वट सावित्री व्रत की अमर गाथा

1. सतीत्व और प्रेम ने यमराज को भी झुका दिया

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भारतीय संस्कृति में उन व्रतों और कथाओं का विशेष महत्व है जो नारी के समर्पण, साहस और पतिव्रता धर्म की अद्वितीय मिसाल पेश करते हैं। ऐसी ही एक अमर गाथा है वट सावित्री (Vat Savitri) व्रत की कहानी। यह केवल एक पौराणिक आख्यान नहीं है, बल्कि एक ऐसी जीवंत परंपरा है जो सदियों से भारतीय नारी की आस्था, दृढ़ संकल्प और असीम प्रेम का प्रतीक बनी हुई है।

यह कथा महाभारत के ‘वन पर्व’ में आती है, जहाँ ऋषि मार्कण्डेय राजा युधिष्ठिर को सुनाते हैं। जब द्रौपदी पर संकट आता है, तो युधिष्ठिर ऋषि से पूछते हैं कि क्या उनके समान पतिव्रता कोई स्त्री हुई है? तब ऋषि उन्हें सावित्री की यह अद्भुत गाथा सुनाते हैं। आइए, मैं और आप इस गाथा के हर पड़ाव को विस्तार से समझते हैं |

2. दिव्य वरदान : सावित्री का जन्म

कहानी की शुरुआत होती है मद्र देश के राजा अश्वपति से। वे प्रजापालक, धर्मात्मा और अत्यंत प्रतापी राजा थे, लेकिन उनके जीवन में एक गहरा दुःख था – वे निःसंतान थे। राजमहल के ऐश्वर्य के बावजूद एक पुत्र की कामना उनके मन में गहरे बसी हुई थी। इस इच्छा की पूर्ति के लिए राजा अश्वपति ने एक अभूतपूर्व तपस्या का संकल्प लिया।

उन्होंने देवी सावित्री (गायत्री) को प्रसन्न करने के लिए घोर तप किया। अठारह वर्षों तक प्रतिदिन हजारों आहुतियाँ देकर उन्होंने देवी की आराधना की। अठारह वर्षों की इस कठिन तपस्या के बाद देवी सावित्री प्रकट हुईं और राजा से वर माँगने को कहा। राजा ने संतान की इच्छा व्यक्त की तो देवी ने कहा, “राजन! ब्रह्मदेव की आज्ञा से तुम्हें एक तेजस्वी कन्या की प्राप्ति होगी।”

समय आने पर रानी मालवी के गर्भ से एक दिव्य कन्या का जन्म हुआ, जिसका नाम सावित्री रखा गया। वह इतनी सुंदर और तेजस्वी थी कि उसे देखकर ऐसा लगता था मानो कोई देवकन्या धरती पर अवतरित हुई हो। उसके रूप-यौवन और आभा ने युवराजों को इतना प्रभावित किया कि कोई भी उससे विवाह करने का साहस नहीं जुटा पाता था |

3. वर की खोज और नियति का साक्षात्कार

जब सावित्री युवा हुई, तो राजा अश्वपति चिंतित हुए। उन्होंने सावित्री से कहा कि वह स्वयं भ्रमण करके अपने योग्य वर का चयन करे। पिता की आज्ञा मानकर सावित्री सुनहरे रथ पर सवार हुई और ऋषियों के आश्रमों, वनों और नगरों का भ्रमण करने लगी।

एक दिन जब वह लौटी, तो राजभवन में देवर्षि नारद का आगमन हुआ था। सावित्री ने पिता और नारद को प्रणाम करके अपनी पसंद बताई – उसने सत्यवान नामक युवक को अपने पति के रूप में चुना था। सत्यवान शाल्व देश के निर्वासित राजा द्युमत्सेन के पुत्र थे। द्युमत्सेन नेत्रहीन हो गए थे, जिसका फायदा उठाकर शत्रु ने उनका राज्य छीन लिया था और वे अपनी पत्नी और पुत्र के साथ वन में तपस्वी का जीवन व्यतीत कर रहे थे।

सत्यवान का नाम सुनते ही नारद ने गंभीर स्वर में कहा, “हाय राजन! इसने बड़ा दुर्भाग्यशाली चुनाव किया है। सत्यवान गुणवान, बलवान और सुंदर है, किंतु उसमें एक दोष है जो सभी गुणों को नष्ट कर देता है। आज से ठीक एक वर्ष बाद सत्यवान की मृत्यु हो जाएगी।” 

राजा अश्वपति व्याकुल हो उठे और सावित्री से किसी अन्य वर को चुनने का आग्रह किया। लेकिन सावित्री अटल थी। उसने कहा, “पिता जी, स्त्री एक बार ही अपना हृदय किसी को देती है। चाहे सत्यवान अल्पायु हों, चाहे वह वनवासी हों, मैंने उन्हें अपना पति मान लिया है। मैं किसी और को स्वीकार नहीं कर सकती।” 

सावित्री की दृढ़ता देख नारद ने भी उसका समर्थन किया और राजा ने सहर्ष इस विवाह की अनुमति दे दी |

4. वन में नवजीवन और प्रतीक्षा का वर्ष

राजा अश्वपति अपनी पुत्री और मंत्रियों के साथ वन में पहुँचे, जहाँ राजा द्युमत्सेन आश्रम में रहते थे। दोनों राजाओं की सहमति से उसी दिन सावित्री और सत्यवान का विवाह संपन्न हो गया। विवाह के साथ ही सावित्री ने अपने राजसी वस्त्र और आभूषण त्याग दिए। उसने वल्कल वस्त्र धारण किए और पूरे मनोयोग से अपने पति, सास और ससुर की सेवा में जुट गई ।

लेकिन उसके मन में नारद का वचन एक तीर की तरह चुभता रहता था। वह दिन-रात गिनने लगी। जैसे-जैसे नियत तिथि नजदीक आती गई, सावित्री का संकल्प और दृढ़ होता गया। नियत तिथि से तीन दिन पहले उसने अनशन व्रत धारण कर लिया। ससुर द्युमत्सेन चिंतित हुए, “पुत्री, यह व्रत बहुत कठोर है, तुम कमजोर हो जाओगी।” सावित्री ने उत्तर दिया, “पिता जी, मैंने यह संकल्प लिया है, मुझे इसे पूरा करने दीजिए ।”

5. वह भीषण दिन : जब यमराज स्वयं प्रकट हुए

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आखिर वह दिन आ ही गया। सुबह सावित्री ने अग्नि में आहुतियाँ दीं और ब्राह्मणों से आशीर्वाद लिया। जब सत्यवान लकड़ियाँ काटने के लिए वन जाने लगे, सावित्री ने उनसे साथ चलने की प्रार्थना की। सत्यवान ने उसे रोकना चाहा, “तुम व्रत से कमजोर हो, रास्ता कठिन है।” लेकिन सावित्री की आँखों में एक अदम्य दृढ़ता थी। वह बोली, “आज मैं तुमसे अलग नहीं हो सकती।” सत्यवान ने उसे अपने माता-पिता से आज्ञा लेने को कहा। सावित्री ने उनसे विदा ली और दोनों वन की ओर चल पड़े ।

वन में सत्यवान फल तोड़ रहे थे और लकड़ियाँ काट रहे थे। अचानक उनके सिर में तेज दर्द हुआ, शरीर में पसीना आने लगा और वे व्याकुल होकर सावित्री के पास आए। “मुझे बहुत थकान है, सिर दर्द कर रहा है। मैं थोड़ा सोना चाहता हूँ।” सावित्री ने उन्हें अपनी गोद में सिर रखकर आराम करने को कहा ।

तभी वह क्षण आया जिसकी आशंका सावित्री को थी। उसने देखा कि एक भयंकर काली आकृति प्रकट हुई। उसका रूप विकराल था – रक्तवर्णी नेत्र, सुनहरा मुकुट, लाल वस्त्र और हाथ में पाश। वह साक्षात यमराज थे। उन्होंने सत्यवान के शरीर से प्राणों को पाश में बाँधकर खींच लिया और दक्षिण दिशा की ओर चल दिए |

6. सतीत्व की अद्भुत यात्रा : जब पत्नी नहीं रुकी

यह देख सावित्री का हृदय विदीर्ण हो गया, लेकिन वह विचलित नहीं हुई। उसने अपनी गोद से सत्यवान का निष्प्राण शरीर रखा और यमराज के पीछे चल दी। यमराज ने उसे रोकना चाहा, “हे पुत्री! तू वापस लौट जा। तेरे पति के प्राणों का समय पूरा हो चुका है। अब यह मेरे अधिकार क्षेत्र में है। शास्त्रों के नियम के अनुसार मैं इसे लेकर जा रहा हूँ।”

सावित्री बोली, “हे धर्मराज! पति के साथ जाना ही पत्नी का धर्म है। मैं जहाँ भी मेरे पति को ले जाया जाएगा, वहाँ जाऊँगी। या तो मुझे भी यमलोक ले चलिए, या फिर मेरे प्राण भी ले लीजिए ।”

यमराज ने समझाया, “तू भूख-प्यास से व्याकुल है, नंगे पाँव कंटीले मार्गों पर चल रही है। लौट जा।” लेकिन सावित्री अडिग रही। तब यमराज ने उसके सतीत्व और समर्पण से प्रभावित होकर उसे एक वरदान देने का प्रस्ताव रखा, लेकिन शर्त रखी – सत्यवान के प्राणों के अलावा कुछ भी माँग ले ।

सावित्री ने कहा, “मेरे ससुर नेत्रहीन हैं और राज्य से निर्वासित हैं। उनकी दृष्टि वापस लौटा दीजिए।” यमराज ने “तथास्तु” कह दिया और आगे बढ़े। सावित्री फिर उनके पीछे चलने लगी ।

थोड़ी दूर जाने पर यमराज ने फिर कहा, “तू अब लौट जा। मैं तुझे दूसरा वरदान देता हूँ।” सावित्री बोली, “मेरे ससुर का खोया हुआ राज्य उन्हें वापस मिल जाए।” यमराज ने “तथास्तु” कहा ।

सावित्री अब भी उनके पीछे चल रही थी। यमराज बोले, “तू बहुत दूर आ गई है, अब लौट जा। मैं तुझे तीसरा वरदान देता हूँ।” सावित्री ने कहा, “मेरे पिता राजा अश्वपति को पुत्र नहीं है। उन्हें सौ पुत्रों का वरदान दीजिए।” यमराज ने यह वरदान भी दे दिया |

7. चतुराई का अंतिम प्रहार : जब यमराज अपने ही जाल में फंसे

यमराज ने तीन वरदान दे दिए और फिर आगे बढ़ने लगे। सावित्री अब भी उनके पीछे थी। यमराज ने आश्चर्य से पूछा, “तू अब भी मेरे पीछे क्यों है? मैंने तुझे तीन वरदान दे दिए। अब तू और क्या चाहती है ?”

यही वह क्षण था जब सावित्री ने अपनी असली चतुराई दिखाई। वह बोली, “हे धर्मराज! आपने मुझे तीन वरदान दिए। एक वरदान आप अभी और दे सकते हैं। यदि आप संतुष्ट हैं तो मुझे एक और वरदान दीजिए। मैं पतिव्रता स्त्री हूँ, मैं सत्यवान से ही पुत्र प्राप्ति की कामना रखती हूँ। मुझे सौ पुत्रों का वरदान दीजिए।” 

यमराज ने यह वरदान भी “तथास्तु” कहकर दे दिया। लेकिन देते ही वह ठिठक गए। उनके मन में विचार आया – यदि सावित्री को सौ पुत्र चाहिए और वह सत्यवान से ही उन्हें प्राप्त करना चाहती है, तो यह तभी संभव है जब सत्यवान जीवित हो। उनके द्वारा दिया गया वरदान तभी सार्थक होगा जब सत्यवान जीवित होगा ।

यमराज मुस्कुराए। उन्होंने कहा, “सावित्री! तूने सचमुच मुझे पराजित कर दिया। तेरे सतीत्व, तेरे प्रेम और तेरी बुद्धि के आगे मैं नतमस्तक हूँ। ले, मैं तेरे पति के प्राण लौटाता हूँ। इतना ही नहीं, तुम दोनों को दीर्घायु का वरदान देता हूँ। तुम चिर सौभाग्यवती रहोगी।” 

8. पुनर्जीवन और पुनर्मिलन

जैसे ही यमराज अंतर्ध्यान हुए, सत्यवान की आँखें खुलीं। वह चौंके और बोले, “प्रिये! मुझे बहुत गहरी नींद आ गई। लगा जैसे बहुत दूर चला गया था। लेकिन तुम… तुम कितनी थकी हुई लग रही हो! हम जल्दी घर चलें।”

जब दोनों आश्रम पहुँचे, तो वहाँ अद्भुत दृश्य देखा। सास-ससुर उन्हें देखते ही दौड़े आए। ससुर द्युमत्सेन की आँखों से आँसू बह रहे थे, क्योंकि उनकी दृष्टि वापस आ गई थी। वह अपने पुत्र और पुत्रवधू को देखकर गद्गद हो उठे। कुछ ही समय बाद राज्य से संदेश आया कि जिस शत्रु ने राज्य छीना था, उसकी मृत्यु हो गई है और प्रजा अपने राजा द्युमत्सेन की वापसी की प्रतीक्षा कर रही है ।

इस प्रकार सावित्री ने अपने अटूट प्रेम, सतीत्व, बुद्धि और धैर्य से न केवल अपने पति को यमराज से वापस जीत लिया, बल्कि ससुर की आँखें, उनका खोया राज्य और अपने पिता को पुत्र का वरदान भी प्राप्त किया।

9. वट वृक्ष और अखंड परंपरा

यह संपूर्ण घटना एक वट वृक्ष (बरगद के पेड़) के नीचे घटित हुई थी। इसीलिए यह व्रत वट सावित्री (Vat Savitri) व्रत के नाम से प्रसिद्ध हुआ। ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा (या कुछ क्षेत्रों में अमावस्या) को विवाहित स्त्रियाँ इस दिन व्रत रखती हैं और वट वृक्ष की पूजा करती हैं ।

वट वृक्ष दीर्घायु का प्रतीक है। उसकी लंबी आयु और अटलता के समान ही पत्नी अपने पति की दीर्घायु की कामना करती है। व्रत (Vat Savitri) के दौरान वट वृक्ष की सात परिक्रमा करते हुए सूत के धागे बाँधे जाते हैं, जो सुहाग के प्रतीक माने जाते हैं।

10. वट सावित्री (Vat Savitri) व्रत कब और कैसे करें ?

यह व्रत (Vat Savitri) ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा या अमावस्या को किया जाता है। विभिन्न क्षेत्रों में तिथि में अंतर है :

  • उत्तर भारत, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, पश्चिम बंगाल में ज्येष्ठ मास की अमावस्या को |

  • महाराष्ट्र, गोवा, दक्षिण भारत में ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को |

  • नेपाल, उड़ीसा में भी अमावस्या को यह व्रत किया जाता है |

कुछ क्षेत्रों में यह तीन दिन (द्वादशी से पूर्णिमा तक) भी मनाया जाता है।

वट सावित्री (Vat Savitri) व्रत की पूजा विधि इस प्रकार है :

  1. प्रातः स्नान : व्रत के दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

  2. संकल्प : व्रत और पूजा करने का संकल्प लें।

  3. वट वृक्ष की पूजा : किसी बरगद के पेड़ के पास जाएं या घर में वट वृक्ष की शाखा या तस्वीर स्थापित करें।

  4. वृक्ष पूजन : वट वृक्ष की जड़ में जल, रोली, अक्षत, फूल, फल अर्पित करें।

  5. सावित्री-सत्यवान की पूजा : वट वृक्ष पर सावित्री और सत्यवान की प्रतिमा या चित्र रखकर उनकी पूजा करें।

  6. कथा श्रवण : सावित्री-सत्यवान की कथा सुनें और सुनाएं।

  7. परिक्रमा : वट वृक्ष की 7 या 11 परिक्रमा करें और सूत के धागे वृक्ष पर बांधें।

  8. आरती और प्रसाद : आरती करें और प्रसाद वितरित करें।

  9. दान : सुहाग की सामग्री, वस्त्र, भोजन आदि का दान करें।

व्रत (Vat Savitri) के दौरान इन मंत्रों का जाप करना शुभ माना जाता है :

  1. वट वृक्ष मंत्र :
    ॐ वटेश्वर्यै नमः।
    ॐ वटवृक्षाय नमः।

  2. सावित्री मंत्र :
    ॐ सावित्र्यै नमः।
    ॐ महासावित्र्यै नमः।

  3. सत्यवान मंत्र :
    ॐ सत्यवानाय नमः।
    ॐ सत्यदेवाय नमः।

  4. यमराज मंत्र (व्रत कथा के समय) :
    ॐ यमाय नमः।
    ॐ धर्मराजाय नमः।

  5. संकल्प मंत्र :
    ॐ अद्य ज्येष्ठे मासि (पूर्णिमा/अमावास्यायां) पुत्रैः सह सुखसमृद्ध्यर्थं वटसावित्रीव्रतं करिष्ये।

11. परिक्रमा और क्या खाना चाहिए और क्या नहीं?

वट वृक्ष पर सामान्यतः 7 या 11 परिक्रमा करने का विधान है। परिक्रमा करते समय सूत या कलावा वृक्ष पर बांधते जाते हैं। कुछ क्षेत्रों में 108 परिक्रमा करने का भी प्रचलन है। परिक्रमा करते समय यह ध्यान रखें कि वृक्ष की जड़ों को नुकसान न पहुंचे ।

सामान्यतः 7, 11 या 16 धागे बांधे जाते हैं। ये धागे सुहाग के प्रतीक माने जाते हैं। इन धागों को कलावा या मौली कहा जाता है। कुछ महिलाएं सूत के 16 धागे मिलाकर बांधती हैं, जो सोलह श्रृंगार का प्रतीक माने जाते हैं। धागे बांधते समय अखंड सौभाग्य की कामना की जाती है ।

खा सकते हैं :

  • फल, मेवे, दूध, दही, फलाहारी व्यंजन (कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा) |

  • साबूदाना खिचड़ी, साबूदाना वड़ा, फलाहारी चिवड़ा |

  • आलू, शकरकंद, अरबी, कच्चा केला (फलाहारी माने जाते हैं) |

नहीं खाना चाहिए :

  • अनाज (गेहूं, चावल, दालें), नमक (सेंधा नमक को छोड़कर) |

  • प्याज, लहसुन, मांसाहारी पदार्थ |

  • तामसिक भोजन |

12. कला, साहित्य और सिनेमा में सावित्री

सावित्री की यह कहानी केवल धार्मिक ग्रंथों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने कला, साहित्य और सिनेमा के विविध रूपों में अभिव्यक्ति पाई है :

(A) श्री अरबिंदो का महाकाव्य

 श्री अरबिंदो ने इस कथा को आधार बनाकर ‘सावित्री : अ लेजेंड एंड अ सिंबल’ नामक महाकाव्य लिखा। यह अंग्रेजी भाषा का सबसे लंबा महाकाव्य माना जाता है। उन्होंने इसे मात्र एक पौराणिक कथा नहीं, बल्कि मानव चेतना के उत्थान का प्रतीक बनाया। उनकी दृष्टि में सावित्री मानव आत्मा है, सत्यवान सत्य है और यमराज अज्ञान और मृत्यु के अंधकार के प्रतीक हैं |

(B) चित्रकला में

राजा रवि वर्मा की प्रसिद्ध लिथोग्राफ में सावित्री को यमराज से संवाद करते और सत्यवान को गोद में लिए दिखाया गया है। मेट्रोपोलिटन म्यूजियम ऑफ आर्ट में संग्रहित 1885-90 की एक लिथोग्राफ में यमराज को सावित्री को वरदान देते हुए दिखाया गया है, जिसमें यूरोपीय शैली का प्रभाव स्पष्ट है |

(C) फिल्में और टेलीविजन

इस कहानी पर लगभग 34 फिल्में बन चुकी हैं। सबसे पहली फिल्म 1914 में दादासाहेब फाल्के ने बनाई थी। तेलुगु, तमिल, हिंदी, मराठी, गुजराती सहित कई भाषाओं में इस पर फिल्में बनी हैं। 2013 में लाइफ ओके पर ‘सावित्री – एक प्रेम कहानी’ नामक धारावाहिक भी प्रसारित हुआ था |

(D) संगीत और रंगमंच

अंग्रेजी संगीतकार गुस्ताव होल्स्ट ने 1916 में इस कहानी पर आधारित एक चैंबर ओपेरा बनाया था। बिहार, झारखंड, उड़ीसा में महिलाएं ‘सावित्री व्रत कथा’ का पाठ करती हैं, जो उड़िया भाषा में लिखी गई है |

13. निष्कर्ष

वट सावित्री (Vat Savitri) व्रत की कथा हमें केवल एक पौराणिक कथा नहीं सुनाती, बल्कि जीवन के कई गूढ़ सत्यों का बोध कराती है :

  • प्रेम की अटल शक्ति : सावित्री का प्रेम केवल शारीरिक आकर्षण नहीं था, बल्कि आत्मिक था। वह जानती थी कि सत्यवान अल्पायु है, फिर भी उसने उन्हें चुना। उसका प्रेम शर्तों से परे था।

  • धैर्य और संकल्प : सावित्री ने हार नहीं मानी। वह यमराज के पीछे तब तक चलती रही जब तक उसका उद्देश्य पूरा नहीं हुआ।

  • बुद्धि का प्रयोग : सावित्री ने कभी भी यमराज से सीधे सत्यवान के प्राण नहीं मांगे। उसने अपनी बुद्धि से ऐसे वरदान मांगे कि यमराज को स्वयं ही उसकी मनोकामना पूरी करनी पड़ी।

  • नारी शक्ति का गौरव : यह कथा सिखाती है कि नारी केवल कोमल ही नहीं, बल्कि असीम साहस और शक्ति की स्वामिनी भी है। जब वह कुछ ठान लेती है, तो यमराज को भी झुकना पड़ता है।

यही कारण है कि आज हजारों वर्षों के बाद भी यह कथा उतनी ही प्रासंगिक और प्रेरणादायक है। जब भी कोई स्त्री वट वृक्ष की पूजा करती है और सावित्री की कथा (Vat Savitri) सुनती है, वह केवल एक अनुष्ठान नहीं करती, बल्कि उस अदम्य साहस, उस अटूट प्रेम और उस असीम शक्ति को नमन करती है जिसने सदियों पहले मृत्यु को भी पराजित कर दिया था।

“सावित्री ने यमराज को पराजित किया, यह कहना उचित नहीं होगा। सच तो यह है कि सावित्री के सतीत्व और प्रेम ने यमराज को भी अपना नियम बदलने पर विवश कर दिया। यह प्रेम की वह अद्भुत शक्ति है, जो मृत्यु पर भी विजय पा सकती है।”

 
 

Frequently Asked Questions (FAQ)

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प्रश्न 1 : वट सावित्री (Vat Savitri) व्रत क्या है और इसे क्यों किया जाता है ?
उत्तर : वट सावित्री (Vat Savitri) व्रत एक महत्वपूर्ण हिंदू व्रत है जो विवाहित महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए किया जाता है। यह व्रत (Vat Savitri) पौराणिक कथा की नायिका सावित्री को समर्पित है, जिन्होंने अपने पति सत्यवान को यमराज से वापस जीत लिया था। यह व्रत (Vat Savitri) पतिव्रता धर्म, अटूट प्रेम और नारी शक्ति का प्रतीक माना जाता है।

प्रश्न 2 : इस व्रत का नाम ‘वट सावित्री (Vat Savitri)’ क्यों है ?
उत्तर : इस व्रत (Vat Savitri) का नाम दो शब्दों से मिलकर बना है – ‘वट’ (बरगद का पेड़) और ‘सावित्री’। पौराणिक कथा के अनुसार, सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण वापस पाने के लिए यमराज के साथ जो संवाद किया था और वरदान प्राप्त किए थे, वह सब एक वट वृक्ष के नीचे घटित हुआ था। इसलिए इस व्रत (Vat Savitri) में वट वृक्ष की पूजा का विशेष महत्व है।

प्रश्न 3 : क्या केवल विवाहित महिलाएं ही यह व्रत (Vat Savitri) कर सकती हैं ?
उत्तर : मुख्य रूप से यह व्रत (Vat Savitri) सुहागिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु के लिए करती हैं। हालांकि, कुंवारी कन्याएं भी अच्छे वर की प्राप्ति के लिए यह व्रत कर सकती हैं। कुछ क्षेत्रों में विधवा महिलाएं भी यह व्रत (Vat Savitri) करती हैं, लेकिन उनका उद्देश्य संतान या परिवार की सुख-समृद्धि होता है।

प्रश्न 4 : क्या गर्भवती महिलाएं यह व्रत कर सकती हैं ?
उत्तर : गर्भवती महिलाएं यह व्रत (Vat Savitri) कर सकती हैं, लेकिन उन्हें निर्जला व्रत की कठोरता से बचना चाहिए। वे फलाहार व्रत रख सकती हैं और पूजा-कथा में भाग ले सकती हैं। स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए डॉक्टर की सलाह लेना उचित होगा। अधिकतर परिवारों में गर्भवती महिलाओं को कठोर व्रत (Vat Savitri) से छूट दी जाती है।

प्रश्न 5 : सावित्री की मूल कहानी किस ग्रंथ में है ?
उत्तर : सावित्री की यह अमर कहानी महाभारत के ‘वन पर्व’ में आती है। जब द्रौपदी पर संकट आता है, तो युधिष्ठिर ऋषि मार्कण्डेय से पूछते हैं कि क्या उनके समान कोई पतिव्रता स्त्री हुई है? तब ऋषि मार्कण्डेय उन्हें सावित्री-सत्यवान की यह कथा (Vat Savitri) सुनाते हैं। इसके अलावा यह कथा पद्म पुराण, वायु पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण और देवी भागवत में भी मिलती है।

प्रश्न 6 : सावित्री के पिता का क्या नाम था ?
उत्तर : सावित्री के पिता का नाम राजा अश्वपति था। वे मद्र देश के राजा थे। अठारह वर्षों की कठोर तपस्या के बाद उन्हें देवी सावित्री के वरदान से यह पुत्री प्राप्त हुई थी।

प्रश्न 7 : सत्यवान के माता-पिता का क्या नाम था ?
उत्तर : सत्यवान के पिता का नाम राजा द्युमत्सेन था और माता का नाम रानी शैव्या था। राजा द्युमत्सेन नेत्रहीन हो गए थे, जिसके कारण शत्रुओं ने उनका राज्य छीन लिया था और वे वन में निवास कर रहे थे।

प्रश्न 8 : नारद ने सत्यवान के बारे में क्या भविष्यवाणी की थी ?
उत्तर : जब सावित्री ने सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना, तो वहां उपस्थित देवर्षि नारद ने बताया कि सत्यवान गुणवान, बलवान और सुंदर है, किंतु उसमें एक दोष है – वह अल्पायु है। उन्होंने भविष्यवाणी की कि आज से ठीक एक वर्ष बाद सत्यवान की मृत्यु हो जाएगी। इसके बावजूद सावित्री ने अपने निर्णय पर अटल रहकर सत्यवान से विवाह किया।

प्रश्न 9 : यमराज ने सावित्री को कितने वरदान दिए ?
उत्तर : यमराज ने सावित्री को कुल तीन वरदान दिए थे, लेकिन सावित्री ने अपनी बुद्धि से चौथा वरदान भी प्राप्त कर लिया। ये वरदान थे :

  1. पहला वरदान : सत्यवान के पिता द्युमत्सेन की दृष्टि वापस लौट जाए |

  2. दूसरा वरदान : द्युमत्सेन को खोया हुआ राज्य वापस मिल जाए |

  3. तीसरा वरदान : सावित्री के पिता अश्वपति को 100 पुत्र प्राप्त हों |

  4. चौथा वरदान (अप्रत्यक्ष) : सावित्री को सत्यवान से 100 पुत्रों की कामना – जो तभी संभव था जब सत्यवान जीवित हों |

प्रश्न 10 : क्या यह कहानी (Vat Savitri) सच्ची है या प्रतीकात्मक ?
उत्तर : यह कहानी (Vat Savitri) एक ओर पौराणिक आख्यान है, वहीं दूसरी ओर गहन प्रतीकात्मक अर्थ भी रखती है। श्री अरबिंदो जैसे महान दार्शनिक ने इसे मानव चेतना के उत्थान का प्रतीक बताया :

  • सावित्री – मानव आत्मा का प्रतीक

  • सत्यवान – सत्य और चेतना का प्रतीक

  • यमराज – अज्ञान और मृत्यु के अंधकार का प्रतीक

  • वट वृक्ष – अनंत काल और स्थिरता का प्रतीक

यह कथा (Vat Savitri) सिखाती है कि सत्य, प्रेम और धैर्य से मृत्यु पर भी विजय पाई जा सकती है।

प्रश्न 11 : विभिन्न राज्यों में यह व्रत (Vat Savitri) कैसे मनाया जाता है ?
उत्तर :

  • महाराष्ट्र : यहां यह व्रत (Vat Savitri) ज्येष्ठ पूर्णिमा को मनाया जाता है। महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं, निर्जला व्रत (Vat Savitri) रखती हैं और वट वृक्ष की पूजा करती हैं। इस दिन को ‘वट पौर्णिमा’ कहते हैं।

  • उत्तर भारत : ज्येष्ठ अमावस्या को मनाते हैं। ‘वट अमावस्या’ या ‘वट सावित्री अमावस्या’ कहते हैं। महिलाएं वट वृक्ष पर सूत बांधती हैं और कथा सुनती हैं।

  • गुजरात : यहां यह व्रत (Vat Savitri) अमावस्या को मनाया जाता है और इसे ‘वट सावित्री व्रत’ कहते हैं।

  • दक्षिण भारत (कर्नाटक, आंध्र, तमिलनाडु) : ज्येष्ठ पूर्णिमा को ‘वट पूर्णिमा व्रत’ के रूप में मनाते हैं।

  • उड़ीसा, बिहार, झारखंड : अमावस्या को विशेष पूजा होती है और महिलाएं ‘सावित्री व्रत कथा’ का पाठ करती हैं।

  • नेपाल : मिथिलांचल क्षेत्र में इसे बहुत धूमधाम से मनाया जाता है।

प्रश्न 12 : क्या पुरुष भी इस व्रत (Vat Savitri) में भाग ले सकते हैं ?
उत्तर : यह व्रत मुख्यतः महिलाओं का व्रत है, लेकिन परिवार के अन्य सदस्य भी इसमें भाग ले सकते हैं। कई परिवारों में पति भी अपनी पत्नी के साथ वट वृक्ष की परिक्रमा करते हैं और पूजा में शामिल होते हैं। कथा का श्रवण पुरुष भी कर सकते हैं – जैसे महाभारत में ऋषि मार्कण्डेय यह कथा युधिष्ठिर को सुनाते हैं।

प्रश्न 13 : क्या कामकाजी महिलाएं यह व्रत (Vat Savitri) रख सकती हैं ?
उत्तर : हां, कामकाजी महिलाएं भी यह व्रत (Vat Savitri) रख सकती हैं। वे अपनी सुविधा अनुसार पूजा का समय निर्धारित कर सकती हैं:

  • यदि संभव हो तो अवकाश ले सकती हैं 

  • सुबह जल्दी उठकर पूजा कर सकती हैं

  • शाम को वट वृक्ष की पूजा कर सकती हैं (यदि सुबह संभव न हो)

  • ऑनलाइन माध्यम से भी कथा श्रवण कर सकती हैं

कई शहरों में सामूहिक पूजा का आयोजन भी होता है, जिसमें कामकाजी महिलाएं भाग ले सकती हैं।

प्रश्न 14 : अगर वट वृक्ष उपलब्ध न हो तो क्या करें ?
उत्तर : यदि वट वृक्ष उपलब्ध न हो तो इन विकल्पों का उपयोग कर सकते हैं :

  • वट वृक्ष की एक शाखा लाकर उसकी पूजा करें |

  • वट वृक्ष का चित्र या फोटो रखकर पूजा करें |

  • गमले में वट वृक्ष का पौधा लगाकर उसकी पूजा करें (यह पर्यावरण के लिए भी अच्छा है) |

  • किसी मंदिर या पार्क में जाकर वट वृक्ष की पूजा करें |

  • घर के आंगन या छत पर वट वृक्ष की प्रतीकात्मक पूजा करें |

प्रश्न 15 : क्या इस व्रत (Vat Savitri) का कोई वैज्ञानिक महत्व भी है ?
उत्तर : हां, इस व्रत (Vat Savitri) के कई वैज्ञानिक और सामाजिक पहलू हैं :

  1. पर्यावरणीय महत्व : वट वृक्ष (बरगद) प्राकृतिक रूप से बहुत लंबी आयु वाला और ऑक्सीजन का बड़ा स्रोत होता है। इसकी पूजा का उद्देश्य वृक्षों के प्रति सम्मान और संरक्षण की भावना जागृत करना है।

  2. स्वास्थ्य लाभ : व्रत रखने से शरीर का डिटॉक्सिफिकेशन होता है और पाचन तंत्र को आराम मिलता है।

  3. मानसिक संतुलन : उपवास और पूजा से मानसिक शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

  4. सामाजिक समरसता : महिलाएं एकत्रित होकर व्रत-पूजा करती हैं, जिससे सामाजिक बंधन मजबूत होते हैं और आपसी सहयोग बढ़ता है।

  5. मौसम परिवर्तन : ज्येष्ठ मास गर्मी का समय होता है। उपवास से शरीर गर्मी के प्रभाव से बचता है और फलाहार से पानी की कमी पूरी होती है।

प्रश्न 16 : क्या विदेशों में रहने वाली महिलाएं यह व्रत (Vat Savitri) कर सकती हैं ?
उत्तर : बिल्कुल कर सकती हैं। विदेशों में भी यह व्रत (Vat Savitri) लोकप्रिय हो रहा है :

  • ऑनलाइन माध्यम से पूजा सामग्री मंगवा सकती हैं |

  • हिंदू मंदिरों में सामूहिक पूजा का आयोजन होता है |

  • वट वृक्ष उपलब्ध न हो तो उसकी शाखा या चित्र का उपयोग कर सकती हैं |

  • परिवार के साथ वीडियो कॉल पर कथा सुन सकती हैं |

  • स्थानीय समयानुसार तिथि का निर्धारण कर सकती हैं (पंचांग देखकर) |

प्रश्न 17 : इस व्रत को करने से क्या लाभ मिलते हैं ?
उत्तर : मान्यता है कि इस व्रत (Vat Savitri) को करने से :

  • पति की आयु लंबी होती है और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है |

  • वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है |

  • संतान सुख की प्राप्ति होती है |

  • परिवार में समृद्धि और खुशहाली आती है |

  • संतान दीर्घायु और यशस्वी होती है |

  • सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं |

शास्त्रों के अनुसार, सावित्री ने इस व्रत (Vat Savitri) के प्रभाव से ही अपने पति को यमराज से वापस पाया था।

प्रश्न 18 : क्या यह व्रत (Vat Savitri) केवल हिंदू धर्म में ही मनाया जाता है ?
उत्तर : यह व्रत (Vat Savitri) मुख्यतः हिंदू धर्म में मनाया जाता है, लेकिन नेपाल, मॉरिशस, फिजी, त्रिनिदाद, सूरीनाम, गुयाना, दक्षिण अफ्रीका आदि देशों में भी भारतीय मूल के हिंदू इसे मनाते हैं। जैन धर्म में भी कुछ समुदायों में यह व्रत प्रचलित है। बौद्ध धर्म में भी सावित्री की कहानी को एक आदर्श पत्नी के रूप में सराहा जाता है।

प्रश्न 19 : क्या यह व्रत (Vat Savitri) हर साल करना चाहिए ?
उत्तर : हां, यह व्रत (Vat Savitri) हर साल करना चाहिए। मान्यता है कि इसे कम से कम 5, 7 या 16 साल तक लगातार करना चाहिए। कुछ महिलाएं जीवनपर्यंत यह व्रत करती हैं। यदि किसी कारण से व्रत (Vat savitri) छूट जाए तो अगले वर्ष संकल्प लेकर कर सकती हैं।

प्रश्न 20 : क्या बेटी के जन्म पर भी यह व्रत किया जा सकता है ?
उत्तर : हां, बेटी के जन्म पर भी यह व्रत (Vat Savitri) किया जा सकता है। कई परिवारों में बेटी के जन्म पर या उसके विवाह के बाद पहले वर्ष विशेष रूप से यह व्रत किया जाता है। माताएं अपनी बेटियों के सुहाग की लंबी आयु के लिए भी यह व्रत करती हैं।

प्रश्न 21 : वट सावित्री (Vat Savitri) व्रत और करवा चौथ में क्या अंतर है ?
उत्तर :

विशेषतावट सावित्री व्रतकरवा चौथ
समयज्येष्ठ मास (मई-जून)कार्तिक मास (अक्टूबर-नवंबर)
तिथिपूर्णिमा या अमावस्याकृष्ण पक्ष की चतुर्थी
मुख्य पूजावट वृक्ष की पूजाचंद्रमा की पूजा
कथासावित्री-सत्यवान की कथाकरवा माता या वीरावती की कथा
भौगोलिक प्रचलनपूरे भारत मेंमुख्यतः उत्तर भारत में
पारणअगले दिन प्रातःचंद्रोदय के बाद

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