ या ‘चिदाभूमि’ कहते हैं – जहाँ ‘चित्त’ (हृदय) गिरा।
अद्वितीयता : देश में यह एकमात्र स्थान है जहाँ ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ दोनों एक साथ हैं। मुख्य मंदिर के बगल में माता पार्वती का मंदिर है। दोनों मंदिरों को लाल धागों से बाँधा गया है – यह शिव-शक्ति के अटूट मिलन का प्रतीक है।
प्रश्न 17: श्रावणी मेला क्या है? यह कब लगता है ?
उत्तर : श्रावणी मेला हर साल सावन (श्रावण) महीने में लगता है। यह हिंदू कैलेंडर का पाँचवाँ महीना होता है, जो आमतौर पर जुलाई-अगस्त में आता है।
यह मेला क्या है : यह केवल एक मेला नहीं है – यह आस्था की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति है। लाखों भक्त (जिन्हें ‘काँवड़िए’ कहते हैं) सुल्तानगंज (बिहार) से गंगाजल लेकर लगभग 105 किलोमीटर पैदल चलते हैं और बैद्यनाथ पहुँचकर वह जल चढ़ाते हैं।
कब से कब तक : पूरे सावन महीने में यह मेला चलता है। पर सबसे अधिक भीड़ सावन के पहले सोमवार और आखिरी सोमवार को होती है। सावन में कुल चार या पाँच सोमवार आते हैं। सभी सोमवार विशेष होते हैं, पर पहला और आखिरी सबसे महत्वपूर्ण।
प्रश्न 18: ‘बोल-बम’ का क्या अर्थ है? यह क्यों बोलते हैं ?
उत्तर : ‘बोल-बम’ (या ‘बम-बम भोले’) काँवड़ियों का युद्ध-नारा है। इसका शाब्दिक अर्थ है – ‘बोलो बम’ यानी ‘शिव का नाम लो’।
कैसे चलता है: काँवड़िए समूहों में चलते हैं। एक व्यक्ति नारा लगाता है – “बोल-बम!” और पूरा समूह जवाब देता है – “बम-बम भोले!” या “हर-हर महादेव!” यह आवाज़ इतनी ऊँची और सामूहिक होती है कि पूरा वातावरण गूँज उठता है।
क्यों ज़रूरी है : यह नारा कई काम करता है :
काँवड़ियों की ऊर्जा बनाए रखता है (सौ किलोमीटर पैदल चलना आसान नहीं है) |
थकान भगाता है |
एकता का भाव बढ़ाता है |
रास्ते में खो जाने से बचाता है (आवाज़ से पता चलता है कि समूह कहाँ है) |
शिव का स्मरण कराता है – ‘बोल-बम’ का अर्थ है ‘शिव का नाम लो’ |
मैंने दूर से ही इस नारे को सुना है। पहली बार सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। हजारों-लाखों लोगों की आवाज़ एक साथ – वह अनुभव शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।
प्रश्न 19: क्या हर कोई काँवड़ यात्रा कर सकता है? इसमें क्या लगता है ?
उत्तर : हाँ, कोई भी श्रद्धालु कर सकता है। कोई जाति, उम्र, लिंग का बंधन नहीं है। लेकिन यह आसान नहीं है।
क्या चाहिए :
काँवड़ : एक बाँस या लकड़ी की संरचना जिसके दोनों छोर पर बाल्टियाँ बँधी होती हैं। इसे दोनों कंधों पर रखकर चलते हैं।
गंगाजल : सुल्तानगंज से गंगा नदी से जल भरकर लाना होता है।
शारीरिक ताकत : 105 किलोमीटर पैदल चलना है। रास्ते में पहाड़ियाँ, जंगल, गर्मी, बारिश – सब कुछ झेलना होता है।
समय : यह यात्रा 3 से 6 दिनों में पूरी होती है (गति पर निर्भर करता है)
समूह : अकेले करना बहुत मुश्किल है। अधिकतर लोग समूह (टोली) बनाकर चलते हैं।
कौन करता है : हर उम्र के लोग करते हैं – 10 साल के बच्चे से लेकर 70 साल के बुजुर्ग तक। महिलाएँ भी करती हैं। कहते हैं कि शिव की कृपा हो तो सब संभव है।
पहली बार करने वालों के लिए सलाह : सीधे 105 किमी मत करिए। पहले छोटी यात्रा करके देखिए। फिर धीरे-धीरे बढ़िए। पर हाँ – अगर मन में सच्ची श्रद्धा है तो शिव रास्ता दिखा ही देते हैं।
प्रश्न 20: देवघर जाते समय क्या सावधानियाँ बरतनी चाहिए ?
उत्तर : कुछ बातें जान लीजिए – काम आएँगी :
ठगी और अत्यधिक कीमतों से बचें :
टैक्सी/ऑटो : दोगुना किराया माँगेंगे (सावन में तो कई गुना)। पहले दर पूछ लें, तय कर लें, फिर बैठें।
होटल : सावन में कीमतें तीन-चार गुना बढ़ जाती हैं। पहले से बुकिंग करके जाएँ।
प्रसाद/चढ़ावा : मंदिर के बाहर बेचने वाले बहुत अधिक कीमत माँगते हैं। बाजार से खरीदें – सस्ता पड़ेगा।
पूजा : ‘स्पेशल पूजा’ के नाम पर पैसे न उड़ाएँ। मंदिर के आधिकारिक काउंटर से ही टिकट लें।
सुरक्षा :
अपने कीमती सामान की निगरानी रखें (भीड़ में चोरी का डर रहता है) |
मोबाइल और पर्स जेब में नहीं, बल्कि क्रॉस बैग में रखें |
महिलाएँ रात में अकेले न घूमें – हालाँकि देवघर सुरक्षित है, फिर भी सावधानी बरतें |
बीमार या बुजुर्गों को सावन में ले जाने से बचें (इतनी भीड़ में परेशानी होगी) |
स्वास्थ्य :
गर्मी में पानी पीते रहें (निर्जलीकरण से बचें) |
सावन में बारिश से बचने के लिए छाता या रेनकोट रखें |
पैर में छाले हो सकते हैं – आराम के जूते/चप्पल पहनें |
बासी या खुला खाना न खाएँ (फूड पॉइज़निंग का खतरा) |
प्रश्न 21: सावन के अलावा अन्य समय में भीड़ कैसी रहती है ?
उत्तर : एक सामान्य धारणा है कि बैद्यनाथ हमेशा भीड़भाड़ वाला है। पर ऐसा नहीं है।
| महीना | भीड़ का स्तर | दर्शन का समय (लगभग) |
|---|---|---|
| जुलाई-अगस्त (सावन) | बहुत अधिक (लाखों) | 6-12 घंटे |
| सितंबर-अक्टूबर | मध्यम | 1-2 घंटे |
| नवंबर-फरवरी | कम | 30 मिनट – 1 घंटा |
| मार्च | मध्यम (होली के आसपास बढ़ जाती है) | 1-2 घंटे |
| अप्रैल-जून | बहुत कम | 15-30 मिनट (गर्मी के कारण) |
सबसे कम भीड़ : अप्रैल-जून में। पर गर्मी बहुत अधिक होती है – 40-45 डिग्री सेल्सियस। सुबह-सुबह दर्शन करें।
सबसे सुहावना समय : अक्टूबर-नवंबर और जनवरी-फरवरी। मौसम ठंडा या सुहावना होता है, भीड़ नहीं होती, दर्शन आराम से हो जाते हैं।
प्रश्न 22: महिलाओं के लिए क्या विशेष सुविधाएँ या नियम हैं ?
उत्तर : कोई विशेष प्रतिबंध नहीं है। महिलाएँ पूरी तरह से पूजा-अर्चना में भाग ले सकती हैं।
क्या कर सकती हैं :
जलाभिषेक कर सकती हैं (बिल्कुल पुरुषों की तरह) |
पूजा करा सकती हैं |
रुद्राभिषेक में भाग ले सकती हैं |
काँवड़ यात्रा कर सकती हैं |
क्या नहीं कर सकतीं : कोई प्रतिबंध नहीं है। शिव को किसी लिंग या जाति का भेद नहीं।
सुझाव : मासिक धर्म के दौरान कई महिलाएँ मंदिर नहीं जातीं (यह व्यक्तिगत आस्था है, मंदिर की ओर से कोई रोक नहीं है)।
सुरक्षा : देवघर अपेक्षाकृत सुरक्षित है। पर रात में अकेले न निकलें। भीड़ में अपने बैग और पर्स की निगरानी रखें। महिला यात्रियों के लिए अलग कतार की सुविधा नहीं है – सब एक ही लाइन में लगते हैं।
प्रश्न 23: क्या मंदिर में मोबाइल फोन ले जा सकते हैं ? फोटोग्राफी की अनुमति है ?
उत्तर : फोटोग्राफी की अनुमति नहीं है।
मोबाइल फोन : ले जा सकते हैं। पर गर्भगृह के अंदर फोन निकालना बहुत अशोभनीय समझा जाता है। पुजारी मना करेंगे, और आसपास के भक्त भी नाराज़ होंगे। बेहतर है फोन को साइलेंट मोड पर रखें और जेब में ही रखें।
फोटोग्राफी : मंदिर के बाहर (बाहरी परिसर, शिवगंगा तालाब, नंदन पहाड़) फोटो ले सकते हैं। पर गर्भगृह के अंदर, शिवलिंग की, या पूजा की कोई फोटो न लें। यह स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित है।
वीडियोग्राफी : पूरी तरह प्रतिबंधित है।
क्यों : मंदिर प्रशासन का कहना है कि यह पवित्रता बनाए रखने के लिए है। साथ ही, भीड़ में फोन निकालने से चोरी का खतरा भी बढ़ता है।
प्रश्न 24: क्या बैद्यनाथ (Baidyanath Dham) के दर्शन के बाद देवघर में और कुछ देख सकते हैं ?
उत्तर : बिल्कुल! देवघर में सिर्फ मंदिर ही नहीं, बल्कि कई दर्शनीय स्थल हैं :
नंदन पहाड़ (3 किमी दूर)
छोटी पहाड़ी, शीर्ष पर नंदी का बड़ा मंदिर |
यहाँ से देवघर का पूरा दृश्य दिखता है |
सूर्यास्त देखना बहुत सुंदर लगता है |
त्रिकुट पहाड़
तीन चोटियों वाली पहाड़ी |
ट्रेकिंग कर सकते हैं |
प्रकृति प्रेमियों के लिए अच्छा है |
तापोवन गुफाएँ
मान्यता है कि पांडवों ने यहाँ कुछ समय बिताया था |
प्राकृतिक गुफाएँ – थोड़ा साहसिक अनुभव |
नौलखा मंदिर
लाल पत्थर से बना भव्य मंदिर |
नाम – ‘नौ लाख’ में बना था |
सत्संग आश्रम (श्री श्री आनंदमूर्ति)
ठाकुर अनुकूलचंद्र के अनुयायियों के लिए महत्वपूर्ण |
बहुत शांत और सुंदर वातावरण |
सुझाव: मुख्य बैद्यनाथ दर्शन सुबह कर लें। फिर दिन में ये स्थान देख सकते हैं। सब मिलाकर 1-2 दिन में देखा जा सकता है।
प्रश्न 25: बैद्यनाथ (Baidyanath Dham) में कौन सा त्योहार मनाया जाता है ? (महाशिवरात्रि, सावन आदि)
उत्तर : यहाँ हर शिव-संबंधी त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है :
मुख्य त्योहार :
| त्योहार | समय | महत्व |
|---|---|---|
| श्रावणी मेला | सावन (जुलाई-अगस्त) | सबसे बड़ा त्योहार। लाखों काँवड़िए गंगाजल लेकर आते हैं। पूरा महीना चलता है। |
| महाशिवरात्रि | फाल्गुन (फरवरी-मार्च) | शिव-पार्वती के विवाह का दिन। रातभर जागरण, भजन-कीर्तन, विशेष पूजा। |
| बसंत पंचमी | माघ (जनवरी-फरवरी) | ‘तिलक’ और ‘सलामी जल’ की परंपरा। मिथिलांचल से हजारों भक्त आते हैं। |
| सावन सोमवार | सावन के चार-पाँच सोमवार | हर सोमवार विशेष। सबसे अधिक भीड़। |
| कार्तिक पूर्णिमा | कार्तिक (नवंबर) | गंगास्नान का महत्व। देव-दीपावली मनाई जाती है। |
सुझाव : यदि आप इन त्योहारों में जाएँ, तो तैयार रहें :
भीड़ बहुत अधिक होगी |
होटल पहले से बुक करें |
दर्शन में घंटों लगेंगे |
सावन में बारिश से बचने की व्यवस्था करें |
लेकिन यदि आप त्योहारों का उत्साह देखना चाहते हैं, तो यही सबसे अच्छा समय है। वह ऊर्जा, वह आस्था, वह रंग – कहीं और नहीं मिलता।
प्रश्न 26: बैद्यनाथ (BAidyanath Dham) जाने के लिए कितना पैसा लगेगा ? (यात्रा बजट)
उत्तर : यह इस पर निर्भर करता है कि कहाँ से आ रहे हैं, कैसे रहना चाहते हैं। एक अनुमान :
एक व्यक्ति के लिए 2 दिन का बजट (कोलकाता/पटना से) :
| मद | किफ़ायती (₹) | मध्यम (₹) | ऊँचा (₹) |
|---|---|---|---|
| यात्रा (ट्रेन/बस, राउंड) | 500-1000 | 1000-2000 | 2000-4000 |
| ठहरना (2 रात) | 400-1000 | 1500-3000 | 4000-10000 |
| खाना (2 दिन) | 200-400 | 500-1000 | 1000-2000 |
| दर्शन/पूजा (वैकल्पिक) | 50-200 | 200-500 | 500-2000 |
| स्थानीय यात्रा (टैक्सी/ऑटो) | 100-200 | 200-500 | 500-1000 |
| प्रसाद/स्मृति (वैकल्पिक) | 50-100 | 100-500 | 500-2000 |
| कुल (लगभग) | ₹1300-3000 | ₹3500-7500 | ₹8000-22000 |
बचत के सुझाव :
ट्रेन का स्लीपर क्लास लीजिए (बहुत सस्ता और ठीक रहता है) |
धर्मशाला में ठहरिए (₹100-200 में मिल जाती है – पर सुविधाएँ बहुत बुनियादी) |
स्थानीय बस या शेयरिंग ऑटो का प्रयोग करिए |
सड़क के किनारे लगे छोटे होटलों में खाइए – सस्ता और सुरक्षित होता है |
सावन में न जाइए – कीमतें बहुत बढ़ जाती हैं |
सावन में बजट : कम से कम दोगुना रखिए। हर चीज़ महँगी हो जाती है – ट्रेन टिकट से लेकर पानी की बोतल तक।
प्रश्न 27: बैद्यनाथ (Baidyanath Dham) में विकलांग या बुजुर्ग व्यक्तियों के लिए क्या सुविधा है ?
उत्तर : मंदिर प्रशासन ने कुछ सुविधाएँ बनाई हैं, पर सब कुछ आदर्श नहीं है।
क्या सुविधा है :
व्हीलचेयर : मंदिर परिसर के बाहर से मिल जाती है (कुछ दान में, कुछ किराए पर)
बुजुर्गों की कतार : कई बार अलग ‘सीनियर सिटीजन कतार’ लगाई जाती है – पर सावन में यह व्यवस्था टूट जाती है
रैंप : मुख्य मंदिर तक जाने के लिए रैंप बने हैं, पर गर्भगृह के अंदर सीढ़ियाँ हैं
क्या नहीं है :
कोई विशेष पार्किंग नहीं |
साफ-सुथरे शौचालयों की कमी (स्थिति खराब है) |
चिकित्सा सुविधा (बहुत बुनियादी) |
सुझाव :
बुजुर्गों या विकलांगों को सावन में न ले जाएँ – भीड़ बहुत अधिक होती है, परेशानी होगी |
सामान्य दिनों में ले जाएँ (अक्टूबर-नवंबर सबसे अच्छा) |
अपना व्हीलचेयर साथ ले जाएँ (वहाँ मिल तो जाता है, पर अच्छी कंडीशन में नहीं होता) |
किसी जवान व्यक्ति को साथ रखें जो मदद कर सके |
प्रश्न 28: क्या बैद्यनाथ (Baidyanath Dham) में ऑनलाइन दर्शन या पूजा बुकिंग की सुविधा है ?
उत्तर : हाँ, अब कुछ हद तक ऑनलाइन सुविधा शुरू हो गई है।
क्या ऑनलाइन हो सकता है :
रुद्राभिषेक : कुछ वेबसाइट्स (जैसे ‘Maa Vindhyavasini Seva Samiti’ आदि) पर बुकिंग हो जाती है |
महामृत्युंजय जाप : ऑनलाइन बुकिंग |
दान : ऑनलाइन दान कर सकते हैं |
क्या ऑनलाइन नहीं हो सकता :
सामान्य दर्शन (लाइन में लगना ही पड़ता है) |
जलाभिषेक (यह व्यक्तिगत रूप से ही कर सकते हैं) |
सावधानी : ऑनलाइन बुकिंग के नाम पर बहुत सारे स्कैम चल रहे हैं। सिर्फ आधिकारिक वेबसाइट या मंदिर प्रशासन द्वारा अधिकृत पोर्टल का ही उपयोग करें। फेसबुक या किसी अज्ञात वेबसाइट पर क्रेडिट कार्ड की जानकारी न दें।
आधिकारिक जानकारी के लिए : देवघर जिला प्रशासन की वेबसाइट या मंदिर के बोर्ड पर चिपके नंबरों से संपर्क करें।
प्रश्न 29: क्या बैद्यनाथ (Baidyanath Dham) में अछूत या स्त्रियों के लिए कोई प्रतिबंध है ?
उत्तर : बिल्कुल नहीं।
बैद्यनाथ एक ऐसा धाम है जहाँ कोई जाति, लिंग, या वर्ग का भेद नहीं है। शिव को सब प्रिय हैं। मंदिर में :
हर जाति का व्यक्ति प्रवेश कर सकता है |
हर उम्र का व्यक्ति प्रवेश कर सकता है |
पुरुष और महिलाएँ, दोनों समान रूप से पूजा कर सकते हैं |
विदेशी भी आ सकते हैं (पासपोर्ट दिखाना पड़ सकता है, पर कोई रोक नहीं) |
इतिहास : यही वह स्थान है जहाँ रावण – जो कि राक्षस कहा जाता है – ने शिव की तपस्या की और ज्योतिर्लिंग प्राप्त किया। रावण को प्रवेश मिला, तो किसे नहीं मिलेगा?
प्रश्न 30: बैद्यनाथ (Baidynath Dham) का सबसे बड़ा चमत्कार क्या है? क्या सच में यहाँ मन्नतें पूरी होती हैं ?
उत्तर : यह प्रश्न आस्था का है। मैं अपना अनुभव बताता हूँ :
मैंने वहाँ कई लोगों से बात की। एक महिला ने बताया – उसके पुत्र को असाध्य रोग था। डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए थे। वह देवघर आई, बाबा से प्रार्थना की। आज उसका बेटा ठीक है। वह हर साल देवघर आती है।
एक बुजुर्ग ने बताया – उसकी कोई संतान नहीं थी। बाबा की कृपा से उसे पुत्र हुआ। उसने बच्चे का नाम ‘बैद्यनाथ’ रखा।
सच क्या है ? मैं नहीं जानता कि ये चमत्कार हैं या संयोग। पर जो विश्वास इन लोगों के चेहरे पर था, वह सच था। उनका मानना है कि बाबा बैद्यनाथ उनके रक्षक हैं, उनके चिकित्सक हैं, उनके पिता हैं।
क्या मन्नतें पूरी होती हैं ? बैद्यनाथ में एक मान्यता है – यहाँ माँगने पर सब कुछ मिलता है। पर सच्चे मन से माँगना पड़ता है। और एक बात – बैद्यनाथ ‘वैद्य’ हैं। वह रोगों को दूर करते हैं। जो व्याधि से पीड़ित हैं, उनके लिए यह स्थान विशेष रूप से शक्तिशाली माना जाता है।
मैं क्या मानता हूँ : चमत्कार होते हैं या नहीं, यह आपकी आस्था पर निर्भर है। पर इतना तय है – बैद्यनाथ जैसा स्थान कहीं नहीं है। वहाँ जाकर एक शांति मिलती है, एक ऊर्जा मिलती है, जो अपने आप में चमत्कार से कम नहीं है। |