Radha Ashtami

radha

1. राधा (Radha) अष्टमी क्योँ मनाते हैं?

भारतीय संस्कृति में जब भी प्रेम, भक्ति और समर्पण की चर्चा होती है, तो सबसे पहले मन में श्रीकृष्ण और श्रीराधा का नाम आता है। श्रीकृष्ण को यदि पूर्ण पुरुषोत्तम कहा जाता है, तो राधा (Radha) जी को भक्ति, प्रेम और करुणा की प्रतिमूर्ति माना जाता है। दोनों के नाम को अलग-अलग लेना भी अधूरा माना जाता है। इसीलिए भक्तजन “राधे-कृष्ण”, “राधा रमण”, “राधा-कृष्णलाल” कहकर उनका स्मरण करते हैं।

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राधा अष्टमी का पर्व राधा जी के जन्मोत्सव के रूप में पूरे ब्रजमंडल और भारतवर्ष में अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पर्व भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को आता है, अर्थात जन्माष्टमी से ठीक पंद्रह दिन बाद।

राधा (Radha) जी का व्यक्तित्व केवल कृष्ण की प्रेयसी का ही नहीं, बल्कि “भक्ति मार्ग” की आधारशिला के रूप में देखा जाता है। वैष्णव परंपरा मानती है कि श्रीकृष्ण अपने भक्तों को जो प्रेम और आनंद देते हैं, वह राधा जी की कृपा से ही संभव है।

भक्ति आंदोलन के महान संतों ने राधा-कृष्ण की महिमा का गान किया।

  • सूरदास ने अपने पदों में राधा-कृष्ण के प्रेम और विहार का अद्भुत वर्णन किया।
  • मीराबाई ने राधा (Radha) को अपनी आदर्श मानकर कृष्ण को अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया।
  • चैतन्य महाप्रभु ने राधा (Radha) जी को भक्ति की सर्वोच्च देवी माना और स्वयं को राधा भाव में स्थित कर लिया।

राधा (Radha) अष्टमी केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह प्रेम, करुणा, भक्ति और आत्मसमर्पण का संदेश देता है। इस दिन श्रद्धालु व्रत-उपवास रखते हैं, भजन-कीर्तन करते हैं और मंदिरों में जाकर राधा-कृष्ण की आराधना करते हैं।

विशेषकर बरसाना, जहाँ राधा जी का जन्म हुआ माना जाता है, और वृंदावन, जहाँ उनकी लीलाएँ हुईं, वहाँ इस पर्व की छटा अद्भुत होती है। शोभायात्राएँ निकलती हैं, भजन-कीर्तन गाए जाते हैं और रासलीला का आयोजन होता है।

यदि कृष्ण भारतीय संस्कृति के “हृदय” हैं, तो राधा (Radha) उसकी “आत्मा” हैं। इसीलिए कहा जाता है कि — राधा बिन श्याम अधूरे हैं और श्याम बिन राधा।”

2. राधा (Radha) जी का जन्म प्रसंग

(A) वृषभानु और कीर्ति देवी

राधा (Radha) जी का जन्म वृषभानु जी और कीर्ति देवी के घर हुआ। वृषभानु जी एक सम्पन्न गोप थे और उनकी गिनती ब्रज के प्रमुख गणमान्य व्यक्तियों में होती थी। कीर्ति देवी अत्यंत धर्मपरायण और सौम्य स्वभाव की थीं।

शास्त्रों में वर्णन है कि वृषभानु जी और कीर्ति देवी को राधा (Radha) जैसी दिव्य पुत्री का आशीर्वाद पिछले जन्म के पुण्यों और तपस्या का परिणाम था।

(B) जन्मस्थान

कुछ ग्रंथों में राधा जी का जन्म रावल गाँव (वर्तमान मथुरा जनपद) में बताया गया है। बाद में वृषभानु जी अपना परिवार लेकर बरसाना में बस गए। इसलिए आज भी बरसाना को “राधा रानी की जन्मभूमि” माना जाता है और यहाँ राधा (Radha) अष्टमी पर विशाल मेला लगता है।

(C) जन्म की विशेष परिस्थितियाँ

राधा (Radha) जी का जन्म भाद्रपद मास, शुक्ल पक्ष, अष्टमी तिथि, बुधवार, रोहिणी नक्षत्र में हुआ। उनके जन्म के समय पूरे ब्रजमंडल में अद्भुत आभा छा गई थी।

  • वातावरण में सुगंध फैल गई।
  • आकाश से पुष्प वर्षा हुई।
  • देवताओं ने नंदनवन से दिव्य ध्वनियाँ प्रकट कीं।

(D) नेत्र खोलने की कथा

सबसे प्रसिद्ध कथा यह है कि राधा (Radha) जी जन्म के समय नेत्रहीन थीं। उन्होंने अपनी आँखें नहीं खोलीं। जब श्रीकृष्ण का जन्म हुआ और वृषभानु जी अपने परिवार के साथ नंदबाबा के यहाँ बधाई देने गए, तब पहली बार राधा (Radha) जी ने कृष्ण का दर्शन किया और अपनी आँखें खोलीं।

यह घटना प्रतीक है कि राधा (Radha) का जीवन केवल कृष्ण के लिए है। वे केवल उन्हीं को देखना चाहती हैं।

(E) दिव्य अवतार के रूप में राधा

वैष्णव मत के अनुसार राधा (Radha) जी कोई साधारण मानव नहीं थीं। वे स्वयं महालक्ष्मी का अवतार थीं। श्रीकृष्ण को “शक्तिमान” कहा जाता है और राधा (Radha) जी को “शक्ति”। उनके बिना कृष्ण अधूरे हैं।

चैतन्य महाप्रभु के अनुयायी मानते हैं कि राधा जी श्रीकृष्ण की “ह्लादिनी शक्ति” हैं, जो भक्तों को भक्ति और आनंद प्रदान करती हैं।

(F) ज्योतिषीय महत्व

जन्मकुंडली के अनुसार, राधा (Radha) जी का जन्म समय अत्यंत शुभ योगों में हुआ था।

  • अष्टमी तिथि – यह तिथि दुर्गा और शक्ति की तिथि है।
  • रोहिणी नक्षत्र – यह नक्षत्र चंद्रमा का सबसे प्रिय नक्षत्र है, जो प्रेम और सौंदर्य का प्रतीक है।
  • बुधवार का दिन – बुद्धि और सौम्यता का प्रतीक।

इन योगों से यह स्पष्ट है कि राधा (Radha) जी स्वयं दिव्य शक्ति के रूप में अवतरित हुईं।

3.राधा जी का बाल्यकाल

राधा (Radha) जी का बाल्यकाल दिव्यता और सौम्यता से परिपूर्ण था। वे बचपन से ही असाधारण गुणों से युक्त थीं। ब्रजभूमि की गलियों में, यमुना के तट पर और वृक्षों की छाँव में उनके खेल आज भी भक्ति साहित्य और लोककथाओं में जीवित हैं।

(A) सौंदर्य और कोमलता

बचपन में ही राधा (Radha) जी इतनी सुंदर थीं कि जब वे गलियों में निकलतीं, तो पूरा ब्रजमंडल निहारता रह जाता था। उनकी आँखें कमल की पंखुड़ियों जैसी थीं, उनकी मुस्कान चंद्रमा की शीतलता जैसी थी।

(B) गोपियों के साथ खेल

राधा (Radha) जी अपनी सखियों (ललिता, विशाखा, चम्पकलता आदि) के साथ खेला करतीं। वे कभी यमुना तट पर जलक्रीड़ा करतीं, तो कभी बगीचों में झूला झूलतीं। ब्रज की गोपियाँ राधा जी को अपनी नेत्रों का तारा मानती थीं।

(C) कृष्ण के प्रति अनुराग

राधा (Radha) जी बचपन से ही श्रीकृष्ण के प्रति अनुरक्त थीं। जब भी कृष्ण अपनी बांसुरी बजाते, राधा जी मंत्रमुग्ध होकर उसकी ओर खिंची चली जातीं। उनके हृदय में कृष्ण का प्रेम इतना गहरा था कि वे किसी और की ओर देखना भी नहीं चाहती थीं।

(D) धार्मिक संस्कार

राधा (Radha) जी के माता-पिता ने उन्हें धार्मिक संस्कार दिए। वे नित्य प्रातः उठकर स्नान करतीं, गो-सेवा करतीं और देवताओं की पूजा करतीं। उनके संस्कारों में करुणा और सेवा का भाव विशेष रूप से प्रकट होता था।

(E) लोककथाएँ

लोककथाओं में वर्णन है कि जब कृष्ण और राधा (Radha) छोटे थे, तो कभी-कभी राधा जी नाराज होकर उनसे बोलती नहीं थीं। तब कृष्ण उन्हें मनाने के लिए विभिन्न लीलाएँ रचते। यही प्रसंग बाद में “मान-लीला” के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

(F) बाल्यकाल का महत्व

राधा (Radha) जी का बाल्यकाल केवल खेलों और सौंदर्य का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह भक्ति की नींव भी है। उनके बचपन में ही वह अनन्य भक्ति और समर्पण की झलक दिखाई देती है, जो आगे चलकर संपूर्ण वैष्णव परंपरा की आधारशिला बनी। राधा जी ने बताया कि प्रेम के माध्यम से किस तरह ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है|

4. राधा जी का स्वरूप और गुण

राधा जी के स्वरूप और गुणों का वर्णन अनेक ग्रंथों, स्तोत्रों और कविताओं में मिलता है। उन्हें केवल कृष्ण की प्रिय ही नहीं, बल्कि “भक्ति देवी” और “शक्ति” माना गया है।

(A) स्वरूप का वर्णन

  • राधा जी के शरीर का वर्ण स्वर्ण के समान चमकदार था।
  • उनके नेत्र कमल की पंखुड़ियों जैसे बड़े और आकर्षक थे।
  • उनकी मुस्कान से वातावरण में आनंद भर जाता था।
  • उनके गले में मोतियों और फूलों की माला सदैव शोभायमान रहती थी।

जयदेव के गीत गोविंद में राधा जी के सौंदर्य का अद्भुत वर्णन है — स्मेराननं स्मित-सम्भ्रमार्द्रं, श्यामं मनोहरमपांगवृष्टि।”

(B) मुख्य गुण

  1. भक्ति – राधा जी का सबसे बड़ा गुण उनकी अनन्य भक्ति थी। उनका सम्पूर्ण जीवन केवल श्रीकृष्ण के लिए समर्पित था।
  2. करुणा – वे सब पर दया करतीं, गोपियों, सखियों और ब्रजवासियों के सुख-दुःख में साथ रहतीं।
  3. त्याग – उन्होंने कभी अपने सुख की चिंता नहीं की। उनका एकमात्र ध्येय कृष्ण की सेवा और संतोष था।
  4. धैर्य और निष्ठा – चाहे कोई भी परिस्थिति हो, उनका विश्वास श्रीकृष्ण पर अडिग रहा।
  5. माधुर्य – उनका वचन, व्यवहार और चाल-ढाल सब मधुर थे।

(C) शक्ति स्वरूपा

गौड़ीय वैष्णव दर्शन में राधा जी को श्रीकृष्ण की ह्लादिनी शक्ति कहा गया है। वे आनंद और प्रेम का स्रोत हैं। कृष्ण से प्राप्त आनंद का अनुभव भक्त केवल राधा की कृपा से कर सकता है।

(D) राधा कृपा

भक्त साहित्य में राधा जी को “कृपा स्वरूपा” कहा गया है। मान्यता है कि बिना राधा जी की कृपा के कृष्ण की प्राप्ति संभव नहीं। इसी कारण भजनकार गाते हैं – राधा रानी मेरी सहाय, तो क्यों डरूँ जगत माया।”

(E) संत वाणी

  • सूरदास ने कहा – राधा के मन बसत हरि, हरि के मन बसत राधा।”
  • मीरा ने राधा को अपना आदर्श मानकर लिखा – मीरा के प्रभु गिरधर नागर, राधा के संग सुभाय।”

(F) स्वरूप और गुण का महत्व

राधा जी का स्वरूप और गुण केवल सौंदर्य और करुणा तक सीमित नहीं है। वे हमें यह सिखाते हैं कि जीवन का सच्चा उद्देश्य भक्ति, त्याग और प्रेम है।

5. राधा-कृष्ण का संबंध

राधा और कृष्ण का संबंध केवल प्रेम का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह दिव्यता और भक्ति का शाश्वत आदर्श है। वैष्णव परंपरा में कहा गया है – राधा बिना कृष्ण अधूरे हैं और कृष्ण बिना राधा अधूरे हैं।”

(A) अद्वितीय प्रेम

राधा और कृष्ण का प्रेम सांसारिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक है। यह प्रेम आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है।

  • कृष्ण आनंद के स्वरूप हैं और राधा आनंद का रस।
  • कृष्ण प्रेम के लक्ष्य हैं और राधा प्रेम का साधन।
  • दोनों का संबंध “अद्वैत” की स्थिति को प्रकट करता है।

(B) लीलाएँ

ब्रजभूमि में राधा और कृष्ण की अनेक लीलाएँ प्रसिद्ध हैं –

  • माखन चोरी – जब कृष्ण माखन चुराते, तो राधा उन्हें चिढ़ातीं और गोपियों को बुलातीं।
  • बांसुरी की तान – कृष्ण की बांसुरी की ध्वनि सुनकर राधा जी मोहिनी हो उठतीं।
  • रसलीला – राधा-कृष्ण का मिलन ब्रज की रसलीलाओं में चरमोत्कर्ष पर पहुँचता है। यह लीला केवल नृत्य नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के मिलन का गूढ़ प्रतीक है।

(C) मान और मिलन

राधा जी कभी-कभी कृष्ण से रुष्ट हो जातीं (मान करतीं)। यह मान भी प्रेम का एक रूप है। जब कृष्ण उन्हें मनाते, तो दोनों का मिलन भक्तों के लिए आनंद का स्रोत बनता। इसमें श्री कृष्णा ने संसार को प्रेम का एक नया मार्ग दिखाया | श्री कृष्णा  और राधा का प्रेम पुरे मानव समाज के लिए एक मिसाल है |

(D) वैष्णव दर्शन

  • गौड़ीय वैष्णव मत के अनुसार, राधा और कृष्ण “एक ही तत्व” हैं।
  • राधा कृष्ण की ह्लादिनी शक्ति हैं – अर्थात आनंद और प्रेम की ऊर्जा।
  • भक्तों का मानना है कि जब तक राधा जी की कृपा न हो, तब तक कृष्ण की प्राप्ति नहीं हो सकती।

(E) संत वाणी

  • सूरदास ने कहा – राधा-कृष्ण एक ही आत्मा के दो रूप हैं।”
  • चैतन्य महाप्रभु स्वयं राधा-भाव से कृष्ण का भजन करते थे।

(F) प्रतीकात्मक महत्व

राधा-कृष्ण का संबंध हमें यह सिखाता है कि ईश्वर की प्राप्ति केवल प्रेम से ही संभव है। भक्ति का चरम रूप वही है, जहाँ आत्मा अपने को भूलकर केवल परमात्मा में लीन हो जाती है। प्रेम के द्वारा किसी का भी दिल जीता जा सकता है | प्रेम समाज को और एक दुसरे को भी बांध कर रखता है |

6. राधा अष्टमी का महत्व

राधा अष्टमी का त्योहार भक्ति, प्रेम और आध्यात्मिकता का उत्सव है। यह केवल राधा जी का जन्मदिवस नहीं, बल्कि भक्ति की दिव्य परंपरा का स्मरण भी है।

(A) तिथि और पर्व

  • राधा अष्टमी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है।
  • यह जन्माष्टमी के 15 दिन बाद आती है।
  • मान्यता है कि इस दिन राधा जी ने वृषभानु गाँव में अवतार लिया था।

(B) धार्मिक महत्व

  1. भक्ति की देवी – राधा जी को भक्ति की मूर्ति माना गया है। उनकी पूजा करने से मनुष्य के हृदय में भक्ति और करुणा जागृत होती है।
  2. कृपा की प्राप्ति – भक्त मानते हैं कि राधा जी की कृपा से ही श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है।
  3. पुण्य लाभ – इस दिन व्रत रखने और पूजा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

(C) व्रत विधि

  • प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • व्रत का संकल्प लें।
  • राधा जी का पूजन पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और भजन-कीर्तन से करें।
  • श्रीकृष्ण और राधा जी का संयुक्त पूजन विशेष फलदायी है।
  • संध्या समय कथा और आरती करें।

(D) ब्रजभूमि में उत्सव

बरसाना, वृंदावन और मथुरा में राधा अष्टमी का उत्सव अत्यंत धूमधाम से मनाया जाता है।

  • बरसाना में राधा रानी मंदिर में भव्य झाँकियाँ सजाई जाती हैं।
  • भक्तजन नृत्य-कीर्तन करते हैं।
  • हजारों श्रद्धालु दूर-दूर से इस दिन राधा जी के दर्शन हेतु आते हैं।

(E) सांस्कृतिक महत्व

  • लोकगीतों और भजनों में राधा अष्टमी का विशेष स्थान है।
  • इस दिन महिलाएँ राधा-कृष्ण के भजन गाती हैं और झूले सजाती हैं।
  • समाज में प्रेम, करुणा और एकता का संदेश प्रसारित होता है।

(F) दार्शनिक महत्व

  • राधा अष्टमी हमें यह सिखाती है कि जीवन का वास्तविक लक्ष्य भक्ति है।
  • सांसारिक इच्छाएँ क्षणिक हैं, परंतु ईश्वर का प्रेम शाश्वत है।
  • राधा जी का जीवन हमें त्याग और समर्पण की शिक्षा देता है।

7. राधा अष्टमी से जुड़ी कथाएँ और मान्यताएँ

राधा अष्टमी के पर्व से अनेक पौराणिक और लोक कथाएँ जुड़ी हुई हैं। ये कथाएँ राधा जी की दिव्यता और उनकी भक्ति की महिमा को दर्शाती हैं।

(A)जन्म कथा

पुराणों में वर्णित है कि राधा जी वृषभानु और कीर्ति देवी की पुत्री थीं। उनका जन्म एक कमल के फूल पर हुआ था। कुछ मान्यताओं के अनुसार, जब नंदबाबा यमुना में स्नान कर रहे थे, तब उन्हें एक दिव्य कन्या कमल पर तैरती मिली। नंदबाबा ने उसे वृषभानु जी को सौंपा। यही दिव्य कन्या राधा जी थीं।

(B) अंधत्व और दिव्य दृष्टि

कहा जाता है कि जन्म के समय राधा जी की आँखें बंद थीं। उन्होंने पहली बार नेत्र खोले तो केवल कृष्ण के दर्शन के लिए। इसीलिए राधा और कृष्ण का संबंध प्रारंभ से ही अभिन्न माना जाता है। ये समाज को प्रेम का समर्पण रूप दिखाया |

(C) राधा जी का स्वरूप

लोक कथाओं में राधा जी को सदा किशोरी स्वरूप में ही बताया गया है। उनका रूप, सौंदर्य और माधुर्य अनंत और अतुलनीय है।

  • उनके सौंदर्य की तुलना स्वयं ब्रह्मा ने “अनंत चंद्रमाओं की शीतलता” से की है।
  • संत कवियों ने राधा जी को “प्रेम की मूर्ति” कहा है।

(D) राधा-कृष्ण की लीला कथाएँ

  • मोरपंख का उपहार – कहा जाता है कि कृष्ण के सिर का मोरपंख राधा जी की ही भेंट था।
  • झूलन लीला – श्रावण-भाद्रपद के महीनों में राधा-कृष्ण झूले पर झूलते थे।
  • मान और रसानंद – राधा जी का मान करना और फिर कृष्ण का उन्हें मनाना ब्रज की रस परंपरा का अनोखा हिस्सा है।

(E) भक्तों की मान्यता

  • राधा जी को “भक्ति की अधिष्ठात्री देवी” माना जाता है।
  • उनका स्मरण करने से मन में प्रेम और करुणा का संचार होता है।
  • संत कहते हैं कि – राधा नाम का स्मरण करने मात्र से ही कृष्ण मिल जाते हैं।”

8. उपसंहार और आज के समय में प्रासंगिकता

राधा अष्टमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह भक्ति, प्रेम और समर्पण का उत्सव है।

(A) आज की आवश्यकता

आज का समाज भौतिकता, ईर्ष्या और स्वार्थ से ग्रस्त है। ऐसे समय में राधा जी का जीवन हमें प्रेम, त्याग और निष्काम भक्ति की प्रेरणा देता है।

  • राधा जी सिखाती हैं कि ईश्वर की प्राप्ति केवल भक्ति और समर्पण से ही संभव है।
  • उनका आदर्श हमें यह बताता है कि प्रेम का सर्वोच्च रूप निस्वार्थ होता है।

(B) आध्यात्मिक दृष्टि

  • राधा अष्टमी हमें याद दिलाती है कि जीवन का उद्देश्य केवल सांसारिक उपलब्धियाँ नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और ईश्वर प्रेम है।
  • यह पर्व मनुष्य को आत्मा और परमात्मा के मिलन की दिशा दिखाता है।

(C) सामाजिक संदेश

  • राधा जी का जीवन करुणा, समानता और सह-अस्तित्व का संदेश देता है।
  • राधा अष्टमी हमें सिखाती है कि समाज में प्रेम और भाईचारा ही सच्चा धर्म है।

9. निष्कर्ष

राधा अष्टमी का पर्व हमें केवल पूजा-पाठ का अवसर ही नहीं देता, बल्कि यह हमारे जीवन को भक्ति और प्रेम से परिपूर्ण बनाने का मार्ग भी दिखाता है। राधा जी का जन्मदिवस वास्तव में भक्ति का जन्मदिवस है।

राधे-राधे 🙏

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