मकर संक्रांति : सूर्य का उत्तरायण, परंपरा का अमृत और भारत की आत्मा का उत्सव

1. मकर संक्राति (Makar Sankranti) : केवल एक तिथि नहीं, एक भावना है|

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जाड़े की सुबह में जब सूरज अपना स्वर्णिम तेज बिखेरता है, जब ठिठुरती हवा में एक नई गर्माहट घुलने लगती है, और जब आकाश रंग-बिरंगी पतंगों से पट जाता है, तब  समझ आता है कि मकर संक्रांति (Makar sankranti) आ गई। यह केवल पंचांग की एक तारीख नहीं है (14 या 15 जनवरी), बल्कि यह भारतीय संस्कृति की उस अद्भुत परंपरा का नाम है जो विज्ञान, आध्यात्म, कृषि और सामाजिक समरसता का संगम है।

Table of Contents

भारत का हर त्योहार एक कहानी कहता है, लेकिन मकर संक्रांति (Makar Sankranti) उस कहानी का वह अध्याय है जिसे पूरा देश एक साथ पढ़ता है, लेकिन अलग-अलग भाषाओं और अंदाज में। यह लेख आपको इसी अद्भुत यात्रा पर ले जाएगा – खगोलीय गणनाओं से लेकर रसोई के पारंपरिक व्यंजनों तक, गुजरात की पतंगों से लेकर तमिलनाडु के ‘पोंगल’ तक, और धार्मिक मान्यताओं से लेकर पर्यावरण के प्रति हमारे कर्तव्य तक।

2. खगोलीय गणना और वैज्ञानिक आधार

(A) सूर्य का मकर राशि में प्रवेश

मकर संक्रांति (Makar Sankranti) शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है: ‘मकर’ (जिसका अर्थ है मकर राशि) और ‘संक्रांति’ (संस्कृत: सङ्क्रान्ति), जिसका अर्थ है ‘संक्रमण’ या ‘बदलाव’। जब सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है, तो इस खगोलीय घटना को मकर संक्रांति (Makar Sankranti) कहा जाता है। यह उन कुछ हिंदू त्योहारों में से एक है जो चंद्र चक्र पर नहीं, बल्कि सौर चक्र पर आधारित है। इसलिए यह हर साल लगभग 14 जनवरी को ही पड़ता है। लीप वर्ष (जैसे 2024) में यह 15 जनवरी को मनाया जाता है, क्योंकि कैलेंडर में एक दिन की शिफ्ट हो जाती है।

(B) उत्तरायण का महत्व

इस दिन से सूर्य की उत्तरायण यात्रा शुरू होती है। इसका मतलब है कि सूर्य उत्तरी गोलार्ध की ओर बढ़ना शुरू करता है। हालांकि वैज्ञानिक रूप से सूर्य के इस उत्तरी गोलार्ध की ओर बढ़ने की सटीक शुरुआत 21 दिसंबर को होती है (जिसे शीतकालीन संक्रांति कहा जाता है), लेकिन भारतीय पंचांग के अनुसार सूर्य के मकर राशि में प्रवेश को उत्तरायण की शुरुआत माना जाता है। पृथ्वी के अक्षीय झुकाव में बदलाव (प्रीसेशन ऑफ इक्विनॉक्सेस) के कारण यह अंतर आ गया है। करीब 1700 साल पहले, 291 ईस्वी के आसपास, ये दोनों घटनाएं एक ही दिन होती थीं।

(C) दिन बड़े, रातें छोटी

इस खगोलीय घटना का सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव यह होता है कि उत्तरी गोलार्ध में दिन का समय बढ़ने लगता है और रातें छोटी होने लगती हैं। जाड़े की लंबी रातें अब पीछे छूटने लगती हैं। प्रकृति में एक नई चेतना का संचार होता है। खेतों में सरसों पीली खिलती है, गेहूं की बालियां लहलहाने लगती हैं और ठंड के कारण सुस्त पड़ी जिंदगी फिर से रफ्तार पकड़ती है। यह त्योहार प्रकृति के इसी नियमित, अटल और सुंदर चक्र का उत्सव है।

3. पौराणिक कथाएं और आध्यात्मिक गहराई

किसी भी भारतीय त्योहार को उसकी पौराणिक कहानियों के बिना समझना अधूरा है। मकर संक्रांति (Makar Sankranti) के पीछे कई अद्भुत कथाएं प्रचलित हैं, जो इसे एक गहरा आध्यात्मिक आयाम प्रदान करती हैं।

(A) पिता-पुत्र का मिलन : सूर्य और शनि

सबसे प्रचलित कथा के अनुसार, इस दिन भगवान सूर्य (सूर्य देव) अपने पुत्र शनि से मिलने उनके घर जाते हैं। शनि ग्रह मकर राशि के स्वामी माने जाते हैं। पौराणिक कथाओं में सूर्य और शनि के संबंध बहुत अच्छे नहीं बताए जाते। शनि की माता छाया थीं और उनके साथ सूर्य का व्यवहार ठीक नहीं था। लेकिन इस विशेष दिन पर, सूर्य स्वयं अपने पुत्र के घर जाते हैं और एक महीने तक वहां निवास करते हैं। यह कहानी हमें सिखाती है कि रिश्ते चाहे कितने भी कटु क्यों न हों, क्षमा और मिलन के लिए हमेशा जगह होनी चाहिए। यह परिवार और संबंधों की अटूटता का प्रतीक है।

(B) भीष्म पितामह का निर्वाण

महाकाव्य महाभारत का एक अत्यंत मार्मिक प्रसंग इस दिन से जुड़ा है। भीष्म पितामह, जिनके पास इच्छा मृत्यु का वरदान था, वे बाणों की शैया पर लेटे हुए थे। वे धरती पर तब तक प्राण त्यागने के लिए प्रतीक्षा कर रहे थे जब तक सूर्य उत्तरायण न हो जाए। उनका मानना था कि उत्तरायण के काल में मृत्यु को प्राप्त होने वाला व्यक्ति मोक्ष को प्राप्त होता है और उसे पुनर्जन्म नहीं लेना पड़ता। उन्होंने मकर संक्रांति (Makar Sankranti) के दिन ही अपने शरीर का त्याग किया था। यह प्रसंग त्याग, प्रतिज्ञा और मोक्ष की भारतीय अवधारणा को गहराई से रेखांकित करता है।

(C) गंगा का कपिल मुनि के आश्रम में आगमन

एक अन्य कथा के अनुसार, इसी दिन गंगा नदी का अवतरण राजा भगीरथ के प्रयासों से पृथ्वी पर हुआ था, और वह कपिल मुनि के आश्रम में प्रवाहित हुई थीं ताकि राजा सगर के 60,000पुत्रों को श्राप से मुक्ति मिल सके। इसी कारण इस दिन पवित्र नदियों में स्नान का विशेष महत्व बताया गया है।

4. क्षेत्रीय विविधताएं - अनेकता में एकता का जीवंत उदाहरण

मकर संक्रांति (Makar Sankranti) भारत की विविधता का सबसे सुंदर उदाहरण है। एक ही त्योहार, लेकिन अलग-अलग नाम, अलग-अलग रीति-रिवाज और अलग-अलग स्वाद। यह त्योहार सचमुच ‘कोहिनूर’ की तरह है, जिसका हर पहलू अलग चमकता है।

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(A) उत्तर भारत : खिचड़ी, दान और पतंगें

  • उत्तर प्रदेश और बिहार : यहां इसे ‘खिचड़ी पर्व’ के नाम से जाना जाता है। इस दिन दाल-चावल से बनी खिचड़ी खाने और दान करने की परंपरा है। इसे बहुत ही शुभ माना जाता है। गंगा स्नान का तो विशेष ही महत्व है। प्रयागराज में तो इस दिन से विशाल मेला लगता है, जो हर बारहवें साल महाकुंभ का रूप ले लेता है।

  • पंजाब : पंजाब में इसे लोहड़ी और माघी के रूप में मनाया जाता है। लोहड़ी संक्रांति से एक रात पहले मनाई जाती है, जिसमें अलाव जलाए जाते हैं, लोग उसके चारों ओर घूमते हैं, रेवड़ियां, मूंगफली और गजक बांटते हैं और भांगड़ा करते हैं। अगले दिन माघी मनाई जाती है, जो कि मकर संक्रांति (Makar Sankranti) का ही स्थानीय रूप है।

  • हरियाणा और राजस्थान : यहां इसे ‘सकरात’ (Makar Sankranti) कहा जाता है। महिलाएं ‘सज्जी’ नामक एक विशेष प्रकार का भोजन बनाती हैं और गीत गाती हैं। बहू-बेटियों को उपहार दिए जाते हैं।

(B) पश्चिम भारत : गुजरात और महाराष्ट्र

  • गुजरात : गुजरात में यह त्योहार (Makar Sankranti) उत्तरायण के नाम से इतने उल्लास से मनाया जाता है कि पूरा राज्य पतंगों के रंग में रंग जाता है। यहां तक कि स्कूल-कॉलेज बंद रहते हैं। अहमदाबाद में अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव का आयोजन होता है, जहां दुनिया भर से पतंगबाज आते हैं। आसमान पूरी तरह पतंगों से ढक जाता है। 

  • रात में ‘तुकोल’ या ‘देव कमाई’ नामक रोशनी वाली पतंगें उड़ाई जाती हैं। यह केवल एक खेल नहीं, बल्कि एक सामूहिक चेतना का उत्सव है। इस दिन का विशेष व्यंजन है उंधियू (सब्जियों का एक मिश्रित व्यंजन) और चिखा (चीला) के साथ मीठी चटनी। खास बात यह है कि इस दिन फाफड़ा-जलेबी खाने की भी एक अलग परंपरा है।

  • महाराष्ट्र: महाराष्ट्र में मकर संक्रांति (Makar Sankranti) का विशेष महत्व है। यहां महिलाएं हल्दी-कुंकू का कार्यक्रम आयोजित करती हैं। इस दिन एक-दूसरे को ‘तीळ-गुळ’ (तिल और गुड़) दिया जाता है और मुंह मीठा कराया जाता है। इस दौरान “तीळ गुळ घ्या, गोड-गोड बोला” (तिल-गुड़ लो और मीठा-मीठा बोलो) कहने की परंपरा है, जो पुरानी कटुता भुलाकर मीठा बोलने की प्रेरणा देती है-1

  •  महाराष्ट्र में यह त्योहार रथ सप्तमी (सूर्य की जन्माष्टमी) तक चलता है, जब महिलाएं एक-दूसरे को हल्दी-कुंकू लगाकर और वाण (उपहार) देकर त्योहार की श्रृंखला पूरी करती हैं। सामाजिक सलोखा बढ़ाने और स्त्री-शक्ति के सम्मान के लिए यह परंपरा बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है |

(C) दक्षिण भारत : पोंगल - चार दिनों का महोत्सव

दक्षिण भारत, खासकर तमिलनाडु में, मकर संक्रांति (Makar Sankranti) को पोंगल के नाम से चार दिनों तक मनाया जाता है। यह तमिल महीने ‘थाई’ की शुरुआत का प्रतीक है। पोंगल का शाब्दिक अर्थ है ‘उबालना’ या ‘अतिप्रवाह’।

  • पहला दिन (भोगी) : इस दिन पुरानी चीजों को त्यागने की परंपरा है। लोग अपने घरों की सफाई करते हैं और अनुपयोगी वस्तुओं को अलाव में जलाते हैं, जो बुराइयों के नाश का प्रतीक है।

  • दूसरा दिन (सूर्य पोंगल) : यह मुख्य दिन है। महिलाएं नए बर्तनों में चावल, दूध और गुड़ मिलाकर ‘पोंगल’ नामक मीठा व्यंजन बनाती हैं। जब दूध उबलकर बर्तन से बाहर गिरता है, तो सब खुशी से ‘पोंगलो पोंगल’ चिल्लाते हैं। यह बहुतायत और समृद्धि का प्रतीक है। यह व्यंजन पहले सूर्य देव को अर्पित किया जाता है।

  • तीसरा दिन (मट्टू पोंगल) : यह दिन गाय-बैलों को समर्पित है। किसान अपने बैलों को नहलाकर, उनके सींगों पर रंग लगाकर और माला पहनाकर उनकी पूजा करते हैं, क्योंकि कृषि में उनका योगदान अतुलनीय है।

  • चौथा दिन (कानूम पोंगल) : इस दिन परिवार और दोस्त एक साथ मिलते हैं, सैर-सपाटा करते हैं और भोजन का आनंद लेते हैं।

  • आंध्र प्रदेश और तेलंगाना : यहां इसे पेद्दा पंडुगा (बड़ा त्योहार) कहा जाता है। यह त्योहार तीन दिन चलता है – भोगी, संक्रांति और कनुमा। इसमें मुरुकुलु (नमकीन), अरिसेलु (मीठी रोटी) जैसे व्यंजन बनते हैं। रंगोली सजाना और बैलों की सजावट भी यहां खास होती है। तेलंगाना सरकार हर साल हैदराबाद में ‘अंतर्राष्ट्रीय पतंग और मिठाई महोत्सव’ का आयोजन करती है, जहां दुनिया भर से कलाकार और पर्यटक आते हैं

(D) पूर्व और पूर्वोत्तर भारत

  • पश्चिम बंगाल और ओडिशा : यहां इसे पौष संक्रांति (Makar Sankranti) कहा जाता है (क्योंकि यह पौष महीने में पड़ती है)। इस दिन गंगा सागर में स्नान का विशेष महत्व है। बंगाल में इस दिन ‘पिठे’ (चावल के पकवान) बनाए जाते हैं। ओडिशा में इस दिन को मकर मेला के रूप में मनाया जाता है, और यहां भी तिल-गुड़ से बने लड्डुओं का विशेष महत्व है।

  • असम : यहां इसे माघ बिहू या भोगाली बिहू कहते हैं। यह भी एक फसल उत्सव है। पूरी रात अलाव जलाए जाते हैं, पारंपरिक नृत्य होते हैं और भरपूर भोजन किया जाता है। ‘माघ बिहू’ समृद्धि और प्रचुरता का प्रतीक है।

  • हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड : हिमाचल में इसे माघी साजी और उत्तराखंड में घुघुति या उत्तरायणी कहा जाता है। उत्तराखंड में ‘घुघुत’ नामक आटे से बने पक्षियों के आकार के पकवान बनाए जाते हैं और ‘काले कौए’ को भी इस दिन खाना खिलाने की परंपरा है, जो सभी जीवों के प्रति सम्मान दर्शाता है। 

5. पतंगों का आकाश - आनंद का उड़ता हुआ रंग

मकर संक्रांति (Makar Sankranti) और पतंगों का रिश्ता बहुत पुराना और गहरा है, खासकर गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र में। यह केवल एक खेल नहीं है।

(A) पतंग उड़ाने का इतिहास और महत्व

कहा जाता है कि पतंगों का इतिहास करीब 2300 साल पुराना है। चीन के दार्शनिक  ने लकड़ी से तीन साल में एक बाज बनाया था, जो एक दिन उड़ा। उनके शिष्य गोंगशू बान ने बांस और रेशम से बेहतर पतंग बनाई जो तीन दिनों तक उड़ती रही। भारत में पतंगों का आगमन व्यापारियों और यात्रियों के माध्यम से हुआ और यह धीरे-धीरे त्योहार का अभिन्न अंग बन गई।

प्रतीकात्मक रूप से, पतंग उड़ाना इस बात का प्रतीक माना गया कि हम अपनी चिंताओं और दुखों को ऊपर आकाश में भेज रहे हैं। सूर्य की किरणों के नीचे खुले आकाश में पतंग उड़ाने से शरीर को पर्याप्त मात्रा में विटामिन डी मिलता है, जो सर्दियों में बहुत जरूरी है।

(B) 'फिरकी नी डोरी' - उत्सव का काला पक्ष

हालांकि, पतंगों के इस उत्सव का एक बेहद दुखद पहलू भी है। पिछले कुछ दशकों में चाइनीज मांझा (नायलॉन की डोरी) और कांच-चूड़ी वाली डोरी (मांझे) के इस्तेमाल ने इस त्योहार को पक्षियों के लिए काल बना दिया है। ये अत्यधिक तेज धार वाली डोरियां हवा में उड़ते पक्षियों के गले काट देती हैं या उनके पंखों को बुरी तरह जख्मी कर देती हैं। पक्षियों के अलावा, इन डोरियों से सड़क पर चलने वाले लोगों (विशेषकर दुपहिया वाहन चालकों) की जान को भी खतरा रहता है।

एक शोध प्रबंध ‘फिरकी नी डोरी’ में इस समस्या को विस्तार से उठाया गया है। इस शोध में पक्षियों के घायल होने, पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले प्रभाव और इस दिशा में काम कर रहे एनजीओ (जैसे जीव दया चैरिटेबल ट्रस्ट) के प्रयासों का विश्लेषण किया गया है। कई राज्य सरकारों ने अब चाइनीज मांझे पर प्रतिबंध लगा दिया है, और जागरूक नागरिकों द्वारा भी इसके खिलाफ आवाज उठाई जा रही है।

एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते हमें चाहिए कि हम:

  1. साधारण सूती धागे का ही इस्तेमाल करें।

  2. कांच या धातु से लेपित मांझे का प्रयोग न करें।

  3. यदि कोई पक्षी घायल हो जाए, तो तुरंत पक्षी बचाव संगठनों से संपर्क करें।

  4. बच्चों को सुरक्षित पतंगबाजी के प्रति जागरूक करें – छत की मुंडेर से दूर रहें, बिजली के तारों से सावधान रहें।

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6. पकवानों का पर्व - स्वाद और सेहत का संगम

मकर संक्रांति (Makar Sankranti) का सीधा संबंध सेहत और मौसम से है। सर्दियों के इस मौसम में शरीर को गर्म रखने वाले और ऊर्जा से भरपूर खाद्य पदार्थों का सेवन किया जाता है।

(A) तिल और गुड़ : सेहत का राज

तिल और गुड़ इस त्योहार (Makar Sankranti) की जान हैं। तिल में प्राकृतिक तेल होता है जो शरीर को अंदर से गर्मी प्रदान करता है। गुड़ आयरन से भरपूर होता है और खून साफ करता है। साथ में ये दोनों शरीर को ठंड से बचाते हैं और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं। ‘तिल-गुड़ के लड्डू’ तो इस त्योहार की पहचान हैं। कहावत है “उत्तम तिलेन” यानी तिल से उत्तम कुछ नहीं।

  क्षेत्रीय व्यंजनों की झलक

  • गुजरात : उंधियू (सब्जी), चिखा, फाफड़ा-जलेबी।

  • तमिलनाडु : चावल और दूध से बना मीठा पोंगल (चक्करई पोंगल), और नमकीन वेन पोंगल।

  • महाराष्ट्र : तिल-गुड़ के लड्डू, पोळी, और ‘पुरण पोळी’ भी कहीं-कहीं बनती है।

  • उत्तर भारत : खिचड़ी, दाल-मोठ, गजक, रेवड़ी, और तिल के लड्डू।

  • पंजाब : लोहड़ी पर मूंगफली, रेवड़ी, गजक और सरसों का साग-मक्की की रोटी।

  • बंगाल : पिठे (गुड़ और नारियल से भरे चावल के पकोड़े)।

7. सामाजिक समरसता और 'हल्दी-कुंकू' का महत्व

मकर संक्रांति (Makar Sankranti) केवल व्यक्तिगत आस्था का त्योहार नहीं है, बल्कि यह सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने का एक सशक्त माध्यम है।

(A) हल्दी-कुंकू समारोह (महाराष्ट्र)

महाराष्ट्र में संक्रांति (Makar Sankranti) से रथसप्तमी तक महिलाओं द्वारा ‘हल्दी-कुंकू’ के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। यह सुवासिनी महिलाओं का एक सामूहिक मिलन समारोह है। इसे केवल एक रस्म न समझा जाए, बल्कि इसके पीछे गहरा सामाजिक और आध्यात्मिक विज्ञान है:

  1. आदिमाया शक्ति की उपासना: एक-दूसरी महिलाओं को हल्दी-कुंकू लगाकर उनमें निहित दैवीय शक्ति (स्त्री तत्त्व) का सम्मान किया जाता है।

  2. सामाजिक सलोखा और संवाद: पुराने जमाने में जब महिलाओं के सामाजिक मेलजोल के सीमित अवसर थे, हल्दी-कुंकू एक ऐसा मंच था जहां वे इकट्ठा होती थीं, अपने सुख-दुख बांटती थीं और एक-दूसरे से जुड़ती थीं-1

  3. नाते-रिश्तों की डोर मजबूत करना: ‘तिळगुळ घ्या आणि गोड बोला’ की भावना के साथ ये आयोजन पुरानी कटुता को भुलाकर संबंधों में मिठास घोलते हैं।

(B) दान और परोपकार

मकर संक्रांति (Makar Sankranti) पर दान का विशेष महत्व है। तिल, गुड़, वस्त्र, कंबल और भोजन का दान करना पुण्यकारी माना जाता है। यह हमें सिखाता है कि हमारी समृद्धि तभी सार्थक है जब हम उसे दूसरों के साथ बांटें।

2026 में एक विशेष संयोग : इस वर्ष 14 जनवरी को मकर संक्रांति (Makar Sankranti) के साथ ‘षटतिला एकादशी’ का भी दुर्लभ संयोग बन रहा है। एकादशी के दिन चावल खाना वर्जित माना जाता है, इसलिए इस दिन पारंपरिक खिचड़ी दान करने की बजाय तिल, गुड़, कंबल और अन्य वस्त्र दान करने की सलाह दी गई है। जो लोग परंपरा निभाना चाहते हैं, वे 15 जनवरी को खिचड़ी का दान कर सकते हैं।

8. 21वीं सदी में मकर संक्रांति - बदलाव और चुनौतियां

जैसे-जैसे समय बदल रहा है, त्योहारों का स्वरूप भी बदल रहा है। मकर संक्रांति (Makar Sankranti) भी इससे अछूती नहीं है।

(A) पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता

आज के युग में ‘हरित त्योहार’ की अवधारणा जोर पकड़ रही है। लोग अब पर्यावरण-अनुकूल पतंगबाजी पर जोर दे रहे हैं। सरकारों और एनजीओ द्वारा प्लास्टिक के मांझे के खिलाफ अभियान चलाए जा रहे हैं। पेपर की पतंगें और सूती धागे का उपयोग बढ़ावा दिया जा रहा है।

(B) डिजिटल दौर में त्योहार

सोशल मीडिया ने इस त्योहार (Makar Sankranti) के स्वरूप को भी प्रभावित किया है। लोग एक-दूसरे को व्हाट्सएप और फेसबुक पर शुभकामनाएं भेजते हैं। डिजिटल पेमेंट के जरिए ‘गुड्डा-पतंग’ के डिजाइन वाले उपहार और गिफ्ट वाउचर भी लोकप्रिय हो रहे हैं। लेकिन फिर भी, घर की छत पर परिवार के साथ बैठकर पतंग उड़ाने या रसोई में तिल-गुड़ के लड्डू बनाने की परंपरा ने अपनी गर्माहट नहीं खोई है।

(C) आर्थिक पहलू

पतंग बनाने वाले कारीगरों से लेकर गजक-रेवड़ी बेचने वाली छोटी दुकानों तक, यह त्योहार स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति देता है। हैदराबाद जैसे शहरों में आयोजित होने वाला अंतर्राष्ट्रीय पतंग महोत्सव न केवल पर्यटन को बढ़ावा देता है, बल्कि स्थानीय हस्तशिल्प और हथकरघा उद्योग के लिए भी एक बाजार उपलब्ध कराता है। यह त्योहार (Makar Sankranti) अब एक ‘ब्रांड’ की तरह उभर रहा है, जो आधुनिक भारत की आर्थिक जरूरतों को पारंपरिक आयोजनों से जोड़ रहा है।

9. निष्कर्ष

मकर संक्रांति (Makar Sankranti) केवल सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में जाने का नाम नहीं है। यह अंधेरे से प्रकाश की ओर, जड़ता से सक्रियता की ओर, और पुराने से नए की ओर बढ़ने का प्रतीक है। यह हमें प्रकृति के उस अटल नियम की याद दिलाता है कि परिवर्तन ही संसार का नियम है।

यह त्योहार हमें आपसी मतभेद भुलाकर ‘गोड-गोड बोलने’ की प्रेरणा देता है। यह किसान को उसकी मेहनत के फल के लिए आभार व्यक्त करने का अवसर देता है। यह शहर में रहने वाले व्यक्ति को अपनी जड़ों से जोड़ता है। यह बच्चों को खुला आसमान देता है, और बुजुर्गों को यादों की गर्म दोपहर।

जैसे-जैसे सूर्य अपनी उत्तरायण यात्रा पर निकलता है, हम भी अपने जीवन में एक नई ऊर्जा, नई आशा और नए उत्साह के साथ आगे बढ़ने का संकल्प लें। तिल-गुड़ की मिठास हमारे रिश्तों में घुले, पतंगों की तरह हमारे सपने ऊंचाइयों को छुएं, और सूर्य की रोशनी हमारे जीवन के हर अंधेरे को दूर करे।

तो आइए, इस मकर संक्रांति (Makar Sankranti) पर, हम सब मिलकर न सिर्फ आसमान में पतंगें उड़ाएं, बल्कि एक-दूसरे के दिलों में भी प्यार की डोर बांधें। ‘तिल-गुड़ घ्या, गोड-गोड बोला!’

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Frequently Asked Questions (FAQ)

1. मकर संक्रांति (Makar Sankranti) क्या है?
उत्तर : मकर संक्रांति (MAkar Sankranti) एक हिंदू त्योहार है, जो सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। यह उत्तरायण (सूर्य की उत्तरी दिशा में यात्रा) की शुरुआत का प्रतीक है और फसल कटाई के मौसम का उत्सव है।

2. मकर संक्रांति (Makar Sankranti) हर साल 14 या 15 जनवरी को ही क्यों मनाई जाती है?
उत्तर : अधिकांश हिंदू त्योहार चंद्र चक्र पर आधारित होते हैं, इसलिए उनकी तारीखें बदलती रहती हैं। लेकिन मकर संक्रांति (Makar Sankranti) सौर चक्र पर आधारित है। यह सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में जाने की खगोलीय घटना है, जो हर साल लगभग एक ही तारीख (14 जनवरी) को घटित होती है। लीप वर्ष में यह 15 जनवरी को पड़ सकती है।

3. उत्तरायण और मकर संक्रांति (Makar Sankranti) में क्या अंतर है?
उत्तर : खगोलीय रूप से, उत्तरायण (सूर्य का उत्तरी गोलार्ध की ओर बढ़ना) 21 दिसंबर से शुरू हो जाता है। लेकिन भारतीय पंचांग और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने के दिन (मकर संक्रांति) को उत्तरायण की शुरुआत माना जाता है। यह अंतर पृथ्वी के अक्षीय झुकाव में हुए बदलाव (प्रीसेशन) के कारण है।

4. इस दिन तिल और गुड़ खाने का क्या महत्व है?
उत्तर : वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, सर्दियों में तिल (जिसमें प्राकृतिक तेल होता है) और गुड़ (जो आयरन से भरपूर होता है) शरीर को गर्माहट प्रदान करते हैं और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, “तिल-गुड़ घ्या, गोड-गोड बोला” (तिल-गुड़ लो और मीठा-मीठा बोलो) कहकर लोग पुरानी कटुता भुलाकर मधुर संबंध बनाने का संदेश देते हैं।

5. पतंगबाजी का इस त्योहार से क्या संबंध है?
उत्तर : पतंगबाजी मकर संक्रांति (Makar Sankranti) की एक लोकप्रिय परंपरा है, खासकर गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र में। प्रतीकात्मक रूप से, इसे अपनी चिंताओं और दुखों को आकाश में भेजने के रूप में देखा जाता है। साथ ही, सर्दियों की धूप में पतंग उड़ाने से शरीर को विटामिन डी मिलता है, जो सेहत के लिए लाभदायक है।

6. क्या मकर संक्रांति (Makar Sankranti) केवल हिंदुओं का त्योहार है?
उत्तर : मकर संक्रांति (Makar Sankranti) मूल रूप से एक फसल उत्सव है, जो किसानों और प्रकृति से जुड़ा हुआ है। इसलिए यह केवल धार्मिक सीमाओं में बंधा नहीं है। भारत के विभिन्न हिस्सों में इसे अलग-अलग नामों (जैसे पोंगल, लोहड़ी, बिहू, उत्तरायण) से सभी वर्गों के लोग मिल-जुलकर मनाते हैं।

7. पोंगल और मकर संक्रांति (Makar Sankranti) में क्या संबंध है?
उत्तर : पोंगल, मकर संक्रांति (Makar Sankranti) का ही दक्षिण भारतीय, विशेषकर तमिलनाडु का रूप है। यह चार दिनों तक मनाया जाता है। ‘पोंगल’ का अर्थ है ‘उबलना’ या ‘अतिप्रवाह’। यह त्योहार (Makar Sankranti) समृद्धि और बहुतायत का प्रतीक है, जब चावल को दूध में उबालकर सूर्य देव को अर्पित किया जाता है।

8. चाइनीज मांझा (नायलॉन की डोरी) खतरनाक क्यों है?
उत्तर : चाइनीज मांझा या कांच-चूड़ी वाली डोरी बहुत तेज धार वाली होती है। यह हवा में उड़ते पक्षियों के गले काट सकती है या उनके पंखों को बुरी तरह घायल कर सकती है। इसके अलावा, यह सड़क पर चलने वाले लोगों (विशेषकर दुपहिया वाहन चालकों) के लिए भी जानलेवा साबित हो सकती है। इसलिए कई राज्य सरकारों ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया है।

9. मकर संक्रांति (Makar Sankranti) पर दान का क्या महत्व है?
उत्तर : इस दिन (Makar Sankranti) तिल, गुड़, वस्त्र, कंबल और भोजन का दान करना बहुत पुण्यकारी माना जाता है। यह परंपरा हमें सिखाती है कि हमारी समृद्धि तभी सार्थक है जब हम उसे जरूरतमंदों के साथ बांटें। सर्दियों में गरीबों को कंबल और गर्म कपड़े दान करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।

10. क्या इस दिन कोई विशेष खगोलीय घटना घटित होती है?
उत्तर : इस दिन सूर्य मकर रेखा (ट्रॉपिक ऑफ कैप्रिकॉर्न) पर पहुंचता है और उत्तरी गोलार्ध की ओर अपनी यात्रा शुरू करता है। इस दिन से दिन की अवधि बढ़ने लगती है और रातें छोटी होने लगती हैं। यह एक महत्वपूर्ण खगोलीय घटना है, जिसे प्राचीन काल से ही भारतीय ऋषि-मुनि समझते थे और त्योहार के रूप में मनाते थे।

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