Eid E Milad Un Nabi Mubarak
1. ईद (Eid)-ए-मिलाद-उन-नबी क्योँ मनाते हैं?
ईद (Eid) -ए-मिलाद-उन-नबी मुसलमानों का एक महत्वपूर्ण पर्व है जिसे पैग़म्बर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की याद में मनाया जाता है। यह पर्व इस्लामी कैलेंडर के तीसरे महीने रबीउल अव्वल की 12वीं तारीख़ को मनाया जाता है। इस दिन पैग़म्बर का जन्म भी हुआ और इसी दिन 632 ईस्वी में उनका निधन भी हुआ। इसलिए इसे एक ओर खुशी का दिन कहा जाता है और दूसरी ओर ग़म का भी।
पैग़म्बर का जीवन दुनिया के लिए मार्गदर्शन है। उन्होंने अज्ञान, अत्याचार और भेदभाव के युग में इंसानियत, समानता और दया का संदेश दिया। इस दिन को मनाने का मूल उद्देश्य है—
• पैग़म्बर की शिक्षाओं को याद करना
• उनके जीवन से प्रेरणा लेना
• समाज में भाईचारा और शांति स्थापित करना
Table of Contents
Toggle2. ईद (Eid)-ए-मिलाद-उन-नबी का अर्थ और महत्व
- ईद (Eid) – पर्व, ख़ुशी का दिन
- मिलाद – जन्म
- नबी – अल्लाह के दूत (पैग़म्बर)
अर्थात ईद (Eid)-ए-मिलाद-उन-नबी का शाब्दिक अर्थ है पैग़म्बर मुहम्मद का जन्मोत्सव।
मुसलमान इसे केवल जन्मदिन के रूप में नहीं, बल्कि पैग़म्बर के आगमन की याद के रूप में मनाते हैं। वह आगमन जिसने अरब और पूरी दुनिया को अज्ञान और अन्याय से निकालकर प्रकाश और इंसाफ़ की ओर मोड़ा।
3. पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद का जन्म और बचपन
(A) जन्म
- पैग़म्बर का जन्म 570 ईस्वी में मक्का में हुआ।
- इस वर्ष को आमुल-फ़ील (हाथियों का वर्ष) कहा जाता है क्योंकि यमन के शासक अब्रहा ने हाथियों की सेना से मक्का पर हमला किया था।
- पैग़म्बर के पिता अब्दुल्लाह और माता आमिना थीं।
- जन्म से पहले ही पिता का निधन हो गया था।
(B) बचपन
- छह वर्ष की उम्र में माँ का भी देहांत हो गया।
- अनाथ हो जाने के बाद दादा अब्दुल मुत्तलिब ने उनकी परवरिश की।
- आठ वर्ष की आयु में दादा का भी निधन हो गया।
- इसके बाद चाचा अबू तालिब ने देखभाल की।
(C) प्रारंभिक जीवन
- बचपन से ही ईमानदारी, सच्चाई और दया का परिचय दिया।
- गरीबों और यतीमों की मदद करना उन्हें बहुत प्रिय था।
- अपने साथियों के बीच सच्चाई और भरोसेमंद स्वभाव के कारण उन्हें अल-अमीन (विश्वसनीय) और अस-सादिक़ (सत्यवादी) की उपाधि मिली।
4. युवावस्था और सामाजिक जीवन
- पैग़म्बर युवावस्था में व्यापार करने लगे।
- उनकी ईमानदारी से प्रभावित होकर मक्का की एक सम्पन्न महिला खदीजा ने उन्हें अपना व्यापारी प्रतिनिधि बनाया।
- व्यापार में सफलता और सच्चाई के कारण खदीजा ने उनसे विवाह किया।
- विवाह के बाद पैग़म्बर का जीवन और भी संतुलित और स्थिर हुआ।
- वह समाज में न केवल एक व्यापारी थे बल्कि गरीबों के सहायक, न्यायप्रिय और सबके हितैषी माने जाते थे।
5. पैग़म्बरी की शुरुआत
- पैग़म्बर को 40 वर्ष की आयु में अल्लाह का संदेश मिला।
- वह अक्सर मक्का के पास हेरा की गुफ़ा में जाकर ध्यान करते थे।
- एक दिन फ़रिश्ता जिब्रईल (गैब्रियल) प्रकट हुए और कुरआन की पहली आयत सुनाई।
- इसके बाद उन्होंने लोगों को अल्लाह की इबादत करने, बुराई छोड़ने और इंसाफ़ पर चलने का संदेश देना शुरू किया।
6. मक्का में इस्लाम का प्रचार
- पैग़म्बर ने सबसे पहले अपने परिवार और करीबी साथियों को इस्लाम की दावत दी।
- धीरे-धीरे अनुयायियों की संख्या बढ़ी, जिनमें अबू बकर, उमर, उस्मान और अली जैसे महान साथी भी शामिल थे।
- पैग़म्बर ने कहा— अल्लाह एक है, उसी की इबादत करो।
- उन्होंने जाति, वर्ग और रंगभेद का विरोध किया।
- इस कारण मक्का के क़ुरैश कबीले के नेता उनका विरोध करने लगे।
7. विरोध और कठिनाइयाँ
- पैग़म्बर और उनके अनुयायियों को अपमान, बहिष्कार और शारीरिक यातना दी गई।
- कई मुसलमानों को मारा गया, यातना दी गई।
- पैग़म्बर स्वयं भी कठिनाइयों से गुज़रे लेकिन उन्होंने धैर्य और संयम रखा।
- उन्होंने हमेशा कहा — सब्र करो और अल्लाह पर भरोसा रखो।
8. मदीना हिजरत (प्रवास)
इस्लाम का संदेश जब मक्का में फैलने लगा तो क़ुरैश कबीले के सरदारों को अपनी सत्ता और व्यापारिक प्रभुत्व पर संकट दिखाई देने लगा। उन्होंने मुसलमानों को सामाजिक बहिष्कार, आर्थिक प्रतिबंध और शारीरिक अत्याचारों का शिकार बनाया। हालात इतने बिगड़े कि मुसलमानों को मक्का छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा।
(A) हिजरत का निर्णय
622 ईस्वी में पैग़म्बर मुहम्मद और उनके अनुयायियों ने मक्का से मदीना की ओर प्रवास किया। इस घटना को हिजरत कहा जाता है और इसी से इस्लामी कैलेंडर की शुरुआत मानी जाती है।
(B) मदीना में स्वागत
मदीना के लोगों (जिन्हें “अंसार” कहा गया) ने पैग़म्बर और उनके साथियों का खुले दिल से स्वागत किया। उन्होंने अपने घर, खेत और व्यापार मुसलमान प्रवासियों (मुहाजिरीन) के साथ साझा किए।
(C) मस्जिद-ए-नबवी का निर्माण
मदीना पहुँचने के बाद पैग़म्बर ने सबसे पहले एक मस्जिद बनाई जिसे मस्जिद-ए-नबवी कहा जाता है। यह आज भी इस्लाम का पवित्र स्थल है।
9. मदीना काल की प्रमुख घटनाएँ
(A) संविधान-ए-मदीना
पैग़म्बर ने मदीना पहुँचने के बाद विभिन्न कबीलों और धार्मिक समुदायों (यहूदी, ईसाई, मुसलमान) के बीच एक समझौता कराया। इसे मदीना का संविधान कहा जाता है। इसमें सभी समुदायों के अधिकार और कर्तव्यों को स्पष्ट किया गया था। यह विश्व का पहला लिखित संविधान माना जाता है।
(B) युद्ध और संघर्ष
मदीना में इस्लामी राज्य की नींव पड़ी लेकिन मक्का के क़ुरैश ने बार-बार हमला किया।
- बद्र का युद्ध (624 ईस्वी) : मुसलमानों की अप्रत्याशित जीत हुई।
- उहुद का युद्ध (625 ईस्वी) : मुसलमानों को हार का सामना करना पड़ा।
- खंदक का युद्ध (627 ईस्वी) : मुसलमानों ने मदीना की चारों ओर खाई खोदकर क़ुरैश और उनके सहयोगियों को पराजित किया।
(C) हुदैबिया की संधि
628 ईस्वी में मुसलमानों और मक्का के क़ुरैश के बीच शांति समझौता हुआ जिसे संधि-ए-हुदैबिया कहते हैं। इससे इस्लाम का संदेश और तेजी से फैला।
(D) मक्का विजय
630 ईस्वी में पैग़म्बर ने मक्का पर विजय प्राप्त की। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से उन्होंने अपने दुश्मनों को माफ कर दिया। उन्होंने कहा — “आज तुम सबके लिए माफी है। किसी से बदला नहीं लिया जाएगा।”
(E) विदाई हज
632 ईस्वी में पैग़म्बर ने अपना अंतिम हज किया जिसे हज्जतुल विदा (विदाई हज) कहते हैं। इस अवसर पर उन्होंने अपना प्रसिद्ध आख़िरी ख़ुत्बा दिया जिसमें उन्होंने कहा—
- कोई अरब गैर-अरब पर श्रेष्ठ नहीं, न कोई गोरा काले पर श्रेष्ठ है।
- सभी इंसान आदम की संतान हैं।
- महिलाएँ तुम्हारी ज़िम्मेदारी हैं, उनके अधिकारों का सम्मान करो।
(F) निधन
632 ईस्वी में 12 रबीउल अव्वल को पैग़म्बर का निधन हुआ। इस दिन को मुसलमानों के लिए ग़म का दिन भी माना जाता है।
10. इस्लामी इतिहास में ईद-ए-मिलाद की परंपरा
(A) प्रारंभिक काल
पैग़म्बर के जीवनकाल में और उनके बाद के शुरुआती खलीफ़ाओं (अबू बकर, उमर, उस्मान, अली) के दौर में ईद (Eid) -ए-मिलाद मनाने की कोई परंपरा नहीं थी। उस समय मुसलमान मुख्य रूप से कुरआन, हदीस और पैग़म्बर की शिक्षाओं पर ध्यान केंद्रित करते थे।
(B) मिस्र में आरंभ
11वीं सदी में मिस्र के फ़ातिमी वंश के दौरान पैग़म्बर का जन्मदिन मनाने की परंपरा शुरू हुई। वहाँ पर विशेष सभाएँ होती थीं जिनमें कुरआन की तिलावत, नातिया शायरी और गरीबों में भोजन वितरण किया जाता था।
(C) तुर्की और अफ्रीका
धीरे-धीरे यह परंपरा तुर्की और उत्तरी अफ्रीका में फैली। वहाँ इसे “मौलिद” कहा गया।
(D) भारत में प्रवेश
भारत में सूफी संतों और मुस्लिम शासकों के समय ईद-ए-मिलाद की परंपरा फैली। मुगल काल में विशेष जुलूस और कव्वालियाँ आयोजित होने लगीं।
11. भारत में ईद-ए-मिलाद
भारत बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश है। यहाँ ईद (Eid) -ए-मिलाद-उन-नबी विशेष धूमधाम से मनाई जाती है।
(A) सजावट और जुलूस
- ईद (Eid) में मस्जिदों और घरों को रोशनी और झंडियों से सजाया जाता है।
- ईद (Eid) में शहरों में बड़े-बड़े जुलूस निकलते हैं जिनमें लोग नारे और नात पढ़ते हैं।
(B)नातिया महफ़िल
ईद (Eid) के दिन नात-शरीफ़ (पैग़म्बर की प्रशंसा में कविता) पढ़ी जाती है। कव्वालियाँ और धार्मिक गीतों का आयोजन होता है।
(C) समाज सेवा
ईद (Eid) के दिन दिन गरीबों और ज़रूरतमंदों को खाना खिलाना और दान देना एक प्रमुख परंपरा है।
(D) हिंदू-मुस्लिम भाईचारा
ईद (Eid) में भारत में कई जगह हिंदू भाई भी इस दिन की खुशी में शामिल होते हैं। यह आपसी सौहार्द्र और भाईचारे की मिसाल पेश करता है।
12. विश्व में ईद-ए-मिलाद
(A) पाकिस्तान
ईद (Eid) में यहाँ राष्ट्रीय अवकाश होता है। सरकारी और सामाजिक स्तर पर जुलूस और महफ़िलें आयोजित होती हैं।
(B) बांग्लादेश
ईद (Eid) में देशभर में मस्जिदों और सड़कों की सजावट होती है।
(C) तुर्की और मिस्र
ईद (Eid) में धार्मिक सभाएँ और विशेष दुआएँ की जाती हैं।
(D) सऊदी अरब
ईद (Eid) में यहाँ सार्वजनिक स्तर पर उत्सव नहीं होता, क्योंकि कुछ विद्वान इसे “नवाचार” मानते हैं। लेकिन लोग व्यक्तिगत रूप से इबादत करते हैं।
13. धार्मिक महत्व
ईद (Eid)-ए-मिलाद-उन-नबी मुसलमानों के लिए सिर्फ़ एक पर्व नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक अवसर है। इस दिन को मनाने का मुख्य उद्देश्य है –
- पैग़म्बर के जीवन को याद करना।
- उनकी शिक्षाओं और आदर्शों पर अमल करने का संकल्प लेना।
- कुरआन और हदीस की तिलावत करना।
- अल्लाह से दुआ करना और नेकी के कामों में शामिल होना।
(A) पैग़म्बर का आदर्श जीवन
- पैग़म्बर का जीवन मुसलमानों के लिए “उसवा-ए-हसनह” यानी सर्वोत्तम आदर्श है।
- उनकी शिक्षाएँ इंसान को शांति, न्याय, दया और भाईचारे की ओर ले जाती हैं।
- ईद (Eid) -ए-मिलाद पर मुसलमान अपने बच्चों को भी पैग़म्बर की जीवनी (सीरत) सुनाते हैं ताकि नई पीढ़ी को मार्गदर्शन मिले।
(B) दुआ और इबादत
- ईद (ईद) में मस्जिदों में विशेष नमाज़ और दुआएँ होती हैं।
- कुरआन की तिलावत और पैग़म्बर से संबंधित हदीसों का पाठ किया जाता है।
14. सामाजिक महत्व
ईद (Eid) -ए-मिलाद केवल धार्मिक महत्व तक सीमित नहीं है बल्कि इसका सामाजिक पहलू भी गहरा है। इसके कारण लोगों में एक दुसरे को लेकर लगाव बढ़ा है |
(A) भाईचारा और एकता
इस अवसर पर मुस्लिम समाज एकजुट होता है। अमीर-गरीब, छोटे-बड़े, सभी एक साथ बैठकर पैग़म्बर की याद में शामिल होते हैं।
(B) गरीबों की मदद
इस दिन दान-पुण्य का विशेष महत्व है। लोग गरीबों, अनाथों और जरूरतमंदों को खाना, कपड़े और दवाइयाँ देते हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि किसी जरूरत मंद की सेवा करना सबसे बड़ा मानव धर्म है |
(C) समाज सुधार
पैग़म्बर का जीवन समाज सुधार का आदर्श है। ईद-ए-मिलाद पर विभिन्न धार्मिक विद्वान समाज में फैली बुराइयों के खिलाफ़ लोगों को जागरूक करते हैं। सबको एक साथ मिलजुलकर रहने के लिए प्रेरित करते थे जिससे समाज में भाईचारे की भावना बढती थी |
15. सांस्कृतिक महत्व
(A) सजावट और जुलूस
- घरों और मस्जिदों को रोशनी, झंडियों और फूलों से सजाया जाता है।
- जुलूसों में बच्चे, महिलाएँ और बुज़ुर्ग सभी उत्साह से भाग लेते हैं।
- जुलूस में डफली और नात-शरीफ़ पढ़े जाते हैं।
(B) नातिया परंपरा
- नात पैग़म्बर की प्रशंसा में लिखी गई कविताएँ होती हैं।
- उर्दू, हिंदी, फारसी और अरबी में हजारों नातें लिखी गई हैं।
- भारत और पाकिस्तान में नात-ख़्वानी (नात का गायन) का विशेष महत्व है।
(C) सूफी परंपरा
सूफी संतों ने पैग़म्बर के जीवन और शिक्षाओं को कव्वाली और शेर-ओ-शायरी के माध्यम से लोगों तक पहुँचाया। यही कारण है कि ईद (Eid)-ए-मिलाद पर कव्वालियों का विशेष महत्व है।
16. मतभेद और विवाद
ईद-ए-मिलाद-उन-नबी को लेकर मुस्लिम समाज में अलग-अलग मत हैं।
(A) समर्थन करने वाले
- जो लोग इसे मनाते हैं, उनका मानना है कि यह पैग़म्बर से मोहब्बत का इज़हार है।
- कुरआन और हदीस में पैग़म्बर की याद करने और उनकी शिक्षाओं पर चलने की बात कही गई है, इसलिए उनका जन्मदिन मनाना भी इबादत का हिस्सा माना जाता है।
(B) विरोध करने वाले
- कुछ मुस्लिम विद्वानों (खासतौर पर सलफ़ी और वहाबी विचारधारा) का मानना है कि पैग़म्बर ने कभी अपना जन्मदिन नहीं मनाया, इसलिए इसे मनाना इस्लाम में नया नवाचार (बिदअत) है।
- उनका कहना है कि मुसलमानों को कुरआन, नमाज़, रोज़ा और पैग़म्बर की शिक्षाओं पर चलने पर ध्यान देना चाहिए।
(C) संतुलित दृष्टिकोण
कई विद्वानों का मत है कि अगर ईद-ए-मिलाद पर कोई ग़लत काम (जैसे शोर-शराबा, अपव्यय) न किया जाए और केवल पैग़म्बर की शिक्षाओं को याद किया जाए, तो इसमें कोई आपत्ति नहीं है।
17. साहित्य और कला
ईद (Eid)-ए-मिलाद का प्रभाव साहित्य और कला पर भी गहरा पड़ा है।
(A) उर्दू साहित्य
- उर्दू शायरी में नातिया परंपरा बहुत समृद्ध है।
- अहमद रज़ा ख़ाँ बरेलवी, अल्लामा इक़बाल और जोश मलीहाबादी जैसे कवियों ने पैग़म्बर की प्रशंसा में अमर नातें लिखीं।
(B) हिंदी और अन्य भाषाएँ
- हिंदी, पंजाबी और बंगला में भी पैग़म्बर की प्रशंसा में धार्मिक गीत और कविताएँ लिखी गईं।
- कबीर, रैदास और अन्य संत कवियों ने भी पैग़म्बर को ईश्वर के दूत मानते हुए उनका उल्लेख किया।
(C) संगीत और कला
- कव्वालियाँ और नात-ख़्वानी ईद-ए-मिलाद की विशेष पहचान हैं।
- सजावट, रोशनी और झाँकियाँ भी कला का रूप हैं।
18. आधुनिक समय में ईद-ए-मिलाद
आज के दौर में ईद (Eid)-ए-मिलाद का स्वरूप और भी व्यापक हो गया है।
(A) वैश्विक स्तर पर
- सऊदी अरब में इसे सरकारी छुट्टी के रूप में नहीं मनाया जाता, लेकिन अन्य खाड़ी देशों, पाकिस्तान, भारत, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, तुर्की, मिस्र और अफ्रीकी देशों में बड़े पैमाने पर आयोजन होते हैं।
- यूरोप और अमेरिका में बसे मुसलमान भी इसे सांस्कृतिक पहचान के रूप में मनाते हैं।
(B) भारत में
- भारत में ईद (Eid)-ए-मिलाद का उत्सव बहुत लोकप्रिय है।
- लखनऊ, हैदराबाद, भोपाल, मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों में बड़े जुलूस निकलते हैं।
- सजावट, कव्वाली, नात-ख़्वानी और सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
(C) डिजिटल युग में
- सोशल मीडिया पर नातें, पैग़म्बर की शिक्षाएँ और वीडियो लेक्चर साझा किए जाते हैं।
- ऑनलाइन जुलूस और वर्चुअल कार्यक्रम भी होने लगे हैं।
19. समाज सेवा और शिक्षा
ईद (Eid)-ए-मिलाद पर विशेष रूप से समाज सेवा के कार्य किए जाते हैं।
(A) अनाथालय और मदरसों की मदद
- इस दिन दान देकर गरीब बच्चों की पढ़ाई में मदद की जाती है।
- मदरसों और इस्लामी संस्थानों में किताबें और भोजन वितरित किया जाता है।
(B) स्वास्थ्य और सेवा कार्य
- कई जगह मुफ्त मेडिकल कैंप, ब्लड डोनेशन और खाना बाँटने के कार्यक्रम होते हैं।
- लोग अस्पतालों में मरीजों को फल और दवाइयाँ पहुँचाते हैं।
(C) शिक्षा पर जोर
पैग़म्बर ने कहा था: “इल्म हासिल करना हर मुसलमान पर फ़र्ज़ है।” इसलिए ईद (Eid)-ए-मिलाद पर बच्चों को पढ़ाई और ज्ञान की ओर प्रेरित किया जाता है। वे मानते थे कि शिक्षा ही वह माध्यम है जो मानव को अंधकार से प्रकाश की लेकर जा सकती है जिससे मानव समाज का कल्याण होगा |
20. पैग़म्बर की शिक्षाओं का वैश्विक प्रभाव
पैग़म्बर मुहम्मद केवल मुसलमानों के लिए ही नहीं बल्कि पूरी मानवता के लिए एक आदर्श हैं।
(A) शांति और भाईचारा
उनकी शिक्षा है – “सबसे अच्छा इंसान वही है जो दूसरों के लिए सबसे ज़्यादा फ़ायदा पहुँचाए।” आज की दुनिया, जहाँ हिंसा और युद्ध फैले हैं, वहाँ यह शिक्षा बहुत प्रासंगिक है। उनका कहना था कि दूसरों के लिए पहले सोचना है अपने लिए बाद में |अपने स्वार्थ के लिए दुसरे का अहित नही करना ही परम धर्म है |
(B) सामाजिक न्याय
उन्होंने अमीर-गरीब, ऊँच-नीच और जाति-भेद को ख़त्म करने पर ज़ोर दिया। इस्लामी समाज में “समानता” का सिद्धांत उनकी ही देन है। वे कहते थे कि सभी एक बराबर हैं कोई बड़ा या छोटा नही |
(C) महिला सशक्तिकरण
पैग़म्बर ने महिलाओं को शिक्षा, संपत्ति और सम्मान का अधिकार दिलाया। आज भी उनकी यह शिक्षा महिलाओं के अधिकारों की रक्षा का आधार है। वे महिलओं को सम्मान दिलाने का प्रयास हमेशा किया है|
(D) पर्यावरण और करुणा
उन्होंने पेड़-पौधों और जानवरों पर दया करने की शिक्षा दी। आज के पर्यावरण संकट में यह शिक्षा और भी महत्वपूर्ण हो गई है। वनस्पतियों की रक्षा करते हुए प्रकृति को बचाने का सन्देश देते है|
21. निष्कर्ष
ईद (Eid)-ए-मिलाद-उन-नबी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं बल्कि आध्यात्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलन है।
- यह पैग़म्बर मुहम्मद के जीवन और शिक्षाओं को याद करने का अवसर है।
- यह गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करने की प्रेरणा देता है।
- यह भाईचारा, शांति और समानता का संदेश फैलाता है।
अगर इस दिन केवल सजावट या जुलूस तक सीमित न रहकर पैग़म्बर की असल शिक्षाओं पर अमल किया जाए, तो दुनिया में शांति, प्रेम और न्याय स्थापित हो सकता है।