छठ पूजा : आस्था और सूर्य उपासना का महापर्व

1. छठ (Chhath) पूजा क्योँ मनाते हैं ?

chhath

भारत एक ऐसी भूमि है जहाँ पर्व और त्योहार जीवन की धड़कन हैं। यहाँ हर त्योहार के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक, सामाजिक और आध्यात्मिक महत्व छिपा होता है। इन्हीं महान पर्वों में से एक है “छठ (Chhath) पूजा”। यह पर्व केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि श्रद्धा, आस्था, तपस्या और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता भाव का अनूठा संगम है। छठ पूजा मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाने वाला लोकआस्था का सबसे बड़ा पर्व है, लेकिन आज देश के कोने-कोने और विदेशों में भी बसे लोग इसे पूरी श्रद्धा के साथ मनाते हैं।

Table of Contents

2. नामकरण और अर्थ

‘छठ’ शब्द ‘षष्ठी’ का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ है ‘छठा’। यह पर्व कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है, इसीलिए इसे ‘छठ’ कहा जाता है। इस दिन छठी मैया (सूर्य देव की बहन) की पूजा का विधान है, इसलिए भी इसका नाम छठ पड़ा।

3. पौराणिक और ऐतिहासिक उल्लेख

छठ (Chhath) पूजा की परंपरा अत्यंत प्राचीन है और इसका उल्लेख प्रमुख हिंदू ग्रंथों में मिलता है। यह पर्व सूर्य देव और छठी मैया (जिन्हें उषा भी कहा जाता है) की आराधना का पर्व है। इसकी खासियत यह है कि इसमें मूर्ति पूजा का स्थान नहीं है, बल्कि प्रकृति के सबसे बड़े शक्ति स्रोत सूर्य और उनकी शक्तियों को सीधे अर्घ्य देकर उनका आभार व्यक्त किया जाता है। यह एक कठोर व्रत है जिसमें 36 घंटे के निर्जला उपवास की परंपरा है और इसकी तैयारियाँ महीनों पहले से शुरू हो जाती हैं।

(A) रामायण काल

मान्यता है कि जब भगवान राम अयोध्या वापस लौटे, तो उन्होंने राजसूय यज्ञ करने का फैसला किया। इस यज्ञ के लिए ऋषि-मुनियों को आमंत्रित किया गया। महर्षि वशिष्ठ ने राजसूय यज्ञ के लिए सबसे योग्य और पूजनीय होने के कारण सूर्य देव की पूजा करने की सलाह दी। भगवान राम ने माता सीता के साथ मुग्दल ऋषि के आश्रम में सूर्य देव की पूजा की थी, जो कि छठ (Chhath) पूजा के रूप में प्रचलित हुई। एक अन्य कथा के अनुसार, लंका विजय के बाद राम और सीता ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को उपवास रखा और सूर्य देव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय अर्घ्य देकर ही उन्होंने व्रत तोड़ा था।

(B) महाभारत काल

छठ (Chhath) पूजा की शुरुआत महाभारत काल में कुंती द्वारा की गई थी, ऐसा भी माना जाता है। कुंती को सूर्य देव का आशीर्वाद प्राप्त था और उन्होंने सूर्य देव की कृपा से ही कर्ण को जन्म दिया था। कर्ण अंग देश (वर्तमान भागलपुर, बिहार) के राजा बने और वे घंटों तक पानी में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य दिया करते थे। मान्यता है कि इसी परंपरा का निर्वाह आज भी छठ के रूप में किया जा रहा है। एक अन्य कथा के अनुसार, जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा था। इस व्रत से उनकी मनोकामना पूरी हुई और पांडवों को उनका राजपाट वापस मिल गया।

(C) वैदिक काल में सूर्योपासना

वैदिक काल में सूर्य को जगत की आत्मा और सभी ऊर्जा का स्रोत माना जाता था। ऋग्वेद में सूर्य देव की स्तुति में कई मंत्र हैं। सूर्य को ‘सविता’ कहा गया है, जो सभी प्राणियों को प्रेरणा और जीवन शक्ति प्रदान करते हैं। छठ (Chhath) पूजा की परंपरा इसी वैदिक सूर्योपासना का सीधा और अटूट रूप है जो आज भी उसी श्रद्धा और विधि-विधान से की जाती है।

4. छठ (Chhath) पूजा का धार्मिक और पौराणिक महत्व

(A) छठी मैया कौन हैं?

छठ (Chhath) पूजा का केंद्र बिंदु ‘छठी मैया’ हैं। इन्हें सूर्य देव की बहन माना जाता है और ये संतानों की रक्षिका देवी हैं। ये प्रसन्न होने पर संतान को दीर्घायु और स्वास्थ्य का आशीर्वाद देती हैं। इन्हें ‘षष्ठी देवी’ के नाम से भी जाना जाता है। पुराणों में इनका उल्लेख है। ये बच्चों की विशेष रक्षक देवी हैं और छठ (Chhath) के दिन इनकी पूजा का विशेष महत्व है। मान्यता है कि छठी मैया ही भक्तों के घर में सुख-समृद्धि और संतान सुख की कामना पूरी करती हैं।

(B) सूर्य देव का महत्व

हिंदू धर्म में सूर्य देव को पंचदेवों में एक माना गया है। वे समस्त ब्रह्मांड को ऊर्जा प्रदान करते हैं। सूर्य को प्रत्यक्ष देव माना जाता है, क्योंकि इन्हें हर दिन देखा और अनुभव किया जा सकता है। सूर्य की किरणें न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत लाभदायक हैं। छठ (Chhath) पूजा में सूर्य देव की उपासना करके उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की जाती है और उनसे जीवन में ऊर्जा, स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना की जाती है।

5. छठ (Chhath) पर्व की वैज्ञानिक व्याख्या

छठ (Chhath) पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा वैज्ञानिक तर्क छिपा है। यह पर्व विशेष रूप से शरीर और मन के लिए एक डिटॉक्सिफिकेशन (शुद्धिकरण) प्रक्रिया का काम करता है।

(A) शरीर विज्ञान और डिटॉक्सिफिकेशन

(a) नहाय-खाय और खरना

छठ (Chhath)  के पहले दिन चने की दाल, कद्दू की सब्जी और चावल का सेवन किया जाता है। ये सभी चीजें पाचन के लिए हल्की और पौष्टिक होती हैं। ये शरीर को धीरे-धीरे उपवास के लिए तैयार करती हैं। खरना के दिन गुड़ की चासनी वाली खीर और रोटी खाई जाती है जो कि लंबे उपवास के दौरान शरीर को ऊर्जा प्रदान करती है।

(b) 36 घंटे का निर्जला उपवास

यह उपवास शरीर की आंतरिक सफाई करता है। पाचन तंत्र को आराम मिलता है और शरीर में जमा विषैले पदार्थ (टॉक्सिन्स) बाहर निकलते हैं। यह प्रक्रिया शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) को मजबूत करती है।

(B) सूर्य के प्रकाश का शारीरिक लाभ

(a) विटामिन-डी

सूर्योदय और सूर्यास्त का समय सूर्य की किरणों से विटामिन-डी लेने का सबसे अच्छा समय होता है। इस समय सूर्य की पराबैंगनी किरणों (UV Rays) का हानिकारक प्रभाव कम होता है। विटामिन-डी हड्डियों के लिए अत्यंत आवश्यक है और यह कैल्शियम के अवशोषण में मदद करता है।

(b) मेलाटोनिन और सेरोटोनिन

सूर्य की रोशनी शरीर में सेरोटोनिन (खुशी का हार्मोन) के स्तर को बढ़ाती है, जिससे मन प्रसन्न और तनावमुक्त रहता है। रात में, यही सेरोटोनिन मेलाटोनिन में बदल जाता है, जो अच्छी और गहरी नींद लाने में मददगार होता है।

(C) मनोवैज्ञानिक और सामाजिक लाभ

(a) आत्मानुशासन

36 घंटे का कठोर व्रत व्यक्ति में आत्मानुशासन, संयम और इच्छाशक्ति को बढ़ाता है।

(b) सामूहिक सद्भाव

 पूरा परिवार और समुदाय एक साथ मिलकर इस पर्व को मनाता है, जिससे सामाजिक एकता और भाईचारे की भावना मजबूत होती है।

(c) प्रकृति से जुड़ाव

यह पर्व हमें प्रकृति के सबसे बड़े स्रोत सूर्य और जल के प्रति आभार व्यक्त करना सिखाता है, जिससे पर्यावरण के प्रति चेतना जागृत होती है।

6. छठ (Chhath) पूजा की तिथि और कैलेंडर

छठ (Chhath) पूजा साल में दो बार मनाई जाती है –

(A) चैत्र छठ (Chhath)

यह चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाई जाती है। इसे ‘चैती छठ’ भी कहते हैं। यह होली के छह दिन बाद आती है।

(B) कार्तिक छठ (Chhath)

यह कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाई जाती है। यह दीपावली के छह दिन बाद आती है और इसी का अधिक व्यापक और प्रचलित रूप है। कार्तिक छठ ज्यादा लोकप्रिय है क्योंकि इस समय नवान्न (नई फसल) आ चुकी होती है और मौसम भी सुहावना होता है। इसके अलावा, दीपावली की शुद्धि के बाद यह व्रत रखा जाता है, जिसका spiritual significance और भी बढ़ जाता है।

7. छठ (Chhath) पूजा का चार दिवसीय अनुष्ठान

छठ (Chhath) पूजा एक कठिन तपस्या है जिसकी शुरुआत चार दिन पहले से हो जाती है। इन चार दिनों में हर दिन का अपना एक अलग महत्व और ritual है।

दिन 1: नहाय-खाय (कार्तिक शुक्ल चतुर्थी)

(a) अर्थ

इस दिन ‘नहाय-खाय’ यानी स्नान करके भोजन ग्रहण करने की ritual है।

(b) विधि

इस दिन पूरा घर गंगाजल या पवित्र जल से शुद्ध किया जाता है। व्रत रखने वाले (व्रती) सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं।

(c) भोजन

इस दिन के भोजन में सात्विकता का पूरा ध्यान रखा जाता है। चावल, चने की दाल और कद्दू (लौकी) की सब्जी बनाई जाती है। इस भोजन को ग्रहण करने के बाद ही व्रत की शुरुआत मानी जाती है। इस दिन से ही घर में पवित्रता का माहौल बन जाता है और प्याज-लहसुन का प्रयोग बंद कर दिया जाता है।

दिन 2: खरना (कार्तिक शुक्ल पंचमी)

(a) अर्थ

‘खरना’ का अर्थ है ‘तपस्या’। यह दिन कठोर तप का प्रतीक है।

(b) विधि

इस दिन व्रती पूरा दिन निर्जला उपवास रखते हैं। शाम को विशेष रूप से चावल और गुड़ की खीर (रसियाव) बनाई जाती है। इस खीर को मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी जलाकर तैयार किया जाता है।

(c) प्रसाद वितरण

इस खीर और रोटी को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। यह प्रसाद पहले छठी मैया को अर्पित किया जाता है और फिर इसे घर के सदस्यों और पड़ोसियों में बाँटा जाता है। इस प्रसाद को ग्रहण करने के बाद ही व्रती 36 घंटे के कठोर निर्जला व्रत में प्रवेश करते हैं।

दिन 3: संध्या अर्घ्य (डूबते सूरज को अर्घ्य - कार्तिक शुक्ल षष्ठी)

यह छठ (Chhath)  पूजा का मुख्य दिन होता है।

(a) पूरा दिन का विधान

इस दिन पूरा दिन प्रसाद तैयार करने में व्यतीत होता है। प्रसाद के रूप में ठेकुआ (खजूर या गुड़ से बना एक पारंपरिक मीठा पकवान), फल, नारियल, केला, गन्ना, सुथनी (सूजी का बना हलवा) आदि तैयार किए जाते हैं।

(b) बांस की टोकरी (दउरा और सूप)

प्रसाद को बांस की बनी हुई टोकरी (दउरा) और सूप में सजाया जाता है।

(c) घाट की रौनक

शाम के समय सभी व्रती और उनके परिवारजन नदी, तालाब या घाट की ओर प्रसाद लेकर चल पड़ते हैं। घाटों पर भारी भीड़ होती है और पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है। घाटों को फूल, रंगोली और दीयों से सजाया जाता है।

(d) अर्घ्य देने की विधि

सूर्यास्त के समय, व्रती पानी में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं। सूप में प्रसाद, फल और दीया रखकर उसे दोनों हाथों से पकड़ा जाता है। फिर परिवार के बुजुर्ग महिलाएँ (जो व्रत रखती हैं) उस सूप से सूर्य देव को जल अर्पित करती हैं। इसके बाद सूर्य देव की विधिवत पूजा-आरती की जाती है और छठी मैया के गीत गाए जाते हैं।

दिन 4: उषा अर्घ्य (उगते सूरज को अर्घ्य - कार्तिक शुक्ल सप्तमी)

(a) सुबह की rituals

अगली सुबह, सभी व्रती और परिवारजन फिर से घाट पर पहुँचते हैं। इस बार उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। यह ritual सूर्योदय से पहले ही शुरू हो जाती है।

(b) अर्घ्य

उगते सूर्य को अर्घ्य देने का यही अंतिम ritual है। इसके बाद व्रती घाट पर ही छठी मैया से प्रार्थना करते हैं और संतान की दीर्घायु और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

(c) पारण (व्रत तोड़ना)

घाट से घर लौटने के बाद, व्रती प्रसाद ग्रहण करके अपना 36 घंटे का कठोर व्रत तोड़ते हैं। इस प्रसाद को ‘प्रसाद’ कहा जाता है और इसे सभी में बाँटा जाता है। इसके साथ ही यह महापर्व समाप्त होता है।

8. छठ (Chhath) पूजा का प्रसाद

छठ (Chhath) का प्रसाद बेहद खास और सात्विक होता है। इसमें किसी भी प्रकार के व्यावसायिक रूप से तैयार मसाले या पैकेज्ड सामग्री का उपयोग नहीं किया जाता। सब कुछ घर पर ही पारंपरिक तरीके से तैयार किया जाता है।

(A) ठेकुआ / खजूर का पेदा

 यह छठ (Chhath) पूजा का सबसे महत्वपूर्ण और पारंपरिक प्रसाद है। यह गेहूं के आटे, गुड़ या खजूर और घी से बनता है। इसे विशेष रूप से मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी की आग पर पकाया जाता है। इसका स्वाद अद्वितीय होता है।

(B) फल

 केला, नारियल, सेब, संतरा, मौसमी फल आदि प्रसाद में शामिल किए जाते हैं। गन्ना भी अर्घ्य में अवश्य होता है, क्योंकि यह सूर्य देव का प्रिय माना जाता है।

(C) सब्जियाँ

सुथनी (सूजी का हलवा), चावल के लड्डू भी बनाए जाते हैं।

(D) बांस की टोकरी (दउरा, सूप)

प्रसाद को बांस की बनी टोकरियों (दउरा) और छलनीनुमा सूप में रखा जाता है। यह प्रकृति के प्रति सम्मान का भी प्रतीक है और इनका उपयोग पर्यावरण के अनुकूल है।

9. छठ (Chhath) घाट: तैयारी और महत्व

छठ (Chhath)  पूजा में घाट का विशेष महत्व है। पवित्र नदियों, तालाबों और जलाशयों के किनारे घाट बनाए जाते हैं।

(A) घाटों की सजावट

घाटों को फूल, रंगोली, दीयों और बांस से सजाया जाता है। विद्युत लाइटों की भी व्यवस्था की जाती है। पूरा घाट दिव्य और आकर्षक दिखाई देता है।

(B) सामूहिकता का भाव

घाट पर सभी जाति, धर्म और वर्ग के लोग एक साथ इकट्ठा होते हैं। यहाँ कोई भेदभाव नहीं होता। सभी एक साथ मिलकर पूजा-अर्चना करते हैं और गीत गाते हैं।

(C) प्रशासनिक तैयारियाँ

सरकार और प्रशासन द्वारा घाटों पर सुरक्षा, स्वच्छता और चिकित्सा की उचित व्यवस्था की जाती है। तैराक और एनडीआरएफ की टीमें मौजूद रहती हैं ताकि किसी भी अनहोनी से बचा जा सके।

10. छठ (Chhath) पूजा के गीत और लोक संस्कृति

छठ (Chhath) पूजा की शान इसके मनमोहक और भक्तिमय लोक गीतों में है। ये गीत छठ पूजा की रौनक को चार चाँद लगा देते हैं।

(A) गीतों का सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व

ये गीत सदियों से चले आ रहे हैं और मौखिक परंपरा के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचे हैं। इन गीतों में छठी मैया की महिमा, सूर्य देव की स्तुति, पौराणिक कथाएँ और सामाजिक जीवन के दृश्य समाहित होते हैं।

(B) प्रसिद्ध छठ गीतों के बोल

    • “कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए…”

    • “उग्गो हे दिननाथ देवा, अर्घ्य देव हम…”

    • “केलवा के पात पर, हरही गिरे अमवा की धार…”

    • “पहिले पूजि छठी मइया, हमरे सुख की दातार…”

ये गीत महिलाएँ समूह में गाती हैं और इनकी धुन इतनी मधुर होती है कि माहौल पूरी तरह भक्तिमय हो जाता है।

11. छठ (Chhath) पूजा: एक सामाजिक परिप्रेक्ष्य

(A) स्त्री-शक्ति का प्रतीक

छठ (Chhath) पूजा मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा ही की जाती है। वे इस कठोर व्रत को पूरे नियम और श्रद्धा से निभाती हैं, जो उनकी अदम्य इच्छाशक्ति और समर्पण को दर्शाता है। हालाँकि, आजकल पुरुष भी इस व्रत को रखने लगे हैं।

(B) सामाजिक समानता और समरसता

यह पर्व सामाजिक भेदभाव को मिटा देता है। घाट पर अमीर-गरीब, ऊँच-नीच का कोई भेद नहीं रहता। सभी एक ही घाट पर खड़े होकर एक ही प्रकार का प्रसाद बनाकर अर्घ्य देते हैं।

(C) पारिवारिक एकजुटता

यह पर्व पूरे परिवार को एक सूत्र में बाँध देता है। घर के सभी सदस्य मिलजुल कर तैयारियों में जुट जाते हैं। पुरुष प्रसाद तैयार करने और घाट तक सामान ले जाने में सहयोग करते हैं।

12. आधुनिक समय में छठ (Chhath) पूजा: चुनौतियाँ और बदलाव

(A) शहरीकरण का प्रभाव

  • बड़े शहरों में नदियों और तालाबों की कमी के कारण लोगों ने कृत्रिम तालाब और टैंक बनाने शुरू कर दिए हैं। आवासीय societies में भी छठ घाट बनाए जाने लगे हैं।

(B) कृत्रिम घाटों का निर्माण

दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु जैसे महानगरों में यमुना, गंगा न होने पर Municipality द्वारा temporary घाट बनाए जाते हैं।

(C) पर्यावरण जागरूकता और प्रदूषण मुक्त छठ

पहले बांस की टोकरी का ही use होता था, लेकिन अब plastic के दउरे भी market में आ गए हैं। लेकिन अब लोग फिर से पर्यावरण के प्रति जागरूक हो रहे हैं और प्लास्टिक का उपयोग न करने, घाटों को साफ-सुथरा रखने की पहल कर रहे हैं। ‘नदियों में प्रदूषण न फैलाएँ’ जैसे अभियान चलाए जा रहे हैं।

13. निष्कर्ष

छठ (Chhath)  पूजा भारतीय संस्कृति की वह अमूल्य धरोहर है जो विज्ञान, आस्था, समर्पण और प्रकृति प्रेम का अनूठा संगम है। यह केवल एक पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक तरीका सिखाती है। यह हमें अनुशासन, सामूहिक सहयोग, पर्यावरण के प्रति सम्मान और ईश्वर में अटूट विश्वास का पाठ पढ़ाती है। आधुनिकता की दौड़ में भी इस पर्व की मूल भावना आज भी उतनी ही शुद्ध और अडिग है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि हमारी संस्कृति और परंपराएँ हमारी पहचान हैं और इन्हें सहेज कर रखना हमारा कर्तव्य है। छठ पूजा का संदेश सार्वभौमिक है – सूर्य की तरह प्रकाश, ऊर्जा और जीवन का संचार करते रहना और प्रकृति के प्रति कृतज्ञ बने रहना।

छठ मइया की जय! सूर्य देव की जय!

Frequently Asked Questions (FAQ)

1. छठ (Chhath) पूजा क्या है ?
Ans) 
छठ पूजा एक प्राचीन हिंदू वैदिक त्योहार है, जो सूर्य देव (भगवान भास्कर) और उनकी पत्नी षष्ठी देवी (छठी मइया) को समर्पित है। यह मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल) और नेपल (तराई क्षेत्र) में मनाया जाता है। यह एकमात्र ऐसा त्योहार है जिसमें अस्ताचलगामी (डूबते) और उदीयमान (उगते) सूर्य दोनों की पूजा होती है।

2. छठ (Chhath) पूजा कब मनाई जाती है ?
Ans) 
छठ पूजा कार्तिक मास (अक्टूबर-नवंबर) की शुक्ल पक्ष षष्ठी को मनाई जाती है, यानी दिवाली के लगभग 6 दिन बाद। यह 4 दिनों तक चलने वाला त्योहार है, जो कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से सप्तमी तक चलता है।

3. छठ (Chhath) पूजा के 4 दिन कौन-से होते हैं ?
Ans) 

दिनत्योहारक्रिया
पहला दिननहाय-खायस्नान, शुद्ध भोजन (कद्दू-चना दाल, चावल)
दूसरा दिनखरना / लोहंडादिनभर निर्जला व्रत, शाम को गुड़ की खीर (रसिया-रोटी)
तीसरा दिनसंध्या अर्घ्य (डूबते सूर्य को)नदी/तालाब में जलकर, ठेकुआ, फल, दूध से अर्घ्य
चौथा दिनउदीयमान अर्घ्य (उगते सूर्य को)सुबह सूर्योदय पर अर्घ्य, फिर पारण (व्रत तोड़ना)

 

4. छठ (Chhath) पूजा क्यों मनाई जाती है ?
Ans) 
छठ पूजा मनाने के कई कारण हैं :

  • सूर्य देव को जीवन और ऊर्जा का स्रोत माना जाता है – वे रोगों, कुष्ठ, नेत्र दोषों को दूर करते हैं।

  • संतान सुख, स्वास्थ्य, समृद्धि और मनोकामना पूर्ति के लिए।

  • पौराणिक कथा : कर्ण (महाभारत) सूर्य पुत्र थे और प्रतिदिन सूर्य को अर्घ्य देते थे।

  • द्रौपदी ने भी कष्टों से मुक्ति के लिए छठ व्रत किया था।

  • सीता माता ने राजा रामचंद्र के राज्याभिषेक के समय सूर्य षष्ठी व्रत किया था।

5. छठ (Chhath) पूजा में किन देवी-देवताओं की पूजा होती है ?
Ans)
सूर्य देव (भगवान भास्कर) – मुख्य देवता |

  • षष्ठी देवी (छठी मइया) – संतानों की रक्षा करने वाली देवी |

  • भगवान भग (सूर्य के एक रूप) और उषा-प्रत्यूषा (सूर्य की पत्नियाँ) |

6. छठ (Chhath) पूजा में क्या चढ़ाया जाता है (प्रसाद) ?
Ans) 
पारंपरिक प्रसाद पूर्णतः शाकाहारी, बिना प्याज-लहसुन और सात्विक होता है :

  • ठेकुआ (ठेकुआ) – गेहूं, गुड़, घी, सौंफ से बना बिस्कुट जैसा पकवान |

  • रसिया – गुड़ या चीनी की खीर (चावल और दूध से) |

  • चावल के लड्डू

  • केला, सेब, नाशपाती, नारियल, संतरा, अमरूद (विशेषकर केले और नारियल) |

  • सूखे मेवे और मौसमी फल |

  • अदरक, हल्दी, सौंफ, साबुत मसाले |

7. क्या छठ (Chhath) पूजा में व्रत रखना जरूरी है ?
Ans) 
हाँ, व्रत को “छठ व्रत” कहा जाता है, और यह अत्यंत कठोर होता है : 

  • 36 घंटे (खरना के दिन सुबह से लेकर अगले दिन सूर्योदय तक) बिना पानी के (निर्जला) व्रत

  • केवल दूसरे दिन (खरना) के दिन दिनभर निर्जला रहकर शाम को एक बार भोजन (गुड़ की खीर) लेते हैं।

  • फिर संध्या अर्घ्य के दिन सुबह से लेकर अगले दिन उदीयमान अर्घ्य के बाद तक कुछ भी नहीं खाते-पीते।

8. क्या केवल महिलाएँ ही छठ व्रत रख सकती हैं ?
Ans) 
नहीं, पुरुष भी छठ व्रत रख सकते हैं। आजकल कई पुरुष (विशेषकर बिहार, झारखंड में) यह व्रत रखते हैं। परंपरागत रूप से विवाहित महिलाएँ अपने पति और बच्चों की लंबी उम्र के लिए, तो पुरुष परिवार की खुशहाली के लिए व्रत रखते हैं।

9. छठ (Chhath) पूजा के लिए क्या सामग्री चाहिए ?
Ans) 

सामग्रीउपयोग
बाँस की सूप (डलिया)अर्घ्य देने के लिए
मिट्टी के दीपकघाट पर जलाने के लिए
पीतल या मिट्टी का कलश (लोटा)दूध, जल, अर्घ्य सामग्री
ठेकुआ, रसिया, फल, नारियलप्रसाद
गन्ना4-5 गन्ने (घाट पर बाँधते हैं)
हल्दी, अदरक, सुपारी, साबुत मसालेविशेष भेंट
चौकी (लकड़ी की)सूर्य मंडल बनाने के लिए
लाल कपड़ा, फूल (गेंदा, गुलाब)पूजा सामग्री

 

10. छठ (Chhath) पूजा में गन्ना क्यों लगाया जाता है ?
Ans) 
गन्ना (गन्ने) को सूर्य की किरणों का प्रतीक माना जाता है। चार या पाँच गन्नों को बाँस के सूप के चारों ओर लगाया जाता है, जिससे सूर्य मंडल (प्रतीकात्मक सूर्य) बनता है। यह जीवन, मिठास और समृद्धि का भी प्रतीक है।

11. क्या छठ (Chhath) पूजा केवल नदी या तालाब पर ही होती है ?
Ans) 
परंपरागत रूप से शुद्ध बहते जल (नदी, तालाब, जलाशय) में ही अर्घ्य दिया जाता है। लेकिन शहरों में यदि नदी न हो तो :

  • कृत्रिम तालाब (होम मेड पॉन्ड) बनाकर |

  • बड़े टैंक या पानी के भरे बर्तन में भी अर्घ्य दे सकते हैं |

  • कई अपार्टमेंट समुदाय सामूहिक रूप से पूल या टैंक बनाते हैं |

12. क्या छठ (Chhath) पूजा में पटाखे चलाए जाते हैं ?
Ans) 
नहीं, छठ पूजा बिल्कुल शांत, सादगी और आध्यात्मिकता का त्योहार है। पटाखे, आतिशबाजी, ताश, जुआ, मदिरा, मांस – ये सब वर्जित हैं। केवल मिट्टी के दीपक, सूर्यास्त और सूर्योदय पर प्रार्थना, भजन-कीर्तन होते हैं।

13. क्या छठ (Chhath) पूजा पर नए कपड़े पहनना जरूरी है ?
Ans) 
हाँ, व्रती (व्रत रखने वाला) पूरी तरह नए या धुले हुए साफ सूती वस्त्र पहनता है :

  • महिलाएँ पीला, नारंगी, लाल, या सफेद साड़ी / सलवार सूट (आमतौर पर सूती) |

  • पुरुष धोती-कुर्ता या सफेद कपड़े |

  • नए कपड़े न हों तो कम से कम साफ, प्राकृतिक रेशमी या सूती कपड़े पहनें।

14. क्या गर्भवती महिलाएँ (Chhath) छठ व्रत रख सकती हैं ?
Ans) 
गर्भवती महिलाओं को निर्जला व्रत (बिना पानी) नहीं रखना चाहिए, क्योंकि यह माँ और बच्चे दोनों के लिए हानिकारक हो सकता है। वे :

  • फलाहार व्रत (फल, दूध, साबूदाना) रख सकती हैं |

  • बिना व्रत के केवल पूजा कर सकती हैं |

  • घाट पर जाकर अर्घ्य दे सकती हैं, लेकिन खड़े न होकर बैठकर दें |

  • डॉक्टर और पंडित दोनों ही पूर्ण व्रत से मना करते हैं।

15. क्या छठ (Chhath) पूजा के दौरान सो सकते हैं ?
Ans) 
व्रती को पूरे 36 घंटे में ज़मीन पर चटाई या कंबल बिछाकर सोना चाहिए, बिस्तर पर नहीं। रात में घाट पर जागरण (रात्रि जागरण) किया जाता है, जहाँ भजन-कीर्तन होते हैं। घर पर भी ज्यादातर लोग रातभर जागते हैं या कम से कम सूर्योदय तक नहीं सोते।

16. छठ (Chhath) पूजा के गीत क्यों गाए जाते हैं ?
Ans) 
लोकगीत (छठ गीत) परंपरा का अभिन्न अंग हैं। ये गीत :

  • सूर्य देव और छठी मइया की स्तुति में होते हैं |

  • बिहारी, भोजपुरी, मैथिली, अवधी भाषाओं में |

  • ऐतिहासिक कथाओं और व्रत के महत्व का वर्णन |

  • प्रसिद्ध गीत: “केलवा जे फरेला”, “उगवा सुरुज देवा भास्कर”, “हे छठी मइया”

  • रातभर गीत गाने से व्रती का मन स्थिर और श्रद्धायुक्त रहता है |

17. क्या छठ (Chhath) पूजा में बाल कटवा सकते हैं, नाखून काट सकते हैं ?
Ans) 
नहीं, 4 दिनों में बाल, नाखून, दाढ़ी, मूंछ काटना वर्जित है। पहले दिन (नहाय-खाय) से पहले ही सभी शस्त्र क्रिया पूरी कर लेनी चाहिए। इस अवधि में स्वयं को यथासंभव प्राकृतिक और शुद्ध रखा जाता है।

18. क्या छठ (Chhath) पूजा के दौरान रजस्वला (मासिक धर्म) महिलाएं व्रत रख सकती हैं ?
Ans) 
परंपरागत रूप से रजस्वला महिलाओं को छठ व्रत रखने और घाट पर जाने से मना किया जाता था। लेकिन अब यह पूर्णतः व्यक्तिगत और पारिवारिक आस्था पर निर्भर करता है :

  • कई आधुनिक परिवार कोई प्रतिबंध नहीं मानते |

  • यदि वह शारीरिक रूप से सक्षम हैं और साफ-सफाई का ध्यान रखें, तो व्रत रख सकती हैं |

  • कुछ घरों में वे पूजा करती हैं लेकिन अर्घ्य नहीं देतीं |

19. क्या छठ (Chhath) पूजा में प्याज-लहसुन खा सकते हैं ?
Ans) 
नहीं, छठ व्रत के चारों दिन प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा, अंडा, तामसिक भोजन वर्जित हैं। सारा प्रसाद और व्रती का भोजन बिना प्याज-लहसुन के सात्विक बनाया जाता है। यहाँ तक कि कई घर 4 दिनों तक प्याज-लहसुन घर में लाते भी नहीं हैं।

20. क्या गैर-हिंदू छठ (Chhath) पूजा कर सकते हैं ?
Ans) 
हाँ, छठ पूजा में कोई जाति या धर्म का बंधन नहीं है। यह एक वैदिक सार्वभौमिक त्योहार है। कई गैर-हिंदू भी श्रद्धा से छठ व्रत रखते हैं, खासकर नेपाल और बिहार-उत्तर प्रदेश में। सूर्य सभी के लिए एक समान ऊर्जा देते हैं, इसलिए यह सबके लिए खुला है।

21. छठ (Chhath) पूजा के दौरान कोशिशा (पानी में खड़े रहना) क्यों जरूरी है ?
Ans) 
व्रती कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते हैं। यह :

  • त्याग और कठोर तपस्या का प्रतीक है |

  • जल में खड़े रहने से शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है |

  • सूर्य की किरणों का सीधा असर शरीर पर (विटामिन डी, रोग प्रतिरोधक क्षमता) |

  • मान्यता है कि ऐसा करने से सूर्य देव प्रसन्न होते हैं और मनोकामना पूरी करते हैं |

22. क्या छठ (chhath) पूजा में रात को दीपक जलाना जरूरी है ?
Ans) 
हाँ, संध्या अर्घ्य के बाद व्रती मिट्टी के दीपक (पांच या अधिक) को जलाकर पानी में प्रवाहित करते हैं। यह दीपक सूर्य के अंधकार पर विजय का प्रतीक है। रातभर घर के दरवाजे पर भी दीपक जलता रहता है।

23. छठ (Chhath) पूजा में “ठेकुआ” क्यों बनाया जाता है ?
Ans) 
ठेकुआ (गेहूं, गुड़, घी, सौंफ का बिस्कुट जैसा पकवान) छठ पूजा का मुख्य प्रसाद है। इसे व्रत में ताकत देने के लिए बनाया जाता है, क्योंकि यह ऊर्जा से भरपूर होता है। इसका आकार सूर्य मंडल जैसा होता है। सूखने पर यह कई दिनों तक खराब नहीं होता, इसलिए दान करने में भी सुविधाजनक है।

24. क्या छठ (chhath) पूजा के दौरान कोई मंत्र जाप करना चाहिए ?
Ans) प्रमुख मंत्र
:

  • गायत्री मंत्र : “ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्”

  • सूर्य मंत्र : “ॐ सूर्याय नमः, ॐ आदित्याय नमः, ॐ भास्कराय नमः”

  • छठ मंत्र: “ॐ षष्ठी देव्यै नमः”

  • सरल: “घृतं कृण्वन्तु ग्राम्याः” (छठ गीत का एक अंश) |

लेकिन अधिकांश व्रती सरल भाषा में ही सूर्य देव की स्तुति करते हैं।

25. क्या बिना गुरु या पंडित के घर पर छठ पूजा कर सकते हैं ?
Ans) 
हाँ, छठ पूजा में किसी पंडित की अनिवार्यता नहीं है। यह लोक आस्था का त्योहार है, जिसमें माताएँ और परिवार के बुजुर्ग ही पूरी विधि बता सकते हैं। आप :

  • घर पर साफ स्थान पर सूर्य मंडल बनाएँ |

  • सामग्री इकट्ठा करें |

  • शुद्ध मन से अर्घ्य दें और भजन गाएँ |

26. क्या छठ पूजा पर नॉन-वेज खा सकते हैं ?
Ans) 
बिल्कुल नहीं। 4 दिनों में मांस, मछली, अंडे, मदिरा पूरी तरह वर्जित हैं। यहाँ तक कि व्रती के घर के अन्य सदस्य भी इन दिनों नॉन-वेज नहीं खाते। प्रसाद और भोजन दोनों शुद्ध शाकाहारी और सात्विक होने चाहिए।

27. छठ पूजा में फल क्यों चढ़ाते हैं ?
Ans) 
फल प्रकृति और सूर्य की देन हैं। केला, नारियल, सेब, संतरा, अमरूद, नाशपाती – सभी फल शुद्ध, बिना तोड़े-मसाले वाले प्रसाद होते हैं। मान्यता है कि फल चढ़ाने से जीवन में मिठास, स्वास्थ्य और समृद्धि आती है।

28. क्या छठ पूजा के दौरान घर की सफाई जरूरी है ?
Ans) 
हाँ, अत्यंत जरूरी। पहले दिन (नहाय-खाय) से पहले पूरे घर की गहरी सफाई कर ली जाती है। दीवारों पर गेरू या चूना लगाया जाता है, आँगन में रंगोली बनाई जाती है। साफ-स्वच्छ वातावरण में ही सूर्य देव और छठी मइया विराजमान होती हैं।

29. क्या छठ पूजा में दूध या दही चढ़ाया जाता है ?
Ans) 
हाँ, दूध (कच्चा या गरम) अर्घ्य का एक महत्वपूर्ण अंग है। इसे कलश में डालकर सूर्य देव पर छिड़का जाता है। कुछ स्थानों पर दही का भी उपयोग होता है। दूध पवित्रता और पोषण का प्रतीक है।

30. क्या छठ पूजा के बाद दूसरों को प्रसाद देना चाहिए ?
Ans) 
बिल्कुल! उदीयमान अर्घ्य (चौथे दिन सुबह) के बाद व्रती सभी रिश्तेदारों, पड़ोसियों, जरूरतमंदों को ठेकुआ, रसिया और फल वितरित करता है। ऐसा माना जाता है कि जितना अधिक बाँटोगे, उतना अधिक सूर्य देव की कृपा होगी। प्रसाद बिना माँगे दिया जाता है।

31. क्या छठ पूजा के दिन सोना या चाँदी खरीदना शुभ होता है ?
Ans) 
हाँ, छठ पूजा के दिन (विशेषकर खरना के दिन) सोना-चाँदी, गहने, या नए बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है, लेकिन यह धनतेरस की तरह अनिवार्य नहीं है। अधिकतर लोग इस दिन सूर्य मंदिर में दान या ताम्रपात्र खरीदते हैं।

32. क्या छठ पूजा पर विदेशों में भी पूजा होती है ?
Ans) 
हाँ, जहाँ-जहाँ बिहारी, उत्तर प्रदेशी और नेपाली प्रवासी हैं :

  • यूएसए (न्यू जर्सी, कैलिफोर्निया, टेक्सास) |

  • यूके (लंदन, लीसेस्टर) |

  • ऑस्ट्रेलिया (सिडनी, मेलबोर्न) |

  • मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद – सार्वजनिक स्थानों पर तालाब बनाकर सामूहिक छठ पूजा आयोजित की जाती है।

33. छठ पूजा के बाद व्रत कैसे तोड़ा जाता है (पारण) ?
Ans) 
चौथे दिन उदीयमान अर्घ्य (सूर्योदय पर) देने के बाद, व्रती घर लौटता है और :

  • सबसे पहले अदरक और कच्ची हल्दी खाता है |

  • फिर ठेकुआ, रसिया, फल ग्रहण करता है |

  • इसके बाद पूरा परिवार सात्विक भोजन करता है |

  • पारण के बाद ही व्रती सामान्य भोजन (दाल-चावल-सब्जी) खाता है |

34. क्या छठ पूजा में “कोसी भराई” की परंपरा है ?
Ans) 
हाँ, कोसी भराई या कोसी निकासी (पानी से भरे बाँस के पात्र) एक प्राचीन परंपरा है, लेकिन अब कम प्रचलित है। इसमें व्रती बाँस के पात्र में नदी का जल भरकर सूर्य देव पर चढ़ाता है। यह अनुष्ठान अत्यंत कठिन होता है और केवल विशेष मनोकामना के लिए किया जाता है।

35. क्या छठ पूजा पर अंत्येष्टि या श्राद्ध कर सकते हैं ?
Ans) 
नहीं, छठ पूजा के 4 दिनों में किसी भी प्रकार का मृतक संस्कार, तेरहवीं, श्राद्ध या तर्पण नहीं करना चाहिए। ये दिन पूर्णतः शुभ और पवित्र हैं। ऐसे कार्य छठ से पहले या बाद में करें।

36. छठ पूजा में सूर्य को अर्घ्य किस दिशा में दिया जाता है ?
Ans)
संध्या अर्घ्य (डूबते सूर्य) – पश्चिम दिशा की ओर मुख करके |

  • उदीयमान अर्घ्य (उगते सूर्य) – पूर्व दिशा की ओर मुख करके
    व्रती कमर तक पानी में खड़ा होता है, सूप (बाँस की डलिया) में प्रसाद सजाकर, दोनों हाथों से सूर्य को अर्घ्य देता है।

37. क्या छठ पूजा के दौरान तेल लगा सकते हैं ?
Ans)
नहीं, व्रती सिर पर तेल नहीं लगाता (यह शुद्धता का प्रतीक है)। स्नान केवल पानी से करता है, या यदि तेल लगाए तो केवल सरसों का तेल (बिना सुगंध वाला)। शरीर पर इत्र, महक, क्रीम आदि भी वर्जित हैं।

38. क्या बिना व्रत रखे केवल छठ पूजा देख सकते हैं ?
Ans) 
बिल्कुल। कोई भी व्यक्ति घाट पर जाकर अर्घ्य देख सकता है, भजन-कीर्तन सुन सकता है, प्रसाद ले सकता है, और सूर्य देव को नमस्कार कर सकता है। केवल व्रती को ही 36 घंटे का कठोर नियम पालन करना होता है।

39. क्या छठ पूजा पर नींद पूरी करना जरूरी है ?
Ans) 
व्रती को नींद से बचना चाहिए – रातभर जागरण करना है। लेकिन यदि कोई बुजुर्ग या बीमार है, तो वह कुर्सी पर बैठकर आराम कर सकता है, लेकिन लेटकर नहीं सोना चाहिए। पूरी नींद तोड़ने के लिए रात में गीत, भजन, कथा का आयोजन किया जाता है।

40. छठ पूजा की शुभकामनाएँ कैसे दें ?
Ans) 
प्रचलित संदेश :

  • “छठ पूजा की हार्दिक शुभकामनाएँ! सूर्य देव की कृपा सदा बनी रहे।”

  • “केलवा जे फरेला, सूर्य देव तोहरे दरबार में हम सब निहोरेला। हैप्पी छठ पूजा!”

  • “घृतं कृण्वन्तु ग्राम्याः… छठी मइया सबके मनोरथ पूरे करें।”

  • “Chhath Puja ke pavani bela par, Maa Chhathi aur Bhaskar Dev ki kripa se aapke parivaar mein sukh, shanti aur samriddhi aaye.”

  • “Wishing you a blessed Chhath Puja! May the Sun God bless you with health, wealth, and happiness.”

 

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