Pitru Paksha 2025

1. पितृ पक्ष (Pitru Paksha) क्या है ?

pitru paksha

भारतीय संस्कृति विश्व की उन कुछ महानतम संस्कृतियों में से एक है, जहाँ न केवल देवताओं की उपासना की जाती है, बल्कि पूर्वजों और पितरों के प्रति भी गहन श्रद्धा और आस्था प्रकट की जाती है। हमारी सभ्यता यह मानकर चलती है कि जीवन केवल वर्तमान पीढ़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें अतीत और भविष्य का भी गहरा संबंध है।

Table of Contents

इसी परंपरा के अंतर्गत पितृपक्ष (Pitru Paksha) का विशेष महत्व है। यह 16 दिनों की अवधि है जिसमें अपने पूर्वजों को याद कर उनके प्रति कृतज्ञता अर्पित की जाती है। “श्राद्ध”, “तर्पण” और “पिंडदान” जैसे अनुष्ठान इस समय विशेष रूप से किए जाते हैं।

पितृपक्ष (Pitru Paksha) का मूल उद्देश्य केवल कर्मकांड करना नहीं है, बल्कि पूर्वजों के त्याग और योगदान को स्मरण करना है। यह हमें यह भी सिखाता है कि हम अकेले नहीं हैं, बल्कि हमारी नसों में पीढ़ियों का इतिहास और संस्कार प्रवाहित हो रहे हैं।

आज जब आधुनिक जीवनशैली के कारण लोग अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं, ऐसे समय में पितृपक्ष (Pitru Paksha) हमें हमारी पहचान और परंपराओं से जोड़ता है। यह पर्व हमें हमारी संस्कृति की उस महान परंपरा की याद दिलाता है जिसमें “पितरों का आशीर्वाद” जीवन की सफलता और शांति का आधार माना गया है।

2. पितृपक्ष (Pitru Paksha) की उत्पत्ति और इतिहास

(A) वैदिक कालीन उल्लेख

पितृपक्ष (Pitru Paksha) का आधार वैदिक साहित्य में मिलता है। ऋग्वेद और यजुर्वेद में पितरों को अर्घ्य और तर्पण देने की विधियाँ वर्णित हैं। वैदिक ऋषि मानते थे कि हमारे पूर्वज सूक्ष्म रूप में हमारे साथ रहते हैं और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना मानव का परम कर्तव्य है।

(B) महाभारत का प्रसंग

महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को श्राद्ध और तर्पण का महत्व बताया। उन्होंने कहा – “पितरों की तृप्ति से देवताओं की कृपा प्राप्त होती है और परिवार सुख-समृद्धि को प्राप्त करता है।”

(C) रामायण का प्रसंग

रामायण में भी पितृकर्म का महत्व स्पष्ट होता है। जब भगवान श्रीराम लंका विजय से लौटे, तब उन्होंने गया में जाकर अपने पिता राजा दशरथ का श्राद्ध और पिंडदान किया। तभी से गया पितृकर्म का प्रमुख तीर्थ बन गया।

(D) पुराणों में उल्लेख

  • गरुड़ पुराण : इसमें बताया गया है कि मृत्यु के बाद आत्मा यमलोक की ओर जाती है। पितरों को शांति तभी मिलती है जब उनकी संतान श्राद्ध और तर्पण करती है।
  • विष्णु धर्मसूत्र : यहाँ श्राद्ध को संतान का परम कर्तव्य माना गया है।
  • मत्स्य पुराण : इसमें श्राद्ध के 96 प्रकार बताए गए हैं।

(E) गया श्राद्ध की कथा

कथा है कि राक्षस गया असुर का शरीर इतना विशाल और पवित्र था कि देवताओं ने उसे श्राद्धकर्म के लिए उपयुक्त स्थल घोषित किया। भगवान विष्णु ने अपने चरण चिन्ह वहाँ स्थापित किए। तब से गया पिंडदान का सबसे पवित्र स्थान माना जाता है।

(F) ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

इतिहासकार मानते हैं कि पितृपक्ष (Pitru Paksha) की परंपरा लगभग 3000 वर्ष पुरानी है। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि सामाजिक व्यवस्था का भी अंग था। जब लोग बड़े-बड़े परिवारों में रहते थे, तब पितरों की स्मृति सामूहिक रूप से मनाई जाती थी।

3. पितृपक्ष का धार्मिक महत्व

भारतीय धर्म और दर्शन की मूल भावना है – ऋणानुबंध। हर इंसान अपने जन्म से ही कई ऋणों के साथ आता है – देवऋण, ऋषि ऋण, मातृऋण और पितृऋण। इनमें से पितृऋण सबसे महत्वपूर्ण माना गया है क्योंकि हमारे अस्तित्व का आधार हमारे पूर्वज ही हैं।

(A) श्राद्ध का धार्मिक स्वरूप

“श्राद्ध” शब्द संस्कृत के “श्रद्धा” से निकला है, जिसका अर्थ है श्रद्धा और आस्था के साथ किया गया कर्म। इसका आशय यह है कि पितरों के लिए जो भी कार्य किया जाए, वह पूरी निष्ठा और भावनाओं से हो।

(B) पितरों की तृप्ति और आशीर्वाद

धार्मिक मान्यता है कि जब संतान श्राद्ध और तर्पण करती है तो पितर तृप्त होते हैं और आशीर्वाद देते हैं। यह आशीर्वाद परिवार में सुख, स्वास्थ्य, संतान-प्राप्ति और समृद्धि का कारण बनता है।

(C) श्राद्ध और मोक्ष

गरुड़ पुराण और विष्णु पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि जिन लोगों का विधिपूर्वक श्राद्ध होता है, उन्हें यमलोक में कष्ट नहीं भोगना पड़ता और वे उत्तम लोक प्राप्त करते हैं।

(D) देवताओं से संबंध

मान्यता है कि जब पितर प्रसन्न होते हैं तभी देवता भी प्रसन्न होते हैं। अतः श्राद्ध केवल पितरों के लिए ही नहीं, बल्कि देवताओं की कृपा प्राप्त करने का साधन भी है।

(E) पारिवारिक शांति का आधार

कई परिवारों में पितृदोष के कारण विवाह, संतान, आर्थिक उन्नति आदि में बाधाएँ आती हैं। श्राद्ध और तर्पण से इन बाधाओं का निवारण होता है।

4. पितृपक्ष (Pitru Paksha) की अवधि और तिथियाँ

पितृपक्ष (Pitru Paksha) की अवधि भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक मानी जाती है। इस दौरान लगभग 15-16 दिन होते हैं, जिन्हें श्राद्ध पक्ष कहा जाता है।

(A) प्रारंभ और समापन

  • प्रारंभ – भाद्रपद पूर्णिमा से।
  • समापन – आश्विन अमावस्या (महालय अमावस्या) को।

(B) महालय अमावस्या का महत्व

यह दिन सर्वपितृ अमावस्या कहलाता है। मान्यता है कि यदि किसी को अपने पितरों की तिथि ज्ञात न हो तो वह अमावस्या के दिन श्राद्ध कर सकता है।

(C) दिनवार महत्व

हर दिन का श्राद्ध अलग-अलग पितरों के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए –

  • प्रतिपदा – मातृ श्राद्ध
  • द्वितीया से त्रयोदशी – सामान्य श्राद्ध
  • चतुर्दशी – अकाल मृतक पितरों के लिए
  • अमावस्या – सर्वपितृ श्राद्ध

(D) श्राद्ध का समय

श्राद्ध कार्य प्रायः मध्याह्न काल में किया जाता है। इसे “कुतुप काल” कहा जाता है, जो लगभग दोपहर से पहले का समय होता है।

5. श्राद्ध की विधि-विधान

श्राद्ध कर्म अत्यंत विधिपूर्वक और शुद्ध वातावरण में किया जाता है। इसकी प्रक्रिया निम्न प्रकार है –

(A) संकल्प

सर्वप्रथम संकल्प लिया जाता है – पितरों का नाम लेकर उन्हें स्मरण किया जाता है और श्राद्ध का उद्देश्य बताया जाता है।

(B) तर्पण

  • कुशा, तिल और जल से पितरों को तर्पण किया जाता है।
  • यह माना जाता है कि तर्पण से पितरों को तृप्ति मिलती है।

(C) पिंडदान

  • आटे, चावल, तिल और जौ से बने गोलाकार पिंड पितरों को अर्पित किए जाते हैं।
  • ये पिंड पितरों के सूक्ष्म शरीर को आहार के रूप में मिलते हैं।

(D) ब्राह्मण भोजन

श्राद्ध में ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है। यह मान्यता है कि ब्राह्मण देवताओं और पितरों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

(E) दान

ब्राह्मणों को अन्न, वस्त्र, दक्षिणा आदि दान दिया जाता है। इसे पितरों की तृप्ति का मुख्य साधन माना गया है।

(F) कौआ, गाय और कुत्ता

  • श्राद्ध का भोजन सबसे पहले कौवे को खिलाया जाता है। कौवा पितरों का दूत माना जाता है।
  • गाय को भोजन कराना शुभ है।
  • कुत्ते को भी भोजन देने की परंपरा है।

(G) श्राद्ध में पकाए जाने वाले भोजन

  • खिचड़ी, कचौरी, पूड़ी, दाल, लड्डू आदि सात्त्विक भोजन बनाए जाते हैं।
  • लहसुन-प्याज, मांस और मद्य का पूर्णतः निषेध है।

6. पितृपक्ष (Pitru Paksha) के नियम और निषेध

पितृपक्ष (Pitru Paksha) केवल अनुष्ठान का समय नहीं है, बल्कि यह आत्मसंयम और सात्त्विकता का काल भी माना जाता है। इस दौरान जीवनशैली में कुछ नियमों का पालन करना आवश्यक है।

(A) क्या करना चाहिए ?

  • प्रतिदिन पितरों को जल अर्पित करना।
  • घर में सात्त्विक भोजन बनाना।
  • ब्राह्मण, गौ और जरूरतमंदों को भोजन कराना।
  • श्राद्ध कर्म में पूरे मन और श्रद्धा से भाग लेना।
  • पितरों के नाम स्मरण करते हुए दान-पुण्य करना।

(B) क्या वर्जित है ?

  • विवाह, नामकरण, गृहप्रवेश, मुंडन जैसे शुभ कार्य।
  • नए कपड़े, नया मकान या नए आभूषण धारण करना।
  • मद्यपान, मांसाहार, लहसुन-प्याज का प्रयोग।
  • झूठ बोलना, छल-कपट करना और किसी का अपमान करना।
  • घर में कलह या अशांति फैलाना।

(C) नियमों के पीछे तर्क

  • श्राद्ध काल में मन को संयमित और एकाग्र रखने की आवश्यकता होती है।
  • सात्त्विक भोजन से शरीर और मन शुद्ध रहते हैं।
  • शुभ कार्य इसलिए वर्जित हैं क्योंकि इस समय पितरों की स्मृति और शांति पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

7. पितृपक्ष (Pitru Paksha) और ज्योतिषीय दृष्टि

भारतीय ज्योतिष शास्त्र में पितृपक्ष (Pitru Paksha) का विशेष महत्व है। मान्यता है कि जिनकी कुंडली में पितृदोष होता है, उनके जीवन में कई बाधाएँ आती हैं।

(A) पितृदोष क्या है ?

जब किसी जातक की कुंडली में सूर्य, चंद्रमा, राहु, केतु या शनि की विशेष स्थितियाँ होती हैं, तो इसे पितृदोष कहा जाता है। इसका अर्थ है कि पितरों की आत्मा संतुष्ट नहीं है।

(B) पितृदोष के लक्षण

  • संतान सुख में बाधा।
  • विवाह में देरी।
  • धन की हानि।
  • बार-बार बीमारियाँ।
  • पारिवारिक कलह।

(C) पितृदोष निवारण उपाय

  • पितृपक्ष में तर्पण और पिंडदान करना।
  • गरीबों और ब्राह्मणों को अन्न-वस्त्र दान करना।
  • गाय को हरा चारा और कुत्ते को रोटी खिलाना।
  • विष्णु सहस्रनाम, महामृत्युंजय मंत्र और पितृ सूक्त का पाठ करना।
  • गया, काशी या पुष्कर में पिंडदान करना।

(D) ज्योतिषीय मान्यता

ज्योतिषियों का मत है कि जब पितरों का श्राद्ध उचित प्रकार से कर दिया जाता है तो पितृदोष स्वतः समाप्त हो जाता है और जातक का जीवन सरल और सुखमय हो जाता है।

8. पितृपक्ष (Pitru Paksha) और दान-पुण्य

दान भारतीय संस्कृति की आत्मा है। पितृपक्ष (Pitru Paksha) में किया गया दान विशेष फलदायी माना गया है।

(A) दान का महत्व

दान केवल पितरों की तृप्ति का साधन ही नहीं है, बल्कि यह समाज के गरीब और जरूरतमंद वर्ग की सहायता का भी माध्यम है। पितृ पक्ष में दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है और इस समय सभी को दान करना चाहिए |

(B) प्रमुख दान

  • तिलदान – यह पापों का नाश करता है।
  • अन्नदान – इससे पितर तृप्त होते हैं।
  • वस्त्रदान – पूर्वजों को संतोष मिलता है।
  • गौदान – सर्वोच्च दान माना गया है।
  • स्वर्णदान – समृद्धि और लक्ष्मी प्राप्ति का साधन।
  • भूमिदान – मोक्षदायक माना गया है।

(C) ब्राह्मण और जरूरतमंदों को दान

श्राद्ध कर्म के अंत में ब्राह्मणों को भोजन और दान देना अनिवार्य माना गया है। इससे पितरों को सीधा संतोष मिलता है।

(D) दान के सामाजिक लाभ

  • समाज में परोपकार और सहयोग की भावना बढ़ती है।
  • गरीब और वंचित वर्ग को राहत मिलती है।
  • परिवार में पुण्य और शांति का संचार होता है।

9. पितृपक्ष (Pitru Paksha) से जुड़े प्रमुख तीर्थ

पितृपक्ष (Pitru Paksha) में तीर्थस्थलों पर जाकर पिंडदान और श्राद्ध करने की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। इनमें कुछ विशेष स्थल ऐसे हैं जहाँ श्राद्धकर्म करने से पितरों को परम शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

(A) गया (बिहार)

  • सबसे प्रमुख और प्राचीन पिंडदान स्थल।
  • यहाँ भगवान विष्णु के चरण चिन्ह स्थित हैं।
  • मान्यता है कि गया में पिंडदान करने से 21 पीढ़ियों तक के पितर तृप्त हो जाते हैं।

(B) वाराणसी (काशी)

  • भगवान शिव की नगरी।
  • यहाँ श्राद्ध और पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

(C) पुष्कर (राजस्थान)

  • ब्रह्मा जी का एकमात्र मंदिर यहीं स्थित है।
  • मान्यता है कि पुष्कर में पिंडदान करने से पितर त्वरित संतुष्ट होते हैं।

(D) गया तीर्थ के अतिरिक्त अन्य स्थल

  • गया जी (बोधगया सहित)
  • प्रयागराज (त्रिवेणी संगम)
  • कुरुक्षेत्र (हरियाणा)
  • हरिद्वार (उत्तराखंड)

(E) तीर्थ यात्रा का महत्व

पितृपक्ष (Pitru Paksha) में इन तीर्थों की यात्रा कर श्राद्ध करने से न केवल पितरों को शांति मिलती है, बल्कि साधक को भी पुण्यफल प्राप्त होता है।

10. पितृपक्ष (Pitru paksha) का सामाजिक और वैज्ञानिक महत्व

पितृपक्ष (Pitru Paksha) केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं है, बल्कि इसके पीछे सामाजिक और वैज्ञानिक दृष्टि से भी गहन अर्थ छिपा हुआ है।

(A) सामाजिक महत्व

  • परिवार को जोड़ने वाला पर्व : पितृपक्ष (Pitru Paksha) के अवसर पर परिवार एकत्र होकर सामूहिक रूप से श्राद्ध करता है। इससे पीढ़ियों के बीच संबंध मजबूत होते हैं।
  • कृतज्ञता का भाव : यह पर्व हमें अपने पूर्वजों के त्याग और योगदान की याद दिलाता है।
  • सामाजिक सहयोग : श्राद्ध के अवसर पर अन्नदान और वस्त्रदान गरीबों की सहायता का माध्यम बनता है।

(B) वैज्ञानिक महत्व

  • मौसम परिवर्तन : यह समय वर्षा ऋतु और शरद ऋतु के बीच का होता है। इस समय पाचन शक्ति कमजोर रहती है, इसलिए सात्त्विक भोजन पर जोर दिया जाता है।
  • दान और स्वास्थ्य : अन्न और वस्त्र का दान समाज में संसाधनों के संतुलन में मदद करता है।
  • सकारात्मक ऊर्जा : पूर्वजों का स्मरण करने से मन में स्थिरता और आत्मबल बढ़ता है।

(C) मनोवैज्ञानिक दृष्टि

  • पूर्वजों को स्मरण करने से व्यक्ति को यह अहसास होता है कि वह अकेला नहीं है, बल्कि एक परंपरा का हिस्सा है।
  • इससे आत्मविश्वास और जिम्मेदारी की भावना जागृत होती है।

11. लोककथाएँ और जनमान्यताएँ

भारत की लोकसंस्कृति में पितृपक्ष (Pitru Paksha) से जुड़ी कई मान्यताएँ और कथाएँ प्रचलित हैं।

(A) कौवे का महत्व

  • कौवा पितरों का प्रतीक माना जाता है।
  • श्राद्ध का भोजन सबसे पहले कौवे को दिया जाता है। यदि कौवा भोजन कर ले तो इसे पितरों की तृप्ति का संकेत माना जाता है।

(B) स्वप्न में पितरों का आना

  • मान्यता है कि पितृपक्ष (Pitru Paksha) के दौरान यदि स्वप्न में पितर दिखाई दें तो यह शुभ संकेत है।
  • यह पितरों की प्रसन्नता का द्योतक माना जाता है।

(C) कुत्ते और गाय की भूमिका

  • कुत्ता यमराज का वाहन माना जाता है।
  • गाय को भोजन कराने से पितर अत्यंत संतुष्ट होते हैं।

(D) लोककथाएँ

  • कहा जाता है कि पितृपक्ष (Pitru Paksha) में पितर अदृश्य रूप से धरती पर आते हैं।
  • यदि संतान श्राद्ध करती है तो वे प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं, अन्यथा नाराज होकर बाधाएँ उत्पन्न करते हैं।

12. उपसंहार

पितृपक्ष (Pitru Paksha) भारतीय संस्कृति की उस गहरी परंपरा का प्रतीक है जिसमें जीवन के प्रत्येक पहलू को संतुलित और अर्थपूर्ण बनाने की दिशा में प्रयास किया गया है। यह पर्व हमें यह स्मरण कराता है कि हम जिस सुख-सुविधा, संस्कृति और संस्कारों का आनंद ले रहे हैं, वह केवल हमारे प्रयासों का परिणाम नहीं है, बल्कि इसमें हमारे पूर्वजों का त्याग, संघर्ष और योगदान भी शामिल है।

(A) पितृपक्ष (Pitru Paksha) का सार

• पितृपक्ष (Pitru Paksha) केवल अनुष्ठान या कर्मकांड का पर्व नहीं है, बल्कि यह पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और आभार व्यक्त करने का माध्यम है।

• यह हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है और यह सिखाता है कि परिवार, समाज और संस्कृति की निरंतरता तभी संभव है जब हम अपने अतीत का सम्मान करें।

(B) आधुनिक समाज में प्रासंगिकता

आज की तेज़-तर्रार जीवनशैली में लोग अपनी परंपराओं और जड़ों से कटते जा रहे हैं। ऐसे में पितृपक्ष (Pitru Paksha) हमें यह याद दिलाता है कि हमारी पहचान केवल वर्तमान तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारे पूर्वजों और उनकी परंपराओं से भी जुड़ी है।

  • यह पर्व हमें परिवार को संगठित करने की प्रेरणा देता है।
  • हमें यह सिखाता है कि परोपकार, दान और समाज सेवा ही सच्चा धर्म है।

(C) आध्यात्मिक दृष्टि

पितृपक्ष (Pitru Paksha) का सबसे बड़ा संदेश आत्मिक शांति और मोक्ष की ओर मार्गदर्शन है। श्राद्ध, तर्पण और दान-पुण्य से न केवल पितरों की आत्मा को तृप्ति मिलती है, बल्कि साधक के मन में भी शांति और संतोष का संचार होता है।

(D) सामाजिक दृष्टि

पितृपक्ष (Pitru Paksha) में परिवार एकत्र होता है, पूर्वजों को स्मरण करता है और गरीबों की सहायता करता है। इससे समाज में सहयोग, दानशीलता और एकता की भावना मजबूत होती है। परिवार में प्रेम बढ़ते देख उनकी आत्मा को शांति का अनुभव होता है |

(E) वैज्ञानिक दृष्टि

मौसम परिवर्तन के इस समय में सात्त्विक और पौष्टिक भोजन का महत्व और भी बढ़ जाता है। इसके साथ ही परंपराएँ हमें अनुशासित जीवन जीने और संयम का अभ्यास करने की प्रेरणा देती हैं।

(F) पितृपक्ष (Pitru Paksha) का संदेश

  • अपने पूर्वजों का सम्मान करें।
  • दान और परोपकार को जीवन का अंग बनाएँ।
  • परंपराओं और संस्कारों को अगली पीढ़ी तक पहुँचाएँ।
  • जीवन में संयम और सात्त्विकता का पालन करें।

13. समापन विचार

पितृपक्ष (Pitru Paksha) हमें यह सिखाता है कि इंसान का जीवन केवल व्यक्तिगत अस्तित्व नहीं है, बल्कि वह एक लंबी परंपरा, वंश और संस्कृति का हिस्सा है। पूर्वजों के स्मरण और उनकी आत्मा की शांति के लिए किए गए अनुष्ठान हमें यह एहसास कराते हैं कि हमारी सफलता और समृद्धि में उनका भी उतना ही योगदान है।

इस प्रकार पितृपक्ष (Pitru Paksha) केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह हमें अपने अतीत से जोड़ता है, वर्तमान को मजबूत करता है और भविष्य को दिशा देता है।

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