Karwa Chauth 2025
1. करवा चौथ (Karwa Chauth) क्योँ मनाते हैं ?
‘करवा’ का अर्थ है मिट्टी का एक छोटा घड़ा (कलश) और ‘चौथ’ का अर्थ है चंद्रमा की चतुर्थी। इस प्रकार, करवा चौथ का अर्थ हुआ कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाने वाला व्रत जिसमें करवे (मिट्टी के घड़े) का विशेष महत्व है। यह व्रत स्त्री के पति के प्रति अगाध प्रेम, समर्पण और भक्ति का प्रतीक है। आधुनिक दौर में भी यह व्रत अपनी पारंपरिक गरिमा के साथ-साथ नए रंग-रूप में मनाया जाता है, जहाँ अब यह सामाजिक मेल-मिलाप और उत्सव का भी एक रूप बन गया है।
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2. करवा चौथ (Karwa Chauth) का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व
करवा चौथ (Karwa Chauth) की उत्पत्ति के बारे में कई पौराणिक कथाएँ और ऐतिहासिक तथ्य प्रचलित हैं। माना जाता है कि इस व्रत की शुरुआत मध्यकालीन युग में हुई थी, जब सैनिक लंबे अभियानों पर जाया करते थे। उनकी पत्नियाँ अपने पतियों की सुरक्षा और जल्दी लौटने की कामना के लिए यह व्रत रखती थीं। इसके अलावा, कई पौराणिक कथाएँ इस व्रत की महत्ता को दर्शाती हैं।
पौराणिक कथाएँ:
(A) वीरावती की कथा
यह करवा चौथ (Karwa Chauth) की सबसे प्रचलित और मान्य कथा है। कथा के अनुसार, एक सुंदर और पतिव्रता राजकुमारी वीरावती थी, जिसका विवाह एक राजकुमार से हुआ था। पहले करवा चौथ पर उसने अपने भाइयों के पास निवास करते हुए व्रत रखा। व्रत के कारण वह बहुत कमजोर हो गई। अपनी बहन की दशा देखकर उसके भाई व्यथित हो गए और उन्होंने एक पीपल के पेड़ के पीछे छुपकर एक जालीदार चंद्रमा जैसी आकृति बनाकर वीरावती को भ्रमित किया कि चंद्रमा निकल आया है। भ्रमवश वीरावती ने व्रत तोड़ दिया।
जैसे ही उसने भोजन किया, उसे खबर मिली कि उसके पति की मृत्यु हो गई है। वह विलाप करते हुए जंगल में भटकने लगी, जहाँ उसे देवी पार्वती मिलीं। देवी ने उसे करवा चौथ (Karwa Chauth) के व्रत का सही विधान बताया और उसका पालन करने को कहा। वीरावती ने ऐसा ही किया और अपने पतिव्रत धर्म के बल पर यमराज से अपने पति का जीवन वापस माँग लिया।
(B) सावित्री-सत्यवान की कथा
एक अन्य मान्यता के अनुसार, जब सावित्री ने यमराज से अपने पति सत्यवान का प्राण वापस लेने का वचन लिया था, तब उसने जो तपस्या की थी, उसी की याद में यह व्रत रखा जाता है। सावित्री के अटूट प्रेम और दृढ़ संकल्प ने मृत्यु के देवता को भी झुका दिया था।
(C) द्रौपदी की कथा
महाभारत में भी एक उल्लेख मिलता है जब अर्जुन नीलगिरि पर्वत पर तपस्या के लिए गए थे, तब द्रौपदी ने उनकी सुरक्षा के लिए एक समान व्रत रखा था। भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें करवा चौथ (Karwa Chauth) के व्रत का विधान बताया था और उसके पालन से अर्जुन सकुशल लौट आए थे।
ये कथाएँ इस व्रत की शक्ति और महिलाओं के पतिव्रत धर्म की महानता को दर्शाती हैं।
3. करवा चौथ (Karwa Chauth) मनाने की तिथि और मुहूर्त
करवा चौथ (Karwa Chauth) हिंदू कैलेंडर के अनुसार कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार, यह अक्टूबर या नवंबर के महीने में पड़ता है। इस दिन चंद्रमा का उदय होने का समय व्रत तोड़ने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।
(A) सरगी का समय
व्रत की शुरुआत सुबह सूर्योदय से पहले होती है। इस समय माँ या सास द्वारा व्रत रखने वाली महिला को ‘सरगी’ दी जाती है। यह एक पौष्टिक भोजन होता है जिसमें मेवे, फल, मिठाई और सेंवई आदि शामिल होते हैं। इसे खाकर ही महिला पूरे दिन के निर्जला व्रत की शुरुआत करती है।
(B) चंद्रोदय का समय
शाम को चंद्रमा के निकलने का समय हर शहर के अनुसार अलग-अलग होता है। अखबारों, टीवी चैनलों या मोबाइल ऐप्स के माध्यम से इसका सही समय ज्ञात किया जाता है। चंद्रमा के दर्शन होने के बाद ही पूजा की जाती है और व्रत तोड़ा जाता है। कई बार मौसम खराब होने पर चंद्रमा नहीं दिखता, ऐसे में किसी बुजुर्ग महिला या पंडित जी के बताए अनुसार ही समय निर्धारित किया जाता है।
4. करवा चौथ (Karwa Chauth) व्रत की विधि (रिती-रिवाज)
करवा चौथ (Karwa Chauth) का व्रत अत्यंत नियमों और संयम के साथ रखा जाता है। इसकी विधि बहुत ही विस्तृत और श्रद्धापूर्वक की जाती है।
(A) सरगी
तड़के सुबह, सूर्योदय से पहले, व्रत रखने वाली महिला स्नान आदि से निवृत्त होकर नए वस्त्र पहनती है। फिर उसे उसकी सास या माँ द्वारा सरगी दी जाती है। यह भोजन पूरे दिन के उपवास के लिए शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है।
(B) निर्जला व्रत
सरगी खाने के बाद महिला पूरे दिन बिना पानी के उपवास रखती है। दिन भर वे पूजा-पाठ और तैयारियों में व्यस्त रहती हैं। कई महिलाएं इस दिन कोई शारीरिक श्रम नहीं करतीं और आराम करती हैं।
(C) पूजा की तैयारी
शाम को पूजा के लिए विशेष तैयारी की जाती है। महिलाएं नए वस्त्र (अक्सर लाल रंग की साड़ी या सूट) पहनती हैं, हाथों में मेहंदी लगाती हैं और सोलह श्रृंगार करती हैं। सोलह श्रृंगार में सिंदूर, बिंदी, मंगतसूत्र, कंगन, बिछुआ, नथ, कर्णफूल, काजल, मेहंदी, महावर, चूड़ियाँ, कमरबंद, अंगूठी, पायल, इत्र और घूँघट शामिल हैं।
(D) पूजा सामग्री (थाली सज्जा)
एक पूजा की थाली तैयार की जाती है, जिसमें निम्नलिखित वस्तुएं रखी जाती हैं:
करवा: मिट्टी का एक नया घड़ा, जिसे सजाया जाता है।
चुनरी: करवे पर लपेटने के लिए लाल रंग का एक कपड़ा।
सिंदूर
मिठाई: जिसे चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद खाया जाता है।
मेवे और फल
दीया: घी या तेल का दीया।
चंदन, अक्षत, फूल, रोली
चौकी: पूजा बैठने के लिए एक छोटा चबूतरा।
छलनी: चंद्रमा को देखने के लिए।
(E) पूजा विधि
सभी महिलाएं एक साथ बैठकर पूजा करती हैं। सबसे पहले एक बुजुर्ग महिला करवा चौथ (Karwa Chauth) की कथा सुनाती है और बाकी सभी महिलाएं उसे सुनती हैं। कथा सुनाने के बाद, करवे की पूजा की जाती है। करवे में जल, सिक्के और मेवे डाले जाते हैं। फिर चंद्रमा के निकलने की प्रतीक्षा की जाती है।
(F) चंद्रमा को अर्घ्य
चंद्रमा के दर्शन होने पर, महिलाएं छलनी के माध्यम से पहले चंद्रमा को देखती हैं, फिर अपने पति को देखती हैं। इसके बाद चंद्रमा को जल, फूल और मिठाई अर्पित करती हैं। अर्घ्य देने के बाद, पति के हाथों से पानी पीकर और मिठाई खाकर व्रत तोड़ा जाता है। इसके बाद ही कोई अन्य भोजन ग्रहण किया जाता है।
5. करवा चौथ (Karwa Chauth) व्रत कथा
करवा चौथ (Karwa Chauth) की कथा का पूजा के दौरान पाठ किया जाता है। यह कथा वीरावती की ही होती है, जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है। कथा सुनने और सुनाने से व्रत का फल और भी बढ़ जाता है ऐसी मान्यता है। कथा के माध्यम से ही व्रत के नियमों और उसके महत्व का बोध होता है।
6. करवा चौथ (Karwa Chauth) का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
करवा चौथ (Karwa Chauth) केवल एक धार्मिक व्रत नहीं है, बल्कि इसका गहरा सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व भी है।
(A) पारिवारिक बंधन
यह व्रत परिवार के सदस्यों, विशेषकर सास-बहू के बीच के रिश्ते को मजबूत करता है। सास द्वारा बहू को सरगी देना और पूजा में मार्गदर्शन करना पारिवारिक सद्भाव को दर्शाता है।
(B) महिला एकजुटता
इस दिन महिलाएं एक साथ मिलकर पूजा करती हैं, गीत गाती हैं और एक-दूसरे के साथ समय बिताती हैं। यह समाज में महिलाओं की एकजुटता और सामाजिक संपर्क को बढ़ावा देता है।
(C) सांस्कृतिक पहचान
यह व्रत भारतीय संस्कृति और परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का एक माध्यम है। नई पीढ़ी की महिलाएं अपनी दादी-नानी से इसकी विधि और कथाएँ सीखती हैं।
7. वैज्ञानिक दृष्टिकोण
हालांकि करवा चौथ (Karwa Chauth) एक आस्था का विषय है, लेकिन इसके पीछे कुछ वैज्ञानिक तर्क भी छिपे हैं।
(A) शारीरिक लाभ
निर्जला उपवास शरीर के लिए एक डिटॉक्सिफिकेशन (विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने) की प्रक्रिया की तरह काम करता है। यह पाचन तंत्र को आराम देता है और शरीर की अंदरूनी सफाई करता है। सरगी में लिए जाने वाला पौष्टिक भोजन शरीर को दिन भर की ऊर्जा प्रदान करता है।
(B) चंद्रमा का प्रभाव
चंद्रमा का जल तत्व और मानव शरीर पर प्रभाव माना जाता है। चंद्रोदय के समय चंद्रमा की किरणों का एक विशेष प्रभाव होता है, जो शरीर के लिए लाभदायक माना जाता है। छलनी से चंद्रमा देखने की प्रक्रिया उसकी तेज रोशनी को फिल्टर करने का एक वैज्ञानिक तरीका हो सकता है।
(C) मनोवैज्ञानिक लाभ
यह व्रत मन की शक्ति और संकल्प को मजबूत करता है। एक दिन तक भूख-प्यास सहन करना व्यक्ति के आत्मनियंत्रण और धैर्य को बढ़ाता है।
8. आधुनिक समय में करवा चौथ (Karwa Chauth) : बदलता स्वरूप
समय के साथ करवा चौथ (Karwa Chauth) के स्वरूप में भी बदलाव आया है। आज यह केवल एक धार्मिक व्रत ही नहीं, बल्कि एक सामाजिक उत्सव बन गया है।
(A) फैशन और शॉपिंग
इस दिन महिलाएं नए कपड़े, जेवरात खरीदती हैं और ब्यूटी पार्लर जाती हैं। बाजार में करवा चौथ (Karwa Chauth) से पहले ही विशेष ऑफर्स और डिस्काउंट शुरू हो जाते हैं।
(B) सोशल मीडिया
अब करवा चौथ (Karwa Chauth) सोशल मीडिया पर भी ट्रेंड करता है। लोग अपनी तस्वीरें, थाली की फोटो, मेहंदी के डिजाइन शेयर करते हैं और एक-दूसरे को बधाईयाँ देते हैं।
(C) तुलना व्रत
आधुनिक समय में कई पुरुष भी अपनी पत्नियों के लिए ‘तुलना व्रत’ रखने लगे हैं। वे भी दिन भर निर्जला उपवास रखते हैं और शाम को पत्नी के हाथों पानी पीकर व्रत तोड़ते हैं। यह पति-पत्नी के बीच के प्रेम और समानता को दर्शाता है।
(D) नारीवादी नजरिया
कुछ लोग इस व्रत को महिलाओं के लिए अनिवार्य और पुरुष-प्रधान समाज का प्रतीक मानते हैं। उनका तर्क है कि केवल महिलाओं द्वारा ही व्रत रखना समानता के सिद्धांत के खिलाफ है। हालाँकि, अधिकांश महिलाएं इसे अपनी इच्छा और पति के प्रति प्रेम का प्रदर्शन मानती हैं, न कि कोई बंधन।
9. करवा चौथ (Karwa Chauth) से जुड़ी विशेष बातें
(A) मेहंदी
करवा चौथ (Karwa Chauth) से एक दिन पहले महिलाएं हाथों और पैरों में मेहंदी लगाती हैं। मान्यता है कि मेहंदी जितनी गहरी होगी, पति का प्यार उतना ही गहरा होगा। मेहंदी के डिजाइन में अक्सर ‘करवा’, ‘चंद्रमा’ और पति के नाम के अक्षर छुपे होते हैं।
(B) गीत
पूजा के दौरान महिलाएं करवा चौथ के पारंपरिक गीत गाती हैं। ये गीत सुहाग की लंबी उम्र और पति की समृद्धि की कामना से भरे होते हैं।
(C) उपहार
व्रत तोड़ने के बाद, पति अपनी पत्नी को उपहार देता है। यह उपहार जेवरात, कपड़े, या कोई अन्य चीज हो सकती है। यह पति के प्यार और आभार का प्रतीक होता है।
10. निष्कर्ष
करवा चौथ (Karwa Chauth) भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न अंग है जो प्रेम, विश्वास और समर्पण की अमर भावना को दर्शाता है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह सामाजिक एकता, पारिवारिक स्नेह और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उदाहरण है। समय के साथ इसके रूप में परिवर्तन आया है, लेकिन इसकी आत्मा आज भी वैसी ही शुद्ध और प्रेरणादायक है। चाहे वह पारंपरिक तरीके से मनाया जाए या आधुनिक, करवा चौथ का सार एक ही है – अपने प्रियजन की कुशलता और दीर्घायु की कामना करना। यह व्रत याद दिलाता है कि सच्चा प्रेम और संकल्प किस प्रकार कठिन से कठिन चुनौतियों को भी पार कर सकता है।