Chhath Puja 2025
1. छठ (Chhath) पूजा क्योँ मनाते हैं ?
भारत एक ऐसी भूमि है जहाँ पर्व और त्योहार जीवन की धड़कन हैं। यहाँ हर त्योहार के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक, सामाजिक और आध्यात्मिक महत्व छिपा होता है। इन्हीं महान पर्वों में से एक है “छठ (Chhath) पूजा”। यह पर्व केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि श्रद्धा, आस्था, तपस्या और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता भाव का अनूठा संगम है। छठ पूजा मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाने वाला लोकआस्था का सबसे बड़ा पर्व है, लेकिन आज देश के कोने-कोने और विदेशों में भी बसे लोग इसे पूरी श्रद्धा के साथ मनाते हैं।
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Toggle2. नामकरण और अर्थ
‘छठ’ शब्द ‘षष्ठी’ का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ है ‘छठा’। यह पर्व कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है, इसीलिए इसे ‘छठ’ कहा जाता है। इस दिन छठी मैया (सूर्य देव की बहन) की पूजा का विधान है, इसलिए भी इसका नाम छठ पड़ा।
3. पौराणिक और ऐतिहासिक उल्लेख
छठ (Chhath) पूजा की परंपरा अत्यंत प्राचीन है और इसका उल्लेख प्रमुख हिंदू ग्रंथों में मिलता है। यह पर्व सूर्य देव और छठी मैया (जिन्हें उषा भी कहा जाता है) की आराधना का पर्व है। इसकी खासियत यह है कि इसमें मूर्ति पूजा का स्थान नहीं है, बल्कि प्रकृति के सबसे बड़े शक्ति स्रोत सूर्य और उनकी शक्तियों को सीधे अर्घ्य देकर उनका आभार व्यक्त किया जाता है। यह एक कठोर व्रत है जिसमें 36 घंटे के निर्जला उपवास की परंपरा है और इसकी तैयारियाँ महीनों पहले से शुरू हो जाती हैं।
(A) रामायण काल
मान्यता है कि जब भगवान राम अयोध्या वापस लौटे, तो उन्होंने राजसूय यज्ञ करने का फैसला किया। इस यज्ञ के लिए ऋषि-मुनियों को आमंत्रित किया गया। महर्षि वशिष्ठ ने राजसूय यज्ञ के लिए सबसे योग्य और पूजनीय होने के कारण सूर्य देव की पूजा करने की सलाह दी। भगवान राम ने माता सीता के साथ मुग्दल ऋषि के आश्रम में सूर्य देव की पूजा की थी, जो कि छठ (Chhath) पूजा के रूप में प्रचलित हुई। एक अन्य कथा के अनुसार, लंका विजय के बाद राम और सीता ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को उपवास रखा और सूर्य देव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय अर्घ्य देकर ही उन्होंने व्रत तोड़ा था।
(B) महाभारत काल
छठ (Chhath) पूजा की शुरुआत महाभारत काल में कुंती द्वारा की गई थी, ऐसा भी माना जाता है। कुंती को सूर्य देव का आशीर्वाद प्राप्त था और उन्होंने सूर्य देव की कृपा से ही कर्ण को जन्म दिया था। कर्ण अंग देश (वर्तमान भागलपुर, बिहार) के राजा बने और वे घंटों तक पानी में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य दिया करते थे। मान्यता है कि इसी परंपरा का निर्वाह आज भी छठ के रूप में किया जा रहा है। एक अन्य कथा के अनुसार, जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा था। इस व्रत से उनकी मनोकामना पूरी हुई और पांडवों को उनका राजपाट वापस मिल गया।
(C) वैदिक काल में सूर्योपासना
वैदिक काल में सूर्य को जगत की आत्मा और सभी ऊर्जा का स्रोत माना जाता था। ऋग्वेद में सूर्य देव की स्तुति में कई मंत्र हैं। सूर्य को ‘सविता’ कहा गया है, जो सभी प्राणियों को प्रेरणा और जीवन शक्ति प्रदान करते हैं। छठ (Chhath) पूजा की परंपरा इसी वैदिक सूर्योपासना का सीधा और अटूट रूप है जो आज भी उसी श्रद्धा और विधि-विधान से की जाती है।
4. छठ (Chhath) पूजा का धार्मिक और पौराणिक महत्व
(A) छठी मैया कौन हैं?
छठ (Chhath) पूजा का केंद्र बिंदु ‘छठी मैया’ हैं। इन्हें सूर्य देव की बहन माना जाता है और ये संतानों की रक्षिका देवी हैं। ये प्रसन्न होने पर संतान को दीर्घायु और स्वास्थ्य का आशीर्वाद देती हैं। इन्हें ‘षष्ठी देवी’ के नाम से भी जाना जाता है। पुराणों में इनका उल्लेख है। ये बच्चों की विशेष रक्षक देवी हैं और छठ (Chhath) के दिन इनकी पूजा का विशेष महत्व है। मान्यता है कि छठी मैया ही भक्तों के घर में सुख-समृद्धि और संतान सुख की कामना पूरी करती हैं।
(B) सूर्य देव का महत्व
हिंदू धर्म में सूर्य देव को पंचदेवों में एक माना गया है। वे समस्त ब्रह्मांड को ऊर्जा प्रदान करते हैं। सूर्य को प्रत्यक्ष देव माना जाता है, क्योंकि इन्हें हर दिन देखा और अनुभव किया जा सकता है। सूर्य की किरणें न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत लाभदायक हैं। छठ (Chhath) पूजा में सूर्य देव की उपासना करके उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की जाती है और उनसे जीवन में ऊर्जा, स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना की जाती है।
5. छठ (Chhath) पर्व की वैज्ञानिक व्याख्या
छठ (Chhath) पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा वैज्ञानिक तर्क छिपा है। यह पर्व विशेष रूप से शरीर और मन के लिए एक डिटॉक्सिफिकेशन (शुद्धिकरण) प्रक्रिया का काम करता है।
(A) शरीर विज्ञान और डिटॉक्सिफिकेशन
(a) नहाय-खाय और खरना
छठ (Chhath) के पहले दिन चने की दाल, कद्दू की सब्जी और चावल का सेवन किया जाता है। ये सभी चीजें पाचन के लिए हल्की और पौष्टिक होती हैं। ये शरीर को धीरे-धीरे उपवास के लिए तैयार करती हैं। खरना के दिन गुड़ की चासनी वाली खीर और रोटी खाई जाती है जो कि लंबे उपवास के दौरान शरीर को ऊर्जा प्रदान करती है।
(b) 36 घंटे का निर्जला उपवास
यह उपवास शरीर की आंतरिक सफाई करता है। पाचन तंत्र को आराम मिलता है और शरीर में जमा विषैले पदार्थ (टॉक्सिन्स) बाहर निकलते हैं। यह प्रक्रिया शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) को मजबूत करती है।
(B) सूर्य के प्रकाश का शारीरिक लाभ
(a) विटामिन-डी
सूर्योदय और सूर्यास्त का समय सूर्य की किरणों से विटामिन-डी लेने का सबसे अच्छा समय होता है। इस समय सूर्य की पराबैंगनी किरणों (UV Rays) का हानिकारक प्रभाव कम होता है। विटामिन-डी हड्डियों के लिए अत्यंत आवश्यक है और यह कैल्शियम के अवशोषण में मदद करता है।
(b) मेलाटोनिन और सेरोटोनिन
सूर्य की रोशनी शरीर में सेरोटोनिन (खुशी का हार्मोन) के स्तर को बढ़ाती है, जिससे मन प्रसन्न और तनावमुक्त रहता है। रात में, यही सेरोटोनिन मेलाटोनिन में बदल जाता है, जो अच्छी और गहरी नींद लाने में मददगार होता है।
(C) मनोवैज्ञानिक और सामाजिक लाभ
(a) आत्मानुशासन
36 घंटे का कठोर व्रत व्यक्ति में आत्मानुशासन, संयम और इच्छाशक्ति को बढ़ाता है।
(b) सामूहिक सद्भाव
पूरा परिवार और समुदाय एक साथ मिलकर इस पर्व को मनाता है, जिससे सामाजिक एकता और भाईचारे की भावना मजबूत होती है।
(c) प्रकृति से जुड़ाव
यह पर्व हमें प्रकृति के सबसे बड़े स्रोत सूर्य और जल के प्रति आभार व्यक्त करना सिखाता है, जिससे पर्यावरण के प्रति चेतना जागृत होती है।
6. छठ (Chhath) पूजा की तिथि और कैलेंडर
छठ (Chhath) पूजा साल में दो बार मनाई जाती है –
(A) चैत्र छठ (Chhath)
यह चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाई जाती है। इसे ‘चैती छठ’ भी कहते हैं। यह होली के छह दिन बाद आती है।
(B) कार्तिक छठ (Chhath)
यह कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाई जाती है। यह दीपावली के छह दिन बाद आती है और इसी का अधिक व्यापक और प्रचलित रूप है। कार्तिक छठ ज्यादा लोकप्रिय है क्योंकि इस समय नवान्न (नई फसल) आ चुकी होती है और मौसम भी सुहावना होता है। इसके अलावा, दीपावली की शुद्धि के बाद यह व्रत रखा जाता है, जिसका spiritual significance और भी बढ़ जाता है।
7. छठ (Chhath) पूजा का चार दिवसीय अनुष्ठान
छठ (Chhath) पूजा एक कठिन तपस्या है जिसकी शुरुआत चार दिन पहले से हो जाती है। इन चार दिनों में हर दिन का अपना एक अलग महत्व और ritual है।
दिन 1: नहाय-खाय (कार्तिक शुक्ल चतुर्थी)
(a) अर्थ
इस दिन ‘नहाय-खाय’ यानी स्नान करके भोजन ग्रहण करने की ritual है।
(b) विधि
इस दिन पूरा घर गंगाजल या पवित्र जल से शुद्ध किया जाता है। व्रत रखने वाले (व्रती) सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं।
(c) भोजन
इस दिन के भोजन में सात्विकता का पूरा ध्यान रखा जाता है। चावल, चने की दाल और कद्दू (लौकी) की सब्जी बनाई जाती है। इस भोजन को ग्रहण करने के बाद ही व्रत की शुरुआत मानी जाती है। इस दिन से ही घर में पवित्रता का माहौल बन जाता है और प्याज-लहसुन का प्रयोग बंद कर दिया जाता है।
दिन 2: खरना (कार्तिक शुक्ल पंचमी)
(a) अर्थ
‘खरना’ का अर्थ है ‘तपस्या’। यह दिन कठोर तप का प्रतीक है।
(b) विधि
इस दिन व्रती पूरा दिन निर्जला उपवास रखते हैं। शाम को विशेष रूप से चावल और गुड़ की खीर (रसियाव) बनाई जाती है। इस खीर को मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी जलाकर तैयार किया जाता है।
(c) प्रसाद वितरण
इस खीर और रोटी को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। यह प्रसाद पहले छठी मैया को अर्पित किया जाता है और फिर इसे घर के सदस्यों और पड़ोसियों में बाँटा जाता है। इस प्रसाद को ग्रहण करने के बाद ही व्रती 36 घंटे के कठोर निर्जला व्रत में प्रवेश करते हैं।
दिन 3: संध्या अर्घ्य (डूबते सूरज को अर्घ्य - कार्तिक शुक्ल षष्ठी)
यह छठ (Chhath) पूजा का मुख्य दिन होता है।
(a) पूरा दिन का विधान
इस दिन पूरा दिन प्रसाद तैयार करने में व्यतीत होता है। प्रसाद के रूप में ठेकुआ (खजूर या गुड़ से बना एक पारंपरिक मीठा पकवान), फल, नारियल, केला, गन्ना, सुथनी (सूजी का बना हलवा) आदि तैयार किए जाते हैं।
(b) बांस की टोकरी (दउरा और सूप)
प्रसाद को बांस की बनी हुई टोकरी (दउरा) और सूप में सजाया जाता है।
(c) घाट की रौनक
शाम के समय सभी व्रती और उनके परिवारजन नदी, तालाब या घाट की ओर प्रसाद लेकर चल पड़ते हैं। घाटों पर भारी भीड़ होती है और पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है। घाटों को फूल, रंगोली और दीयों से सजाया जाता है।
(d) अर्घ्य देने की विधि
सूर्यास्त के समय, व्रती पानी में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं। सूप में प्रसाद, फल और दीया रखकर उसे दोनों हाथों से पकड़ा जाता है। फिर परिवार के बुजुर्ग महिलाएँ (जो व्रत रखती हैं) उस सूप से सूर्य देव को जल अर्पित करती हैं। इसके बाद सूर्य देव की विधिवत पूजा-आरती की जाती है और छठी मैया के गीत गाए जाते हैं।
दिन 4: उषा अर्घ्य (उगते सूरज को अर्घ्य - कार्तिक शुक्ल सप्तमी)
(a) सुबह की rituals
अगली सुबह, सभी व्रती और परिवारजन फिर से घाट पर पहुँचते हैं। इस बार उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। यह ritual सूर्योदय से पहले ही शुरू हो जाती है।
(b) अर्घ्य
उगते सूर्य को अर्घ्य देने का यही अंतिम ritual है। इसके बाद व्रती घाट पर ही छठी मैया से प्रार्थना करते हैं और संतान की दीर्घायु और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
(c) पारण (व्रत तोड़ना)
घाट से घर लौटने के बाद, व्रती प्रसाद ग्रहण करके अपना 36 घंटे का कठोर व्रत तोड़ते हैं। इस प्रसाद को ‘प्रसाद’ कहा जाता है और इसे सभी में बाँटा जाता है। इसके साथ ही यह महापर्व समाप्त होता है।
8. छठ (Chhath) पूजा का प्रसाद
छठ (Chhath) का प्रसाद बेहद खास और सात्विक होता है। इसमें किसी भी प्रकार के व्यावसायिक रूप से तैयार मसाले या पैकेज्ड सामग्री का उपयोग नहीं किया जाता। सब कुछ घर पर ही पारंपरिक तरीके से तैयार किया जाता है।
(A) ठेकुआ / खजूर का पेदा
यह छठ (Chhath) पूजा का सबसे महत्वपूर्ण और पारंपरिक प्रसाद है। यह गेहूं के आटे, गुड़ या खजूर और घी से बनता है। इसे विशेष रूप से मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी की आग पर पकाया जाता है। इसका स्वाद अद्वितीय होता है।
(B) फल
केला, नारियल, सेब, संतरा, मौसमी फल आदि प्रसाद में शामिल किए जाते हैं। गन्ना भी अर्घ्य में अवश्य होता है, क्योंकि यह सूर्य देव का प्रिय माना जाता है।
(C) सब्जियाँ
सुथनी (सूजी का हलवा), चावल के लड्डू भी बनाए जाते हैं।
(D) बांस की टोकरी (दउरा, सूप)
प्रसाद को बांस की बनी टोकरियों (दउरा) और छलनीनुमा सूप में रखा जाता है। यह प्रकृति के प्रति सम्मान का भी प्रतीक है और इनका उपयोग पर्यावरण के अनुकूल है।
9. छठ (Chhath) घाट: तैयारी और महत्व
छठ (Chhath) पूजा में घाट का विशेष महत्व है। पवित्र नदियों, तालाबों और जलाशयों के किनारे घाट बनाए जाते हैं।
(A) घाटों की सजावट
घाटों को फूल, रंगोली, दीयों और बांस से सजाया जाता है। विद्युत लाइटों की भी व्यवस्था की जाती है। पूरा घाट दिव्य और आकर्षक दिखाई देता है।
(B) सामूहिकता का भाव
घाट पर सभी जाति, धर्म और वर्ग के लोग एक साथ इकट्ठा होते हैं। यहाँ कोई भेदभाव नहीं होता। सभी एक साथ मिलकर पूजा-अर्चना करते हैं और गीत गाते हैं।
(C) प्रशासनिक तैयारियाँ
सरकार और प्रशासन द्वारा घाटों पर सुरक्षा, स्वच्छता और चिकित्सा की उचित व्यवस्था की जाती है। तैराक और एनडीआरएफ की टीमें मौजूद रहती हैं ताकि किसी भी अनहोनी से बचा जा सके।
10. छठ (Chhath) पूजा के गीत और लोक संस्कृति
छठ (Chhath) पूजा की शान इसके मनमोहक और भक्तिमय लोक गीतों में है। ये गीत छठ पूजा की रौनक को चार चाँद लगा देते हैं।
(A) गीतों का सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व
ये गीत सदियों से चले आ रहे हैं और मौखिक परंपरा के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचे हैं। इन गीतों में छठी मैया की महिमा, सूर्य देव की स्तुति, पौराणिक कथाएँ और सामाजिक जीवन के दृश्य समाहित होते हैं।
(B) प्रसिद्ध छठ गीतों के बोल
“कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए…”
“उग्गो हे दिननाथ देवा, अर्घ्य देव हम…”
“केलवा के पात पर, हरही गिरे अमवा की धार…”
“पहिले पूजि छठी मइया, हमरे सुख की दातार…”
ये गीत महिलाएँ समूह में गाती हैं और इनकी धुन इतनी मधुर होती है कि माहौल पूरी तरह भक्तिमय हो जाता है।
11. छठ (Chhath) पूजा: एक सामाजिक परिप्रेक्ष्य
(A) स्त्री-शक्ति का प्रतीक
छठ (Chhath) पूजा मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा ही की जाती है। वे इस कठोर व्रत को पूरे नियम और श्रद्धा से निभाती हैं, जो उनकी अदम्य इच्छाशक्ति और समर्पण को दर्शाता है। हालाँकि, आजकल पुरुष भी इस व्रत को रखने लगे हैं।
(B) सामाजिक समानता और समरसता
यह पर्व सामाजिक भेदभाव को मिटा देता है। घाट पर अमीर-गरीब, ऊँच-नीच का कोई भेद नहीं रहता। सभी एक ही घाट पर खड़े होकर एक ही प्रकार का प्रसाद बनाकर अर्घ्य देते हैं।
(C) पारिवारिक एकजुटता
यह पर्व पूरे परिवार को एक सूत्र में बाँध देता है। घर के सभी सदस्य मिलजुल कर तैयारियों में जुट जाते हैं। पुरुष प्रसाद तैयार करने और घाट तक सामान ले जाने में सहयोग करते हैं।
12. आधुनिक समय में छठ (Chhath) पूजा: चुनौतियाँ और बदलाव
(A) शहरीकरण का प्रभाव
बड़े शहरों में नदियों और तालाबों की कमी के कारण लोगों ने कृत्रिम तालाब और टैंक बनाने शुरू कर दिए हैं। आवासीय societies में भी छठ घाट बनाए जाने लगे हैं।
(B) कृत्रिम घाटों का निर्माण
दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु जैसे महानगरों में यमुना, गंगा न होने पर Municipality द्वारा temporary घाट बनाए जाते हैं।
(C) पर्यावरण जागरूकता और प्रदूषण मुक्त छठ
पहले बांस की टोकरी का ही use होता था, लेकिन अब plastic के दउरे भी market में आ गए हैं। लेकिन अब लोग फिर से पर्यावरण के प्रति जागरूक हो रहे हैं और प्लास्टिक का उपयोग न करने, घाटों को साफ-सुथरा रखने की पहल कर रहे हैं। ‘नदियों में प्रदूषण न फैलाएँ’ जैसे अभियान चलाए जा रहे हैं।
13. निष्कर्ष
छठ (Chhath) पूजा भारतीय संस्कृति की वह अमूल्य धरोहर है जो विज्ञान, आस्था, समर्पण और प्रकृति प्रेम का अनूठा संगम है। यह केवल एक पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक तरीका सिखाती है। यह हमें अनुशासन, सामूहिक सहयोग, पर्यावरण के प्रति सम्मान और ईश्वर में अटूट विश्वास का पाठ पढ़ाती है। आधुनिकता की दौड़ में भी इस पर्व की मूल भावना आज भी उतनी ही शुद्ध और अडिग है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि हमारी संस्कृति और परंपराएँ हमारी पहचान हैं और इन्हें सहेज कर रखना हमारा कर्तव्य है। छठ पूजा का संदेश सार्वभौमिक है – सूर्य की तरह प्रकाश, ऊर्जा और जीवन का संचार करते रहना और प्रकृति के प्रति कृतज्ञ बने रहना।
छठ मइया की जय! सूर्य देव की जय!