नरसिंह अवतार की कथा
1. सिंह-नर (Mahavatar Narsimha) का अद्भुत अवतरण
भगवान विष्णु के दस प्रमुख अवतारों (दशावतार) में चौथा स्थान नरसिंह अवतार (Mahavatar Narsimha) को प्राप्त है। यह अवतार अपने स्वरूप में अद्वितीय है – न तो पूर्ण रूप से मानव और न ही पूर्ण रूप से पशु, बल्कि दोनों का अद्भुत सम्मिलन। नरसिंह का अर्थ ही है ‘नर’ (मनुष्य) और ‘सिंह’ का मेल | यह अवतार धर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश के लिए हुआ, किंतु इसकी कथा अन्य अवतारों से इस मायने में भिन्न है कि इसमें भगवान को एक अभूतपूर्व क्रोधित एवं रौद्र रूप में धारण करना पड़ा, जिसे शांत करना भी एक बड़ी चुनौती बन गई।
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Toggleयह अवतार केवल एक दैत्य के वध की कहानी नहीं है, बल्कि यह भक्ति की अटल शक्ति, ईश्वर की सर्वव्यापकता, और उन नैतिक प्रश्नों की गहन व्याख्या है, जहां नियमों का पालन करते हुए भी अन्याय का अंत करना होता है। हिरण्यकशिपु के वध की कथा सृष्टि के उस शाश्वत सत्य को उजागर करती है कि जब अहंकार और दंभ अपनी चरम सीमा को पार कर जाते हैं, तब ईश्वर स्वयं स्तंभ से भी प्रकट होकर उसका नाश करते हैं
2. ऐतिहासिक और पौराणिक स्रोत
(A) वैदिक जड़ें और पौराणिक विकास
नरसिंह (Mahavatar Narsimha) की अवधारणा का उद्भव केवल पौराणिक कथाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें वैदिक साहित्य में भी मिलती हैं। ऋग्वेद के 1.154 सूक्त में विष्णु का वर्णन “एक जंगली, भयानक, पहाड़ों में विचरने वाले पशु” के रूप में किया गया है, जिसे विद्वान नरसिंह (Mahavatar Narsimha) का प्रारंभिक संकेत मानते हैं | इससे भी महत्वपूर्ण संबंध इंद्र और नमुचि की कथा से जुड़ता है, जो शतपथ ब्राह्मण में मिलती है।
इंद्र-नमुचि कथा और नरसिंह-हिरण्यकशिपु कथा में अद्भुत समानताएं हैं। नमुचि वरदान मांगता है कि उसे न दिन में मारा जाए, न रात में; न सूखी वस्तु से, न गीली वस्तु से; न हथेली से, न मुट्ठी से। इंद्र संध्या के समय (जो न दिन है न रात) पानी के झाग (जो न सूखा है न गीला) से उसका वध करते हैं । डेबोरा सॉइफर जैसी विद्वानों के अनुसार, यह वैदिक कथा ही पौराणिक काल में आकर नरसिंह अवतार (Mahavatar Narsimha) के रूप में विकसित हुई। शब्दों और अवधारणाओं की समानता इसे स्पष्ट करती है |
(B) पुराणों में नरसिंह
नरसिंह (Mahavatar Narsimha) की कथा का सर्वाधिक विस्तृत और लोकप्रिय वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण के सप्तम स्कंध में मिलता है। इसके अतिरिक्त, विष्णु पुराण (1.16-20), अग्नि पुराण (4.2-3), ब्रह्मांड पुराण (2.5.3-29), मत्स्य पुराण (161-163), वायु पुराण (67.61-66), कूर्म पुराण (1.15.18-72), पद्म पुराण (5.42) और शिव पुराण (2.5.43 एवं 3.10-12) सहित कुल 17 पुराणों में इस अवतार का उल्लेख मिलता है। इन सभी कथाओं में मूल ढांचा एक जैसा है, यद्यपि विवरणों में थोड़ा अंतर है।
नरसिंह तापनीय उपनिषद् भी नरसिंह (Mahavatar Narsimha) को समर्पित एक महत्वपूर्ण उपनिषद् है, जो वैष्णव उपनिषदों में प्राचीनतम मानी जाती है। संगम साहित्य के परिपाटल ग्रंथ (300 ईसा पूर्व – 300 ईस्वी) में भी नरसिंह का उल्लेख मिलता है, जो दर्शाता है कि दक्षिण भारत में भी इस अवतार की लोकप्रियता प्राचीन काल से रही है |
3. कथा - हिरण्यकशिपु का अहंकार और प्रह्लाद की भक्ति
(A) कथा का प्रारंभ: दो भाई और उनका अंत
नरसिंह (Mahavatar Narsimha) कथा का प्रारंभ दो शक्तिशाली दैत्य भाइयों, हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु से होता है। हिरण्याक्ष का वध भगवान विष्णु ने अपने वराह अवतार में किया था । इस घटना ने हिरण्यकशिपु के मन में विष्णु के प्रति गहरी द्वेष भावना पैदा कर दी। उसने प्रतिज्ञा की कि वह विष्णु को मारकर अपने भाई का बदला लेगा और संसार से विष्णु का नामोनिशान मिटा देगा।
(B) कठोर तप और अद्वितीय वरदान
अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हिरण्यकशिपु ने घोर तपस्या की। वह मांसल, त्वचा और नाखूनों को छोड़कर अस्थिपिंजर मात्र रह गया। उसकी तपस्या से तीनों लोक तपने लगे। अंततः स्वयं ब्रह्मा जी प्रकट हुए और उससे वर मांगने को कहा । हिरण्यकशिपु ने एक ऐसा वरदान मांगा जो उसे लगभग अमर बना दे। उसने मांगा:
न कोई शस्त्र मुझे मार सके।
न कोई मनुष्य, न कोई देवता, न कोई दैत्य, न कोई पशु-पक्षी मुझे मार सके।
न दिन में मेरी मृत्यु हो, न रात में।
न घर के अंदर मेरी मृत्यु हो, न बाहर।
न पृथ्वी पर मेरी मृत्यु हो, न आकाश में।
न किसी चेतन प्राणी से मेरी मृत्यु हो, न अचेतन से ।
ब्रह्मा जी ने ‘तथास्तु’ कह दिया और हिरण्यकशिपु अजेय हो गया।
(C) प्रह्लाद का जन्म और दिव्य संस्कार
हिरण्यकशिपु की पत्नी का नाम कयाधु था। जब वह गर्भवती थी, तब इंद्र ने उसका अपहरण कर लिया, यह सोचकर कि उसके गर्भ में पल रहा दैत्य शक्तिशाली होगा। देवर्षि नारद ने हस्तक्षेप कर कयाधु को इंद्र के चंगुल से मुक्त कराया और अपने आश्रम में शरण दी । नारद जी के आश्रम में कयाधु ने उनकी सेवा की और उनसे भगवान विष्णु की कथाएं सुनी एवं भक्ति का वातावरण देखा | गर्भ में पल रहा शिशु प्रह्लाद इन दिव्य ध्वनियों और वातावरण से प्रभावित हुआ और जन्म से ही भगवान विष्णु का परम भक्त बन गया |
(D) पिता-पुत्र का संघर्ष
जब प्रह्लाद बड़ा हुआ, तो उसे दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य के शिष्यों के पास शिक्षा के लिए भेजा गया। वहां उसे राजा (हिरण्यकशिपु) की पूजा करना सिखाया जाता था, परंतु प्रह्लाद तो केवल नारायण का नाम जपता था और दूसरे छात्रों को भी भक्ति का पाठ पढ़ाता था। जब यह बात हिरण्यकशिपु को पता चली, तो वह अत्यंत क्रोधित हुआ ।
हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को मारने के अनेक प्रयास किए:
उसे विषैले सांपों से डसवाया गया, किंतु सांपों के फन पर लक्ष्मी जी ने अपना आसन जमा लिया और प्रह्लाद सुरक्षित रहा।
उसे ऊंचे पर्वत से नीचे फेंक दिया गया, परंतु भगवान ने उसे थाम लिया।
उसे जहर दिया गया, किंतु वह अमृत के समान पच गया।
उसे अग्नि में झोंका गया, किंतु अग्नि शीतल हो गई।
जंगली हाथियों के सामने डाला गया, किंतु हाथी उसके सामने झुक गए ।
हर बार प्रह्लाद शांतिपूर्वक ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जाप करता रहा और भगवान की कृपा से बचता रहा।
(E) अंतिम संवाद: क्या यह स्तंभ में है?
अपनी असफलता से क्रोधित और व्यथित हिरण्यकशिपु ने एक दिन प्रह्लाद से पूछा, “तू जिस परमेश्वर की भक्ति करता है, क्या वह सर्वव्यापी है?” प्रह्लाद ने कहा, “हाँ पिताश्री, वह सर्वत्र हैं।” हिरण्यकशिपु ने व्यंग्य करते हुए सभा भवन के एक स्तंभ की ओर इशारा करके पूछा, “क्या तेरा यह नारायण इस स्तंभ में भी है?” प्रह्लाद ने बिना किसी हिचकिचाहट के उत्तर दिया, “हाँ, वह इस स्तंभ में भी हैं” |
(F) स्तंभ से प्रकट हुआ भयंकर रूप
हिरण्यकशिपु ने अपनी गदा उठाई और उस स्तंभ पर जोर से प्रहार किया। उसी क्षण उस स्तंभ में से एक भयंकर गर्जना के साथ एक अद्भुत स्वरूप प्रकट हुआ – नरसिंह (Mahavatar Narsimha)। उनका शरीर मानव का था, किंतु मुख सिंह का, नेत्र अंगारों के समान लाल, नुकीले दांत और अत्यंत विकराल ।
हिरण्यकशिपु नरसिंह (Mahavatar Narsimha) को देखकर चकित रह गया। उसे समझ में नहीं आया कि यह कौन है? न मनुष्य, न पशु। अब युद्ध आरंभ हुआ। संध्या का समय था (जो न दिन है न रात)। नरसिंह (Mahavatar Narsimha) ने हिरण्यकशिपु को पकड़ लिया और द्वार की दहलीज पर (जो न घर के अंदर है न बाहर) ले जाकर अपनी जांघों (जो न भूमि है न आकाश) पर रख लिया। फिर अपने नाखूनों (जो न शस्त्र हैं न अचेतन) से उसका पेट चीरकर उसे मार डाला । इस प्रकार भगवान ने ब्रह्मा के वरदान की एक-एक शर्त को तोड़े बिना ही उस दैत्य का अंत कर दिया।
4. नरसिंह (Mahavatar Narsimha) का रौद्र रूप और शांति
(A) अदम्य क्रोध और तीनों लोकों की व्यथा
हिरण्यकशिपु के वध के बाद भी नरसिंह (Mahavatar Narsimha) का क्रोध शांत नहीं हुआ। उनकी भयंकर अग्नि से तीनों लोक तपने लगे। देवता, गंधर्व, ऋषि-मुनि सब भयभीत हो गए। उनका रूप इतना भीषण था कि कोई भी उनके समीप जाने का साहस नहीं कर पा रहा था ।
देवताओं ने शांति के लिए अनेक प्रयास किए। स्वयं ब्रह्मा और भगवान शिव ने उनकी स्तुति की, किंतु उनका क्रोध कम नहीं हुआ। भगवान की शक्ति एवं पत्नी महालक्ष्मी भी उनके सामने गईं, किंतु वे भी उन्हें शांत नहीं कर सकीं । यह स्थिति दर्शाती है कि जब सृष्टि के पालनकर्ता को संहारक का रूप धारण करना पड़ता है, तो वह शक्ति कितनी प्रबल और अप्रतिम होती है। लक्ष्मी जी भी उस रूप के समक्ष निरस्त हो गईं, जो लीला के समापन पर पुनः अपने मूल शांत स्वरूप में लौटने को तैयार नहीं था।
(B) प्रह्लाद की स्तुति और शांति
अंततः देवताओं ने स्वयं प्रह्लाद को नरसिंह (Mahavatar Narsimha) के समक्ष भेजा। प्रह्लाद ने निडर होकर उस भयानक रूप के समक्ष घुटने टेके और करुण हृदय से भगवान की स्तुति करनी शुरू की ।
प्रह्लाद की स्तुति अद्भुत थी। उसने भगवान से कहा:
“प्रभो, आप क्रोधित क्यों हैं? आप तो सच्चिदानंद स्वरूप हैं। आपका यह क्रोध किस पर है? क्रोध का कारण तो दैत्य हिरण्यकशिपु था, जो अब मारा जा चुका है। अब यह क्रोध किसके लिए है? यदि यह क्रोध अभी भी शेष है, तो कृपया इस क्रोध को मुझ पर उतार दें, मैं आपकी संतान हूं।”
प्रह्लाद की निष्कलंक भक्ति और विनम्रता देखकर भगवान नरसिंह (Mahavatar Narsimha) का हृदय पसीज गया। उनका क्रोध शांत हुआ और उन्होंने प्रह्लाद को अपनी गोद में उठाकर आशीर्वाद दिया। इस घटना के बाद प्रह्लाद को दैत्यों का राजा बनाया गया |
5. दार्शनिक व्याख्या और प्रतीकार्थ
(A) सर्वव्यापकता का प्रमाण
नरसिंह अवतार (Mahavatar Narsimha) का सबसे बड़ा संदेश ईश्वर की सर्वव्यापकता है। हिरण्यकशिपु ने बार-बार प्रह्लाद से पूछा, “क्या तेरा भगवान इस स्तंभ में है?” प्रह्लाद का उत्तर ‘हाँ’ इस बात का प्रमाण है कि भक्त के लिए ईश्वर कण-कण में व्याप्त है। एक साधारण स्तंभ भी उस परम शक्ति का निवास स्थान बन सकता है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड का संहार करने में सक्षम है |
(B) भक्त की अटूट श्रद्धा
प्रह्लाद की कथा भक्ति योग का उत्कृष्ट उदाहरण है। प्रह्लाद के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती उसका अपना पिता था, जो सर्वशक्तिमान था और उसे मारने पर तुला हुआ था। फिर भी प्रह्लाद ने कभी अपने पिता से घृणा नहीं की और न ही अपने भगवान पर संदेह किया। उसका यह विश्वास कि “भगवान मेरी रक्षा करेंगे” कभी डगमगाया नहीं। यही कारण है कि भगवान को स्वयं प्रकट होकर उसकी रक्षा करनी पड़ी |
(C) अहंकार का नाश
हिरण्यकशिपु का चरित्र अहंकार का प्रतीक है। उसने सोचा कि उसके वरदान उसे अमर बना देंगे। उसने यह भूल कर दी कि ईश्वर के सामने कोई वरदान टिक नहीं सकता। उसका अंत इस बात का प्रतीक है कि अहंकार और अधर्म का नाश निश्चित है। उसकी मृत्यु के समय की परिस्थितियाँ – न दिन न रात, न घर न बाहर, न शस्त्र न अस्त्र – यह दर्शाती हैं कि ईश्वर नियमों से बंधा नहीं है, बल्कि नियम उसके अधीन हैं। उसने हिरण्यकशिपु के अपने ही बनाए नियमों को ही उसके विरुद्ध मोड़ दिया |
(D) नरसिंह (Mahavatar Narsimha) : धर्म और अनुग्रह का द्वंद्व
नरसिंह (Mahavatar Narsimha) का रूप स्वयं एक द्वंद्व है। वे एक ओर भयंकर संहारक हैं, तो दूसरी ओर भक्तवत्सल। उनका यह रूप बताता है कि ईश्वर में करुणा और क्रोध दोनों का समावेश है। वे जहां भक्तों पर कृपा करते हैं, वहीं अत्याचारियों का संहार भी करते हैं। यही वैष्णव दर्शन का मूल है – सृष्टि का पालन करने के लिए उसे बुराइयों से मुक्त करना भी आवश्यक है |
(E) स्तंभ का रहस्य
स्तंभ से नरसिंह (Mahavatar Narsimha) का प्रकट होना कई अर्थों में व्याख्यायित किया गया है। यह स्तंभ केवल पत्थर का खंभा नहीं, बल्कि सृष्टि के उस स्तंभ का प्रतीक है जो आकाश और पृथ्वी को जोड़ता है। यह सीमा रेखा का प्रतीक है – जहां घर समाप्त होता है और बाहर का संसार शुरू होता है। नरसिंह (Mahavatar Narsimha) का प्रकट होना इस सीमा रेखा पर ही संभव था, जो दो लोकों के बीच की संधि है। यह संधि का क्षण – संध्या – भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जो दिन और रात के बीच की संधि है। नरसिंह (Mahavatar Narsimha) संधियों के देवता हैं, जहां विरोधाभासी तत्व मिलते हैं और एक नए सत्य का जन्म होता है |
6. नरसिंह (Mahavatar Narsimha) के विभिन्न रूप
(A) उग्र और शांत स्वरूप
नरसिंह (Mahavatar Narsimha) के मुख्यतः दो स्वरूप हैं – उग्र और शांत। हिरण्यकशिपु के वध के समय का स्वरूप उग्र नरसिंह (उग्र-नरसिंह) कहलाता है। इस स्वरूप में उनकी भौहें तनी होती हैं, नेत्र लाल, मुख विकराल और दांत नुकीले होते हैं। इस स्वरूप की पूजा विशेष नियमों और सावधानियों के साथ की जाती है।
वध के बाद, जब प्रह्लाद ने उनकी स्तुति की और वे शांत हुए, तब उन्होंने योग-नरसिंह का रूप धारण किया । योग-नरसिंह ध्यानमग्न मुद्रा में होते हैं, उनके हाथ ध्यान मुद्रा में होते हैं या वरद मुद्रा में। उनके साथ उनकी शक्ति लक्ष्मी जी भी होती हैं, इसलिए वे लक्ष्मी-नरसिंह कहलाते हैं । यह स्वरूप शांत, सौम्य और भक्तों पर कृपा बरसाने वाला है। दक्षिण भारत के मंदिरों में प्रायः योग-नरसिंह की मूर्तियाँ मिलती हैं, विशेषकर चोल काल की |
(B) नव-नरसिंह
आंध्र प्रदेश के अहोबिलम क्षेत्र में नरसिंह (Mahavatar Narsimha) के नौ रूपों (नव-नरसिंह) की पूजा होती है, जिन्हें अहोबिलम नरसिंह (Mahavatar Narsimha) क्षेत्र के नाम से जाना जाता है । ये नौ रूप हैं:
ज्वाला नरसिंह (अग्नि के समान तेजस्वी)
अहोबिल नरसिंह (प्रसन्न मुद्रा वाले)
क्रोड़ नरसिंह (शिकार की मुद्रा में)
करण नरसिंह (हाथी के रूप में)
भार्गव नरसिंह (परशुराम से संबंधित)
योगानंद नरसिंह (योग मुद्रा में)
क्षत्रिय नरसिंह (युद्ध मुद्रा में)
पवन नरसिंह (वायु के समान सर्वव्यापी)
वीर नरसिंह (शूरवीर)
इन नौ रूपों में से प्रत्येक की अपनी कथा और महिमा है, और यह स्थान नरसिंह (Mahavatar Narsimha) भक्तों के लिए प्रमुख तीर्थ स्थल है।
7. मंदिर और तीर्थ स्थल
(A) उत्तर भारत के मंदिर
नरसिंह (Mahavatar Narsimha) अवतार की पूजा सम्पूर्ण भारत में व्याप्त है। उत्तर भारत में प्राचीन नरसिंह (Mahavatar Narsimha) मंदिरों के प्रमाण मथुरा से मिले हैं, जो दूसरी से चौथी शताब्दी के बीच के हैं । ये प्रतिमाएँ गुप्त काल की कला की उत्कृष्ट नमूने हैं।
प्रयागराज (इलाहाबाद) के निकट स्थित नरसिंह मंदिर भी प्रसिद्ध है। हिमाचल प्रदेश में काँगड़ा के पास नरसिंह (Mahavatar Narsimha) का एक प्राचीन मंदिर है, जहां हर वर्ष भक्तों की भीड़ लगती है।
(B)दक्षिण भारत के प्रमुख मंदिर
दक्षिण भारत में नरसिंह (Mahavatar Narsimha) की उपासना का विशेष महत्व है। श्रीरंगम मंदिर में मेलुक्कोट्टई के नरसिंह (Mahavatar Narsimha) और मेट्टु अलागिया सिंहर सन्निधि विशेष प्रसिद्ध हैं। श्रीरंगम में स्थित इस सन्निधि के बारे में प्रसिद्ध है कि जब कवि कंबन ने अपने रामायण में नरसिंह (Mahavatar Narsimha) का वर्णन किया, तो इस सन्निधि से गर्जना हुई, जिसे उनके रामायण की स्वीकृति का प्रतीक माना गया ।
आंध्र प्रदेश का अहोबिलम नरसिंह का सर्वोच्च तीर्थ है, जहां नव-नरसिंह की उपासना होती है। कर्नाटक के श्रीक्षेत्र नरसिंहपुर, मैसूर के नंजनगूड में भी नरसिंह (Mahavatar Narsimha) के प्रसिद्ध मंदिर हैं। तमिलनाडु के शोलिंगर, नमक्कल और मदुरै के पास अलागर कोविल में भी नरसिंह (Mahavatar Narsimha) के भव्य मंदिर हैं।
(C) चोल काल की मूर्तियाँ
चोल राजाओं (880-1279 ईस्वी) ने नरसिंह (Mahavatar Narsimha) की अनेक उत्कृष्ट कांस्य प्रतिमाएँ बनवाईं। इनमें योग-नरसिंह की मूर्तियाँ विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। न्यूयॉर्क के मेट्रोपोलिटन म्यूजियम ऑफ आर्ट में स्थित 12वीं शताब्दी की एक योग-नरसिंह प्रतिमा इस कला की उत्कृष्टता को दर्शाती है। इसमें नरसिंह (Mahavatar Narsimha) को ध्यान मुद्रा में दिखाया गया है, उनके हाथ में शंख और चक्र है तथा नीचे के दो हाथ ध्यान में लीन हैं |
8. पर्व और उत्सव
(A) नरसिंह जयंती
नरसिंह (Mahavatar Narsimha) जयंती हिंदू कैलेंडर के वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है। यह दिन आमतौर पर अप्रैल-मई में आता है। इस दिन भगवान नरसिंह का प्राकट्य हुआ था ।
इस दिन भक्त व्रत रखते हैं और मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है। श्री शंकराचार्य मठों में इस दिन विशेष आयोजन होते हैं। नरसिंह को विशेष प्रसाद चढ़ाया जाता है, जैसे कि नीर मोर (मठा), पानक (गुड़ और पानी का शर्बत) और वड़ा परुप्पु (उड़द की दाल)। मंदिरों में स्तंभ से नरसिंह (Mahavatar Narsimha) के प्रकट होने के प्रसंग का पाठ किया जाता है और हवन-यज्ञ किए जाते हैं।
(B) होली से संबंध
दिलचस्प रूप से नरसिंह (Mahavatar Narsimha) की कथा का होली के पर्व से भी गहरा संबंध है। होली से एक दिन पहले होलिका दहन किया जाता है। होलिका, हिरण्यकशिपु की बहन थी, जिसे यह वरदान था कि वह अग्नि में नहीं जल सकती। हिरण्यकशिपु के कहने पर होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई, ताकि प्रह्लाद जल जाए। किंतु भगवान की कृपा से होलिका तो जल गई और प्रह्लाद सुरक्षित रहा । यही घटना होलिका दहन के रूप में प्रतिवर्ष मनाई जाती है।
9. आधुनिक संदर्भ और व्याख्याएं
(A) नरसिंह (Mahavatar Narsimha) और विकासवाद का सिद्धांत
कुछ आधुनिक विद्वानों ने नरसिंह अवतार (Mahavatar Narsimha) को विकासवाद के सिद्धांत से भी जोड़ा है। अभिजीत सरकार के “अवतारिक विकासवाद सिद्धांत” के अनुसार, दशावतार पृथ्वी पर जीवन के विकासक्रम को दर्शाते हैं। मत्स्य (मछली) से कूर्म (कछुआ/उभयचर), फिर वराह (स्थलीय स्तनपायी), और फिर नरसिंह (अर्ध-मानव) यह दर्शाता है कि कैसे विकास ने मानव और पशु के बीच की एक संक्रमणकालीन अवस्था को जन्म दिया । नरसिंह उस चरण का प्रतीक हैं जहां मानव ने अभी पूरी तरह से पशु प्रवृत्ति से मुक्ति नहीं पाई थी, लेकिन चेतना का विकास तीव्र गति से हो रहा था। यह व्याख्या नरसिंह (Mahavatar Narsimha) को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी प्रासंगिक बनाती है।
(B) नरसिंह (Mahavatar Narsimha) : समकालीन भक्ति में
आज भी नरसिंह (Mahavatar Narsimha) भक्तों के लिए आस्था के केंद्र हैं। विशेष रूप से इस्कॉन (ISKCON) में नरसिंह की उपासना का विशेष महत्व है। इस्कॉन के मंदिरों में नरसिंह को ‘भक्तों के रक्षक’ के रूप में स्थापित किया जाता है ।
आधुनिक समय में भी नरसिंह के चमत्कारों की कई कथाएं प्रचलित हैं। एक प्रचलित कथा के अनुसार, जब एक भक्त के माता-पिता कार दुर्घटना का शिकार हुए, तो वे पूरी तरह सुरक्षित बच गए क्योंकि उन्होंने नरसिंह का नाम जपा था। एक अन्य घटना में, एक भक्त लड़की तेज गति से आ रही ट्रक की चपेट में आ गई, लेकिन वह हवा में उछलकर सड़क के किनारे सुरक्षित गिरी और उसे केवल मामूली खरोंचें आईं। उसने बताया कि नरसिंह ने उसे अपने पंजों में उठाकर सुरक्षित स्थान पर रखा था । ये कथाएं आज भी भक्तों के विश्वास को मजबूत करती हैं कि नरसिंह अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर हैं।
(C) संकटों से मुक्ति के देवता
नरसिंह (Mahavatar Narsimha) को विशेष रूप से भय और संकट से मुक्ति के देवता के रूप में पूजा जाता है। उनका मंत्र – “उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्” – का जाप भक्त नियमित रूप से करते हैं। इस मंत्र में नरसिंह को ‘मृत्युमृत्यु’ (मृत्यु को मारने वाला) कहा गया है । यह मान्यता है कि इस मंत्र के जाप से भय दूर होता है, शत्रुओं पर विजय मिलती है और जीवन की बाधाएं समाप्त होती हैं।
10. साहित्य और संस्कृति में नरसिंह
(A) आदि शंकराचार्य की रचनाएं
आदि शंकराचार्य का नरसिंह से गहरा संबंध था। कथा के अनुसार, जब एक कापालिक शंकराचार्य का बलि चढ़ाने वाला था, तब उनके शिष्य पद्मपाद में नरसिंह ने प्रवेश किया और उनकी रक्षा की | इस घटना के बाद शंकराचार्य ने नरसिंह पर अनेक स्तोत्रों की रचना की। उनमें प्रमुख हैं – लक्ष्मी-नरसिंह पंचरत्न स्तोत्र और लक्ष्मी-नरसिंह करावलंब स्तोत्र। करावलंब स्तोत्र में वे कहते हैं:
“लक्ष्मीपते कमलनाथ सुरेश विष्णो
यज्ञेश यज्ञ मधुसूदन विश्वरूप।
ब्रह्मण्य केशव जनार्दन वासुदेव
लक्ष्मी नृसिंह मम देहि करावलम्बम्॥”
अर्थात – हे लक्ष्मीपते, कमलनाथ, देवेश, विष्णो, यज्ञेश, यज्ञस्वरूप, मधुसूदन, विश्वरूप, ब्रह्मण्य, केशव, जनार्दन, वासुदेव, हे लक्ष्मी-नरसिंह, मुझे अपना हाथ का सहारा दीजिए |
(B) कंबन और उनका रामायण
तमिल साहित्य में नरसिंह का विशेष स्थान है। तमिल के महाकवि कंबन ने अपने रामायण (कंब रामायणम) में नरसिंह कथा का समावेश किया, जबकि वाल्मीकि रामायण में इसका उल्लेख नहीं है। जब कंबन ने अपने रामायण को सभा में प्रस्तुत किया, तो विद्वानों ने इस पर आपत्ति की। तब कंबन श्रीरंगम के मेट्टु अलागिया सिंहर सन्निधि में गए और अपनी रचना सुनाई। सन्निधि से एक भयंकर गर्जना हुई, जिसे नरसिंह की स्वीकृति मानकर सभी विद्वानों ने कंबन के रामायण को मान्यता दी । यह घटना दर्शाती है कि नरसिंह केवल पौराणिक देवता नहीं, बल्कि साहित्य और कला के संरक्षक भी हैं।
11. निष्कर्ष: नरसिंह का शाश्वत संदेश
नरसिंह अवतार (Mahavatar Narsimha) भारतीय धर्म और दर्शन का एक ऐसा अध्याय है, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना कि हजारों वर्ष पूर्व था। यह अवतार हमें कई महत्वपूर्ण संदेश देता है:
पहला, यह कि ईश्वर सर्वत्र है। वह किसी स्तंभ में हो सकता है, किसी कण में हो सकता है। हमें उसे पहचानने के लिए केवल प्रह्लाद जैसी निष्कलंक दृष्टि चाहिए।
दूसरा, यह कि भक्ति की शक्ति सबसे बड़ी शक्ति है। हिरण्यकशिपु के पास अद्वितीय वरदान थे, अजेय शक्ति थी, परंतु वह एक छोटे से बालक की भक्ति के समक्ष निरस्त हो गया।
तीसरा, यह कि ईश्वर के नियम अटल हैं, किंतु वे स्वयं उन नियमों से परे हैं। उन्होंने हिरण्यकशिपु के वरदान की एक-एक शर्त को मानते हुए भी उसका वध किया। यह दर्शाता है कि ईश्वर न्याय और धर्म की स्थापना के लिए कोई भी मार्ग खोज ही लेते हैं।
चौथा, यह कि क्रोध और संहार भी ईश्वर के अंग हैं, किंतु उनका अंत करुणा और शांति में ही होता है। नरसिंह का रौद्र रूप शांत तभी हो सका जब एक भक्त ने उनके समक्ष आत्मसमर्पण किया।
नरसिंह (Mahavatar Narsimha) केवल एक देवता नहीं, वे एक अवधारणा हैं – धर्म की विजय और अधर्म के विनाश की अवधारणा। वे भक्त की पुकार सुनने वाले रक्षक हैं, और अहंकारी का संहार करने वाले संहारक। उनका अर्ध-नर अर्ध-सिंह रूप यह बताता है कि जीवन में पशुता और मानवता के बीच संतुलन आवश्यक है। जब यह संतुलन बिगड़ता है, तो ईश्वर स्वयं उसे सुधारने आते हैं।
आज के आधुनिक युग में, जब अन्याय और अत्याचार नए-नए रूपों में सामने आते हैं, जब अहंकार और दंभ पुनः सिर उठाते हैं, नरसिंह का स्तंभ से प्रकट होना उस आशा का प्रतीक है कि धर्म की रक्षा अवश्य होगी। उनका वह रूप, जो न दिन में प्रकट हुआ न रात में, न घर में न बाहर, हमें स्मरण दिलाता है कि ईश्वर की लीला अपरंपार है और उसकी कृपा सदैव भक्तों पर बनी रहती है।
नरसिंह अवतार (Mahavatar Narsimha) की यह कथा युगों-युगों तक मानवता को यही संदेश देती रहेगी कि सत्य की हमेशा जीत होती है, असत्य का नाश होता है, और भगवान अपने भक्तों की रक्षा के लिए हर युग में, हर स्थान पर प्रकट होते हैं – चाहे वह स्थान एक साधारण स्तंभ ही क्यों न हो।
ॐ नमो भगवते नरसिंहाय॥
Frequently Asked Questions (FAQ)
1) नरसिंह अवतार क्या है ?
उत्तर : नरसिंह अवतार (Mahavatar Narsimha) भगवान विष्णु के दस प्रमुख अवतारों (दशावतार) में चौथा अवतार है। इसमें भगवान ने आधा मनुष्य और आधा सिंह का रूप धारण किया था। ‘नर’ का अर्थ मनुष्य और ‘सिंह’ का अर्थ सिंह होता है। यह अवतार भक्त प्रह्लाद की रक्षा और अहंकारी दैत्य हिरण्यकशिपु के वध के लिए हुआ था।
2) नरसिंह अवतार क्यों हुआ ?
उत्तर : नरसिंह अवतार (Mahavatar Narsimha) मुख्यतः दो कारणों से हुआ :
भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए, जिसे उसका पिता हिरण्यकशिपु मारना चाहता था |
अहंकारी दैत्य हिरण्यकशिपु का वध करने के लिए, जिसने ब्रह्मा जी से अद्वितीय वरदान प्राप्त कर लिया था और स्वयं को भगवान घोषित कर दिया था |
3) हिरण्यकशिपु को क्या वरदान मिला था ?
उत्तर : हिरण्यकशिपु ने ब्रह्मा जी से यह वरदान मांगा था :
न वह दिन में मरे, न रात में
न घर के अंदर मरे, न बाहर
न किसी शस्त्र से उसकी मृत्यु हो
न किसी मनुष्य, देवता, दैत्य या पशु-पक्षी से उसकी मृत्यु हो
न पृथ्वी पर मरे, न आकाश में
न किसी चेतन से, न अचेतन से
ब्रह्मा जी ने ‘तथास्तु’ कह दिया, जिससे वह लगभग अमर हो गया।
4) नरसिंह भगवान ने हिरण्यकशिपु का वध कैसे किया ?
उत्तर : नरसिंह भगवान ने हिरण्यकशिपु के वरदान की एक-एक शर्त का पालन करते हुए उसका वध किया :
संध्या के समय (जो न दिन है न रात)
द्वार की दहलीज पर (जो न घर के अंदर है न बाहर)
अपनी जांघों पर रखकर (जो न भूमि है न आकाश)
अपने नाखूनों से (जो न शस्त्र हैं न अस्त्र, न चेतन न अचेतन)
नरसिंह रूप में (जो न मनुष्य है न पशु)
5) प्रह्लाद कौन थे ?
उत्तर : प्रह्लाद हिरण्यकशिपु के पुत्र थे। वे जन्म से ही भगवान विष्णु के परम भक्त थे। गर्भावस्था में ही उन्होंने देवर्षि नारद से भक्ति का उपदेश सुना था। पिता के अनेक अत्याचारों के बावजूद उन्होंने अपनी भक्ति नहीं छोड़ी। वे भक्ति के महान उदाहरण माने जाते हैं।
6) नरसिंह जयंती कब मनाई जाती है ?
उत्तर : नरसिंह जयंती हिंदू कैलेंडर के वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है। यह आमतौर पर अप्रैल-मई माह में आती है। इस दिन भगवान नरसिंह का प्राकट्य हुआ था। भक्त व्रत रखते हैं और मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है।
7) नरसिंह भगवान के प्रमुख मंदिर कहाँ हैं ?
उत्तर : भारत में नरसिंह भगवान के प्रमुख मंदिर :
अहोबिलम (आंध्र प्रदेश): यहाँ नरसिंह के नौ रूपों (नव-नरसिंह) के मंदिर हैं |
शोलिंगर (तमिलनाडु)
नमक्कल (तमिलनाडु)
मेलुक्कोट्टई (कर्नाटक)
श्रीरंगम (तमिलनाडु) – यहाँ मेट्टु अलागिया सिंहर सन्निधि है |
प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) के निकट नरसिंह मंदिर |
8) नरसिंह भगवान के कितने रूप हैं ?
उत्तर : नरसिंह भगवान के मुख्यतः दो स्वरूप हैं – उग्र (क्रोधित) और शांत। आंध्र प्रदेश के अहोबिलम क्षेत्र में नरसिंह के नौ रूपों (नव-नरसिंह) की पूजा होती है :
ज्वाला नरसिंह
अहोबिल नरसिंह
क्रोड़ नरसिंह
करण नरसिंह
भार्गव नरसिंह
योगानंद नरसिंह
क्षत्रिय नरसिंह
पवन नरसिंह
वीर नरसिंह
9) नरसिंह मंत्र क्या है ?
उत्तर : नरसिंह भगवान का प्रसिद्ध मंत्र :
“उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्।
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्॥”
अर्थ : मैं उग्र, वीर, महाविष्णु, सब ओर से प्रज्वलित, सर्वतोमुख, भीषण, कल्याणकारी और मृत्यु को भी मारने वाले नृसिंह भगवान को नमस्कार करता हूं।
10) होली का नरसिंह अवतार से क्या संबंध है ?
उत्तर : होली का नरसिंह अवतार से गहरा संबंध है। होलिका, हिरण्यकशिपु की बहन थी, जिसे वरदान था कि वह अग्नि में नहीं जल सकती। हिरण्यकशिपु के कहने पर वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई, परंतु भगवान की कृपा से होलिका जल गई और प्रह्लाद सुरक्षित रहे। इसी घटना की याद में होलिका दहन किया जाता है।
11) क्या नरसिंह अवतार का वैज्ञानिक महत्व है ?
उत्तर : कुछ विद्वानों के अनुसार, नरसिंह अवतार विकासवाद के सिद्धांत को दर्शाता है। दशावतार में मत्स्य (मछली) से कूर्म (कछुआ), वराह (स्थलीय जीव) और फिर नरसिंह (अर्ध-मानव) का क्रम विकासवाद की अवस्थाओं को दर्शाता है – जहाँ मानव और पशु के बीच की संक्रमणकालीन अवस्था को नरसिंह के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
12) नरसिंह भगवान को शांत किसने किया ?
उत्तर : हिरण्यकशिपु के वध के बाद नरसिंह भगवान का क्रोध शांत नहीं हुआ। देवता, ब्रह्मा जी, भगवान शिव और माता लक्ष्मी भी उन्हें शांत नहीं कर सके। अंततः स्वयं प्रह्लाद ने उनके सामने आकर विनम्र भाव से स्तुति की, जिससे भगवान का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने प्रह्लाद को गोद में उठाकर आशीर्वाद दिया।
13) क्या नरसिंह भगवान आज भी पूजे जाते हैं ?
उत्तर : हाँ, नरसिंह भगवान आज भी पूजे जाते हैं। विशेष रूप से इस्कॉन (ISKCON) मंदिरों में नरसिंह को ‘भक्तों के रक्षक’ के रूप में स्थापित किया जाता है। दक्षिण भारत में नरसिंह के अनेक प्राचीन मंदिर हैं जहाँ प्रतिदिन पूजा होती है। नरसिंह जयंती पर विशेष उत्सव मनाए जाते हैं।
14) नरसिंह अवतार का मुख्य संदेश क्या है ?
उत्तर : नरसिंह अवतार के मुख्य संदेश :
ईश्वर सर्वव्यापी है – वह कण-कण में है |
भक्ति की शक्ति सबसे बड़ी शक्ति है |
अहंकार का अंत निश्चित है |
भगवान अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर हैं |
नियम ईश्वर के अधीन हैं, ईश्वर नियमों के अधीन नहीं |
15) ‘स्तंभ से प्रकट’ होने का क्या अर्थ है ?
उत्तर : ‘स्तंभ से प्रकट’ होने का अर्थ है कि ईश्वर की सर्वव्यापकता – वह हर जगह हैं। जब हिरण्यकशिपु ने स्तंभ पर प्रहार किया, तो भगवान वहाँ से प्रकट हुए। यह दर्शाता है कि ईश्वर निर्जीव वस्तुओं में भी विद्यमान हैं। भक्त प्रह्लाद का विश्वास था कि उनके भगवान स्तंभ में भी हैं, और उनका विश्वास सत्य साबित हुआ।