Premanand Ji Maharaj News

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1. प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्भूमि

श्री हित प्रेमानंद (Premanand Ji) गोविन्द शरण जी महाराज, जिन्हें आज करोड़ों लोग “प्रेमानंद (Premanand) महाराज ” के नाम से जानते हैं, का जन्म 30  मार्च 1969 को उत्तर प्रदेश के कानपूर जिले के सरसोल ब्लाक के एक छोटे से गाँव अखरी में हुआ | यह गाँव हरियाली, सादगी और धार्मिक वातावरण से भरा हुआ है | उनका जन्म का नाम अनिरुद्ध कुमार पाण्डेय था | उनके माता पिता, श्री शम्भू पाण्डेय और रामादेवी, अत्यंत धार्मिक और संस्कारी व्यक्ति थे |

Table of Contents

(A) बचपन से भक्ति का संस्कार

अखरी गाँव उस समय कृषि-प्रधान और सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध था। पिता शंभु पाण्डेय खेती-बाड़ी के साथ-साथ धार्मिक अनुष्ठानों में भी निपुण थे। माता रमा देवी एक गृहिणी होते हुए भी पूजा-पाठ, व्रत-उपवास और कथा-कीर्तन में सक्रिय रहतीं। घर के बड़े-बुजुर्ग, विशेषकर दादा जी, प्रातः काल से ही जप-माला और ग्रंथ-पाठ में लीन रहते, जिससे घर का वातावरण सत्संगमय रहता।

अनिरुद्ध (Premanand ji) का बचपन ऐसे माहौल में बीता जहाँ धर्म केवल पूजा तक सीमित नहीं था, बल्कि जीवन के हर कार्य में भगवान का स्मरण था—खाना खाने से पहले भजन, खेती करते समय मंत्र-जप, और रात को सोने से पहले कथा-सुनना।

(B) बचपन में भक्ति की झलक

उन्होंने (Premanand ji) अपनी प्रारंभिक शिक्षा गाँव के ही प्राथमिक विद्यालय से शुरू की। पढ़ाई में वे औसत से बेहतर थे, लेकिन उनका मन अधिकतर धार्मिक पुस्तकों और कथा-कहानियों में लगा रहता। कक्षा पाँच से ही उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता और श्री सुखसागर पढ़ना प्रारंभ कर दिया। वे अपनी उम्र के बच्चों से अलग इस मायने में थे कि खेलने-कूदने से अधिक उन्हें भजन, आरती और पूजा में आनंद मिलता था।

गाँव के लोग अक्सर कहते—

“यह लड़का (Premanand Ji) सामान्य नहीं है, इसकी आँखों में एक अलग ही चमक है।” वे खेतों, बागों और नदी किनारे बैठकर “राम-जय-राम” या “कृष्ण-गोविंद-गोपाल” का जप करते। उनका यह स्वभाव धीरे-धीरे गहरी भक्ति और वैराग्य की नींव डाल रहा था।

(a) मंदिर की घंटी का आकर्षण

जब अनिरुद्ध (Premanand ji) लगभग 7 साल के थे, तो गाँव के शिव मंदिर में रोज़ सुबह-सुबह घंटी बजने की आवाज़ आती थी। एक दिन उन्होंने अपनी माँ से कहा—

“माँ, मैं भी मंदिर जाकर घंटी बजाना चाहता हूँ।” माँ ने मुस्कुराकर कहा—“बेटा, पहले नहा-धोकर, साफ़ कपड़े पहनकर जाओ।” उस दिन से उन्होंने यह नियम बना लिया कि हर सुबह नहा-धोकर मंदिर जाकर भगवान को प्रणाम करेंगे और घंटी बजाएँगे। यह आदत उनके जीवन भर बनी रही—आज भी वे आरती में घंटी की ध्वनि को भक्ति का हिस्सा मानते हैं।

(b) रामलीला का अभिनय

गाँव में होने वाली रामलीला में बच्चे छोटे-छोटे रोल निभाते थे। एक साल, उन्हें बाल हनुमान का रोल मिला। उन्होंने इतनी लगन से संवाद याद किए कि गाँव के लोग कहते—“ये तो सच में हनुमान बन गया है।” इस अभिनय में उन्होंने सीखा कि लीला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि साधना का माध्यम भी है

2. किशोरावस्था और वैराग्य का संकल्प

(A) संसार की नश्वरता का अनुभव

जब किशोरावस्था में उन्होंने (Premanand ji)  देखा कि गाँव के कई बुज़ुर्ग, जो कभी स्वस्थ और संपन्न थे, धीरे-धीरे बीमारियों और उम्र के कारण निर्बल हो रहे थे। तो  उनके मन में प्रश्न उठा—“क्या जीवन केवल जन्म, खाना-पीना और मृत्यु तक सीमित है?” यहीं से उनके भीतर वैराग्य की भावना का जन्म हुआ |

(B) 13 वर्ष में घर छोड़ना

एक सुबह, बिना किसी को बताए, अनिरुद्ध ने घर छोड़ दिया। उनके पास न पैसा था, न सामान—बस गले में तुलसी की माला और हाथ में गीता की एक छोटी प्रति। वे पैदल चलते-चलते, कभी सवारी पकड़कर, वाराणसी पहुँचे।

काशी में गंगा किनारे के घाट, मंदिर और संन्यासी उनका नया संसार बन गए। वे मणिकर्णिका घाट, पंचगंगा घाट और अस्सी घाट पर साधुओं के साथ बैठते, उनके प्रवचन सुनते, और भिक्षा में जो मिले, उसी से गुज़ारा करते। गंगा जल, मंदिर की घंटियों की ध्वनि, और संतों का संग—इन सबने उनके मन को और अधिक भक्ति में डुबो दिया।

3. गुरु की खोज और दीक्षा

(A) गुरु के बिना साधना अधूरी

अनिरुद्ध (Premanand ji) समझ चुके थे कि बिना गुरु के साधना अधूरी है। वे कहते—

“गुरु वह दीपक है, जो अंधकार में रास्ता दिखाता है।”

(B) शरणागति मंत्र की दीक्षा

काशी में उन्होंने पहले एक संत से “शरणागति मंत्र” की दीक्षा ली। यह उनके आध्यात्मिक जीवन का पहला औपचारिक कदम था।

(C) श्री हित गौरांगी शरण जी महाराज से मिलन

कुछ समय बाद, वे वृंदावन में रसिक परंपरा के संत श्री हित गौरांगी शरण जी महाराज के संपर्क में आए। गुरुदेव के चरणों में बैठते ही उन्हें लगा कि उनकी वर्षों की खोज समाप्त हो गई है। गुरुदेव ने उन्हें “निज मंत्र” की दीक्षा दी, जो राधा-कृष्ण की अनन्य भक्ति का प्रवेश द्वार है।

(D) गुरु-शिष्य संवाद का एक प्रसंग

दीक्षा के समय गुरु ने पूछा—

“क्या तुम अपना सब कुछ छोड़ने को तैयार हो?” अनिरुद्ध (Premanand ji) ने उत्तर दिया— “गुरुदेव, मेरे पास छोड़ने को कुछ नहीं, बस अपना जीवन है, वह भी आपके चरणों में अर्पित करता हूँ।”

4. वृंदावन आगमन और सेवा मिशन

(A) वृंदावन में पहली सुबह

गुरु की आज्ञा से वे वृंदावन पहुँचे। पहली सुबह यमुना तट पर उन्होंने सूर्योदय के समय बाँसुरी की धुन सुनी—वह किसी स्थानीय कलाकार की थी, लेकिन उनके मन को लगा जैसे स्वयं श्रीकृष्ण बाँसुरी बजा रहे हों। उस दिन उन्होंने निश्चय किया—यही मेरी कर्मभूमि है।

(B) सेवा का विस्तार

वे मंदिरों में सफाई करते, फूल माला बनाते, और भूखे-प्यासे तीर्थयात्रियों को भोजन कराते। धीरे-धीरे लोग उन्हें “प्रेमानंद” नाम से पुकारने लगे—क्योंकि उनके चेहरे पर हमेशा प्रेम और आनंद झलकता था।

(C) श्री हित राधा केली कुंज ट्रस्ट की स्थापना (2016)

2016 में उन्होंने (Premanand ji) इस ट्रस्ट की स्थापना की। इसके अंतर्गत:

  • प्रतिदिन हजारों लोगों के लिए निशुल्क भोजन
  • गरीबों को वस्त्र और आवास
  • चिकित्सा शिविर
  • गौशाला और गौ-सेवा का आयोजन होता है।

(D) आश्रम का वातावरण

आश्रम में सुबह 2:30 बजे से ही पदयात्रा और जप-ध्यान शुरू हो जाता है। दिनभर भक्ति, सेवा और सत्संग चलता है। शाम को संध्या आरती के समय भजन की गूंज और घंटियों की ध्वनि वातावरण को अद्भुत बना देती है।

5. शिक्षाएँ, प्रवचन और प्रभाव

(A) प्रमुख शिक्षाएँ

  1. त्याग में ही सुख है।
  2. गुरु बिना मुक्ति नहीं।
  3. चरित्र ही असली संपत्ति है।
  4. भक्ति में भाव प्रधान है।
  5. सेवा और स्मरण का संतुलन।

(B) प्रवचनों की शैली

उनके (Premanand ji) प्रवचन सरल भाषा, रोचक उदाहरण और शास्त्रीय प्रमाण से भरपूर होते हैं। वे अक्सर कहते हैं —

“भक्ति कोई बोझ नहीं, यह तो आनंद का मार्ग है।”

(C) डिजिटल युग में भक्ति

  • YouTube और सोशल मीडिया पर लाखों अनुयायी
  • विराट कोहली, अनुष्का शर्मा, हेमा मालिनी जैसे लोग भी उनसे मिलने आते हैं
  • देश-विदेश में भक्ति प्रचार

6. स्वास्थ्य, चुनौतियाँ और वर्तमान जीवन

(A) युवा का प्रश्न

एक बार एक युवा ने उनसे पूछा—

“महाराज जी, मैं भक्ति करना चाहता हूँ, लेकिन मोबाइल और सोशल मीडिया में फँस जाता हूँ, क्या करूँ?” प्रेमानंद जी ने उत्तर दिया— “बेटा, जैसे तुम सुबह उठकर दाँत साफ़ करते हो, वैसे ही सुबह उठकर 5 मिनट नाम-स्मरण कर लो। आदत बन जाएगी और बाकी चीज़ें धीरे-धीरे छूट जाएँगी।” यह सरल उपाय कई युवाओं के जीवन में बदलाव लेकर आया।

(B) बीमारी के बावजूद सेवा

उन्हें (Premanand ji) पॉलीसिस्टिक किडनी डिज़ीज़ है, जिसके कारण डायलिसिस कराना पड़ता है। लेकिन वे कहते हैं—

“यह शरीर तो सेवा का साधन है, जब तक यह चलेगा, सेवा करता रहूँगा।”

(C) वर्तमान जीवन

आज वे (Premanand ji) वृंदावन में रहकर न केवल भक्ति का प्रचार करते हैं, बल्कि सामाजिक सेवा में भी अग्रणी हैं। उनकी दिनचर्या आज भी उतनी ही कठोर है जितनी युवावस्था में थी।

आज वे न केवल वृंदावन बल्कि पूरे भारत और विदेशों में भी भक्ति संदेश पहुँचा रहे हैं। वे कहते हैं—

“दुख और रोग भी यदि राधा-कृष्ण की याद दिलाएँ, तो वे वरदान हैं।”

7. निष्कर्ष

प्रेमानंद (Premanand ji) महाराज का जीवन एक अद्भुत यात्रा है—गाँव के एक साधारण बालक से लेकर वृंदावन के एक प्रेरक संत तक। उनकी कहानी यह सिखाती है कि सच्ची भक्ति में उम्र, साधन और परिस्थिति बाधा नहीं बनते—बस हृदय में प्रेम और सेवा-भाव होना चाहिए। उनकी विनम्रता, सेवा, और धैर्य हम सबके लिए एक आदर्श है।

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