Pushkar Fair
1. पुष्कर मेला (Pushkar Fair) : एक परिचय
पुष्कर मेला (Pushkar Fair), जिसे स्थानीय भाषा में “पुष्कर ऊंट मेला” या “कर्तिक मेला” के नाम से भी जाना जाता है, दुनिया के सबसे बड़े पशु मेलों में से एक है। लेकिन इसकी पहचान केवल एक पशु मेले तक सीमित नहीं है। यह एक ऐसा अद्भुत संगम है जहाँ आस्था, व्यापार, मनोरंजन और परंपरा का अनोखा मेल देखने को मिलता है। यह पुष्कर मेला (Pushkar Fair) हर साल कार्तिक मास की पूर्णिमा के आस-पास राजस्थान के अजमेर जिले में स्थित पवित्र पुष्कर नगरी में आयोजित किया जाता है। इसकी भव्यता और विशालता इसे विश्व भर में एक अलग पहचान दिलाती है, जिसके कारण यह देश-विदेश के लाखों पर्यटकों, तीर्थयात्रियों और फोटोग्राफरों को अपनी ओर आकर्षित करता है।
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Toggle2. पौराणिक इतिहास और धार्मिक महत्व
पुष्कर मेले (Pushkar Fair) को समझने के लिए सर्वप्रथम पुष्कर के धार्मिक और पौराणिक महत्व को जानना आवश्यक है। पुष्कर शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के दो शब्दों ‘पुष्प’ (फूल) और ‘कर’ (हाथ) से मानी जाती है, अर्थात ‘वह स्थान जहाँ फूलों की वर्षा भगवान के हाथों से हुई’।
(A) पौराणिक कथा
हिंदू पुराणों के अनुसार, पुष्कर की उत्पत्ति की कथा भगवान ब्रह्मा से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी एक बार यज्ञ करना चाहते थे। यज्ञ के लिए एक उपयुक्त स्थान की खोज करते हुए वे पृथ्वी पर आए। उनके हाथ से कमल का एक पुष्प (पंखुड़ी) गिर गया, जिसके तीन स्थानों पर गिरने से तीन झीलें बन गईं – ज्येष्ठ पुष्कर (बड़ा पुष्कर), मध्यम पुष्कर (मध्य पुष्कर) और कनिष्ठ पुष्कर (छोटा पुष्कर)। इनमें से ज्येष्ठ पुष्कर सबसे प्रमुख है।
यज्ञ स्थल की रक्षा के लिए ब्रह्मा जी ने अपने पुत्र नारद जी को राक्षसों का वध करने के लिए भेजा, लेकिन नारद जी असफल रहे। तब ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु से सहायता मांगी। विष्णु जी ने उन्हें एक वरदान दिया कि एक दिन के लिए वे स्वयं एक तलवार बनेंगे और ब्रह्मा जी का पुत्र बनकर राक्षसों का वध करेंगे।
इस प्रकार विष्णु जी ने ‘सुदर्शन’ नामक एक कुमार का रूप धारण किया और एक तलवार से सभी राक्षसों का संहार कर दिया। लेकिन क्रोध में आकर उन्होंने अपनी ही पत्नी सावित्री का भी सिर धड़ से अलग कर दिया। बाद में, पश्चाताप करने पर विष्णु जी ने उन्हें दर्शन दिए और कहा कि सावित्री का सिर उसी स्थान पर गिरा था, जहाँ आज सावित्री मंदिर स्थित है। ब्रह्मा जी ने अपने यज्ञ की पूर्णता के लिए देवी गायत्री से विवाह किया, जो सावित्री का ही दूसरा रूप मानी जाती हैं।
इस यज्ञ के पश्चात, ब्रह्मा जी ने पुष्कर को अपना निवास स्थान बनाया और घोषणा की कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन जो भी व्यक्ति यहाँ स्नान करेगा और पूजा-अर्चना करेगा, उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी। यही कारण है कि पुष्कर को ‘तीर्थराज’ यानी तीर्थों का राजा कहा जाता है और यह दुनिया के चुनिंदा ब्रह्मा मंदिरों में से सबसे प्रसिद्ध है।
(B) धार्मिक महत्व
पुष्कर हिंदुओं के लिए पांच प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ स्नान करने से सभी पाप धुल जाते हैं और आत्मा शुद्ध हो जाती है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन यहाँ स्नान का विशेष महत्व है। लाखों श्रद्धालु इस पवित्र अवसर पर पुष्कर झील में डुबकी लगाते हैं और ब्रह्मा मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं। यह झील 52 घाटों से घिरी हुई है, जिनमें से प्रमुख हैं: ब्रह्मा घाट, वराह घाट, गौ घाट और जयपुर घाट। प्रत्येक घाट का अपना एक अलग ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व है।
3. पुष्कर मेले (Pushkar Fair) का ऐतिहासिक सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य
पुष्कर मेले (Pushkar Fair) की शुरुआत एक व्यापारिक मेले के रूप में हुई थी। राजस्थान एक पशु पालन प्रधान राज्य रहा है, जहाँ किसान और खानाबदोश समुदायों के लिए ऊँट, घोड़े, गाय-बैल आदि पशु जीवनयापन का प्रमुख साधन थे। कार्तिक पूर्णिमा के पवित्र अवसर पर जब दूर-दूर से तीर्थयात्री पुष्कर आते थे, तो स्थानीय पशुपालक और व्यापारी भी अपने पशुओं को बेचने और खरीदने के लिए यहाँ एकत्रित होने लगे। धीरे-धीरे यह एक परंपरा बन गई और इस छोटे से मेले ने एक विशाल रूप धारण कर लिया।
राजस्थान के रजवाड़ों ने भी इस मेले को प्रोत्साहन दिया। यह मेला न केवल व्यापार का एक बड़ा केंद्र बना, बल्कि यहाँ विभिन्न क्षेत्रों के लोगों का मिलन-स्थल भी बन गया। लोग न केवल पशु खरीद-बेचने आते, बल्कि एक-दूसरे से समाचारों का आदान-प्रदान करते, रिश्ते तय करते और सांस्कृतिक उल्लास में भाग लेते। इस प्रकार, यह पुष्कर मेला (Pushkar Fair) सामाजिक सद्भाव और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन गया।
समय के साथ, इस मेले ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। ब्रिटिश काल में भी इस मेले का महत्व बना रहा। आजादी के बाद, राजस्थान सरकार और भारत सरकार ने इसे पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया और इसे दुनिया भर में प्रचारित-प्रसारित किया। आज, यह पुष्कर मेला (Pushkar Fair) राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर का एक जीवंत प्रतीक है।
4. मेले का आयोजन और समय
पुष्कर मेला (Pushkar Fair) हिंदू कैलेंडर के अनुसार कार्तिक मास की पूर्णिमा को आयोजित किया जाता है, जो आमतौर पर अंग्रेजी कैलेंडर के अक्टूबर-नवंबर महीने में पड़ता है। यह मेला पांच दिनों तक चलता है, लेकिन इसकी तैयारियाँ हफ्तों पहले से शुरू हो जाती हैं। मेले के मुख्य दिन कार्तिक पूर्णिमा का दिन होता है, जिस दिन सबसे अधिक संख्या में श्रद्धालु झील में स्नान करने आते हैं।
पुष्कर मेले (Pushkar Fair) का आयोजन मुख्य रूप से पुष्कर के विशाल मैदान में होता है, जिसे ‘मेला ग्राउंड’ कहा जाता है। इस विशाल परिसर में ऊँट, घोड़े और अन्य पशुओं के लिए अलग-अलग enclosures बनाए जाते हैं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए मंच तैयार किए जाते हैं और दुकानें लगाई जाती हैं। राजस्थान पर्यटन विभाग, स्थानीय प्रशासन और विभिन्न समितियों का संयुक्त तत्वावधान में इस भव्य आयोजन को सफल बनाया जाता है।
5. मेले का मुख्य आकर्षण - पशु व्यापार और ऊँट
पुष्कर मेले (Pushkar Fair) की सबसे प्रमुख पहचान इसका पशु व्यापार है, और इसमें भी ऊँट सर्वाधिक आकर्षण का केंद्र होते हैं।
(A) ऊँट - रेगिस्तान का जहाज
राजस्थान की रेतीली धरती के लिए ऊँट एक वरदान हैं। यह परिवहन, सामान ढोने, खेती और दूध देने का काम करते हैं। पुष्कर मेला ऊँटों और उनके व्यापारियों के लिए सबसे बड़ा बाजार है। हज़ारों की संख्या में ऊँटों को उनके मालिक सजा-धजा कर लाते हैं। इन ऊँटों की खरीद-फरोख्त एक दिलचस्प प्रक्रिया है। खरीदार और विक्रेता आपस में मोल-भाव करते हैं, ऊँटों के दांत देखते हैं, उनकी सेहत का जायजा लेते हैं और उनकी चाल परखते हैं।
ऊँटों को सजाने की परंपरा भी बहुत पुरानी है। उन्हें रंग-बिरंगी कंबल, मोतियों और घंटियों से सजाया जाता है। ऊँट की सवारी करना पर्यटकों के लिए सबसे लोकप्रिय गतिविधि होती है। मेले में ऊँट की सुंदरता प्रतियोगिता भी आयोजित की जाती है, जहाँ सबसे सुंदर ऊँट को पुरस्कृत किया जाता है।
(B) अन्य पशु
ऊँटों के अलावा, यहाँ घोड़ों, गायों, भेड़ों और बकरियों का भी व्यापार होता है। राजस्थान के मारवाड़ी घोड़े अपनी सुंदरता और ताकत के लिए प्रसिद्ध हैं। इन्हें देखने और खरीदने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं।
6. एक विस्तृत यात्रा - मेले के विभिन्न पहलू
पुष्कर मेला (Pushkar Fair) एक बहुआयामी अनुभव है। इसे केवल एक घटना के रूप में नहीं, बल्कि कई समानांतर चलने वाले उत्सवों के संगम के रूप में देखा जा सकता है।
(A) धार्मिक और आध्यात्मिक पहलू
पुष्कर मेले (Pushkar Fair) का सबसे पवित्र पक्ष इसका धार्मिक आयोजन है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन सूर्योदय से पहले ही श्रद्धालु पुष्कर झील के घाटों पर एकत्रित होने लगते हैं। पुजारियों के मंत्रोच्चार के बीच वे झील में डुबकी लगाते हैं और सूर्य देवता को अर्घ्य देते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन स्नान करने से सभी तीर्थों में स्नान का पुण्य प्राप्त होता है। इसके बाद श्रद्धालु ब्रह्मा मंदिर और झील के आस-पास स्थित अन्य मंदिरों के दर्शन करते हैं। पूरे शहर में भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों का वातावरण छाया रहता है।
(B) सांस्कृतिक और लोक कला का अद्भुत संसार
पुष्कर मेला (Pushkar Fair) राजस्थानी लोक संस्कृति का एक जीवंत संग्रहालय है। यहाँ दूर-दूर से लोक कलाकार आते हैं और अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं।
(1) लोक नृत्य और संगीत
कालबेलिया नृत्य (सपेरा नृत्य), घूमर, गैर, फिरंगी नृत्य जैसे पारंपरिक नृत्यों की धूम मेले में देखने को मिलती है। ढोल, नगाड़े, अलगोजा, रावणहत्था जैसे वाद्ययंत्रों की मधुर धुनें पूरे वातावरण को मंत्रमुग्ध कर देती हैं।
(2) कठपुतली शो
राजस्थान का पारंपरिक कठपुतली शो बच्चों और बड़ों सभी को समान रूप से आकर्षित करता है। इन शोों में पौराणिक कथाओं और सामाजिक मुद्दों को रोचक ढंग से प्रस्तुत किया जाता है।
(3) लोक गायन
मांगणियार और लंगा समुदाय के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत लोक गीत राजस्थानी संस्कृति की आत्मा हैं। ये गीत प्रेम, बलिदान, वीरता और विरह की कहानियाँ सुनाते हैं।
(C) शिल्प और हस्तकला का खजाना
पुष्कर मेले (Pushkar Fair) में राजस्थान की समृद्ध हस्तकला का भंडार देखने को मिलता है। यहाँ सैकड़ों की संख्या में दुकानें लगती हैं, जो स्थानी कलाकारों के हाथों से बनी विभिन्न वस्तुओं से सजी होती हैं।
(1) टेराकोटा और चमड़े का सामान
हाथ से बनी मिट्टी की आकर्षक कलाकृतियाँ और चमड़े के जूते (जूतियाँ), बैग, पर्स आदि।
(2) जेवरात
चांदी के पारंपरिक आभूषण, कड़े, झुमके, हार आदि जो राजस्थानी संस्कृति की शान हैं।
(3) कपड़े और कढ़ाई
बंधेज, लहरिया, सांगानेरी ब्लॉक प्रिंट के रंग-बिरंगे कपड़े, पगड़ियाँ (साफ़ा), और मिरर वर्क वाले कपड़े।
(4) कालीन और दरियाँ
राजस्थान के प्रसिद्ध हस्तनिर्मित कालीन और दरियाँ।
(5) लकड़ी की नक्काशी
हाथ से नक्काशीदार लकड़ी के फर्नीचर और सजावटी सामान।
(D) पाक कला के स्वाद
पुष्कर मेला (Pushkar Fair) राजस्थानी व्यंजनों के स्वाद का आनंद लेने का एक शानदार अवसर है। यहाँ के स्ट्रीट फूड का स्वाद अविस्मरणीय होता है।
(1) मालपुआ
पुष्कर मेले (Pushkar Fair) की मशहूर मिठाई, जो खासतौर पर तीर्थयात्रियों के बीच बहुत लोकप्रिय है।
(2) दाल बाटी चूरमा
पुष्कर मेले (Pushkar Fair) में राजस्थान का राजसी और प्रसिद्ध व्यंजन मिलता है |
(3) कचौड़ी और मिर्ची बड़ा
गर्मागर्म मसालेदार नाश्ता।
(4) गर्मागर्म चाय और कुल्फी
पुष्कर मेले (Pushkar fair) में रेगिस्तानी गर्मी में राहत देने वाले पेय और मिठाई मिलता है |
(E) मनोरंजक प्रतियोगिताएँ और आयोजन
पुष्कर मेले (Pushkar Fair) में पर्यटकों के मनोरंजन के लिए कई तरह की रोमांचक प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाती हैं।
(1) ऊँट दौड़
पुष्कर मेले (Pushkar Fair) में यह एक बेहद रोमांचक और मजेदार आयोजन है, जहाँ ऊँटों को दौड़ाया जाता है।
(2) मत्था फोड़ी (कुश्ती)
पारंपरिक कुश्ती की प्रतियोगिता, जिसमें राजस्थान और आस-पास के राज्यों के पहलवान भाग लेते हैं।
(3) लंबी दाढ़ी प्रतियोगिता
एक अनोखी प्रतियोगिता जहाँ सबसे लंबी और सुंदर दाढ़ी वाले व्यक्ति को पुरस्कृत किया जाता है।
(4) ब्रीडर्स कॉन्टेस्ट
सबसे सुंदर ऊँट और पशु की प्रतियोगिता।
(5) गर्म हवा के गुब्बारे (Hot Air Balloon)
आधुनिक समय में, पर्यटकों के लिए गर्म हवा के गुब्बारों में बैठकर पूरे मेले का हवाई दृश्य देखने की सुविधा भी शुरू की गई है, जो एक अविस्मरणीय अनुभव प्रदान करता है।
7. पुष्कर मेला (Pushkar Fair) और आधुनिक पर्यटन
समय के साथ, पुष्कर मेले ने एक बड़ा बदलाव देखा है। अब यह केवल एक स्थानीय व्यापारिक मेला नहीं रह गया है, बल्कि एक वैश्विक पर्यटन आकर्षण बन चुका है। इसके विकास में राजस्थान पर्यटन विभाग की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
(A) अंतर्राष्ट्रीय भागीदारी
आज, इस मेले में दुनिया भर से पर्यटक, फोटोग्राफर, शोधार्थी और सांस्कृतिक प्रेमी आते हैं। यह मेला विदेशी पर्यटकों के लिए भारतीय संस्कृति को समझने का एक सशक्त माध्यम बन गया है।
(B) इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास
मेले के दौरान पर्यटकों की सुविधा के लिए बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जाता है। टेंट सिटी बसाई जाती है, जहाँ लक्जरी तंबुओं में रहने की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है। इसके अलावा, होटल्स, गेस्ट हाउस और रिसॉर्ट्स की भी भरमार रहती है।
(C) डिजिटल प्रचार
सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से मेले का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाता है, जिससे दुनिया के कोने-कोने में इसकी जानकारी पहुँचती है।
8. चुनौतियाँ और संरक्षण के प्रयास
इतनी विशालता और लोकप्रियता के बावजूद, पुष्कर मेला कुछ चुनौतियों का सामना भी कर रहा है।
(A) पर्यावरणीय चिंताएँ
लाखों लोगों के आगमन से झील के पानी की गुणवत्ता, कचरे के प्रबंधन और पर्यावरण प्रदूषण की समस्या उत्पन्न होती है।
(B) पारंपरिक स्वरूप का खतरा
आधुनिकता और व्यावसायिकता के चलते मेले के पारंपरिक स्वरूप के विलुप्त होने का खतरा बना रहता है। पशु व्यापार में कमी आई है और पर्यटन अधिक प्रमुख होता जा रहा है।
(C) सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन
इतनी बड़ी भीड़ को प्रबंधित करना और सभी की सुरक्षा सुनिश्चित करना एक बड़ी जिम्मेदारी है।
इन चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार और स्थानीय प्रशासन द्वारा कड़े कदम उठाए जा रहे हैं। झील की सफाई, कचरे का वैज्ञानिक तरीके से निपटान, जल संरक्षण के उपाय और स्थानीय कलाकारों को प्रोत्साहन जैसे कार्य किए जा रहे हैं ताकि मेले की मौलिकता और परंपरा बरकरार रह सके।
9. एक पर्यटक के रूप में अनुभव और सुझाव
यदि आप पुष्कर मेले (Pushkar Fair) का भ्रमण करने की योजना बना रहे हैं, तो यहाँ कुछ सुझाव दिए जा रहे हैं जो आपके अनुभव को और भी समृद्ध बना सकते हैं:
(A) योजना पहले बनाएँ
मेले के दौरान होटलों और यातायात में भीड़ बहुत अधिक होती है। इसलिए, अपने रहने और यात्रा की व्यवस्था पहले से ही बुक कर लें। यात्रा पे जाने के कुछ दिनों पहले ही आप सब चीजें जांच ले कि सब व्यवस्था आप के अनुसार हुई है की नही क्यूंकि नयी जगह जाने के बाद वहा कुछ करने में आपको कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है | बच्चों को लेकर सभी जरुरी चीजे अपने साथ ले ले |
(B) पारंपरिक पोशाक पहनें
मेले के माहौल में घुलने-मिलने के लिए राजस्थानी पारंपरिक पोशाक जैसे कि घाघरा-चोली या कुर्ता-पजामा पहनना एक अच्छा विचार हो सकता है। इनकी ड्रेस पहनकर आप कुछ हद तक राजस्थानी लगेंगे जो एक अलग ही अनुभव होगा आप के लिए और आप के परिवार के लिए भी | इसलिए इसे जरुर अपनाये |
(C) कैमरा साथ रखें
यहाँ का हर पल एक फोटोग्राफिक अवसर है। अपना कैमरा जरूर साथ रखें। अपना और अपने परिवार की हर फोटो को जरुर खीचें | ये पल बहुत ही यादगार होते है | इसलिए इसे अपने साथ ले जाये |
(D) स्थानीय व्यंजनों का आनंद लें
मालपुआ, दाल बाटी चूरमा और अन्य स्थानीय स्वादों को जरूर आजमाएँ। राजस्थान अपने व्यंजनों के दूर दूर तक प्रसिद्ध है | यहाँ की दल बाटी चूरमा विश्व भर में प्रसिद्ध है |
(E) सम्मानजनक व्यवहार
स्थानीय लोगों, उनकी संस्कृति और धार्मिक स्थलों का सम्मान करें। किसी भी सांस्कृतिक धरोहर को नुकसान नही पहुचना चाहिए क्यूंकि ये विश्व में हमारे देश का प्रतिनिधितव करता है | किसी नये जगह पे जाने पे वहां भाईचारा का माहोल बनाये रखना है | प्रेमपूर्वक वहां के लोगो का सहयोग करना है |
(F) सावधानी बरतें
भीड़ में अपने सामान का ध्यान रखें और निर्देशों का पालन करें। किसी अनजाने व्यक्ति से किसी भी प्रकार का खाना नहीं लेना चाहिए | खासकर छोटे बच्चों का विशेषकर ध्यान रखना चाहिए |
10. निष्कर्ष
पुष्कर मेला (Pushkar Fair) केवल एक आयोजन नहीं है; यह एक भावना है, एक जीवंत परंपरा है जो सदियों से चली आ रही है। यह वह दर्पण है जिसमें राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, आध्यात्मिक आस्था और सामाजिक सद्भाव की झलक साफ़ दिखाई देती है। यह मेला हमें याद दिलाता है कि कैसे परंपरा और आधुनिकता एक साथ मिलकर एक अद्भुत समामेलन create कर सकती हैं। जब भी कोई व्यक्ति पुष्कर मेले (Pushkar Fair) की भव्यता, रंगीनियत और आध्यात्मिकता का अनुभव करता है, तो वह भारत की ‘अनेकता में एकता’ की भावना को महसूस कर पाता है। पुष्कर मेला (Pushkar Fair) truly राजस्थान का गौरव और भारत की सांस्कृतिक धरोहर का एक अमूल्य हिस्सा है।