महाशिवरात्रि: मोक्ष और साधना की रात

1. महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) : चेतना की जागृति का महापर्व

Maha Shivratri

भारतीय संस्कृति में पर्व और त्योहार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं, अपितु वे जीवन दर्शन के वे पड़ाव हैं जहाँ मनुष्य अपने भीतर झांकने का अवसर पाता है। महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) ऐसी ही एक पवित्र रात है, जो अंधकार से प्रकाश की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर और मृत्यु से अमरत्व की ओर जाने का मार्ग प्रशस्त करती है। 

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फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाने वाला यह पर्व केवल एक दिन का अनुष्ठान न होकर, चेतना के उच्चतम शिखर को छूने की एक साधना है। शिव का अर्थ है ‘कल्याण’ और ‘मंगल’ और रात्रि का अर्थ है ‘विश्राम’ और ‘ध्यान’। इस प्रकार महाशिवरात्रि का सीधा अर्थ है – कल्याण की उस चैतन्य ऊर्जा में विश्राम करना, जो समस्त सृष्टि का मूल आधार है .

यह रात्रि भौगोलिक और खगोलीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी एक विशेष रेखा में आते हैं, तब उत्तरी गोलार्ध में ऊर्जा का एक स्वाभाविक उभार होता है। सद्गुरु के अनुसार, पृथ्वी के 11 डिग्री अक्षांश पर, जहाँ इशा योग केंद्र स्थित है, यह ऊर्जा सर्वाधिक प्रवाहित होती है। यही कारण है कि हजारों वर्षों से यह रात्रि ध्यान और साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी गई है . 

आज विज्ञान भी यह मानता है कि मानव शरीर एक सूक्ष्म ब्रह्मांड है और जब बाहरी वातावरण में ऊर्जा का संचार होता है, तो वह हमारी आंतरिक चेतना को भी प्रभावित करता है। महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) उस प्रभाव को साधना में बदलने की रात है।

2. महाशिवरात्रि का शाब्दिक अर्थ

“महाशिवरात्रि (Maha Shivratri)” शब्द तीन भागों से मिलकर बना है:

  • महान / महा – अत्यंत महत्वपूर्ण

  • शिव – कल्याणकारी, शुभ, मंगल

  • रात्रि – अंधकार, अंतर्मन, साधना का समय

अर्थात यह वह महान रात्रि है जो शिव तत्व से जुड़ी है — वह चेतना जो अज्ञान, भय और बंधनों का नाश करती है।

भारतीय दर्शन में रात को साधना का विशेष समय माना गया है। मन शांत होता है, बाहरी शोर कम होता है और चेतना भीतर की ओर मुड़ती है। महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) की रात्रि को विशेष रूप से ऊर्जावान और जागृत माना जाता है।

इस दिन:

1) मन का शुद्धिकरण
2)  नकारात्मक प्रवृत्तियों का त्याग
3) ध्यान और जप का अभ्यास
4) आत्मनिरीक्षण का अवसर

शिव केवल देवता नहीं, बल्कि एक तत्व हैं — जो सृजन और संहार के बीच संतुलन बनाए रखते हैं।

3. महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) की अमर गाथाएं

हर पर्व के पीछे कोई न कोई कथा होती है, लेकिन महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) के साथ अनेक कथाएं जुड़ी हुई हैं। यह विविधता भारतीय संस्कृति की उदारता को दर्शाती है। इन कथाओं में से प्रत्येक में शिव के किसी न किसी स्वरूप का उद्घाटन होता है।

(A) समुद्र मंथन और नीलकंठ का प्राकट्य

महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा देवताओं और दानवों द्वारा किए गए समुद्र मंथन से जुड़ी है। जब इस मंथन से चौदह रत्न निकले, तो सबसे पहले निकला था विष, जिसे हलाहल या कालकूट कहा जाता है . यह विष इतना प्रचंड था कि उसकी एक लपट से समस्त सृष्टि भस्म हो सकती थी। देवता और दानव सभी त्राहि-त्राहि करने लगे। तब सभी ने भगवान शिव की शरण ली।

शिव सदैव दयालु और करुणामय हैं। उन्होंने समस्त प्राणियों की रक्षा के लिए वह विष अपने कंठ में धारण कर लिया। विष की तीव्रता ने उनके कंठ को नीला कर दिया और वे नीलकंठ कहलाए। परंतु उन्होंने उसे निगला नहीं, क्योंकि उनकी इच्छा थी कि यह विष नीचे न उतरे। उनकी पत्नी पार्वती ने उनके कंठ को दबाया, जिससे विष वहीं रुक गया। यह वह क्षण था जब शिव ने अपने भक्तों की रक्षा के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया। जिस रात यह घटना हुई, वह महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) के नाम से जानी गई . 

यह कथा हमें सिखाती है कि जीवन में सुख और दुख दोनों आते हैं, लेकिन एक योगी वह है जो विष को भी अमृत में बदलने की क्षमता रखता है, अथवा कम से कम उसे अपने कंठ में समेटकर संसार की रक्षा तो कर ही सकता है।

(B) शिव-पार्वती विवाह: प्रेम का पुनर्मिलन

एक अन्य प्रचलित कथा के अनुसार, इसी दिन भगवान शिव का देवी पार्वती से विवाह हुआ था . पूर्व जन्म में पार्वती, सती के रूप में शिव की पत्नी थीं। जब उनके पिता दक्ष प्रजापति ने एक यज्ञ में शिव का अपमान किया, तो सती ने उस यज्ञ की अग्नि में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए . इस घटना से दुखी होकर शिव गहन समाधि में लीन हो गए। सती ने अगले जन्म में हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में जन्म लिया और घोर तपस्या करके शिव को पुनः प्राप्त किया। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को ही शिव और पार्वती का विवाह संपन्न हुआ। 

इस दृष्टिकोण से महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) केवल वैराग्य की नहीं, बल्कि गृहस्थ और संयोग की भी रात्रि है। यही कारण है कि विवाहित महिलाएं सुहाग की लंबी आयु के लिए व्रत रखती हैं और कुंवारी कन्याएं मनवांछित वर की प्राप्ति के लिए शिव से प्रार्थना करती हैं।

(C) शिवलिंग का प्राकट्य और ब्रह्मा-विष्णु का संघर्ष

एक तीसरी महत्वपूर्ण कथा ब्रह्मा और विष्णु के अहंकार के नाश से जुड़ी है . एक बार दोनों में इस बात पर विवाद हो गया कि सृष्टि में सर्वश्रेष्ठ कौन है? उनके इस संघर्ष को देखकर भगवान शिव ने एक अनंत ज्योति स्तंभ (लिंग) के रूप में प्रकट होकर उनकी परीक्षा ली। उन्होंने दोनों से कहा कि जो इस ज्योति स्तंभ के आदि या अंत का पता लगा लेगा, वही सर्वश्रेष्ठ होगा। 

ब्रह्मा ने हंस का रूप धारण करके ऊपर की ओर उड़ान भरी और विष्णु ने वराह का रूप लेकर पाताल में गोता लगाया। लेकिन वे दोनों असफल रहे। अंत में शिव स्वयं प्रकट हुए और घोषणा की कि वे सभी के आदि और अंत हैं। इस प्रकार महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) उस निराकार ब्रह्म के साकार रूप के दर्शन की रात्रि है।

4. शिवरात्रि और महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) में अंतर

बहुत से लोग भ्रमित होते हैं कि हर मास में आने वाली शिवरात्रि और महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) में क्या अंतर है।

शिवरात्रिमहाशिवरात्रि
हर मास आती हैवर्ष में एक बार
सामान्य पूजाअत्यंत विशेष साधना
सीमित महत्वसर्वोच्च महत्व

5. आध्यात्मिक दर्शन : जागृति की रात्रि

यदि हम पौराणिक कथाओं से ऊपर उठकर देखें, तो महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) का सबसे गहरा आयाम आध्यात्मिक है। यह रात्रि बाहरी आडंबरों की नहीं, बल्कि भीतर की यात्रा की है। साधना की दृष्टि से यह वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण रात्रि मानी गई है।

(A) शिव तत्व और मानव शरीर

तंत्र शास्त्र और योग विज्ञान के अनुसार, मानव शरीर में तीन नाड़ियाँ होती हैं – इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना। इड़ा चंद्र स्वरूप है, शीतल है और मन से जुड़ी है। पिंगला सूर्य स्वरूप है, ऊष्मा देती है और प्राण से जुड़ी है। सामान्य अवस्था में ये दोनों नाड़ियाँ सक्रिय रहती हैं, लेकिन सुषुम्ना, जो केंद्रीय नाड़ी है और आध्यात्मिक उत्थान का मार्ग है, प्रायः निष्क्रिय रहती है। महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) की रात्रि वह अवसर है जब ग्रहों की विशेष स्थिति के कारण सुषुम्ना नाड़ी स्वतः ही जागृत होने की संभावना बन जाती है . यही कारण है कि साधक इस रात्रि को जागरण करके अपनी ऊर्जा को इस नाड़ी में प्रवाहित करने का प्रयास करते हैं।

(B) अहर्निश जागरण: चैतन्य का उत्सव

महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) की रात्रि को जागरण करने का विधान केवल एक परंपरा नहीं है। इसका गूढ़ अर्थ है कि हम शारीरिक और मानसिक निद्रा (तमस) को त्यागकर चेतना के प्रकाश (सत्व) में स्थित हों। रात्रि के चार प्रहरों को चार अलग-अलग अवस्थाओं का प्रतीक माना गया है। पहले प्रहर में व्यक्ति भौतिक इच्छाओं से ऊपर उठता है, दूसरे में मानसिक विकारों को दूर करता है, तीसरे में आध्यात्मिक ज्ञान का उदय होता है और चौथे प्रहर में वह ब्रह्म से एकाकार हो जाता है . इस रात्रि को जागकर, भजन-कीर्तन और ध्यान में बिताने से व्यक्ति अपने भीतर की शिव ऊर्जा से जुड़ पाता है।

(C) शिवलिंग का अभिषेक: पंच तत्वों की साधना

शिवलिंग केवल पूजा की एक मूर्ति नहीं है। यह निराकार ब्रह्म का साकार प्रतीक है। ‘लिंग’ का अर्थ है ‘चिह्न’ – वह चिह्न जो निराकार की ओर संकेत करता है। महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) पर शिवलिंग का पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और चीनी या गंगाजल) से अभिषेक किया जाता है . यह पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश – इन पांच महाभूतों या पंच तत्वों का प्रतीक है। 

जब हम लिंग पर इन पदार्थों को चढ़ाते हैं, तो हम वास्तव में इन पंच तत्वों से बने अपने शरीर को शिव में समर्पित कर रहे होते हैं। यह बाहरी पूजा से कहीं अधिक, आत्म-साक्षात्कार की एक प्रक्रिया है। बिल्वपत्र चढ़ाने का विशेष महत्व है, क्योंकि यह पत्र त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) का प्रतीक माना जाता है और इसे चढ़ाने से त्रिकाल दोष समाप्त होते हैं .

(D) महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) और ध्यान

यह पर्व ध्यान साधना के लिए सर्वोत्तम अवसर माना जाता है। योग परंपराओं में इसे ऊर्जा परिवर्तन की रात्रि कहा गया है।

ध्यान के लाभ:

  1) मानसिक शांति
  2) स्पष्टता
  3) तनाव मुक्ति
  4) आत्मसाक्षात्कार की दिशा

आज के भागदौड़ भरे जीवन में यह पर्व हमें सिखाता है:

  • धीमा चलना

  • स्वयं को सुनना

  • भीतर की शांति ढूँढना

  • संयम और संतुलन

शिव का अर्थ ही है — कल्याण।

6. महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) का वैज्ञानिक आधार

maha shivratri

भारतीय परंपराएँ कभी भी अंधविश्वास पर आधारित नहीं रहीं। उनके पीछे गहरा वैज्ञानिक आधार रहा है। महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) भी इसका अपवाद नहीं है।

(A) खगोलीय घटनाक्रम

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो फाल्गुन मास की यह रात्रि वर्ष की सबसे अंधेरी रातों में से एक होती है। इस समय उत्तरी गोलार्ध में पृथ्वी की स्थिति ऐसी होती है कि वहाँ ऊर्जा का एक प्राकृतिक संचार होता है। सद्गुरु के अनुसार, पृथ्वी अपने अक्ष पर जिस प्रकार झुकी हुई है, उसके कारण 11 डिग्री अक्षांश पर अपकेंद्रीय बल सर्वाधिक होता है . यही कारण है कि इस क्षेत्र (जहाँ कालीमठ से लेकर कन्याकुमारी तक का भाग आता है) में साधना और ध्यान का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है। महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) वह दिन है जब यह ऊर्जा अपने चरम पर होती है।

(B) ऋतु परिवर्तन और स्वास्थ्य

महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) का समय शीत ऋतु के अंत और वसंत ऋतु के आगमन का सूचक है। यह ऋतु संधि (संक्रमण काल) का समय होता है, जब शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता सबसे कमजोर हो सकती है। इस समय किया गया व्रत शरीर को डिटॉक्स (विषहरण) करने का काम करता है . व्रत के दौरान गेहूं-चावल जैसे अनाज का सेवन न करके फल, दूध और साबूदाना जैसे सुपाच्य और ऊर्जा से भरपूर पदार्थों का सेवन किया जाता है, जिससे शरीर हल्का रहता है और पाचन तंत्र को आराम मिलता है। यह वैज्ञानिक दृष्टि से भी स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है।

(C) रात्रि जागरण का मनोवैज्ञानिक प्रभाव

पूरी रात जागकर ध्यान और भजन में बिताना एक प्रकार की नींद की कला (sleep hygiene) और चेतना की अवस्था (altered state of consciousness) को बदलने का प्रयास है। मनोविज्ञान कहता है कि जब हम अपनी दिनचर्या से हटकर कुछ करते हैं, तो हमारे मस्तिष्क में नए संयोजन (neural pathways) बनते हैं। रात्रि जागरण, साधारण नींद के चक्र को तोड़कर, व्यक्ति को अपने अवचेतन मन से जुड़ने का अवसर देता है।

 यह आत्म-चिंतन और आत्म-निरीक्षण की एक प्रक्रिया है। सामूहिक रूप से हजारों लोगों द्वारा एक साथ किया गया ध्यान और जाप एक सामूहिक चेतना (collective consciousness) का निर्माण करता है, जिसका वातावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

(D) महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) का गूढ़ अर्थ

महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) को समझने के लिए सबसे पहले “शिव” को समझना आवश्यक है। शिव का अर्थ केवल एक देवता नहीं है। संस्कृत में “शिव” का शाब्दिक अर्थ है — कल्याणकारी, शुभ, मंगलकारी

शिव का स्वरूप विरोधाभासों का संगम है:

1) संन्यासी भी, गृहस्थ भी
2) विनाशक भी, करुणामूर्ति भी
3) भस्मविभूषित भी, सौंदर्य के देव भी

यही कारण है कि शिव को “अद्वैत” का प्रतीक माना जाता है — जहाँ द्वंद्व समाप्त हो जाता है।

अधिकांश त्योहार दिन में मनाए जाते हैं, परंतु महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) का केंद्र रात्रि है। इसका गहरा मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक संकेत है।

रात्रि का प्रतीक:

  • अंधकार → अज्ञान

  • मौन → अंतर्मुखता

  • विश्राम → मन की शांति

  • सूक्ष्मता → ध्यान की अवस्था

जब बाहरी गतिविधियाँ कम होती हैं, मन भीतर की ओर मुड़ता है। शिव साधना का सार ही है — भीतर उतरना।

7. पर्व और प्रकृति : शिव का वन

भगवान शिव को ‘पशुपति’ कहा जाता है, जो समस्त प्राणियों के स्वामी हैं। उनका निवास हिमालय की ऊँचाइयों पर, बर्फ और वनों के बीच है। वे चंदन, भांग, धतूरा और बिल्व वृक्ष से अत्यधिक प्रेम करते हैं। महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) का पर्व प्रकृति और पर्यावरण से गहरे जुड़ाव का संदेश देता है .

(A) बिल्व पत्र का महत्व

बिल्व या बेल का पेड़ भारतीय उपमहाद्वीप में पाया जाने वाला एक औषधीय वृक्ष है। इसके पत्ते त्रिपत्रक होते हैं, जिन्हें त्रिदेव या त्रिगुण (सत, रज, तम) का प्रतीक माना जाता है। वैज्ञानिक दृष्टि से बिल्व पत्र में जीवाणुरोधी और एंटी-फंगल गुण होते हैं। जब इसे शिवलिंग पर चढ़ाया जाता है, तो यह जल और दूध के साथ मिलकर एक प्राकृतिक कीटाणुनाशक का काम करता है। यही कारण है कि मंदिरों में प्रतिदिन अभिषेक के बाद शिवलिंग पर बिल्व पत्र चढ़ाए जाते हैं। यह प्रकृति में उपलब्ध संसाधनों के प्रति हमारी कृतज्ञता और उनके संरक्षण का भी संदेश देता है।

(B) धतूरा और भांग : शिव का प्रसाद

शिव का एक रूप वैरागी और तपस्वी का है। धतूरा और भांग का सेवन आमतौर पर नशे के लिए किया जाता है, लेकिन शिव के संदर्भ में इनका आध्यात्मिक अर्थ है। धतूरा एक ऐसा फल है जो विषैला होता है, लेकिन इसका फूल शिव को अत्यंत प्रिय है। यह सिखाता है कि सांसारिक विष (वासनाएं, काम, क्रोध, लोभ) को भी यदि शिव के चरणों में समर्पित कर दिया जाए, तो वह प्रसाद बन जाता है। 

भांग को शिव की बेल या वनस्पति माना जाता है, जो उनकी साधना में सहायक होती है। ये सभी वनस्पतियाँ पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती हैं और यह दर्शाती हैं कि शिव का पर्व वन्य जीवन और वनस्पतियों से कितना जुड़ा हुआ है।

(C) पर्यावरण संरक्षण का संदेश

जब हम शिवलिंग पर जल, दूध, शहद चढ़ाते हैं, तो हम जल और पृथ्वी जैसे प्राकृतिक संसाधनों का सम्मान करते हैं। जब हम बिल्व पत्र तोड़ते हैं, तो हम वृक्ष के प्रति आभार प्रकट करते हैं। महाशिवरात्रि का पर्व हमें यह स्मरण दिलाता है कि हम इस पृथ्वी के मालिक नहीं, बल्कि संरक्षक हैं। शिव की जटाओं से गंगा निकलती है, उनके गले में सर्प लिपटा है और वे बैल की सवारी करते हैं। यह सब मनुष्य और प्रकृति के अटूट संबंध को दर्शाता है। आज जब जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संकट गहरा रहा है, महाशिवरात्रि का यह पहलू और भी प्रासंगिक हो जाता है .

(D) महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) और ऊर्जा

योग परंपराओं में यह रात्रि विशेष ऊर्जा परिवर्तन का समय मानी जाती है। कहा जाता है कि इस रात पृथ्वी की स्थिति ऐसी होती है जिससे शरीर की ऊर्जा स्वाभाविक रूप से ऊपर की ओर प्रवाहित होती है।

इसीलिए:

1) जागरण किया जाता है
2) ध्यान पर बल दिया जाता है
3) स्थिर बैठने की सलाह दी जाती है

यह अवधारणा वैज्ञानिक बहस का विषय हो सकती है, परंतु अनुभवात्मक परंपरा में इसका अत्यंत महत्व है।

बहुत लोग शिवलिंग को केवल पूजा का प्रतीक मानते हैं, परंतु इसका गहरा दार्शनिक आयाम है।

“लिंग” का अर्थ है — चिन्ह, प्रतीक, सूचक

शिवलिंग दर्शाता है:

1) निराकार ब्रह्म
2) अनंत ऊर्जा
3) सृजन का मूल स्रोत

यह रूप से अधिक अस्तित्व का प्रतीक है — जहाँ आकार गौण हो जाता है।

महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) पर जागरण का गहरा अर्थ है — अचेतनता से जागरूकता की ओर यात्रा

नींद का प्रतीक:

  • जड़ता

  • अज्ञान

  • असावधानी

जागरण का प्रतीक:

  • सजगता

  • ध्यान

  • चेतना

यह बाहरी जागरण नहीं, बल्कि भीतर की जागृति का संकेत है।

8. समकालीन महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) : वैश्विक उत्सव

महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) आज केवल भारत का ही नहीं, बल्कि एक वैश्विक पर्व बन चुका है। विश्व के कोने-कोने में, चाहे वह मॉरीशस हो, नेपाल हो या अमेरिका, शिव भक्ति के स्वर गूंजते हैं। भारत में भी इस पर्व को मनाने की अलग-अलग परंपराएँ और शैलियाँ हैं।

(A) इशा योग केंद्र, कोयंबटूर: आदियोगी के दर्शन

आधुनिक युग में महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) का सबसे भव्य और वैश्विक आयोजन सद्गुरु के इशा योग केंद्र, कोयंबटूर में होता है। वर्ष २०२६ में यह ३३वाँ आयोजन है . इस वर्ष मुख्य अतिथि के रूप में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जी उपस्थित रहेंगे, जबकि केंद्रीय मंत्री देवेंद्र फडणवीस और एल मुरुगन जैसे गणमान्य व्यक्ति भी इस अवसर की शोभा बढ़ाएंगे. 

इशा में महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) का उत्सव रात ६ बजे से प्रारंभ होकर अगली सुबह ६ बजे तक चलता है। इसकी शुरुआत ध्यानलिंग में पंचभूत क्रिया से होती है, जो पांच तत्वों को शुद्ध करने की एक शक्तिशाली प्रक्रिया है . इसके बाद लिंग भैरवी महा यात्रा होती है, जो दिव्य स्त्री ऊर्जा का उत्सव है। इस वर्ष का एक विशेष आकर्षण है योगेश्वर लिंग का महा अभिषेकम, जिसे सद्गुरु स्वयं संपन्न करेंगे। यह पहली बार है जब यह अभिषेक सार्वजनिक रूप से किया जा रहा है और दुनिया भर के भक्त इसमें ऑनलाइन पंजीकरण करके निःशुल्क भाग ले सकते हैं .

इशा उत्सव की एक और प्रमुख विशेषता है ‘आदियोगी दिव्य दर्शनम’। यह एक अद्भुत लाइट एंड साउंड शो है, जिसमें ११२ फीट ऊंची आदियोगी (भगवान शिव) की प्रतिमा को जीवंत कर दिया जाता है। सद्गुरु की वाणी में योग के इतिहास का वर्णन इस अनुभव को अविस्मरणीय बना देता है . 

इस आयोजन में देश-विदेश के प्रसिद्ध कलाकार अपनी प्रस्तुतियाँ देते हैं। इस वर्ष आदित्य गढ़वी (गुजराती लोक संगीत), परशुराम सोनागर और टीम (पारंपरिक ढोल), स्वरूप खान, ब्लेज़, पैराडॉक्स, स्वागत राठौड़ और पृथ्वी गंधर्व जैसे कलाकार अपनी प्रस्तुतियाँ देंगे . यह पूरा आयोजन १४० मिलियन (१४ करोड़) दर्शकों तक पहुँचने का अनुमान है, जो १०० से अधिक टीवी चैनलों और २३ भाषाओं में प्रसारित किया जाएगा .

(B) वाराणसी: बाबा विश्वनाथ की नगरी

उत्तर भारत में महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) का सबसे बड़ा केंद्र काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी है। इस दिन काशी में शिव की बारात निकलती है। हजारों की संख्या में श्रद्धालु गंगा में स्नान करके बाबा विश्वनाथ के दरबार में हाजिरी लगाते हैं। मंदिरों में घंटे-घड़ियालों की गूंज और ‘बम-बम भोले’ के जयकारों से पूरा वातावरण शिवमय हो जाता है। काशी में यह रात्रि जागरण और भजन-कीर्तन की अद्भुत परंपरा है।

maha shivratri

(C) अन्य क्षेत्रीय परंपराएँ

  • महाराष्ट्र: यहाँ महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) को विशेष रूप से मंदिरों में भव्य रूप से मनाया जाता है। त्र्यंबकेश्वर, भीमाशंकर और ग्रहणेश्वर जैसे ज्योतिर्लिंगों पर भक्तों का सैलाब उमड़ता है।
  • आंध्र प्रदेश और कर्नाटक: यहाँ के प्रसिद्ध श्रीशैलम मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग पर विशेष पूजा और रथयात्रा का आयोजन होता है।
  • गुजरात: सोमनाथ ज्योतिर्लिंग पर भव्य आयोजन होते हैं और रात्रि जागरण के दौरान भजन-संध्या का आयोजन किया जाता है।
  • उज्जैन (मध्य प्रदेश): महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती का विशेष महत्व है। महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) के दिन यहाँ सुबह की भस्म आरती में हजारों श्रद्धालु सम्मिलित होते हैं।

(D) नेपाल और पड़ोसी देशों में महाशिवरात्रि (Maha Shivratri)

नेपाल, जो खुद को ‘शिव भक्ति का देश’ कहता है, में पशुपतिनाथ मंदिर में महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) का अत्यधिक महत्व है। इस दिन नेपाल के राजा (अब राष्ट्रपति) भी मंदिर में पूजा करते हैं। यहाँ साधु-संतों का विशाल जमावड़ा होता है और वे भांग-धतूरे का सेवन करते हुए शिव की आराधना करते हैं। 

इसी प्रकार मॉरीशस, त्रिनिदाद, फिजी, गुयाना और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में जहाँ भारतीय मूल के लोग बसे हैं, वहाँ भी महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) धूमधाम से मनाई जाती है। मॉरीशस में तो यह राष्ट्रीय अवकाश का दिन होता है, जहाँ भक्त गंगा तलाब (एक ज्वालामुखीय झील) तक पैदल यात्रा करते हैं और शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं।

9. पूजा विधि, सामग्री & तिथि और समय

महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) की पूजा विधि बहुत ही सरल और सात्विक है। शास्त्रों में बताया गया है कि शिव को प्रसन्न करने के लिए जटिल अनुष्ठानों की आवश्यकता नहीं, केवल शुद्ध हृदय और सच्ची भक्ति चाहिए।

(A) व्रत के नियम

  • प्रातः स्नान: महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें। यदि संभव हो तो गंगा स्नान या पवित्र नदी में स्नान करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • संकल्प: स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करके व्रत रखने का संकल्प लें। संकल्प के समय भगवान शिव का ध्यान करें और मन ही मन व्रत का नियम (निर्जल, फलाहार या एक समय भोजन) तय करें।
  • आहार: व्रत में गेहूं, चावल, दाल, मसालेदार भोजन, लहसुन-प्याज और नमक का सेवन वर्जित माना गया है। सेवन किए जाने वाले पदार्थों में फल, दूध, दही, साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े के आटे से बने व्यंजन, आलू और मेवे शामिल हैं .

(B) तिथि और समय

2026 में महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) 15 फरवरी, रविवार को मनाई जा रही है . हिंदू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी 15 फरवरी को शाम 5:04 बजे प्रारंभ होगी और 16 फरवरी को शाम 5:34 बजे समाप्त होगी। रात्रि के चार प्रहरों की पूजा का समय इस प्रकार है:

  • प्रथम प्रहर: 15 फरवरी, शाम 06:11 से 09:23 बजे तक
  • द्वितीय प्रहर: रात 09:23 से रात 12:35 बजे तक
  • तृतीय प्रहर: रात 12:35 से 03:47 बजे तक
  • चतुर्थ प्रहर: सुबह 03:47 से 06:59 बजे तक
  • निशीथ काल पूजा: रात 12:09 से 01:01 बजे तक व्रत का पारण (समापन) अगले दिन १६ फरवरी को सुबह 06:59 से दोपहर 03:24 के बीच करने का विधान है .

(C) पूजा की सामग्री

  • जल और गंगाजल
  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, चीनी या शक्कर)
  • बिल्व पत्र (बेल पत्र)
  • धतूरा फल और फूल
  • अक्षत (चावल)
  • चंदन
  • सफेद या लाल पुष्प (अड़हुल या आक के फूल)
  • भांग (वैकल्पिक)
  • धूप और दीपक
  • नैवेद्य (प्रसाद) – फल, मिठाई, पंचामृत
  • रुद्राक्ष की माला

(D) चार प्रहरों की पूजा विधि (चतुष्काल पूजा)

शिवपुराण के अनुसार, महाशिवरात्रि की रात्रि को चार प्रहरों (लगभग तीन-तीन घंटे के अंतराल) में बांटा गया है। प्रत्येक प्रहर में शिवलिंग का पुनः अभिषेक और पूजा की जाती है। यह क्रम इस प्रकार है:

(a) प्रथम प्रहर (शाम 6:11 से 9:23 बजे तक) :

  • सबसे पहले शिवलिंग को गंगाजल या पवित्र जल से स्नान कराएं।
  • फिर पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और चीनी) से अभिषेक करें।
  • शिवलिंग पर चंदन का लेप लगाएं।
  • सफेद पुष्प और बिल्व पत्र अर्पित करें। बिल्व पत्र चढ़ाते समय ध्यान रखें कि वह तीन पत्तियों वाला जोड़ा हुआ हो और चिकना भाग शिवलिंग पर सटा हो।
  • धूप-दीप दिखाएं।
  • इस प्रहर में “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करें।

(b) द्वितीय प्रहर (रात 9:23 से 12:35 बजे तक) :

  • शिवलिंग को दूध से स्नान कराएं।
  • दही अर्पित करें।
  • शिवलिंग पर अक्षत (चावल) चढ़ाएं।
  • लाल पुष्प, विशेषकर आक या अड़हुल के फूल और बिल्व पत्र चढ़ाएं।
  • धतूरा और भांग (यदि प्रचलन हो तो) अर्पित करें।
  • दीपक जलाएं।
  • इस प्रहर में महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें: “ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥”

(c) तृतीय प्रहर (रात 12:35 से 3:47 बजे तक) :

  • शिवलिंग को शहद और घी से स्नान कराएं।
  • गन्ने का रस या चीनी अर्पित करें।
  • बेलपत्र और फूल चढ़ाएं।
  • धूप-दीप दिखाएं।
  • इस प्रहर में रुद्राष्टाध्यायी या रुद्र सूक्त का पाठ करें।

(d) चतुर्थ प्रहर (सुबह 3:47 से 6:59 बजे तक) :

  • शिवलिंग को गंगाजल या पवित्र जल से स्नान कराएं।
  • सभी पूजन सामग्री पुनः अर्पित करें।
  • शिवलिंग पर भस्म (राख) लगाना इस प्रहर की विशेषता है। यह संसार की अस्थायी प्रकृति का प्रतीक है।
  • पूजा के अंत में शिव आरती करें और क्षमा प्रार्थना करें।

(E) पूजा के बाद (पारण)

अगले दिन (१६ फरवरी) सुबह स्नान-ध्यान के बाद, पारण के समय (सुबह ६:५९ से दोपहर ३:२४ के बीच) फिर से शिव जी का स्मरण करें और प्रसाद ग्रहण करें। व्रत खोलने से पहले किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन कराना या दान देना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है .

10. मंत्र, भजन और उनका महत्व

भगवान शिव की आराधना बिना मंत्र और संगीत के अधूरी है। शिव तो नटराज हैं, जिनका तांडव इस ब्रह्मांड की मूल लय है। महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) की रात्रि में मंत्र जाप और भजन-कीर्तन का विशेष महत्व है।

(A) पंचाक्षरी मंत्र: ॐ नमः शिवाय

यह सबसे पवित्र और सर्वोच्च मंत्र है, जो वेदों में मिलता है। ‘ॐ’ ब्रह्मांड की मूल ध्वनि है। ‘नमः’ का अर्थ है झुकना या समर्पण। ‘शिवाय’ का अर्थ है शिव के प्रति। इस प्रकार ‘ॐ नमः शिवाय’ का अर्थ है – परम कल्याणकारी चेतना के प्रति पूर्ण समर्पण। यह मंत्र पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) का प्रतीक है और इसे किसी भी समय, कहीं भी जपा जा सकता है। महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) पर इस मंत्र के १०८ बार जप का विशेष विधान है .

(B) महामृत्युंजय मंत्र

यह मंत्र भगवान शिव का सबसे शक्तिशाली मंत्र है, जो मृत्यु के भय को दूर करने वाला और आयु, आरोग्य तथा मोक्ष प्रदान करने वाला माना जाता है। इसका उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है .

मंत्र: ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

भावार्थ: हम त्रिनेत्र धारी शिव की उपासना करते हैं, जो सुगंध (आनंद) से परिपूर्ण हैं और सबका पोषण करने वाले हैं। जैसे ककड़ी अपने डंठल से अलग हो जाती है, वैसे ही हमें मृत्यु के बंधन से मुक्त करके अमरत्व प्रदान करें।

(C) रुद्राष्टाध्यायी और शिव तांडव स्तोत्र

रुद्राष्टाध्यायी यजुर्वेद का एक भाग है, जो पूर्ण रूप से शिव को समर्पित है। इसके पाठ से समस्त पाप नष्ट होते हैं और मन को अत्यधिक शांति मिलती है। वहीं शिव तांडव स्तोत्र, जो रावण द्वारा रचित माना जाता है, शिव के उग्र और लयात्मक रूप का वर्णन करता है। इसका पाठ उच्च स्वर में करने से ऊर्जा का संचार होता है।

(D) आधुनिक संगीत में शिव

आज के समय में महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) का उत्सव केवल मंदिरों तक सीमित नहीं रहा। इशा फाउंडेशन के आयोजनों में देखा जा सकता है कि कैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों (जैसे ढोल-ताशा) के साथ-साथ आधुनिक संगीत (रैप, रॉक) का भी भव्य संगम होता है। ब्लेज़, पैराडॉक्स जैसे कलाकार अपने समकालीन अंदाज में शिव भक्ति को नए युवा वर्ग तक पहुँचा रहे हैं . यह दर्शाता है कि शिव की उपासना कालातीत है और हर युग में नए रूपों में प्रकट होती है।

11. व्रत और उपवास के लाभ

व्रत केवल धार्मिक दायित्व नहीं है, बल्कि यह एक समग्र चिकित्सा पद्धति भी है। महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) के व्रत को वैज्ञानिक और स्वास्थ्य की दृष्टि से देखा जाए तो इसके अनेक लाभ हैं .

(A) शारीरिक लाभ (डिटॉक्सिफिकेशन)

फाल्गुन मास ऋतु संधि का समय है। सर्दी समाप्त हो रही होती है और गर्मी शुरू हो रही होती है। ऐसे में शरीर में कफ दोष बढ़ने की संभावना रहती है। महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) के व्रत में अन्न का सेवन नहीं किया जाता, जिससे पाचन तंत्र को विश्राम मिलता है और शरीर में जमे विषैले तत्व बाहर निकलते हैं। फल और दूध का सेवन शरीर को आवश्यक ऊर्जा और पोषण प्रदान करता है। रात्रि जागरण से चयापचय क्रिया (मेटाबॉलिज्म) भी सक्रिय होती है।

(B) मानसिक लाभ (मानसिक शांति)

दिनभर उपवास और रात्रि जागरण से इच्छाशक्ति (willpower) का विकास होता है। जब हम अपनी आदतों (जैसे बार-बार खाना या सोना) का विरोध करते हैं, तो हम अपने मन पर नियंत्रण पाना सीखते हैं। मंत्र जाप और ध्यान से मन को एकाग्रता मिलती है, जिससे चिंता और तनाव कम होता है। यह एक प्रकार का मानसिक अनुशासन है।

(C) आध्यात्मिक लाभ (चेतना का विस्तार)

सबसे महत्वपूर्ण लाभ आध्यात्मिक है। जब शरीर हल्का होता है और मन एकाग्र होता है, तो आत्मा का प्रकाश स्वतः ही प्रकट होता है। यह वह रात्रि है जब व्यक्ति अपने सीमित अहंकार (ईगो) को भूलकर असीम चेतना (शिव) से जुड़ सकता है। यही सबसे बड़ा लाभ है।

maha shivratri

12. निष्कर्ष

महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, यह जीवन दर्शन है। यह हमें सिखाता है कि अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का मार्ग हमेशा हमारे भीतर ही मौजूद है। शिव के तीन नेत्र हमें संदेश देते हैं कि हमारे पास भूत, वर्तमान और भविष्य देखने की शक्ति है। उनके गले का नीला रंग (नीलकंठ) हमें सिखाता है कि जीवन के विष को भी हंसते-हंसते पचाने की क्षमता विकसित करनी चाहिए। उनका डमरू ब्रह्मांड की ध्वनि है, जो हमें सचेत रहने की प्रेरणा देता है।

2026 में जब हम 15 फरवरी की इस पवित्र रात्रि में जागेंगे, चाहे वह इशा के आदियोगी के समक्ष हो, काशी के विश्वनाथ गली में हो, या अपने घर के मंदिर में – हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि यह रात्रि केवल बाहरी पूजा की नहीं, बल्कि आंतरिक परिवर्तन की है। यह हमारे भीतर छिपे शिव (चेतना) को जगाने की रात है।

जब हम कहते हैं “हर हर महादेव”, तो इसका अर्थ है कि हर व्यक्ति के भीतर महादेव हैं। महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) उसी महादेव के दर्शन का, स्वयं के दर्शन का पर्व है।

आइए, इस महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) मै और आप मिलकर यह प्रण लें कि हम अपने जीवन में शिव के गुणों – करुणा, त्याग, वैराग्य, और संयम – को धारण करेंगे। अपने भीतर के अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान रूपी प्रकाश को फैलाएंगे। और सदैव इस बात का ध्यान रखेंगे कि यह संसार, यह प्रकृति, हमारे लिए नहीं, बल्कि हम इसके लिए हैं।

नमः शिवाय।

Frequently Asked Questions (FAQ)

1. महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) कब मनाई जाती है?
Ans) महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है। अंग्रेज़ी कैलेंडर के अनुसार इसकी तिथि हर वर्ष बदलती रहती है।

2. महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) का धार्मिक महत्व क्या है?
Ans) यह दिन भगवान भगवान शिव की उपासना का सबसे पावन अवसर माना जाता है। श्रद्धालु इसे साधना, उपवास और आत्मशुद्धि की रात्रि के रूप में देखते हैं।

3. महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) और शिवरात्रि में क्या अंतर है?
Ans) शिवरात्रि हर महीने आती है, जबकि महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) वर्ष में केवल एक बार मनाई जाती है और इसका आध्यात्मिक महत्व अधिक माना जाता है।

4. महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) पर उपवास क्यों रखा जाता है?
Ans) उपवास का उद्देश्य शरीर और मन को संयमित करना है। इसे इंद्रिय-नियंत्रण, अनुशासन और ध्यान के लिए सहायक माना जाता है।

5. क्या उपवास में फलाहार लिया जा सकता है?
Ans) हाँ, अधिकांश लोग अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार फल, दूध या हल्का आहार लेते हैं। भावना और श्रद्धा प्रमुख मानी जाती है।

6. महाशिवरात्रि Maha Shivratri) पर रात्रि जागरण का क्या महत्व है?
Ans) रात्रि जागरण जागरूकता और साधना का प्रतीक माना जाता है। भक्त पूरी रात मंत्र-जप, ध्यान और भजन करते हैं।

7. शिवलिंग पर जल चढ़ाने का क्या अर्थ है?
Ans) जल अर्पण शांति और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। यह श्रद्धा और समर्पण का सरल रूप है।

8. बेलपत्र क्यों चढ़ाया जाता है?
Ans) बेलपत्र भगवान शिव को अत्यंत प्रिय माना गया है। इसके तीन पत्ते विभिन्न आध्यात्मिक प्रतीकों से जोड़े जाते हैं।

9. महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) पर कौन-सा मंत्र जपा जाता है?
Ans) सबसे अधिक प्रचलित मंत्र है – “ॐ नमः शिवाय”। इसे शिव साधना का मूल मंत्र माना जाता है।

10. क्या घर पर महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) की पूजा की जा सकती है?
Ans) हाँ, घर में स्वच्छ स्थान, श्रद्धा और सरल विधि से पूजा की जा सकती है। भव्यता आवश्यक नहीं होती।

11. क्या इस दिन विशेष दान-पुण्य का महत्व है?
Ans) कई लोग इस दिन दान, सेवा या ज़रूरतमंदों की सहायता को शुभ मानते हैं। इसे श्रधा और करुणा से जोड़ा जाता है।

12. महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) का आध्यात्मिक संदेश क्या है?
Ans) यह पर्व आत्मनिरीक्षण, संयम, ध्यान और मानसिक शांति का संदेश देता है। शिव को संतुलन और कल्याण का प्रतीक माना जाता है।

13. क्या महिलाएँ भी व्रत रख सकती हैं?
Ans) हाँ, महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) व्रत सभी श्रद्धालुओं के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।

14. महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) पर किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
Ans) स्वास्थ्य का ध्यान रखें, अति-कठोर नियमों से बचें, और पूजा में दिखावे से अधिक भावनात्मक श्रद्धा रखें।

15. महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) का सांस्कृतिक महत्व क्या है?
Ans) यह पर्व भारतीय परंपरा में भक्ति, साधना और सामूहिक आस्था का सुंदर उदाहरण माना जाता है।

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